दिल्ली में छात्र आंदोलन और पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अब पेपर लीक मामलों में जवाबदेही तय करने को लेकर कर्नाटक की राजनीति गरमा गई है। दरअसल, भर्ती परीक्षाओं की सुचिता सुनिश्चित करना हर चुनी हुई सरकार की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है। लेकिन मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के उस बयान पर विवाद खड़ा हो गया है, जिसमें उन्होंने कहा कि यदि राज्य में भविष्य में किसी भर्ती परीक्षा का पेपर लीक होता है तो संबंधित जिले के डिप्टी कमिश्नर को जिम्मेदार माना जाएगा। राज्य सरकार भर्ती परीक्षाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बजाय पहले से ही अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराने जा रही है। दिलचस्प यह है कि जब केंद्र सरकार के अधीन किसी पेपर लीक की बात आती है तो राहुल गांधी और कांग्रेस शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग करती है। लेकिन जब अपनी सरकार की बारी आती है तो पिछले दरवाजे से बचने का प्रयास करती है। भाजपा ने इसे लेकर कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है और इसे राजनीतिक पाखंड बताया है। पार्टी का कहना है कि परीक्षा प्रणाली की जवाबदेही अंततः सरकार और मुख्यमंत्री की होती है।
कांग्रेस कर्नाटक की सत्ता में अपना रही है दोहरे मापदंड
दिल्ली में कांग्रेस का तंत्र शिक्षा मंत्री के इस्तीफों की मांग करता है और पूरे देश को जवाबदेही का पाठ पढ़ाता है लेकिन कर्नाटक में वही कांग्रेस सरकार अपनी असली सोच जाहिर कर रही है। दरअसल, विपक्ष में रहते हुए राष्ट्रीय स्तर पर तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करने वाली कांग्रेस आज कर्नाटक की सत्ता में दोहरे मापदंड अपना रही है। जब नीति बनाने वाले और सत्ता का मलाईदार सुख भोगने वाले कांग्रेस के नेता खुद को हर विफलता से बरी कर सारा दोष नीचे के अधिकारियों पर मढ़ देते हैं, तो यह न केवल लोकतंत्र का मखौल है बल्कि लाखों युवाओं के भविष्य के साथ किया जा रहा क्रूर राजनीतिक पाखंड भी है।

दिल्ली में राहुल के उपदेश, बेंगलुरु में कांग्रेस का शुतुरमुर्गी रवैया
विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक ने शिवकुमार के इस बयान पर कहा कि यह कांग्रेस का ऐसा मॉडल है जिसमें राजनीतिक वर्ग को बचाया जाता है और दोष नीचे के अधिकारियों पर डाल दिया जाता है। अशोक ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा,‘‘ राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और डी.के. शिवकुमार- तीन चेहरे हैं, लेकिन इनमें राजनीतिक पाखंड एक जैसा है। दरअसल, दिल्ली की सड़कों पर जब छात्र राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) और तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे, तब कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नैतिकता और जवाबदेही के बड़े-बड़े भाषण दे रहे थे। उस समय कांग्रेस का स्पष्ट रुख था कि परीक्षा प्रणाली की विफलता की अंतिम जिम्मेदारी राजनीतिक नेतृत्व की होती है। लेकिन जैसे ही सुई कर्नाटक की तरफ घूमी, कांग्रेस का वह नैतिक चश्मा उतर गया। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार का हालिया बयान और उस पर राहुल-प्रियंका की चुप्पी इसी वैचारिक खोखलेपन को उजागर करती है।
Rahul Gandhi. Priyanka Gandhi. D.K. Shivakumar. Three faces. One hypocrisy.
In Delhi, the Congress ecosystem demands resignations and lectures the nation on accountability.
In Karnataka, the same Congress government has exposed its real mindset.
CM @DKShivakumar is not talking… pic.twitter.com/MYofvT9nVP
— R. Ashoka (@RAshokaBJP) July 26, 2026
जब नीतियां बेंगलुरु से तय तो डीसी बलि का बकरा क्यों?
एक बुनियादी सवाल यह उठता है कि किसी भी राज्य में भर्ती परीक्षाओं की नियमावली, प्रश्नपत्रों की छपाई, परीक्षा केंद्रों का आवंटन और सुरक्षा प्रोटोकॉल का निर्धारण राज्य के गृह मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय और मुख्यमंत्री कार्यालय के स्तर पर होता है। जिला स्तर के अधिकारी केवल उन आदेशों का पालन कराने वाले माध्यम होते हैं। अगर राज्य मुख्यालय स्तर पर बैठे सिंडिकेट से पेपर लीक होता है, या प्रिंटिंग प्रेस से गोपनीयता भंग होती है, तो उसमें किसी जिले का डिप्टी कमिश्नर कैसे जिम्मेदार हो सकता है? यह सीधे तौर पर ‘क्रेडिट हमारा, दोष तुम्हारा’ वाली सामंती मानसिकता को दर्शाता है, जहां राजनेता मलाई खाते हैं और संकट आने पर नौकरशाही को ढाल बना देते हैं। सीएम डी.के. शिवकुमार का यह फरमान प्रशासनिक सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ है। यह प्रशासनिक अराजकता को जन्म देगा, जहां अधिकारी डरे रहेंगे और राजनेता अपनी फाइलों को साफ सुथरा रखकर जनता के सामने दूध के धुले बने रहेंगे।
नेता प्रतिपक्ष का प्रहार: ‘राजनीतिक पाखंड का कांग्रेस मॉडल’
विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक ने इस मुद्दे पर सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कांग्रेस के इस मॉडल की धज्जियां उड़ा दी हैं। उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर जो लिखा, वह इस समय कर्नाटक की जनता और युवाओं की आवाज बन चुका है। अशोक ने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और डी.के. शिवकुमार को एक ही सिक्के के तीन पहलू बताते हुए इसे ‘राजनीतिक पाखंड का कांग्रेस मॉडल’ करार दिया। यह आरोप पूरी तरह तर्कसंगत प्रतीत होता है। यदि दिल्ली में बैठे केंद्रीय मंत्री को देश में होने वाली परीक्षाओं के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, तो कर्नाटक में होने वाले घोटालों के लिए मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार खुद को इस जिम्मेदारी से अलग कैसे कर सकते हैं? क्या कर्नाटक के मुख्यमंत्री और मंत्रियों की कुर्सी सिर्फ उद्घाटन करने और ट्रांसफर-पोस्टिंग के उद्योग को चलाने के लिए है?
युवाओं के सपनों की हत्या और जवाबदेही से भागती सरकार
प्रतियोगी छात्र सालों तक तंग कमरों में रहकर, भूखा-प्यास रहकर, अपने माता-पिता की गाढ़ी कमाई को कोचिंग और किताबों में झोंककर परीक्षा की तैयारी करता है। जब परीक्षा का दिन आता है, और कुछ घंटों बाद खबर मिलती है कि ‘पेपर लीक’ हो गया, तो वह केवल एक परीक्षा रद्द नहीं होती, बल्कि एक पूरे परिवार की उम्मीदें और एक युवा का मानसिक संतुलन टूट जाता है। ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर सरकार को बेहद आक्रामक होकर लीक करने वाले माफियाओं के खिलाफ बुलडोजर चलाना चाहिए था। लेकिन इसके उलट, कर्नाटक की कांग्रेस सरकार प्रशासनिक तू-तू मैं-मैं में उलझ गई है। सरकार का यह रवैया दिखाता है कि उसे युवाओं के भविष्य की कोई चिंता नहीं है।
इस्तीफा तो मुख्यमंत्री और शिक्षामंत्री का होना चाहिए
लोकतंत्र में अंतिम जवाबदेही हमेशा जनता द्वारा चुनी गई कैबिनेट की होती है। नौकरशाही केवल सरकार की नीतियों को लागू करने का साधन है। भाजपा का यह तर्क बिल्कुल सही है कि यदि भविष्य में कर्नाटक के भीतर एक भी पेपर लीक होता है, तो उसका सीधा और एकमात्र इस्तीफा मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री को देना चाहिए। दिल्ली में खुद राहुल गांधी भी इसके पक्षधर थे और तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रहे थे। इसलिए सीएम डी.के. शिवकुमार अपने गैर-जिम्मेदाराना बयानों से राज्य के प्रशासनिक ढांचे को पंगु बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। नौकरशाही को बलि का बकरा बनाकर कांग्रेस राजनेता अपनी चमड़ी नहीं बचा सकते। कर्नाटक के युवाओं को खोखले अल्टीमेटम नहीं, बल्कि एक सुरक्षित, पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त परीक्षा प्रणाली चाहिए।
You are the one who has harmed the future of our youth the most.
You allowed and encouraged the total capture and destruction of our education system – and protected every person responsible for it.
The students’ demands are clear:
1. Sack Dharmendra Pradhan.
2. Apologise to… https://t.co/0MK4wPMNiK— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) July 23, 2026
दागदार अतीत: पीएसआई और केपीएससी घोटालों में लिप्तता
कर्नाटक में पेपर लीक और भर्ती घोटाले कोई नई बात नहीं हैं। यही वजह है कि सीएम शिवकुमार का यह बयान और भी ज्यादा संदेहास्पद और आक्रामक विरोध के योग्य हो जाता है। राज्य अभी कुछ ही समय पहले हुए 545 पुलिस सब-इंस्पेक्टर (PSI) भर्ती घोटाले के दंश से उबरा नहीं है, जिसमें ओएमआर शीट में बड़े पैमाने पर हेरफेर की गई थी और एडीजीपी स्तर के आईपीएस अधिकारी तक को जेल जाना पड़ा था। इसके अलावा कर्नाटक लोक सेवा आयोग (KPSC) की परीक्षाओं में लगातार लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोप और असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा के पेपर लीक मामले ने राज्य की साख को धूल में मिला दिया था। इन तमाम घोटालों का पैटर्न गवाही देता है कि धांधली हमेशा शीर्ष स्तर पर बैठे नेताओं, बिचौलियों और बड़े अधिकारियों के गठजोड़ से होती है। जिला स्तर का कोई डीसी इस तरह के राज्यव्यापी सिंडिकेट को नहीं चलाता। अतीत के इन घोटालों से सबक लेने के बजाय सरकार पहले से ही अपनी विफलता का ठीकरा फोड़ने के लिए एक नया सिर ढूंढ रही है।
ಕೆಪಿಎಸ್ಸಿಯ ಪಶುವೈದ್ಯಾಧಿಕಾರಿಗಳ ನೇಮಕಾತಿಯಲ್ಲಿ ₹80 ಲಕ್ಷದವರೆಗೆ ಲಂಚ ಪಡೆದಿರುವ ಗಂಭೀರ ಆರೋಪಗಳು ಕರ್ನಾಟಕದ ಲಕ್ಷಾಂತರ ಉದ್ಯೋಗಾಕಾಂಕ್ಷಿಗಳ ನಂಬಿಕೆಗೆ ದೊಡ್ಡ ಆಘಾತ ನೀಡಿವೆ.
ಇಂತಹ ಸಂದರ್ಭದಲ್ಲಿ ಕೆಪಿಎಸ್ಸಿಯೇ ತನ್ನ ವಿರುದ್ಧದ ಆರೋಪಗಳನ್ನು ಆಂತರಿಕವಾಗಿ ತನಿಖೆ ನಡೆಸುವುದರಿಂದ ಸತ್ಯ ಹೊರಬರುವುದಿಲ್ಲ; ಸಾರ್ವಜನಿಕರ ವಿಶ್ವಾಸವೂ… pic.twitter.com/jK9hwmVyXO
— R. Ashoka (@RAshokaBJP) July 27, 2026









