झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) द्वारा आयोजित सहायक वन संरक्षक एवं वन क्षेत्र पदाधिकारी (ACF/FRO) मुख्य परीक्षा में स्ट्रॉन्ग रूम का ताला खोलकर ओएमआर शीट और कॉपियां बदलने के खुलासे ने राज्य में राजनीतिक भूचाल ला दिया है। यह कोई सामान्य परीक्षा अनियमितता नहीं, बल्कि सरकारी संरक्षण में सुनियोजित ‘पेपर लूट’ का प्रत्यक्ष प्रमाण है। सत्ता के शीर्ष संरक्षण में योग्य अभ्यर्थियों को दरकिनार कर बैकडोर से नौकरियां बांटने का घिनौना खेल खेला गया है। अपनी नाकामी छुपाने के लिए लोकतांत्रिक तरीके से न्याय मांग रहे छात्रों पर लाठीचार्ज कराकर संगीन मुकदमे दर्ज करा दिए गए। जेएमएम-कांग्रेस गठबंधन सरकार के इस दमनकारी रवैये के खिलाफ अब भारतीय जनता पार्टी ने आर-पार की जंग छेड़ दी है। आगामी 8 से 11 सितंबर तक भाजपा कार्यकर्ता राज्य के सभी 24 जिलों में उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक कार्यालयों का पूर्ण घेराव करेंगे।
बीजेपी का राज्यव्यापी घेराव 8 सितंबर से
युवाओं के भविष्य के साथ हुए इस छल के विरोध में भारतीय जनता पार्टी ने निर्णायक संघर्ष का शंखनाद कर दिया है। 8 से 11 सितंबर तक चलने वाले इस राज्यव्यापी घेराव में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ हजारों पीड़ित छात्र और उनके अभिभावक शामिल होंगे। इस आंदोलन के जरिए सभी जिलों में प्रशासनिक भवनों के समक्ष धरना देकर परीक्षा माफिया और सरकार के नापाक गठजोड़ की पोल खोली जाएगी। भाजपा का स्पष्ट रुख है कि लाठी-गोली और पुलिसिया दमन के बल पर युवाओं की आवाज दबाई नहीं जा सकती। पार्टी का यह सड़क स्तरीय प्रदर्शन तब तक जारी रहेगा जब तक दोषियों की शिनाख्त कर उन्हें जेल नहीं भेजा जाता।
छात्रों की आवाज़ दबेगी नहीं, हक की लड़ाई रुकेगी नहीं!
JPSC-JSSC घोटालों की निष्पक्ष CBI जांच और छात्रों पर दर्ज फर्जी मुकदमे वापस लेने की मांग को लेकर भाजपा झारखंड का जोरदार आंदोलन।
DC-SP कार्यालय घेराव
📅 8 सितंबर
📍 रांची | दुमका | हजारीबाग | जमशेदपुर | गढ़वायुवाओं के न्याय… pic.twitter.com/net1tFGsMx
— Geeta kora (@Geetakora1) September 7, 2026
सामान्य गड़बड़ी नहीं, संगठित भर्ती माफिया का खेल
जांच में सामने आ रहे विवरण यह सिद्ध करते हैं कि यह मानवीय भूल नहीं, बल्कि तंत्र द्वारा सुनियोजित तरीके से अंजाम दी गई संगठित डकैती है। अति-सुरक्षित वज्रगृह (स्ट्रॉन्ग रूम) के सीलबंद बक्से खोलकर मूल उत्तर पुस्तिकाओं को बाहर निकालना और ओएमआर में मनचाहे बदलाव करना किसी सिंडिकेट का ही काम हो सकता है। यह पूरा षड्यंत्र बिना उच्च प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत और सियासी शह के संभव ही नहीं था। परिणाम यह हुआ कि परीक्षा प्रणाली की न्यूनतम निष्पक्षता भी पूरी तरह समाप्त हो गई। इस संगठित सिंडिकेट ने आयोग की विश्वसनीयता की नींव को पूरी तरह खोखला कर दिया है।
छात्रों पर लाठियां और राहुल गांधी की चुप्पी
देशभर में रोजगार और परीक्षा सुधार पर बड़े-बड़े दावे करने वाले कांग्रेस नेतृत्व का दोहरा चरित्र इस घटना से पूरी तरह उजागर हो गया है। रांची में अपने जायज अधिकारों की मांग कर रहे निहत्थे अभ्यर्थियों पर पुलिस ने बर्बरता से लाठियां भांजीं, जिस पर पूरा विपक्ष स्तब्ध है। राष्ट्रीय स्तर पर छात्रों का मसीहा बनने का दावा करने वाले राहुल गांधी इस लाठीचार्ज और एफआईआर पर पूरी तरह मौन साधे हुए हैं। झारखंड में अपनी ही गठबंधन सरकार की इस बर्बरता पर उन्होंने ‘गांधी जी के तीन बंदर’ की मुद्रा अपना रखी है। यह आपराधिक चुप्पी साबित करती है कि युवाओं की पीड़ा विपक्षी दलों के लिए केवल चुनावी मंचों पर भुनाने का औजार मात्र है।
झारखंड के प्रोटेस्ट में भी हुई लाठी चार्ज, जूते चप्पल छोड़कर भागे छात्र। pic.twitter.com/SQbLRAmDDN
— Abhimanyu Singh (@Abhimanyu1305) August 12, 2026
प्रशासनिक तंत्र का दुरुपयोग और युवा वर्ग से विश्वासघात
झारखंड में वर्तमान गठबंधन सरकार के कार्यकाल के दौरान लगभग हर प्रतियोगी परीक्षा किसी न किसी विवाद, पेपर लीक या धांधली की भेंट चढ़ी है। निष्पक्ष जांच कराने के स्थान पर पूरी प्रशासनिक मशीनरी को माफियाओं और दलालों के बचाव में ढाल की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा है। दूरदराज से आकर दिन-रात पसीना बहाने वाले सामान्य परिवारों के अभ्यर्थियों को इस लचर व्यवस्था ने बार-बार छला है। जब भर्ती कराने वाले नियामक ही भ्रष्टाचार के औजार बन जाएं, तो संवैधानिक व्यवस्था से लोगों का भरोसा उठने लगता है। आयोग का यह पतन सीधे तौर पर सत्ता में बैठे नीति-नियंताओं की गैर-जिम्मेदारी को रेखांकित करता है।
रोजगार के वादों का छलावा और युवाओं से दोहरा विश्वासघात
जेएमएम और कांग्रेस गठबंधन ने सत्ता में आते समय युवाओं को बड़े पैमाने पर सरकारी नौकरियां देने अथवा बेरोजगारी भत्ता देने का पुरजोर भरोसा दिलाया था। सत्ता में लगातार बने रहने के बावजूद नई नियुक्तियां देना तो दूर, पूर्व से विज्ञापित पदों की प्रक्रियाएं भी विवादों और घोटालों की भेंट चढ़ाई जा रही हैं। रोजगार के नाम पर युवाओं को सुनहरे सपने दिखाए गए, परंतु धरातल पर केवल नियुक्तियों की नीलामी और भ्रष्टाचार ही देखने को मिला है। लगातार मिले जनादेश के बाद भी रोजगार की प्रतीक्षा कर रहे लाखों नौजवानों को आज सिर्फ आश्वासनों की घुट्टी पिलाई जा रही है। अपने मूल वादों से इस कदर मुकर जाना और दोबारा अवसर मिलने के बाद भी परीक्षा माफियाओं को संरक्षण देना राज्य की युवा शक्ति के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात है।
झारखंड में रोजगार के नाम पर महाघोटाला!
कांग्रेस समर्थित JMM सरकार में PGT परीक्षा में 300 में से 299 अंक लाने के बावजूद छात्रा का नहीं हुआ Selection!
ये सवाल झारखंड के हर युवा का है-
हेमंत सरकार जवाब दो… भर्ती का आधार मेरिट है या भ्रष्टाचार?सुनिए, एक मेधावी छात्रा की… pic.twitter.com/uhASK7ZVaY
— BJP (@BJP4India) August 1, 2026
अंतरराज्यीय परीक्षा माफिया का सिंडिकेट
स्ट्रॉन्ग रूम से उत्तर पुस्तिकाओं को बदलने का यह जाल केवल राज्य तक सीमित नहीं, बल्कि अंतरराज्यीय परीक्षा माफियाओं के नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। पड़ोसी राज्यों में दागी घोषित हो चुके भर्ती गिरोहों ने झारखंड को अपना नया सुरक्षित ठिकाना बना लिया है। संगठित दलालों की यह टोली दूसरे प्रदेशों से आकर यहां के केंद्रों और स्ट्रांग रूमों की सुरक्षा में आसानी से सेंध लगा रही है। उच्च स्तरीय संरक्षण के बिना किसी बाहरी गिरोह का आयोग के आंतरिक तंत्र में दखल देना संभव नहीं है। इस अंतरराज्यीय सिंडिकेट की कड़ियों को तोड़े बिना भविष्य में किसी भी परीक्षा की शुचिता सुरक्षित नहीं रखी जा सकती।
करोड़ों के परीक्षा शुल्क की लूट और छात्रों पर आर्थिक बोझ
विभिन्न आयोगों और विभागों द्वारा निकाली गई भर्तियों के नाम पर बेरोजगार छात्र-छात्राओं से आवेदन शुल्क के रूप में भारी राजस्व जुटाया गया। गरीबी और तंगहाली से जूझ रहे छात्रों ने उधार लेकर फॉर्म की फीस भरी और परीक्षा केंद्रों तक यात्राएं कीं। परंतु अंततः परीक्षाएं रद्द कर दी गईं और अभ्यर्थियों की न तो फीस लौटाई गई, न ही यात्रा का खर्च दिया गया। एक तरफ बेरोजगारी की मार और दूसरी तरफ बार-बार परीक्षा शुल्क का यह बोझ छात्रों को आर्थिक रूप से तोड़ रहा है। बिना परीक्षा पूरी कराए करोड़ों रुपये दबाकर बैठ जाना सीधे-सीधे युवाओं की जेब पर डाला गया सरकारी डाका है।
स्कूली शिक्षा की दुर्दशा: फटे कपड़ों में पढ़ने को विवश मासूम
एक तरफ प्रतियोगी परीक्षाओं में भ्रष्टाचार चरम पर है, तो दूसरी ओर बुनियादी स्कूली शिक्षा का ढांचा भी पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। नया शैक्षणिक सत्र शुरू हुए पांच महीने बीत जाने के बाद भी अकेले गुमला जिले के 1304 प्राथमिक और मध्य विद्यालयों के 1.29 लाख बच्चों को पोशाक की राशि नहीं मिली। पैसे के अभाव में छोटे-छोटे बच्चे फटी और छोटी ड्रेस तथा टूटे जूते पहनकर कक्षाओं में बैठने को मजबूर हैं। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि मुख्यालय स्तर से ही पूरे राज्य में पोशाक आवंटन का बजट जारी नहीं किया गया। जो सरकार सरकारी स्कूलों के बच्चों को एक जोड़ी बुनियादी यूनिफॉर्म नहीं दे सकती, उससे राज्य के समग्र विकास की अपेक्षा क्या ही की जा सकती है।
रोटी, कपड़ा, मकान और शिक्षा…ये किसी भी व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताएं हैं। लेकिन झारखंड के गुमला जिले में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले करीब 1.30 लाख बच्चे आज भी फटे-पुराने कपड़ों में स्कूल जाने को मजबूर हैं।
₹1.5 लाख करोड़ का बजट पेश करने वाली सरकार से कम से कम इतनी उम्मीद तो… pic.twitter.com/DKVCuI3jdH
— Mrityunjay Sharma (@MrityunjayS7) September 7, 2026
केंद्रीय जांच से क्यों भाग रही है गठबंधन सरकार?
इस व्यापक फर्जीवाड़े के खुलासे के बाद भी राज्य सरकार केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) या उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश से जांच कराने से लगातार बच रही है। स्थानीय पुलिस स्तर पर जांच का दिखावा करके अहम फॉरेंसिक साक्ष्यों और डिजिटल लॉग को प्रभावित करने की आशंका जताई जा रही है। निष्पक्ष एजेंसी को मामला न सौंपना यह स्पष्ट करता है कि सरकार को अपने ही तंत्र के बड़े चेहरों के बेनकाब होने का भय है। जब तक किसी केंद्रीय और स्वायत्त जांच दल को पूरी जांच नहीं सौंपी जाती, तब तक किसी भी निष्कर्ष की विश्वसनीयता संदिग्ध रहेगी। पारदर्शी जांच से कतराकर शासन ने अपनी भूमिका को और अधिक सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।
आदिवासी और मूलवासी युवाओं के हक पर खुला डाका
‘जल, जंगल, जमीन’ और मूलवासियों के संरक्षण का दम भरने वाली सरकार ने असल में राज्य के सबसे वंचित वर्ग के अधिकारों पर कुठाराघात किया है। जंगलों और ग्रामीण अंचलों से आकर वन विभाग जैसी सेवाओं में अधिकारी बनने का सपना देखने वाले जनजातीय युवाओं की सीटों का सौदा किया गया। जिन पदों पर आदिवासी और पिछड़े वर्ग के प्रतिभावान अभ्यर्थियों का चयन होना चाहिए था, वे पद दलालों के जरिए धनपतियों को सौंप दिए गए। यह केवल एक प्रशासनिक कदाचार नहीं, बल्कि झारखंड के मूल निवासियों के संवैधानिक आरक्षण और आत्मसम्मान पर सीधा प्रहार है।
खराब मौसम में झारखंड के आदिवासी छात्र अपने हक की लड़ाई लड़ रहे,
अगर गाली, फूहड़ता और बदतमीजी करते तो शायद इनको भी लोग प्यार और सम्मान देते pic.twitter.com/4GIeBAPewj
— खुरपेंच (@khurpenchh) July 30, 2026
‘कैश-फॉर-जॉब’ और करोड़ों के काले धन का सिंडिकेट
स्ट्रॉन्ग रूम में सेंधमारी कर उत्तर पुस्तिकाओं की अदला-बदली का यह दुस्साहस केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सैकड़ों करोड़ रुपये के संगठित आर्थिक अपराध का हिस्सा है। एक-एक राजपत्रित पद के लिए अभ्यर्थियों से तीस से पचास लाख रुपये तक की भारी रकम वसूलने की चर्चाएं आम हैं। यह काली कमाई परीक्षा माफिया से होते हुए सत्ता के गलियारों और चुनावी फंडों तक पहुंचाने का सुनियोजित नेटवर्क काम कर रहा था। इस पूरे मामले में मनी ट्रेल की जांच से यह साफ हो सकता है कि युवाओं के भविष्य की नीलामी से जमा काला धन कहां-कहां खपाया गया। जब राज्य की सर्वोच्च भर्ती संस्था ही उगाही और अवैध धन शोधन का केंद्र बन जाए, तो यह पूरे तंत्र के आपराधिक पतन को दर्शाता है। आर्थिक अपराध के इस बड़े सिंडिकेट का पर्दाफाश किए बिना परीक्षा व्यवस्था की बहाली असंभव है।
सचिवालय से लेकर निचले तंत्र तक की मिलीभगत
कड़े सुरक्षा घेरे वाले स्ट्रॉन्ग रूम का सील टूटना किसी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी या छोटे कंप्यूटर ऑपरेटर के बूते की बात नहीं है। यह पूरा षड्यंत्र सचिवालय के वातानुकूलित कमरों में बैठे वरिष्ठ नीति-नियंताओं और भ्रष्ट अधिकारियों के संरक्षण के बिना संभव ही नहीं था। हमेशा की तरह इस बार भी कुछ निचले स्तर के मोहरों को आगे कर मुख्य षड्यंत्रकारियों और सफेदपोश चेहरों को बचाने की पटकथा तैयार कर ली गई है। आयोग के शीर्ष पदाधिकारियों और विभागीय अधिकारियों की भूमिका की गहन पड़ताल किए बिना यह सिंडिकेट कभी खत्म नहीं हो सकता। जब तक उन बड़े मगरमच्छों के नाम सार्वजनिक नहीं किए जाते जिन्होंने इस लूट की पूरी योजना बनाई, तब तक कोई भी कार्रवाई केवल एक दिखावा होगी। सत्ता का संरक्षण प्राप्त इन शीर्ष अफसरों की जवाबदेही तय होना इस लड़ाई का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
झारखंड पब्लिक सर्विस कमीशन (JPSC) की जांच की प्रक्रिया में इस प्रकार के तथ्य सामने आए हैं, जो बहुत हैरान करने वाले हैं और Congress led INDI गठबंधन की छात्र हितों की असली हकीकत को बयान करने वाले हैं।
इस प्रकार के तथ्य सामने आए कि Assistant Conservator of Forests और Forest Range… pic.twitter.com/mMq9z1ILRM
— BJP (@BJP4India) September 5, 2026
प्रतिभा का पलायन और युवाओं का गहराता अवसाद
झारखंड में भर्ती परीक्षाओं के इस अंतहीन भ्रष्टाचार और रद्द होने के चक्र ने राज्य की पूरी युवा पीढ़ी को गहरे मानसिक तनाव में धकेल दिया है। अपनी जवानी के कई बहुमूल्य वर्ष तैयारी में झोंकने के बाद हाथ में केवल लाठियां और मुकदमे मिलने से युवाओं में भारी हताशा फैल रही है। अपनी योग्यता पर भरोसा खो चुके राज्य के प्रतिभाशाली युवा अब दूसरे राज्यों में दिहाड़ी मजदूरी और छोटे-मोटे काम करने को विवश हो रहे हैं। यह स्थिति झारखंड को एक बार फिर पिछड़ेपन और अंधकार के गर्त में धकेल रही है, जहां मेधा की कोई कद्र नहीं बची है। सरकार युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के बड़े-बड़े विज्ञापनों पर जनता का पैसा पानी की तरह बहा रही है, लेकिन हकीकत में उनके भविष्य को बर्बाद कर रही है। जब युवा शक्ति का भरोसा टूटता है, तो राज्य के विकास की पूरी नींव ही चरमरा जाती है।
स्थानीय नीति का छलावा और युवाओं से खुला विश्वासघात
जेएमएम और कांग्रेस गठबंधन ने सत्ता में आने के लिए स्थानीय नीति और स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता देने के नाम पर बड़े-बड़े वादे किए थे। परंतु सत्ता हाथ में आते ही भर्ती प्रक्रियाओं की चाबियां परीक्षा माफिया और बाहरी सिंडिकेट के हाथों में सौंप दी गईं। स्थानीय युवाओं के रोजगार की रक्षा करने का दावा करने वाली सरकार में आज राज्य का योग्य नौजवान दर-दर की ठोकरें खाने को विवश है। पारदर्शी नीति बनाने के बजाय ऐसी व्यवस्था खड़ी कर दी गई जहां केवल धनबल और राजनीतिक पहुंच से नौकरियां हासिल की जा सकें। यह झारखंड की अस्मिता, स्थानीय पहचान और मूल अधिकारों पर खुला प्रहार है जो सरकार के दोहरे चरित्र को उजागर करता है। युवाओं को भावनात्मक रूप से बरगलाकर सत्ता हासिल करने वालों का यह छलावा अब खुलकर जनता के सामने आ चुका है।
दागी और विवादित एजेंसियों पर सरकार की मेहरबानी
परीक्षा के संचालन, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा और डिजिटल प्रबंधन की जिम्मेदारी ऐसी निजी कंपनियों को सौंपी गई जो पहले से ही कई राज्यों में कटघरे में रही हैं। सरकारी स्तर पर सुरक्षित और विश्वसनीय माध्यमों को जानबूझकर दरकिनार कर दागी फर्मों को काम देना किसी बड़ी मिलीभगत का स्पष्ट प्रमाण है। पूर्व में हुए घोटालों से सबक लेने के बजाय उन्हीं विवादित वेंडरों पर भरोसा जताना यह दर्शाता है कि यह चूक नहीं, बल्कि सुनियोजित षड्यंत्र था। इन निजी एजेंसियों और सत्ताधारी तंत्र के बीच के गठजोड़ ने पूरी चयन प्रक्रिया को पूरी तरह संदिग्ध बना दिया है। जब संस्थाएं ही संदिग्ध ठेकेदारों को सुरक्षा का जिम्मा सौंपने लगें, तो निष्पक्षता की उम्मीद करना बेमानी साबित होता है। इस पूरे ठेका आवंटन और आयोग की संदिग्ध कार्यप्रणाली की स्वतंत्र वित्तीय जांच होना अत्यंत आवश्यक है।
झारखंड में छात्रों ने प्रदर्शन किया और पूरे देश ने उनका साथ दिया। लेकिन अब जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, यह सामने आ रहा है कि जिस कंपनी TDPL को परीक्षा कराने की जिम्मेदारी झारखंड सरकार ने दी थी, वो एक ब्लैकलिस्टेड कंपनी थी और उसने अभी तक टेंडर तक जारी नहीं किया है।
TDPL ने आगे… pic.twitter.com/mtUoDw6m4Y
— BJP (@BJP4India) September 3, 2026

अदालत की फटकार और सरकार की हठधर्मिता
झारखंड लोक सेवा आयोग की कार्यप्रणाली पर पूर्व में भी माननीय उच्च न्यायालय द्वारा कई बार गंभीर टिप्पणियां की जा चुकी हैं और व्यवस्था सुधार के निर्देश दिए गए हैं। इसके बावजूद वर्तमान गठबंधन सरकार ने न्यायिक हस्तक्षेपों और चेतावनियों से कोई सबक नहीं लिया और सुधार के सारे दरवाजे बंद रखे। प्रशासनिक गलतियों को सुधारने के बजाय आयोग के बचाव में सरकारी वकीलों की फौज खड़ी कर जनता की गाढ़ी कमाई का दुरुपयोग किया गया। जब संवैधानिक और न्यायिक संस्थाओं के दिशा-निर्देशों की भी खुलेआम अनदेखी की जाने लगे, तो यह शासन के अहंकार की पराकाष्ठा है। न्यायालय के आदेशों को ठेंगे पर रखकर मनमाने ढंग से परीक्षाएं कराना युवाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों का खुला हनन है। सरकार की इसी हठधर्मिता के कारण आज राज्य की सर्वोच्च चयन संस्था की विश्वसनीयता पूरी तरह शून्य हो चुकी है।
कर्ज और तंगहाली के बोझ तले दबे किसान-मजदूर परिवार
झारखंड के गांवों में रहने वाले गरीब किसान और मजदूर अपने खेत गिरवी रखकर और ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज लेकर अपने बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराते हैं। सालों तक रूखी-सूखी खाकर बच्चे इस उम्मीद में मेहनत करते हैं कि एक दिन सरकारी सेवा में आकर अपने परिवार को गरीबी के दलदल से बाहर निकालेंगे। स्ट्रॉन्ग रूम से कॉपियों की हेराफेरी केवल एक परीक्षा का घोटाला नहीं, बल्कि उन हजारों गरीब परिवारों के खून-पसीने और अरमानों पर सीधा हमला है। जब पैसे के दम पर अमीर और रसूखदार लोग नौकरियां खरीद लेते हैं, तो उन गरीब परिवारों पर कर्ज और निराशा का ऐसा पहाड़ टूटता है जिसकी भरपाई असंभव है। सत्ता के संरक्षण में चल रहे इस खेल ने सैकड़ों घरों के चूल्हों को बुझाने और मेहनतकश मां-बाप के सपनों को रौंदने का जघन्य पाप किया है।
उम्र सीमा पार होते युवाओं की लाचारी और छीना गया भविष्य
झारखंड में पिछले कई वर्षों से लगातार परीक्षाएं लटकने, पेपर रद्द होने और घोटालों के कारण हजारों मेधावी अभ्यर्थी भर्ती की अधिकतम उम्र सीमा पार कर चुके हैं। युवाओं के जीवन के सबसे अनमोल और ऊर्जावान साल इस भ्रष्ट व्यवस्था और लालफीताशाही की भेंट चढ़ गए हैं। अब हालात यह हैं कि अपनी कोई गलती न होने के बावजूद ये युवा भविष्य की किसी भी भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने के योग्य नहीं बचे हैं। सरकार की घोर लापरवाही ने एक पूरी पीढ़ी के सरकारी सेवा में जाने के संवैधानिक अधिकार की उम्रदराज हत्या कर दी है। जिन युवाओं को समाज और राज्य के निर्माण में योगदान देना था, उन्हें व्यवस्था ने लाचार बनाकर सड़कों पर भटकने के लिए छोड़ दिया है। इस अपराध की भरपाई किसी भी सरकारी मुआवजे या खोखले वादे से नहीं हो सकती।
झारखंड के छात्रों की मागों को जरूर सुनना चाहिए।
जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किया और शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा लिया। लेकिन झारखंड में कोई शिक्षा मंत्री ही नहीं है। झारखंड इससे बेहतर का हकदार है।
छात्र अधिकतम उम्र सीमा पार कर रहे हैं। लेकिन झारखंड सरकार में कोई जवाबदेही नहीं है।… pic.twitter.com/OqzjQg2JLZ
— Panchjanya (@epanchjanya) August 1, 2026
सुरक्षा की धज्जियां: स्ट्रॉन्ग रूम के सीसीटीवी और डिजिटल लॉग का रहस्य
आधुनिक दौर में किसी भी संवेदनशील परीक्षा के स्ट्रॉन्ग रूम को 24 घंटे उच्च क्षमता वाले सीसीटीवी कैमरों, बायोमेट्रिक एंट्री और डिजिटल लॉग बुक से लैस रखा जाता है। परंतु कॉपियां बदलने की इस पूरी वारदात के दौरान सुरक्षा प्रोटोकॉल और कैमरों की कार्यप्रणाली पर गहरा रहस्य बना हुआ है। सवाल उठता है कि जब कॉपियों की अदला-बदली हो रही थी, तब क्या कैमरों को जानबूझकर बंद कर दिया गया था या फुटेज को मिटाया गया? बिना किसी तकनीकी साक्ष्य के इतने बड़े स्तर पर छेड़छाड़ होना साबित करता है कि सबूत नष्ट करने की साजिश पहले से तैयार थी। यह कोई सामान्य तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि उच्च स्तर से संचालित पूर्व-नियोजित आपराधिक षड्यंत्र है। इस डिजिटल लॉग और सीसीटीवी बैकअप की स्वतंत्र फॉरेंसिक जांच ही सच सामने ला सकती है।
केंद्रीय भर्ती प्रणालियों के मुकाबले राज्य सरकार की विफलता
जब केंद्र सरकार संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और कर्मचारी चयन आयोग (SSC) जैसी संस्थाओं के माध्यम से देश भर में लाखों अभ्यर्थियों की परीक्षाएं पारदर्शी ढंग से आयोजित करा सकती है, तो झारखंड सरकार महज कुछ हजार पदों की परीक्षा निष्पक्ष तरीके से क्यों नहीं करा पाती? यह अंतर क्षमता का नहीं, बल्कि नीयत और राजनीतिक इच्छाशक्ति का है। केंद्र में जहां योग्यता और मेधा को प्राथमिकता दी जाती है, वहीं राज्य की गठबंधन सरकार में आयोग को वसूली का अड्डा बना दिया गया है। पारदर्शी तकनीकों को अपनाने के बजाय जानबूझकर ऐसी व्यवस्था बनाई गई है जिसमें धांधली की पूरी गुंजाइश रहे। राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं की तुलना में राज्य आयोग का यह पतन सीधे तौर पर शासन की नीतिगत विफलता का परिचायक है। यह अंतर दिखाता है कि मजबूत नेतृत्व और भ्रष्ट तंत्र में क्या फर्क होता है।
कलम थामने वालों पर देशद्रोह व संगीन धाराओं का दमन
अपने लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण आवाज उठाने वाले छात्र-छात्राओं पर पुलिस प्रशासन द्वारा संगीन आपराधिक धाराएं थोपी जा रही हैं। जिन युवाओं के हाथों में किताबें और कलम होनी चाहिए थीं, उन्हें सरकार ने मुकदमों और अदालतों के चक्कर काटने पर विवश कर दिया है। विडंबना यह है कि करोड़ों के वारे-न्यारे करने वाले परीक्षा माफिया खुलेआम सुरक्षा के साथ घूम रहे हैं और न्याय मांगने वाले छात्रों पर लाठियां बरसाई जा रही हैं। सरकार का यह दमनकारी दृष्टिकोण उसकी आंतरिक घबराहट और तानाशाही मानसिकता का खुला सबूत है। असहमति और विरोध को कुचलने के लिए कानून का ऐसा दुरुपयोग किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में अस्वीकार्य है। छात्र शक्ति को डराकर सत्ता बचाने का यह प्रयास शासन के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा।

प्रशासनिक तंत्र फेल, विकास की पटरी से उतरता राज्य
जब राज्य के सर्वोच्च प्रशासनिक पदों पर योग्यता की जगह पैसे और कॉपियां बदलकर चहेतों को बिठाया जाएगा, तो नौकरशाही का चरित्र पूरी तरह भ्रष्ट होना स्वाभाविक है। घूस देकर सेवा में आने वाले ऐसे अधिकारी भविष्य में जनसेवा करने के बजाय केवल अपनी वसूली और भ्रष्टाचार का सिंडिकेट चलाने में व्यस्त रहेंगे। इससे झारखंड की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पंगु हो जाएगी और सरकारी योजनाओं का लाभ कभी भी अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंच सकेगा। अयोग्य अधिकारियों के हाथ में सत्ता की बागडोर जाने से राज्य विकास की दौड़ में कई दशक पीछे चला जाएगा। यह घोटाला सिर्फ आज के युवाओं की नौकरी की लूट नहीं, बल्कि झारखंड के आने वाले कल और पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ तोड़ने की गहरी साजिश है। जब नीति-निर्माता ही अनैतिक तरीके से चुने जाएंगे, तो सुशासन की कल्पना पूरी तरह बेमानी हो जाएगी।
परीक्षा केंद्रों के चयन में खेल और निजी कॉलेजों का सिंडिकेट
सरकारी स्कूलों और प्रतिष्ठित संस्थानों को दरकिनार कर ऐसे दूरदराज के निजी कॉलेजों को परीक्षा केंद्र बनाया गया जिनकी साख पहले से ही कटघरे में रही है। केंद्रों का यह चयन निष्पक्षता के आधार पर नहीं, बल्कि परीक्षा माफियाओं की पहुंच और सुविधा को ध्यान में रखकर किया गया था। निजी केंद्र प्रबंधकों और दलालों के इसी अपवित्र गठबंधन ने स्ट्रॉन्ग रूम और परीक्षा कक्षों की सुरक्षा को पहले से ही खोखला कर रखा था। सीसीटीवी की गैरमौजूदगी और स्थानीय प्रशासन की ढिलाई का फायदा उठाकर कॉपियों की हेराफेरी को आसानी से अंजाम दिया गया। निजी संस्थानों को अनुचित लाभ पहुंचाने और उनके जरिए नौकरियों का सौदा कराने का यह तंत्र सत्ता के संरक्षण के बिना संभव नहीं था। इस पूरे सेंटर-आवंटन प्रक्रिया की भी गहन न्यायिक जांच होनी आवश्यक है ताकि निजी सिंडिकेट का पर्दाफाश हो सके।
महिला अभ्यर्थियों के संघर्ष और स्वावलंबन पर सीधा कुठाराघात
झारखंड के पिछड़े ग्रामीण अंचलों से निकलकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाली बेटियों के लिए यह घोटाला दोहरी मार साबित हुआ है। सीमित संसाधनों, पारिवारिक पाबंदियों और सामाजिक दबावों से लड़कर छात्राएं शहरों में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटती हैं। जब परीक्षाएं रद्द होती हैं या उनमें धांधली की बात सामने आती है, तो परिवारों का भरोसा टूट जाता है और बेटियों की पढ़ाई बंद करा दी जाती है। सरकार के इस भ्रष्टाचार ने सीधे तौर पर राज्य की आधी आबादी के सपनों और स्वावलंबन के मार्ग में कांटे बो दिए हैं। महिला सशक्तिकरण के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाली गठबंधन सरकार की नीतियों ने मेहनती छात्राओं को गहरी निराशा में धकेल दिया है। अपनी योग्यता से आत्मनिर्भर बनने का सपना देखने वाली बेटियों के साथ हुआ यह अन्याय अक्षम्य है।
कोचिंग और हॉस्टल अर्थव्यवस्था पर मंडराता गंभीर संकट
रांची, हजारीबाग और धनबाद जैसे प्रमुख शिक्षा केंद्रों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले संस्थान और उन पर टिकी पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था अब तबाह होने की कगार पर है। लाखों छात्रों की मौजूदगी से चलने वाले छोटे लॉज, मेस, बुक स्टोर, फोटोकॉपी की दुकानें और रिक्शा चालकों की रोजी-रोटी सीधे तौर पर प्रभावित हुई है। लगातार घोटालों और अनिश्चितता के माहौल से तंग आकर छात्र अपने कमरे खाली कर गांवों की ओर लौटने लगे हैं। छात्रों के इस पलायन ने छोटे व्यापारियों और मकान मालिकों की आजीविका पर गहरा प्रहार किया है। सरकार की अक्षमता ने न केवल युवाओं का करियर बर्बाद किया, बल्कि शिक्षा से जुड़े एक पूरे आर्थिक तंत्र को मंदी और भुखमरी की ओर धकेल दिया है। इस आर्थिक बर्बादी के लिए सीधे तौर पर राज्य की अकर्मण्य नीतियां जिम्मेदार हैं।
आरटीआई और ओएमआर कार्बन कॉपी पर रोक से गहराता संदेह
किसी भी पारदर्शी चयन प्रक्रिया की पहली शर्त यह होती है कि छात्रों को परीक्षा के तुरंत बाद ओएमआर शीट की कार्बन कॉपी और कट-ऑफ मार्क्स उपलब्ध कराए जाएं। लेकिन झारखंड लोक सेवा आयोग द्वारा आरटीआई के तहत मांगी गई जरूरी जानकारियों को लगातार दबाने और टालमटोल करने का काम किया गया। छात्रों को अपनी ही उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन की जानकारी न देना यह साबित करता है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। पारदर्शिता से बचने के लिए बनाई गई यह संस्थागत दीवार केवल और केवल भ्रष्टाचार और कॉपियों के बदलाव को छिपाने के लिए खड़ी की गई थी। जब कोई संवैधानिक संस्था सूचनाएं छिपाने में जुट जाए, तो उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना पूरी तरह स्वाभाविक है। यह गोपनीयता छात्रों के विश्वास पर सीधा कुठाराघात है।
पड़ोसी राज्यों से सबक लेने के बजाय माफियाओं को संरक्षण
पड़ोसी राज्यों जैसे बिहार और ओडिशा में जब भी परीक्षा में अनियमितताओं की बात सामने आई, तो वहां की सरकारों ने तुरंत कड़े नकल-रोधी कानून लागू किए और त्वरित गिरफ्तारियां कीं। इसके विपरीत, झारखंड की गठबंधन सरकार ने पड़ोसी राज्यों के सख्त कदमों से सीख लेने के बजाय परीक्षा माफियाओं के आगे घुटने टेक दिए। नकल और धांधली रोकने के लिए ठोस कदम उठाने के बजाय सरकार ने हमेशा गड़बड़ियों पर पर्दा डालने और जांच को भटकाने का काम किया। इसके चलते राष्ट्रीय स्तर पर झारखंड की भर्ती संस्थाओं और यहां से जारी प्रमाणपत्रों की साख पूरी तरह धूल-धूसरित हो चुकी है। अन्य राज्यों के मुकाबले झारखंड का यह पिछड़ापन और माफिया-परस्त रवैया राज्य के युवाओं के लिए एक बड़ा कलंक बन चुका है।
चुनावी जवाबदेही: वोट की चोट से हिसाब होगा चुकता
राज्य का युवा वर्ग अब केवल आश्वासनों, जांच कमेटियों और कागजी बयानों से शांत होने के मूड में बिल्कुल नहीं है। अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए सड़क पर उतरे छात्रों पर लाठियां बरसाकर सरकार ने अपने पतन की पटकथा खुद लिख ली है। लोकतंत्र में जनआक्रोश सबसे बड़ी ताकत होता है और युवाओं के दमन का इतिहास गवाह है कि कोई भी दंभी शासन इसके आगे टिक नहीं सका है। अन्याय और शोषण के इस दौर का हिसाब आने वाले विधानसभा चुनावों में राज्य का प्रत्येक पीड़ित युवा और उसका परिवार अपने मत के अधिकार से करेगा। सत्ता के नशे में चूर गठबंधन सरकार को यह याद रखना चाहिए कि युवाओं के आंसुओं और संघर्ष की उपेक्षा करने वालों को जनता कभी माफ नहीं करती। यह जनाक्रोश अब एक ऐसे राजनीतिक बदलाव की ओर बढ़ रहा है जो इस भ्रष्ट और जनविरोधी व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकने का काम करेगा।
युवाओं के संकल्प से टूटेगा सत्ता का अहंकार
जेएमएम और कांग्रेस गठबंधन की सरकार में झारखंड के युवाओं के परिश्रम और आत्मसम्मान का सरेआम सौदा किया गया है। स्ट्रॉन्ग रूम से कॉपियों की अदला-बदली जैसी शर्मनाक घटना ने यह साफ कर दिया है कि सत्ता की प्राथमिकता रोजगार देना नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का खुला खेल चलाना है। जब तक इस पूरे सिंडिकेट और इसके पीछे बैठे रसूखदार राजनीतिक संरक्षकों को सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता, तब तक व्यवस्था पर भरोसा बहाल नहीं हो सकता। पीड़ित युवाओं के इस संघर्ष को मुकाम तक पहुंचाने के लिए सड़क से लेकर सदन तक निर्णायक लड़ाई लड़ने की जरूरत अब जन-जन तक पहुंच चुकी है। राज्य का युवा वर्ग अब जाग चुका है और वह अपने भविष्य पर हुए इस हमले का कड़ा जवाब लोकतांत्रिक माध्यमों से देने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस अन्याय और दमनकारी नीतियों के खिलाफ शुरू हुआ यह जन-आंदोलन तब तक नहीं थमेगा जब तक पीड़ित छात्रों को उनका हक और न्याय नहीं मिल जाता।










