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BRICS Summit: पीएम मोदी के विजन से डिजिटल से इकोनॉमी तक भारत को मिलेगी नई मजबूती

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने 2016 और 2021 में ब्रिक्स सम्मेलन की अध्यक्षता की है। अब फिर भारत इस प्रभावशाली समूह की कमान संभालने जा रहा है। इस बार हमारे लिए परिस्थितियां और ज्यादा उत्साहवर्धक हैं। दरअसल, पीएम मोदी का विजन ब्रिक्स को केवल राजनीतिक संवाद का मंच बनाए रखने का नहीं, बल्कि व्यापार, डिजिटल इकोनॉमी, तकनीक, निवेश और ग्लोबल साउथ की साझा ताकत का प्रभावी केंद्र बनाने का है। यही दूरदृष्टि भारत को एक ऐसी शक्ति के रूप में स्थापित कर रही है, जो किसी एक धड़े के साथ खड़े होने के बजाय अपने हितों के साथ वैश्विक एजेंडा को भी दिशा देने की ताकत रखता है। बदलती विश्व व्यवस्था में ब्रिक्स के विस्तार और बढ़ते आर्थिक-जनसांख्यिकीय प्रभाव के बीच पीएम मोदी की कूटनीति भारत को संवाद, संतुलन और सहयोग की केंद्रीय धुरी बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इस अर्थ में दिल्ली का ब्रिक्स सम्मेलन पीएम मोदी के उस दीर्घकालिक विजन का अगला पड़ाव है, जिसमें हमारा देश आर्थिक ताकत के साथ तकनीकी और कूटनीतिक नेतृत्व की वैश्विक शक्ति बनकर उभर रहा है।

ब्रिक्स व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग का अहम प्लेटफॉर्म
भारत की मेजबानी में 12-13 सितंबर को 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन उस समय हो रहा है, जब वैश्विक इकोनॉमी युद्ध और ऊर्जा संकट, नई सप्लाई चेन, तकनीकी स्पर्धा और भू-राजनीतिक तनाव के बीच एक नए संतुलन की तलाश में है। ऐसे में हमारे पास ब्रिक्स को व्यापार, डिजिटल भुगतान, निवेश और तकनीकी सहयोग का व्यावहारिक प्लेटफॉर्म बनाने का बेहद अहम अवसर है। भारत के लिए ब्रिक्स अब केवल तेल, गैस, खनिज या पारंपरिक वस्तुओं का बाजार नहीं रहेगा, बल्कि यह सॉफ्टवेयर, फिनटेक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा, ऑनलाइन शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और डिजिटल प्रोफेशनल सेवाओं का विशाल बाजार बनने की तेजी से अग्रसर है। 

डिजिटल सेवाओं में भारत की बढ़त बनेगी सबसे बड़ा हथियार
डिजिटल सेवाओं के कारोबार में भारत की करीब 48 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इतनी ज्यादा हिस्सेदारी केवल आंकड़ा नहीं, बहुत बड़ा बाजार है। ऐसे में सम्मेलन में पहली बार सीमा पार डिजिटल सेवाओं को आसान बनाने की दिशा में ब्रिक्स देशों के बीच साझा सिद्धांतों पर काम होगा। ब्रिक्स देशों के बीच डिजिटल रूप से उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाओं को आसान बनाने के सिद्धांतों को आगे बढ़ाना भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। दरअसल,  ब्रिक्स व्यापार मंत्रियों ने सुरक्षित डिजिटल सेवाओं को सीमा पार उपलब्ध कराने के लिए सिद्धांत अपनाए थे। साथ ही 2030 तक की आर्थिक साझेदारी रणनीति को भी आगे बढ़ाया। इससे भारत की आईटी कंपनियों, स्टार्टअप्स और डिजिटल प्रोफेशनल्स को ब्रिक्स देशों में कारोबार करने के लिए अपेक्षाकृत आसान राह मिलेगी। जिस भारत ने दुनिया को यूपीआई जैसी डिजिटल भुगतान व्यवस्था का सफल मॉडल दिया है, वही भारत अब डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को निर्यात करने वाले देश की भूमिका में भी आ सकता है।

ब्रिक्स व्यापार मंत्रियों ने जयपुर में दी चार समझौतों को मंजूरी
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का एक फायदा यह भी होगा कि आर्थिक लाभ बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से निकलकर छोटे भारतीय कारोबारियों तक भी पहुंचेगा। इस दिशा में भारत ने पहले ही महत्वपूर्ण पहल की है। जयपुर में 7 अगस्त को ब्रिक्स व्यापार मंत्रियों की बैठक में चार समझौतों को मंजूरी दी गई थी। इसके तहत एमएसएमई के लिए ट्रेड फाइनेंस का अंतर कम करने और उन्हें वैश्विक बाजारों तक पहुंच दिलाने के लिए सिद्धांतों पर सहमति बनी बै। इसमें सीमा पार डिजिटल सेवाएं सुगम बनाने के ब्रिक्स सिद्धांत भी शामिल हैं। इन पहलों में निर्यात आधारित एमएसएमई के लिए क्रेडिट आकलन और इनवॉइस डिस्काउंटिंग जैसी व्यवस्थाएं भी हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी छोटे भारतीय इंजीनियरिंग उद्यम को ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका या किसी अन्य ब्रिक्स देश से ऑर्डर मिलता है और उसे भुगतान व वित्तपोषण आसानी से उपलब्ध हो जाता है तो वह घरेलू बाजार से निकलकर वैश्विक सप्लाई चेन का हिस्सा बन जाएगा। यह भारत की रोजगार और उत्पादन क्षमता को गति देने वाला एक अहम कारक भी होगा।

UPI से सीमा पार भुगतान, भारत का डिजिटल मॉडल दुनिया तक
ब्रिक्स सम्मेलन में यूपीआई भारत की सबसे बड़ी ताकतों में से एक बन सकती है। ब्रिक्स देशों के बीच सीमा पार डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने की वकालत भारत ने की है। यदि अलग-अलग देशों की भुगतान प्रणालियां आपस में जुड़ती हैं तो छोटे कारोबारियों, पर्यटकों, छात्रों और प्रवासी भारतीयों के लिए भुगतान आसान और सस्ता हो जाएगा। भारत के लिए इसका महत्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि वह दुनिया के सबसे बड़े रेमिटेंस प्राप्तकर्ता देशों में है। महंगे अंतर्राष्ट्रीय भुगतान नेटवर्क पर निर्भरता कम होने से लेन-देन की लागत घट सकती है। हालांकि डेटा सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे भी अहम हैं।

10 नए वैश्विक बाजारों से नए क्षितिज पर भारतीय कारोबार
ब्रिक्स देशों के विस्तार ने भारत के सामने नए बाजारों का दायरा भी बढ़ाया है। अब यह समूह केवल मूल पांच देशों तक सीमित नहीं है। विस्तारित ब्रिक्स में 11 सदस्य देश हैं और साझेदार देशों का नेटवर्क भी बढ़ा है। इसका सीधा सा अर्थ है कि भारतीय कंपनियों को 10 नए वैश्विक बाजारों से ग्राहक, नए निवेशक और नई आपूर्ति-श्रृंखला तक पहुंच बनाने के अवसर मिल सकते हैं। दवा, ऑटो कंपोनेंट, इंजीनियरिंग सामान, खाद्य प्रसंस्करण, आईटी सेवाएं, अक्षय ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और डिजिटल उत्पाद ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें भारत ब्रिक्स देशों के बाजार में प्रतिस्पर्धी स्थिति बनाने में पूरी तरह सक्षम है।

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत के लिए बड़ा अवसर है। आइए, जानते हैं कि यह भारत को कैसे और किन क्षेत्रों में मजबूती दे सकता है…

1.ग्लोबल वैल्यू चेन में भारत की नई भूमिका
दुनिया अब एक ही देश पर निर्भर सप्लाई चेन से दूर जा रही है। यही भारत के लिए बड़ा अवसर है। ब्रिक्स ने 2026-30 के लिए ग्लोबल वैल्यू चेन से जुड़ी कार्ययोजना को आगे बढ़ाया है, जिसमें रणनीतिक सप्लाई चेन और निवेश सहयोग जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इसकी पूरी संभावना है कि भारत अब फार्मास्यूटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उत्पादन, ऑटोमोबाइल, सेमीकंडक्टर, खाद्य सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में ब्रिक्स देशों के साथ और अधिक दीर्घकालीन साझेदारी बनाएगा, जिससे वह केवल निर्यातक नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक उत्पादन व्यवस्था का अहम केंद्र-बिंदु बन जाएगा।

2. स्टार्टअप, डिजिटल और एआई में अगली छलांग
पीएम मोदी की दूरगामी नीतियों से साफ है कि भारत की अगली आर्थिक छलांग डिजिटल सेवाओं से आगे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्टार्टअप इकोनॉमी में होगी। ब्रिक्स के भीतर स्टार्टअप, एआई और तकनीकी सहयोग को बढ़ाने पर चर्चा हो रही है। ब्रिक्स देशों के स्टार्टअप के लिए साझा फंडिंग, इनोवेशन नेटवर्क और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने से भारतीय युवा कंपनियों को अरबों लोगों तक पहुंच मिलेगी। यह वह क्षेत्र है जहां भारत चीन, अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच अपनी अलग तकनीकी पहचान को और मजबूत बना सकता है।

3. भारत का निर्यात बढ़ाने का बड़ा अवसर
भारत के लिए ब्रिक्स बाजार पहले ही अहम रहा है। आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2025-26 में ब्रिक्स देशों को भारत का वस्तु निर्यात करीब 82 अरब डॉलर रहा, जबकि 2024 में सेवाओं का निर्यात करीब 31.3 अरब डॉलर था। वहीं ब्रिक्स के भीतर कुल वस्तु व्यापार 2024 में करीब 1.17 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका था। इसलिए चुनौती बाजार की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि बाजार तक पहुंच की लागत और प्रक्रियाओं को आसान बनाने की है। भारत का जोर इसी पर रहने वाला है। सीमा शुल्क, भुगतान, व्यापार वित्त और मानकों की जटिलता कम होने से भारत का निर्यात काफी तेजी से बढ़ना तय है।

4. वैश्विक निवेश के लिए भारत की विश्वसनीयता बढ़ेगी
दिल्ली सम्मेलन भारत के लिए निवेश आकर्षित करने का भी बड़ा मंच है। रिपोर्टों के मुताबिक वैश्विक निवेशकों और नेताओं के बीच विशेष संवाद की योजना है, जिसमें बड़े वित्तीय संस्थानों और निवेशकों की भागीदारी होगी। भारत के लिए यह अवसर इसलिए भी अहम है, क्योंकि आज निवेश केवल सस्ता श्रम देखकर नहीं आता। निवेशक डिजिटल बुनियादी ढांचा, राजनीतिक स्थिरता, बाजार का आकार, भुगतान प्रणाली, सप्लाई चेन और दूसरी व्यवस्था भी देखते हैं। ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत को इन सभी खूबियों को एक साथ प्रदर्शित करने का अवसर देगी।

5. ग्लोबल साउथ की और बुलंद आवाज बनेगा भारत
ब्रिक्स की आर्थिक शक्ति जितनी महत्वपूर्ण है, उसका राजनीतिक महत्व उससे कम नहीं है। भारत लंबे समय से ग्लोबल साउथ की आवाज को अधिक प्रभावशाली बनाने की कोशिश कर रहा है। ब्रिक्स भारत को ऐसा मंच देगा, जिससे वह विकासशील देशों की चिंताओं जैसे वित्त, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, तकनीक और वैश्विक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व को मजबूती से उठा सकता है। दरअसल, पीएम मोदी की कूटनीति की विशेषता है कि भारत पश्चिमी देशों के साथ भी रणनीतिक संबंध रखता है और ब्रिक्स के भीतर चीन, रूस तथा अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ भी संवाद कर सकता है। यही रणनीतिक स्वायत्तता भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक पूंजी है।

6. मोदी-जिनपिंग संवाद का आर्थिक और रणनीतिक महत्व
दिल्ली सम्मेलन का एक अलग महत्व भारत-चीन संबंधों से भी जुड़ा है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा सात वर्ष बाद हो रही है। दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को बढ़ाने की काफी संभावनाएं हैं। लेकिन सीमा विवाद, निवेश और तकनीकी सुरक्षा से जुड़े कुछ सवाल भी हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की आपसी बातचीत से आर्थिक रिश्तों में स्थिरता और पारदर्शिता का रास्ता खुलता है तो इसका असर केवल द्विपक्षीय व्यापार तक ही सीमित नहीं रहेगा। इससे पूरे एशियाई क्षेत्र की सप्लाई चेन और निवेश माहौल पर सकारात्मक असर पड़ेगा। यह तय है कि पीएम मोदी यह संतुलन राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए ही बनाएंगे।

7. हमारे लिए ब्रिक्स यानि बड़ा बाजार और बड़ी आवाज
मोदी सरकार की नीतियों में नेशन फर्स्ट के विजन से साफ है कि भारत ब्रिक्स सम्मेलन के मंच को अपने विकास और आर्थिक परिवर्तन का इंजन बनाने की रणनीति पर चलेगा। एक ओर डिजिटल सेवाओं और यूपीआई के जरिए भारत अपनी तकनीकी क्षमता का निर्यात कर सकता है, दूसरी ओर ब्रिक्स सदस्य देशों और साझेदारों के विस्तृत नेटवर्क के जरिए वस्तुओं, सेवाओं और निवेश के नए बाजार खोल सकता है। इसके साथ एमएसएमई को वैश्विक बाजार, स्टार्टअप को निवेश, किसानों और उद्योगों को नए निर्यात अवसर, युवाओं को डिजिटल रोजगार और भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में बड़ी भूमिका मिल सकती है।

BRICS में भारत की मजबूत स्थिति की दस अहम वजह
1.भारत BRICS की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी इकोनॉमी है। 2025 में इसकी ग्रोथ रेट 7.7% और 2026-27 की शुरुआत में 7.8% है, जो चीन, ब्राजील और रूस से कहीं अधिक है।
2.चीन के बाद यह ब्रिक्स की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय कम होने की वजह से इसमें आगे बढ़ने की बहुत अधिक गुंजाइश है।
3. हमारी ग्रोथ अनुशासन पर टिकी है। महंगाई दर बहुत कम और विदेशी कर्ज GDP का सिर्फ 21% है। 691 अरब डॉलर का रिजर्व किसी भी बाहरी झटके से बचाने के लिए काफी है।
4. भारत BRICS का दूसरा सबसे बड़ा बिजली उत्पादक देश है। भारत अपने कुल उत्पादन का 35 प्रतिशत हिस्सा निर्माण कार्यों में लगाता है। 2000 के बाद से इसके रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में 176 गुना बढ़ोतरी हुई है।
5. पिछले एक दशक में हमारी समृद्धि का दायरा लगातार बढ़ रहा है। वर्कफोर्स में महिलाओं की भागीदारी 23 से बढ़कर 40 प्रतिशत हो गई है और अशिक्षा लगभग आधी हो गई है।
6. खेती के मामले में, भारत BRICS में सबसे बड़े खेती वाले इलाके में फार्मिंग करता है। अनाज व फलों के उत्पादन में दूसरे नंबर पर है, जिससे 1.4 अरब लोगों का पेट भरता है।
7. भारत की फैक्ट्रियां तेजी से काम कर रही हैं। ब्रिक्स का दूसरा सबसे बड़ा स्टील उत्पादक देश भारत है और इसका औद्योगिक उत्पादन चीन, ब्राजील या रूस की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है।
8. भारत ने तेजी से विकास करते हुए भी बेरोजगारी दर को सिर्फ़ 3.1 प्रतिशत पर बनाए रखा है। यह ऐसा संतुलन है जिसे अधिकतर बड़ी अर्थव्यवस्थाएं, खासकर BRICS के कुछ साथी सदस्य देश नहीं बना पाए हैं।
9. डिजिटल क्षेत्र में जबरदस्त उछाल आया है। 2000 के बाद से इंटरनेट की पहुंच प्रति हजार लोगों पर 5 यूजर्स से बढ़कर 722 यूजर्स हो गई है, जिससे ऑनलाइन अर्थव्यवस्था और पेमेंट सिस्टम को बढ़ावा मिला है।
10. हमारी आर्थिक रफ्तार स्थिरता और युवा आबादी के मामले में भारत का कोई भी BRICS देश मुकाबला नहीं कर सकता। आने वाले दशक में, भारत ही वह देश है जिस पर सबकी नजर रहेगी।

 

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