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ब्रिक्स में मोदी सरकार का मास्टरस्ट्रोक: स्पेस और AI का ग्लोबल लीडर बनकर उभरा भारत

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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने वैश्विक पटल पर एक नई रणनीतिक शुरुआत की है। पारंपरिक कूटनीतिक भाषणों और पुराने ढर्रे से आगे निकलकर भारत ने विकासशील देशों के सामने ‘ब्रिक्स ओपन-टेक व स्पेस आर्किटेक्चर’ और ‘ब्रिक्स साइंस एंड रिसर्च रिपोजिटरी’ (BRICS Science and Research Repository) का विजनरी खाका पेश किया। पश्चिमी देशों के महंगे पेटेंट और सिलिकॉन वैली के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence – AI) एकाधिकार के सामने भारत ने अपना स्वदेशी स्पेस डेटा, ‘भाषिणी’ (Bhashini) एआई और ओपन-सोर्स फ्रेमवर्क दुनिया के साथ साझा करने का संकल्प दोहराया। यह पहल विकासशील देशों (Global South) को तकनीकी पराधीनता से मुक्त कराने की दिशा में भारत का सबसे बड़ा रणनीतिक कदम है।

पीएम मोदी का दो टूक संदेश: “मानवता का भविष्य तकनीक पर निर्भर, इसे साझा करना होगा”
ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में आयोजित 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के विशेष सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “21वीं सदी में मानवता की समृद्धि और प्रगति तकनीक, विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर निर्भर है। भारत ‘एआई फॉर ऑल’ (AI for All) के मंत्र पर काम कर रहा है। हमें ‘जिम्मेदार एआई’ (Responsible AI) के लिए मिलकर काम करना होगा ताकि डिजिटल दुनिया का फायदा कुछ चुनिंदा हाथों तक सीमित न रहे, बल्कि इसका विस्तार पूरे ग्लोबल साउथ तक हो। तकनीक तभी प्रगति ला सकती है जब उसका लोकतंत्रीकरण (Democratisation) हो। इसी सोच के साथ भारत एक साझा ‘ब्रिक्स साइंस एंड रिसर्च रिपोजिटरी’ बनाने का प्रस्ताव करता है, जिसका लाभ सभी विकासशील देशों को मिले।” प्रधानमंत्री का यह बयान स्पष्ट करता है कि भारत तकनीक को पश्चिमी देशों की तरह केवल मुनाफा कमाने का साधन नहीं, बल्कि पूरी मानवता के कल्याण का माध्यम मानता है।

जी-20 से ब्रिक्स तक: ग्लोबल साउथ के नेतृत्व की अटूट निरंतरता
यह कदम अचानक उठाया गया कोई फैसला नहीं है, बल्कि मोदी सरकार की सोची-समझी वैश्विक रणनीति का अगला बड़ा चरण है। भारत ने जब जी-20 (G20) की ऐतिहासिक अध्यक्षता संभाली थी, तब दुनिया के सबसे शक्तिशाली मंच पर पहली बार डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) और विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को अंतरराष्ट्रीय एजेंडे के केंद्र में रखा गया था। अब उसी कूटनीतिक सफलता को आगे बढ़ाते हुए मोदी सरकार ने ब्रिक्स के मंच पर विकासशील देशों को आधुनिक तकनीक का साझा मंच सौंप दिया है। यह निरंतरता साबित करती है कि भारत अब किसी एक गुट तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ग्लोबल साउथ की सबसे मुखर आवाज बन चुका है।

पश्चिमी डिजिटल गुलामी के दौर का अंत
भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर दुनिया का ध्यान एक नए खतरे की ओर खींचा—तकनीकी उपनिवेशवाद (Tech Colonialism)। मोदी सरकार ने रेखांकित किया कि भविष्य में किसी देश की संप्रभुता केवल सीमाओं या हथियारों से नहीं, बल्कि एआई एल्गोरिदम और सैटेलाइट डेटा के नियंत्रण से तय होगी। यदि विकासशील देश केवल पश्चिमी कंपनियों के डेटाबेस और टूल्स पर निर्भर रहे, तो वे डिजिटल रूप से पराधीन बन जाएंगे। भारत का यह ओपन-सोर्स आर्किटेक्चर लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के उभरते देशों को सिलिकॉन वैली के एकाधिकार से मुक्ति दिलाने वाला सुरक्षा कवच बनकर सामने आया है।

‘वसुधैव कुटुंबकम’ का डिजिटल मॉडल: तकनीक मानवता की साझी धरोहर
पश्चिमी टेक कंपनियां तकनीक को केवल महंगे सॉफ्टवेयर लाइसेंस और अरबों डॉलर की रॉयल्टी वसूलने का जरिया बनाती आई हैं। इसके उलट मोदी सरकार ने भारत के प्राचीन चिंतन ‘वसुधैव कुटुंबकम’ को डिजिटल युग का मूल आधार बना दिया है। भारत ने यह सिद्ध किया है कि उन्नत तकनीक कोई गोपनीय व्यापारिक सौदा नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझी धरोहर (Global Public Good) होनी चाहिए। तकनीक साझा करने की इस नीति ने लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के मंचों पर भारत की नैतिक साख को शीर्ष पर पहुंचा दिया है।

चीन के ‘डिजिटल कर्ज जाल’ के सामने भारत का पारदर्शी विकल्प
तकनीक के विस्तार के नाम पर चीन अक्सर विकासशील देशों को अपने ‘डिजिटल सिल्क रोड’ के जरिए कर्ज के जाल (Debt-Trap) में उलझाता रहा है, जहां उसके हार्डवेयर और सर्विलांस सिस्टम्स पर जासूसी के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। इसके विपरीत, मोदी सरकार द्वारा प्रस्तुत मॉडल पूरी तरह पारदर्शी, ओपन-सोर्स और बिना किसी छिपी शर्त के है। भारत किसी देश को तकनीक देकर उस पर नियंत्रण नहीं करता, बल्कि उसे खुद तकनीकी रूप से सक्षम बनाता है। यही कारण है कि आज ग्लोबल साउथ के देश चीन के संदेहास्पद सिस्टम्स के मुकाबले भारत को एक सुरक्षित और भरोसेमंद साझेदार (Trusted Partner) मान रहे हैं।

इसरो (ISRO) और स्वदेशी एआई टूल्स की खुली पेशकश
आत्मनिर्भर भारत की अंतरिक्ष सफलताओं को साझा करते हुए भारत ने घोषणा की कि इसरो के अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट डेटा और उपग्रह मॉडलिंग टूल्स सभी मित्र देशों के लिए उपलब्ध कराए जाएंगे। इसके साथ ही, भारत का बहुभाषी एआई मॉडल ‘भाषिणी’ (Bhashini Architecture) भी ओपन-सोर्स के रूप में सुलभ होगा। इससे अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों को मौसम की निगरानी, अंतरिक्ष अनुसंधान और स्थानीय भाषाओं में तकनीक के विकास के लिए पश्चिमी दिग्गजों को भारी भरकम रॉयल्टी नहीं चुकानी पड़ेगी।

पश्चिमी अंतरिक्ष एजेंसियों के मुकाबले ब्रिक्स स्पेस नेटवर्क का नेतृत्व
चंद्रयान और सूर्य मिशनों की किफायती और सटीक सफलताओं के बाद पूरी दुनिया इसरो की क्षमताओं का लोहा मान चुकी है। भारत अब ब्रिक्स सैटेलाइट कंसोर्टियम (BRICS Satellite Consortium) में केंद्रीय भूमिका निभाते हुए ग्लोबल साउथ का प्रमुख स्पेस हब बन रहा है। नासा (NASA) और यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ESA) के महंगे प्रोजेक्ट्स के मुकाबले भारत विकासशील देशों के छोटे उपग्रहों को बेहद कम लागत में अंतरिक्ष में स्थापित करने और उनका डेटा साझा करने का नेतृत्व कर रहा है, जिससे अंतरिक्ष विज्ञान पर विकसित देशों का दशकों पुराना नियंत्रण टूट रहा है।

अंतरिक्ष कचरे और पश्चिमी निजी कंपनियों की मनमानी पर लगाम
पश्चिमी निजी कंपनियां हजारों सैटेलाइट्स भेजकर पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit – LEO) में अंतरिक्ष कचरा (Space Debris) और ट्रैफिक का गंभीर संकट खड़ा कर रही हैं। भारत का साझा सैटेलाइट कंसोर्टियम और डेटा-शेयरिंग मॉडल एक स्थायी और जिम्मेदार अंतरिक्ष अन्वेषण (Sustainable Space Exploration) का रास्ता दिखाता है। हर देश को अलग से हजारों सैटेलाइट भेजने के बजाय भारत साझा डेटा नेटवर्क उपलब्ध करा रहा है, जिससे अंतरिक्ष पर्यावरण सुरक्षित रहेगा और संसाधनों की भारी बर्बादी रुकेगी।

विस्तारित ब्रिक्स (BRICS+) के नए सदस्यों के लिए सबसे बड़ा संबल
ब्रिक्स में शामिल हुए नए सदस्य देशों और साझेदार मुल्कों के पास अपने बड़े अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र या उन्नत कंप्यूटिंग लैब्स नहीं हैं। भारत का यह ओपन-सोर्स और स्पेस डेटा आर्किटेक्चर इन देशों के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक आकर्षण बनकर उभरा है। महंगे विदेशी इंफ्रास्ट्रक्चर के बिना इन देशों को सीधे अत्याधुनिक तकनीक की पहुंच मिल रही है। इस खुले दिल से सहयोग करने की नीति ने विस्तारित ब्रिक्स के भीतर भारत को सबसे स्वीकार्य और भरोसेमंद मार्गदर्शक बना दिया है।

‘इंडिया एआई मिशन’ और सस्ती कंप्यूटिंग पावर: विदेशी क्लाउड से आजादी
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के मॉडल विकसित करने में सबसे बड़ी बाधा सिर्फ कोड नहीं, बल्कि बेहद महंगी कंप्यूटिंग पावर (GPUs और सुपरकंप्यूटिंग) होती है। मोदी सरकार ने 10 हजार से अधिक जीपीयू क्षमता तैयार करने के लिए ‘इंडिया एआई मिशन’ (India AI Mission) को मंजूरी देकर इस दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया है। भारत केवल ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर तक सीमित न रहकर ब्रिक्स और मित्र देशों को साझा कंप्यूट इंफ्रास्ट्रक्चर का किफायती मॉडल भी उपलब्ध कराएगा। इससे गरीब और छोटे देशों को पश्चिमी क्लाउड दिग्गजों के आगे भारी फीस चुकाने के लिए विवश नहीं होना पड़ेगा।

पश्चिमी नियमों के बरक्स ग्लोबल साउथ का नैतिक ढांचा: एआई गवर्नेंस में भारत की अगुवाई
अब तक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के नियम और दिशा-निर्देश पश्चिमी देश अपने भू-राजनीतिक और कॉरपोरेट हितों को ध्यान में रखकर तय करते रहे हैं। मोदी सरकार ने सुनिश्चित किया है कि वैश्विक एआई गवर्नेंस की मेज पर विकासशील देशों की आवाज दबाई न जा सके। भारत ‘नैतिक, समावेशी और पारदर्शी एआई’ (Ethical & Inclusive AI) का अंतरराष्ट्रीय ढांचा तैयार करने में ब्रिक्स का स्वाभाविक अगुआ बन चुका है, जिससे भविष्य के नियम कुछ चुनिंदा पश्चिमी देशों की जागीर नहीं रहेंगे।

बिग टेक की डेटा लूट और रॉयल्टी से मुक्ति: ‘किराएदारी मॉडल’ का खात्मा
सिलिकॉन वैली की बड़ी कंपनियां विकासशील देशों की आबादी से मुफ्त में कच्चा डेटा जुटाती हैं, उस डेटा पर अपने एआई मॉडल प्रशिक्षित करती हैं और फिर उन्हीं देशों को महंगे मासिक सब्सक्रिप्शन पर सॉफ्टवेयर बेचती हैं। यह आधुनिक तकनीकी किराएदारी (Rent-Seeking Model) है। मोदी सरकार की ओपन-सोर्स रिपोजिटरी इस आर्थिक शोषण के चक्रव्यूह को तोड़ती है। यह व्यवस्था मित्र देशों को खुद अपने एआई टूल्स विकसित करने का आधार देती है, जिससे इन देशों का अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार बाहर जाने से बचेगा।

अंग्रेजी के वर्चस्व को तोड़ती ‘भाषिणी’: स्थानीय भाषाओं का सशक्तिकरण
दुनिया के प्रमुख पश्चिमी एआई मॉडल मुख्य रूप से अंग्रेजी भाषा और पश्चिमी सोच के अनुसार डिजाइन किए गए हैं, जिनमें विकासशील देशों की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता के प्रति पूर्वाग्रह (Bias) देखने को मिलता है। मोदी सरकार का ‘भाषिणी’ मॉडल इस सांस्कृतिक और भाषाई एकाधिकार को सीधी चुनौती देता है। यह आर्किटेक्चर मित्र देशों को अपनी-अपनी स्थानीय भाषाओं और बोलियों में अत्याधुनिक एआई ऐप्लिकेशंस तैयार करने की आजादी देता है, जिससे भाषा की दीवारें टूट सकें।

डेटा संप्रभुता की गारंटी: सीमाओं के भीतर सुरक्षित रहेगा राष्ट्रीय डेटा
विदेशी या पश्चिमी क्लाउड सर्वर्स पर निर्भर रहने से किसी भी देश का संवेदनशील राष्ट्रीय डेटा बाहरी निगरानी के खतरे में रहता है। भारत का ओपन-सोर्स मॉडल हर देश को यह संप्रभु अधिकार देता है कि उसका संवेदनशील डेटा उसके अपने देश की भौगोलिक सीमाओं के भीतर ही प्रोसेस और स्टोर हो (Data Localization)। मोदी सरकार का यह सुरक्षा दृष्टिकोण विकासशील देशों को साइबर जासूसी, डेटा लीकेज और विदेशी राजनीतिक दखल से पूरी तरह सुरक्षित करता है।

एआई जनित खतरों और डीपफेक के खिलाफ साझा सुरक्षा कवच
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के अंधाधुंध प्रसार के साथ डीपफेक (Deepfake), गलत सूचनाओं और विदेशी साइबर हमलों का खतरा गंभीर होता जा रहा है। भारत ने अपने मजबूत साइबर सुरक्षा तंत्र के जरिए इन खतरों की रोकथाम के लिए विशेष टूल्स तैयार किए हैं। इस ओपन-सोर्स फ्रेमवर्क के तहत भारत ब्रिक्स देशों को साइबर सुरक्षा और एआई सेफ्टी से जुड़े टूल्स तथा दिशा-निर्देश साझा करेगा, ताकि विकासशील देशों के लोकतांत्रिक तंत्र और नागरिकों की डिजिटल पहचान सुरक्षित रह सके।

पुरानी सुस्ती बनाम मोदी सरकार की फ्यूचर-रेडी कूटनीति
दशकों तक भारत की विदेश नीति केवल कागजी बयानों और गुटनिरपेक्षता के पुराने ढर्रे तक सीमित रही। वहीं मोदी सरकार ने आधुनिक तकनीक को कूटनीति का सबसे बड़ा रणनीतिक अस्त्र बना दिया है। जहां पिछली सरकारों के समय भारत केवल विदेशी तकनीक का खरीदार और उपभोक्ता (Consumer) बना रहता था, वहीं आज भारत पूरी दुनिया को समाधान देने वाला प्रदाता (Provider) बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तकनीक के लोकतंत्रीकरण का झंडा उठाकर भारत ने अपने रणनीतिक प्रभाव को अभूतपूर्व ऊंचाई दी है।

भारतीय युवाओं और डीप-टेक स्टार्टअप्स के लिए ग्लोबल अवसर
इस नीतिगत पहल का सबसे बड़ा आर्थिक लाभ भारत के युवा इनोवेटर्स को मिलने जा रहा है। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और दिल्ली-एनसीआर के डीप-टेक (Deep-Tech) स्टार्टअप्स के लिए अब दर्जनों देशों के बाजार सीधे खुल रहे हैं। जब ब्रिक्स देश भारत के एआई और स्पेस ढांचे को अपनाएंगे, तो सॉफ्टवेयर इंटीग्रेशन, मेंटेनेंस, साइबर सुरक्षा और स्पेस ऐप्लिकेशंस के बड़े अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स भारतीय कंपनियों और प्रोफेशनल्स को मिलेंगे। इससे देश में वेंचर कैपिटल (Venture Capital) निवेश बढ़ेगा और प्रतिभा का पलायन (Brain Drain) रुककर देश में ही नए ग्लोबल अवसर तैयार होंगे।

इससे भारत को क्या रणनीतिक फायदा होगा?
इस कदम से भू-राजनीतिक (Geopolitical) स्तर पर भारत का प्रभाव कई गुना बढ़ेगा। जब अनेक विकासशील देश भारत के स्पेस डेटा और एआई प्लेटफॉर्म पर निर्भर होंगे, तो संयुक्त राष्ट्र (UN) से लेकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंचों तक हर जगह भारत का समर्थन आधार मजबूत होगा। इसके अलावा, भारत द्वारा तैयार किए गए तकनीकी मानकों (Tech Standards) को वैश्विक स्वीकृति मिलेगी, जिससे भारत के आईटी और स्पेस उद्योग के लिए लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के उभरते बाजारों में स्थायी बढ़त हासिल होगी। भारत अब केवल बैक-ऑफिस सर्विस देने वाला देश नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का तकनीकी आधार तैयार करने वाला लीडर बनकर उभरेगा।

आम भारतीयों के जीवन में क्या बदलेगा?
इस वैश्विक पहल का सीधा सकारात्मक असर भारत के आम नागरिकों और युवाओं के जीवन पर पड़ेगा। जब भारत के तकनीकी मॉडल का दायरा दुनिया भर में फैलेगा, तो देश के भीतर टेक और स्पेस सेक्टर में लाखों उच्च वेतन वाली नौकरियां (High-Paying Jobs) पैदा होंगी। इसरो और घरेलू एआई अनुसंधान का दायरा बढ़ने से स्थानीय स्तर पर मौसम की सटीक भविष्यवाणी, प्राकृतिक आपदाओं से बचाव और शहरी प्रबंधन से जुड़े सिस्टम और अधिक सटीक होंगे। अंततः तकनीक जितनी अधिक बड़े पैमाने पर लागू होगी, उसकी लागत उतनी ही घटेगी, जिससे भारत के आम नागरिकों को रोजमर्रा की डिजिटल सेवाएं पहले से कहीं अधिक सस्ती, तेज और सुरक्षित मिल सकेंगी।

तकनीक से आत्मनिर्भर और विश्वगुरु बनता भारत
ब्रिक्स के मंच पर भारत का यह तकनीकी मॉडल इस बात का ठोस प्रमाण है कि देश अब दूसरों का अनुकरण करने वाला नहीं, बल्कि दुनिया को दिशा दिखाने वाला राष्ट्र है। मोदी सरकार ने स्पेस और एआई जैसी जटिल तकनीकों को आम इंसान और विकासशील देशों की भलाई का माध्यम बनाकर पश्चिमी एकाधिकार को करारा जवाब दिया है। ‘ग्लोबल साउथ’ को डिजिटल गुलामी से बचाकर आत्मनिर्भरता की राह दिखाने वाला यह विजन भारत को 21वीं सदी की ज्ञान-आधारित महाशक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है।

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