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आंदोलन का मुखौटा, एजेंडे का खेल! जंतर-मंतर के ‘मास्टरप्लान’ का सच आया सामने

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दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन का शोर तो अब थम चुका है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के पीछे छिपा राजनीतिक सच अब परत-दर-परत बेनकाब हो रहा है। निष्पक्ष और छात्र-हितैषी आंदोलन का दावा करने वाली ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) और इसके प्रमुख चेहरों की असली मंशा पर अब गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं। जिस तरह से देश के मासूम युवाओं के आक्रोश और ‘पेपर लीक’ जैसे संवेदनशील मुद्दे की आड़ में राजनीतिक रोटियां सेकी गईं, उसने इस पूरे प्रदर्शन के पीछे की गहरी साजिश को जगजाहिर कर दिया है।

अमर्यादित भाषा और दागियों का साथ  
प्रदर्शन के दौरान सौरभ दास जैसे प्रमुख चेहरों का असली चरित्र उस समय सामने आया, जब प्रधानमंत्री के खिलाफ भद्दी और अमर्यादित भाषा इस्तेमाल करने वाले अराजक तत्वों का उन्होंने खुलेआम बचाव किया। हद तो तब हो गई जब जंतर-मंतर पर दागियों और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले असामाजिक तत्वों को न्यौता देने पर सवाल उठे, तो आयोजकों ने देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के स्पष्ट आदेशों और गाइडलाइंस को मानने से साफ इनकार कर दिया।

‘सिलेक्टिव नरेटिव’ और दोहरे रवैये की खुली पोल
लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम के इस तंत्र का दोहरा रवैया भी देश के सामने आ चुका है। यह स्वयंभू टोली केवल भाजपा शासित राज्यों में प्रदर्शनकारियों पर दर्ज एफआईआर (FIR) वापस लेने की मांग तो जोर-शोर से उठाती रही, लेकिन जब वैसी ही प्रशासनिक कार्रवाई वामपंथी सरकार वाले राज्य केरल या अन्य विपक्षी शासित प्रदेशों में हुई, तब इनकी जुबान पर ताला लग गया। यह ‘सुविधाजनक विरोध’ उनके निष्पक्ष होने के खोखले दावों की धज्जियां उड़ाता है।

आंदोलनकारियों की नीयत का पर्दाफाश !
आंदोलनकारियों की नीयत का सबसे बड़ा पर्दाफाश तब हुआ, जब उन्होंने कैमरे पर खुद स्वीकार किया कि ‘पेपर लीक’ और धांधली की समस्याएं हर दौर और हर सरकार के कार्यकाल में होती रही हैं, लेकिन उनका सीधा निशाना केवल और केवल भाजपा और केंद्र सरकार है। इस कबूलनामे ने साफ कर दिया कि इस पूरे तमाशे की मूल प्रेरणा छात्रों का भविष्य सुधारना नहीं, बल्कि शुद्ध रूप से राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और मोदी विरोध था।

युवाओं के सामने खड़ा बड़ा ‘यक्ष प्रश्न’
जंतर-मंतर से भले ही तंबू-कनात उखड़ चुके हों और सड़कों का शोर शांत हो गया हो, लेकिन इस आंदोलन ने देश के लाखों छात्रों के सामने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया है। प्रश्न यह है कि क्या युवा वाकई अपने हक और परीक्षा सुधारों की लड़ाई लड़ रहे थे, या फिर वे किसी के गुप्त राजनीतिक ‘मास्टरप्लान’ में केवल ढाल और मोहरे के रूप में इस्तेमाल कर लिए गए? कानून, संविधान और न्यायपालिका के सम्मान को ताक पर रखकर अपनी सहूलियत से विरोध का रास्ता चुनने वाले इन चेहरों का लक्ष्य कभी भी छात्रों का भला करना नहीं था।

10 प्वाइंट्स में समझें जंतर-मंतर प्रोटेस्ट की ‘इनसाइड स्टोरी’

1. ‘विपक्ष का पिछलग्गू’: रणनीतिकार अभिजीत दिपके पर उठते सवाल
आंदोलन के मुख्य सूत्रधार अभिजीत दिपके (Abhijeet Dipke) की भूमिका पूरी तरह कटघरे में है। आम आदमी पार्टी (AAP) के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े रहे दिपके ने खुद को ‘गैर-राजनीतिक’ बताकर आंदोलन शुरू किया था। लेकिन जिस तरह उन्होंने बीजेपी के खिलाफ ऑनलाइन पोल चलाए, पंजाब-कर्नाटक के पेपर लीक पर चुप्पी साधी और कांग्रेस के दिग्गज कानूनी सलाहकारों का सहारा लिया, उससे उनकी तटस्थता का ढोंग बेनकाब हो गया।

2. दलित राजनीति का ढोंग और ‘क्रीमी लेयर’ पर रहस्यमयी चुप्पी
एक शिक्षित दलित पृष्ठभूमि से आने के कारण अभिजीत दिपके के पास ‘राष्ट्र-प्रथम’ की सोच के साथ देश का बड़ा जननेता बनने का स्वर्णिम अवसर था। यदि वे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा SC/ST आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ को बाहर करने के ऐतिहासिक स्टैंड का समर्थन करते—ताकि अंतिम पायदान के वंचित दलितों को अधिकार मिले—तो वे एक सच्चे समाज सुधारक बनते। लेकिन उन्होंने दूरगामी सामाजिक सुधार के बजाय तात्कालिक राजनीतिक विरोध का आसान रास्ता चुना।

3. अन्ना आंदोलन जैसा नैतिक बल नहीं, केवल राजनीतिक अवसरवाद
यदि इस आंदोलन का निष्पक्ष विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि दिपके और CJP की यह लहर किसी नैतिक विचार या सामाजिक बदलाव की उपज नहीं थी। वर्ष 2011 के ऐतिहासिक अन्ना आंदोलन के विपरीत, जहाँ एक नैतिक आधार था, यह पहल केवल सरकार की कमियों पर रोटियां सेकने का राजनीतिक अवसरवाद भर थी। नतीजतन, देश के युवाओं के हाथ केवल निराशा और छलावा ही आया।

4. न्यायपालिका पर अविश्वास और अराजकता को बढ़ावा
जंतर-मंतर पर जब सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को धता बताया गया, तो इससे आयोजकों की लोकतांत्रिक व्यवस्था में आस्था की पोल खुल गई। देश की सर्वोच्च अदालत को चुनौती देकर अपनी शर्तों पर भीड़ तंत्र चलाने की कोशिश करना सीधे तौर पर अराजकता को न्यौता देना है। छात्रों के अधिकारों की आड़ में देश की संवैधानिक संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करना इस ‘मास्टरप्लान’ का सबसे खतरनाक हिस्सा था।

5. ‘टूलकिट इकोसिस्टम’ और अंतरराष्ट्रीय साजिश का संदेह
जिस तेज़ी से आंदोलन का रुख परीक्षा सुधारों से हटकर केंद्र सरकार के तख्तापलट और प्रधानमंत्री के प्रति व्यक्तिगत घृणा की ओर मोड़ा गया, उसने ‘टूलकिट इकोसिस्टम’ की सक्रियता को उजागर किया। सोशल मीडिया बॉट्स, प्रायोजित हैशटैग्स और विदेशी मीडिया आउटलेट्स द्वारा इस विरोध को अचानक हवा देना यह साबित करता है कि युवाओं के भोलेपन का इस्तेमाल भारत की वैश्विक छवि को धूमिल करने के लिए किया गया।

6. लाखों निर्दोष छात्रों के करियर और भविष्य के साथ खिलवाड़
इस पूरे ड्रामे का सबसे दुखद पहलू यह रहा कि देश के लाखों मेहनती और ईमानदार छात्र खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। आंदोलन खत्म होते ही मुख्य रणनीतिकार अपने-अपने राजनीतिक एजेंडे और महत्वाकांक्षाओं को साधकर सुरक्षित निकल गए, जबकि कई निर्दोष युवाओं पर कानूनी मुकदमे (FIR) दर्ज हो गए और उनका बहुमूल्य समय बर्बाद हुआ। CJP के लिए छात्र केवल ‘पॉलीटिकल माइलेज’ का जरिया बनकर रह गए।

7. सकारात्मक समाधानों को नकारने की हठधर्मिता
जब केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालयों ने परीक्षा सुधारों के लिए उच्चस्तरीय समितियों का गठन किया और पारदर्शी व्यवस्था का रोडमैप पेश किया, तब भी आंदोलनकारियों ने बातचीत का दरवाजा बंद रखा। किसी भी सुधार या समाधान को स्वीकार न करना और केवल ‘इस्तीफे’ व ‘अस्थिरता’ की जिद पर अड़े रहना यह साबित करता है कि उनका मकसद समस्या हल करना था ही नहीं, बल्कि माहौल खराब रखना था।

8. ‘अर्बन नक्सल थ्योरी’ और वामपंथी ताकतों की वापसी
जंतर-मंतर के मंच का इस्तेमाल जिस तरह से देशविरोधी और अलगाववादी विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए किया गया, उसने ‘अर्बन नक्सल’ नरेटिव को फिर से हवा दे दी। परीक्षा सुधार के नाम पर जुटाए गए मंच पर जब वामपंथी विचारधारा से प्रभावित विवादित चेहरों और संगठनों को संरक्षण दिया जाने लगा, तो यह साफ हो गया कि यह मंच छात्रों का नहीं, बल्कि वामपंथी इकोसिस्टम को दोबारा जिंदा करने का अखाड़ा बन चुका था।

9. ‘विक्टिम कार्ड’ और मीडिया में भ्रामक नरेटिव गढ़ने की साजिश
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सोशल मीडिया पर एक प्रायोजित ‘नरेटिव वॉर’ चलाया गया। जमीनी सच्चाइयों को दरकिनार कर कटी-छांटी क्लिप्स और फर्जी खबरों के जरिए देश को गुमराह करने की कोशिश हुई। जब भी निष्पक्ष पत्रकारों ने आंदोलन के नेताओं से कड़े सवाल पूछे, वे जवाब देने से भागते नजर आए और तुरंत ‘विक्टिम कार्ड’ खेलकर विक्टिम बनने का नाटक करने लगे।

10. संसदीय लोकतंत्र और जनमत का खुला अनादर
आंदोलन के नाम पर जिस तरह से लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और 140 करोड़ जनता द्वारा चुनी गई सरकार की वैधता को खारिज करने की धमकियां दी गईं, वह चिंताजनक है। बिना किसी व्यापक जनाधार के, मुट्ठी भर लोगों द्वारा संसद का घेराव करने और मनमाने ढंग से सरकार गिराने की बातें करना भारतीय संसदीय लोकतंत्र का अपमान है। सुधार के नाम पर अराजकता का यह मॉडल पूरी तरह विफल साबित हुआ, जिसे देश की समझदार जनता ने खारिज कर दिया।

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