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राहुल गांधी के दिल्ली में छात्र सुरक्षा पर घड़ियाली आंसू: हादसों पर सियासत, लेकिन अपने राज्यों में चुप्पी

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दिल्ली के सत्य निकेतन में जर्जर पीजी इमारत हादसे पर लोकसभा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तुरंत केंद्र और प्रशासनिक तंत्र पर सवाल उठाते हुए अनर्गल आरोप लगाए। उन्होंने इसे सरकार की विफलता बताकर सोशल मीडिया पर जवाबदेही तय करने की मांग उठाई। लेकिन दिल्ली में छात्रों की सुरक्षा को लेकर घड़ियाली आंसू बहाने वाले राहुल गांधी का यह रुख कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों द्वारा शासित राज्यों की जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाता। झारखंड, कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में जब प्रतियोगी छात्र सड़कों पर उतरे, उनके भविष्य से खिलवाड़ हुआ और शिक्षा का बुनियादी ढांचा चरमराया, तब राहुल गांधी की कोई जवाबदेही या आवाज सामने नहीं आई।

हादसों पर सियासत, जमीनी राहत से पहले अनर्गल आरोप
सत्य निकेतन में दशकों पुरानी इमारत का हिस्सा गिरने के तुरंत बाद प्रशासन, एनडीआरएफ और पुलिस ने मौके पर पहुंचकर युद्ध स्तर पर राहत और बचाव कार्य शुरू किया। जिम्मेदारों पर तुरंत कानूनी कार्रवाई भी की गई। इसके बावजूद राहुल गांधी ने तकनीकी जांच और प्रशासनिक रिपोर्ट का इंतजार किए बिना इसे सीधे सरकार की विफलता करार दे दिया। मानवीय त्रासदी के समय पीड़ितों की मदद और व्यवस्था को सहयोग देने के बजाय केवल राजनीतिक फायदा उठाने के लिए सोशल मीडिया पर सनसनी पैदा करना राहुल गांधी की पुरानी कार्यशैली को दर्शाता है।

राहुल का ‘ट्रिपल इंजन’ और ‘जवाबदेही’ का तंज, लेकिन अपने राज्यों में चुप्पी
राहुल गांधी ने दिल्ली में ‘ट्रिपल इंजन सरकार’ और ‘जवाबदेही के अभाव’ का आरोप लगाते हुए तंत्र पर हमला बोला। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि झारखंड में जहां जेएमएम, कांग्रेस और राजद का गठबंधन सत्ता में है, वहां युवाओं के प्रति कौन सी जवाबदेही निभाई जा रही है? कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की अपनी पूर्ण बहुमत वाली सरकारों में युवाओं और छात्रों से जुड़े मुद्दों पर क्या राहुल गांधी ने कभी अपनी सरकारों से जवाबदेही मांगी? दूसरों पर उंगली उठाने से पहले इंडी गठबंधन शासित राज्यों की नाकामी पर मौन साधना उनके दोहरे मापदंड को उजागर करता है।

मानवीय त्रासदी पर ओछी बयानबाजी, ‘दिमागी नक्सल’ और ‘फूफा’ जैसे जुमलों से ध्यान भटकाने की कोशिश
सत्य निकेतन में छात्रों की मौत जैसे बेहद संवेदनशील और दर्दनाक हादसे पर भी राहुल गांधी ने ओछी भाषा का सहारा लिया। उन्होंने प्रधानमंत्री पर सवाल पूछने वालों को ‘दिमागी नक्सल’ और ‘नाराज फूफा’ कहने का आरोप लगाकर बहस को राजनीतिक कीचड़ उछालने की तरफ मोड़ दिया। मलबे के बीच जब जिंदगियां बचाने और परिवारों को संबल देने का समय था, तब राहुल गांधी का इस प्रकार की सतही शब्दावली का इस्तेमाल करना यह साफ करता है कि उनका ध्यान छात्रों की पीड़ा पर नहीं, बल्कि सरकार पर व्यक्तिगत हमले करने पर केंद्रित था।

सैदुलाजाब और हौज रानी की मौतों का आंकड़ा उछालकर छात्रों में डर फैलाने की कोशिश
राहुल गांधी ने अपने सोशल मीडिया बयान में सैदुलाजाब और हौज रानी जैसी अलग-अलग घटनाओं की मौतों का आंकड़ा एक साथ जोड़कर पूरे प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया। विभिन्न परिस्थितियों और कारणों से हुए हादसों को एक तराजू में तौलकर केवल छात्रों और उनके परिजनों के बीच आतंक और असुरक्षा का माहौल बनाना उनकी कार्यशैली बन चुकी है। वे यह भूल जाते हैं कि हिमाचल प्रदेश में अनियंत्रित अवैध निर्माण और कर्नाटक में हुए गंभीर अग्निकांडों पर उन्होंने कभी अपनी सरकारों से कोई सवाल नहीं पूछा।

‘कार्रवाई न होने’ का झूठा दावा, दिल्ली में 5 अफसर निलंबित और मालिक जेल में
राहुल गांधी ने दावा किया कि सरकार केवल लीपापोती करती है और कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। जबकि हकीकत यह है कि सत्य निकेतन हादसे के फौरन बाद दिल्ली नगर निगम के 5 अधिकारियों को तुरंत निलंबित किया गया, न्यायिक व मजिस्ट्रियल जांच बैठाई गई और मुख्य आरोपी इमारत मालिक को राजस्थान के भिवाड़ी से गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। इसके ठीक उलट झारखंड में भर्ती घोटालों के दोषी अफसरों को बचाने के लिए उल्टे हक मांग रहे निर्दोष छात्रों पर ही संगीन मुकदमे लाद दिए गए।

किराए के लालच में अवैध निर्माण और कांग्रेस के 15 साल में पनपा माफिया तंत्र
सत्य निकेतन जैसे इलाकों में दशकों पुरानी जर्जर इमारतों में नियमों की अनदेखी कर अतिरिक्त मंजिलें तानना और बिना सुरक्षा मानकों के पीजी चलाना सीधे तौर पर निजी लालच और माफिया तंत्र का नतीजा है। इस अनियंत्रित निर्माण और पीजी क्लस्टर की जड़ें दिल्ली में कांग्रेस की 15 साल की शीला दीक्षित सरकार के दौर में मजबूत हुईं, जब स्थानीय स्तर पर नियमों की अनदेखी कर व्यावसायिक क्लस्टर खड़े किए गए। इस व्यक्तिगत लालच और पुराने अवैध ढांचे को सरकार की विफलता बताकर राहुल गांधी असल में नियम तोड़ने वालों के अपराध पर पर्दा डालने का काम कर रहे हैं।

त्रासदी के समय प्रधानमंत्री के दौरों को जोड़कर ओछी राजनीति में जुटी कांग्रेस
हादसे के तुरंत बाद कांग्रेस के नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिल्ली विश्वविद्यालय दौरे और छात्रों से संवाद के कार्यक्रमों पर तंज कसना शुरू कर दिया। जब मलबे से छात्रों को निकालने का रेस्क्यू ऑपरेशन चल रहा था, तब राहुल गांधी की पार्टी के नेता मौतों का इस्तेमाल केवल राजनीतिक दुर्भावना निकालने के लिए कर रहे थे। यह दिखाता है कि कांग्रेस की संवेदना छात्रों के लिए नहीं, केवल राजनीतिक अवसरवादिता के लिए है।

’12 साल से केवल बातें’ का आरोप लगाने वाले भूल गए कांग्रेस के 60 सालों की नाकामी
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि बीते 12 साल में केवल बड़ी-बड़ी बातें हुईं और बुनियादी मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालयों में अच्छे हॉस्टल नहीं हैं, जिससे छात्र अमानवीय स्थिति में पीजी में रहने को मजबूर हैं। लेकिन देश का युवा यह भलीभांति जानता है कि देश में छह दशक तक कांग्रेस का एकछत्र शासन रहा। दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू और देश भर के बड़े उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की बढ़ती संख्या के अनुपात में सुरक्षित छात्रावासों का निर्माण कांग्रेस के समय क्यों नहीं हुआ? जो दल 60 साल तक छात्रों को बुनियादी आवासीय सुविधाएं नहीं दे पाया, वह आज अपनी ऐतिहासिक विफलताओं का ठीकरा दूसरों पर फोड़ रहा है।

छात्रों को पॉलिटिकल टूलकिट बनाकर अपना एजेंडा साधने की रणनीति
राहुल गांधी जब भी संकट में होते हैं, तो वे छात्रों और युवाओं के असंतोष को हवा देकर अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने का प्रयास करते हैं। प्रतियोगी छात्रों और युवाओं की वास्तविक समस्याओं का कोई नीतिगत और रचनात्मक समाधान निकालने के बजाय, उन्हें व्यवस्था के खिलाफ भड़काना और सरकार विरोधी हथियार की तरह इस्तेमाल करना राहुल गांधी का पुराना राजनीतिक तरीका रहा है।

अग्निपथ और रेलवे भर्तियों के दौरान युवाओं को उकसाने का इतिहास
यह पहला मौका नहीं है जब राहुल गांधी ने छात्रों के नाम पर राजनीति की हो। अग्निपथ योजना और रेलवे भर्ती के समय भी कांग्रेस नेताओं ने भ्रामक नैरेटिव बनाकर युवाओं को सड़कों पर उतारा था। उस भड़काऊ राजनीति के कारण कई राज्यों में हिंसक घटनाएं हुईं और करोड़ों की सार्वजनिक संपत्तियों व रेलगाड़ियों को नुकसान पहुंचाया गया। छात्रों के भविष्य के नाम पर समाज में असंतोष फैलाना कांग्रेस का आजमाया हुआ तरीका है।

झारखंड में 1000 छात्रों पर बर्बर लाठीचार्ज और मुकदमों पर राहुल का रहस्यमयी मौन
झारखंड में जेपीएससी और जेएसएससी भर्ती परीक्षाओं में हुई भारी धांधली और पेपर लीक के खिलाफ जब हजारों प्रतियोगी छात्र शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रखने निकले, तो जेएमएम-कांग्रेस सरकार ने उन पर बेरहमी से लाठियां चलवाईं। 1000 से अधिक निर्दोष छात्रों पर बलवा और सरकारी काम में बाधा जैसी गंभीर गैर-जमानती धाराओं में मुकदमे दर्ज कर दिए गए। लाठीचार्ज के बाद महीनों से छात्र आमरण अनशन पर बैठे हैं, लेकिन दिल्ली में छात्रों के अधिकारों की वकालत करने वाले राहुल गांधी ने आज तक इन पीड़ित छात्रों का हाल जानने या इंडी गठबंधन सरकार से बातचीत करने की कोई पहल नहीं की।

सड़क पर उतरीं छात्राओं पर लाठियां, महिला सुरक्षा के दावों की खुली पोल
रांची की सड़कों पर हक मांग रहे छात्रों पर हुए पुलिसिया प्रहार में शांतिपूर्ण ढंग से बैठी छात्राओं को भी दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया। संसद में संविधान की प्रति लहराने और नारी शक्ति व महिला सम्मान के लंबे-चौड़े दावे करने वाले राहुल गांधी इंडी गठबंधन शासित राज्यों में बेटियों के सिर पर बरसी लाठियों पर पूरी तरह खामोश रहे। यह साबित करता है कि महिला सुरक्षा और सम्मान के उनके दावे केवल राजनीतिक सहूलियत के हिसाब से बदलते हैं।

कांग्रेस शासित राज्यों में शिक्षा परिसरों और छात्रावासों का जर्जर ढांचा
दिल्ली में पीजी और छात्रावासों के बुनियादी ढांचे पर सवाल उठाने से पहले राहुल गांधी को कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश जैसे अपने शासित राज्यों के सरकारी शिक्षण संस्थानों की बदहाली देखनी चाहिए। वहां के राज्य विश्वविद्यालयों में हॉस्टलों की स्थिति बेहद दयनीय है, बुनियादी सुविधाओं का अभाव है और छात्रों को असुरक्षित परिस्थितियों में रहना पड़ता है। कांग्रेस ने अपनी सरकारों में कभी भी छात्रों के लिए आधुनिक और सुरक्षित हॉस्टल बनाने की प्राथमिकता नहीं दिखाई।

इंडी गठबंधन शासित राज्यों में पेपर लीक सिंडिकेट और लटकी भर्तियों की लंबी फेहरिस्त
जहां भी कांग्रेस या उनके सहयोगियों की सरकार होती है, वहां युवाओं का करियर पेपर लीक और लटकी भर्तियों की भेंट चढ़ जाता है। झारखंड में छात्र वर्षों से जेएसएससी-सीजीएल भर्ती में धांधली की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार ने परीक्षाओं को लटकाए रखा। इससे पहले राजस्थान में भी पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के समय लगातार दर्जनों प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक हुए थे, जिसने लाखों युवाओं का भविष्य बर्बाद कर दिया।

कर्नाटक वाल्मीकि निगम घोटाला: गरीब और वंचित छात्रों की स्कॉलरशिप में डाका
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार में सामने आए वाल्मीकि विकास निगम घोटाले ने यह साफ कर दिया कि कांग्रेस की प्राथमिकता क्या है। अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग के छात्रों के कल्याण व छात्रवृत्ति के लिए रखा गया करोड़ों रुपये का फंड अवैध रूप से अन्य खातों और राजनीतिक लाभ के लिए ट्रांसफर कर दिया गया। जब अपनी सरकार में गरीब छात्रों के वजीफे का पैसा लूटा जा रहा हो, तब राहुल गांधी का छात्रों का हितैषी बनना महज एक दिखावा है।

युवाओं से झूठी गारंटियों और बेरोजगारी भत्ते का महाधोखा
कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश के चुनावों में राहुल गांधी और कांग्रेस ने हर बेरोजगार युवा को बेरोजगारी भत्ता देने और लाखों सरकारी पद तुरंत भरने की बड़ी-बड़ी ‘गारंटियां’ बांटी थीं। सत्ता में आने के बाद युवाओं को न तो भत्ता मिला और न ही वादे के मुताबिक नौकरियां निकाली गईं। राहुल गांधी के चुनावी वादे केवल युवाओं के वोट हासिल करने का छलावा बनकर रह गए हैं।

कॉलेजों में भारी फीस वृद्धि और स्कॉलरशिप में कटौती से छात्रों पर बोझ
कांग्रेस शासित राज्यों में शिक्षा को सुलभ बनाने के बजाय छात्रों की जेब काटी जा रही है। कर्नाटक और तेलंगाना में तकनीकी और उच्च शिक्षण संस्थानों में फीस में भारी वृद्धि कर दी गई है। इसके अलावा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को मिलने वाली स्कॉलरशिप के बजट में कटौती और देरी की जा रही है, जिससे गरीब छात्रों के लिए पढ़ाई जारी रखना मुश्किल हो गया है।

विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के हजारों पद खाली, शिक्षा व्यवस्था बदहाल
हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और झारखंड के राज्य विश्वविद्यालयों व कॉलेजों में वर्षों से प्रोफेसरों, लेक्चररों और स्टाफ के हजारों पद खाली पड़े हैं। नियमित भर्तियां करने के बजाय अतिथि प्रवक्ताओं के सहारे काम चलाया जा रहा है। जब अपनी सरकारों के कॉलेजों में शिक्षक ही मौजूद नहीं हैं, तब राहुल गांधी का शिक्षा सुधारों पर व्याख्यान देना पूरी तरह बेमानी लगता है।

शिक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर बजट का पैसा गैर-उत्पादक योजनाओं में डायवर्ट
कर्नाटक जैसी कांग्रेस सरकारों में चुनावी मुफ्त योजनाओं का वित्तीय बोझ संभालने के लिए शिक्षा और उच्च शिक्षण संस्थानों के बुनियादी बजट में कटौती की गई है। इसका सीधा असर कॉलेजों की प्रयोगशालाओं, लाइब्रेरी, सुरक्षा मानकों और छात्रावासों के रख-रखाव पर पड़ रहा है। शिक्षा के बजट को काटकर राजनीतिक लाभ के लिए खर्च करना छात्रों के भविष्य के साथ सीधा समझौता है।

आंदोलनकारी छात्रों को उपद्रवी बताकर दबाने का तानाशाही रवैया
जब भी झारखंड या अन्य गैर-भाजपा राज्यों में छात्र अपने अधिकारों, पेपर लीक और लटकी भर्तियों के खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो कांग्रेस गठबंधन की सरकारें उनसे संवाद करने के बजाय उन्हें असामाजिक तत्व और उपद्रवी बताकर बदनाम करने लगती हैं। दिल्ली में लोकतांत्रिक अधिकारों की वकालत करने वाले राहुल गांधी अपने राज्यों में छात्रों की वास्तविक मांगों को लाठियों और मुकदमों के दम पर कुचलने की नीति अपनाते हैं।

एनएसयूआई और छात्र राजनीति का दोहरा चरित्र: दिल्ली में ड्रामा, अपने राज्यों में सन्नाटा
दिल्ली विश्वविद्यालय और बड़े शैक्षणिक परिसरों में कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई केवल राजनीतिक लाभ और चुनाव जीतने के लिए सक्रिय रहती है। दिल्ली में किसी भी हादसे पर इनके कार्यकर्ता कैमरों के सामने प्रदर्शन का ढोंग करते हैं, लेकिन जब झारखंड में छात्रों पर लाठियां बरसीं और मुकदमे दर्ज हुए, तब एनएसयूआई पूरी तरह गायब रही। इन छात्र संगठनों ने कभी भी स्थानीय स्तर पर अवैध निर्माण या सुरक्षा मानकों को लेकर कोई रचनात्मक अभियान नहीं चलाया।

संसद में चर्चा से भागना और केवल सड़कों पर सनसनी फैलाना
जब भी संसद में छात्रों की सुरक्षा, शिक्षा व्यवस्था और भर्ती परीक्षाओं की शुचिता पर नियम सम्मत चर्चा का अवसर आता है, तब राहुल गांधी और उनकी पार्टी गंभीर बहस में भाग लेने के बजाय सदन की कार्यवाही बाधित करती है। संसद में सकारात्मक नीतिगत सुझाव देने के बजाय केवल बाहर आकर भ्रामक बयानबाजी करना यह साबित करता है कि कांग्रेस की रुचि समाधान में नहीं, बल्कि सनसनी फैलाने में है।

नेता प्रतिपक्ष के संवैधानिक पद की गरिमा भूलकर केवल सिलेक्टिव राजनीति
नेता प्रतिपक्ष का पद पूरे देश का एक जिम्मेदार संवैधानिक पद होता है। राहुल गांधी को पूरे राष्ट्र के छात्रों की चिंता करनी चाहिए, न कि केवल राजनीतिक लाभ वाले मामलों की। जब झारखंड जैसे राज्य में 1000 से अधिक छात्रों पर फर्जी मुकदमे लादकर उनका करियर बर्बाद किया जाता है, तब पूरे देश के छात्रों की आवाज बनने का दावा करने वाले राहुल गांधी का मौन रहना इस संवैधानिक पद की मर्यादा के विपरीत है।

युवा समझ रहे हैं अवसरवादी और दमनकारी राजनीति का सच
देश का जागरूक युवा अब इस अवसरवादी राजनीति के पीछे का सच भलीभांति देख रहा है। एक तरफ जहां प्रशासनिक तंत्र हादसों में त्वरित राहत कार्य और कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करता है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस केवल मौतों पर अपनी राजनीति चमकाने में लगी रहती है। जब तक राहुल गांधी इंडी गठबंधन शासित राज्यों में छात्रों पर हो रहे अत्याचारों, लटकी भर्तियों और बदहाल शिक्षा व्यवस्था पर जवाब नहीं देते, तब तक दिल्ली में छात्रों के मसीहा बनने का उनका हर बयान केवल एक सियासी पाखंड ही माना जाएगा।

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