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कॉकरोच पार्टी दो फाड़, मनीष ब्रह्मभट्ट ने सीजेपी तोड़ बनाया CJP-D संगठन, दीपके की पोल ‘टीम केजरीवाल’ से खुली

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कॉकरोच जनता पार्टी अंदरूनी कलह की शिकार होकर दो फाड़ हो गई है। दरअसल, किसी भी आंदोलन की असली ताकत उसके मंच, पोस्टर या सोशल मीडिया की चमक में नहीं, बल्कि उन लोगों में होती है जो बिना किसी निजी स्वार्थ के उसके पीछे खड़े होते हैं। लेकिन जब आंदोलन सड़क से संगठन और संगठन से राजनीति की ओर बढ़ता है, तभी असल परीक्षा शुरू होती है। कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के सामने आज यही परीक्षा खड़ी दिखाई दे रही है। कौन निर्णय लेगा, किसकी सुनी जाएगी और सफलता का श्रेय किसे मिलेगा? सीजेपी के गठन के कुछ ही महीनों बाद ही एक्टिविस्ट मनीष ब्रह्मभट्ट ने अलग होकर CJP-डेमोक्रेटिक बनाने का ऐलान कर दिया है। उन्होंने अभिजीत दीपके के नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए हैं। ब्रह्मभट्ट ने CJP के प्रमुख अभिजीत दिपके पर आंदोलन को राजनीतिक रूप से बेचने और इसे ‘केजरीवाल टीम’ में बदलने का गंभीर आरोप लगाया है।लोकतांत्रिक नहीं, खुद की आंतरिक राजनीति के ही उलझी सीजेपी
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि CJP की राजनीतिक पूंजी अभी बिल्कुल नई-नई है। एक ओर संगठन ने पेपर लीक और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर जंतर-मंतर जैसे मंच पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश की, दूसरी ओर अब उसी संगठन के भीतर यह आरोप लग रहा है कि आंदोलन की सफलता के बाद कार्यकर्ताओं की आवाज को दबाया गया, उन्हें किनारे कर दिया गया। ब्रह्मभट्ट ने तो यहां तक आरोप लगाया कि नई राष्ट्रीय टीम में आम आदमी पार्टी से जुड़े लोगों का प्रभाव बढ़ गया और संगठन ‘टीम केजरीवाल’ जैसा हो गया। सवाल यह है कि आखिर कुछ ही महीनों में वह संगठन, जिसने दूसरों की राजनीति पर सवाल उठाकर अपनी जमीन बनाई थी, खुद आंतरिक राजनीति के सवालों में क्यों घिर गया? आखिर ब्रह्मभट्ट क्यों यह दावा कर रहे हैं कि जिस आंदोलन में देशभर के युवा, छात्र और अलग-अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोग जुड़े थे, उसकी राष्ट्रीय टीम में बाद में चुनिंदा लोगों को जगह दी गई और संगठन की मूल भावना बदल गई।

सीजेपी की नई टीम में 12 में से 8 आम आदमी पार्टी से जुड़े
CJP की कहानी की शुरुआत एक आंदोलनकारी तेवर से हुई। सोशल मीडिया पर तेजी से पहचान बनाने के बाद जंतर-मंतर पर युवाओं और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर आंदोलन हुआ। लेकिन आंदोलन और राजनीतिक संगठन में जमीन-आसमान का अंतर होता है। आंदोलन में भीड़ महत्वपूर्ण होती है, संगठन में विश्वास और सबको साथ लेकर चलने की भावना प्रधान होती है। आंदोलन में नारा सबको जोड़ सकता है, लेकिन संगठन में पद, प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने की लोकतांत्रिक व्यवस्था सबको जोड़कर रखती है। यही वह मोड़ था जहां CJP की सबसे बड़ी चुनौती सामने आई। ब्रह्मभट्ट का आरोप है कि आंदोलन की सफलता के बाद बनाई गई 12 सदस्यीय राष्ट्रीय टीम में जमीनी कार्यकर्ताओं, छात्रों और सोशल मीडिया स्वयंसेवकों से सलाह ही नहीं ली गई। उनका दावा है कि आठ सदस्य आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है, लेकिन इतना जरूर है कि नेतृत्व की संरचना को लेकर असंतोष अब सार्वजनिक हो चुका है।नई टीम में आंदोलन से जुड़े कई वर्गों को प्रतिनिधित्व नहीं मिला
ब्रह्मभट्ट ने आरोप लगाया कि अभिजीत दीपके ने नई टीम को घर बैठ कर बना लिया। किसी वॉलेंटियर या आंदोलन से जुड़े लोगों को नहीं बुलाया गया। पद का क्या पैरामीटर है? उन्होंने आम आदमी पार्टी से जुड़े आठ लोगों को जोड़ा है। महिला मित्र, कॉलेज के मित्र को जोड़ लिया। हम चाहते थे कि हर राज्य से पांच लोगों का प्रतिनिधि हो। राजा बनकर कोई फैसला नहीं हो। उन्होंने विशेष रूप से अलग-अलग राजनीतिक विचारों से जुड़े युवाओं, महिलाओं, सिख और मुस्लिम चेहरों को पर्याप्त स्थान न दिए जाने का दावा किया। यह आरोप भले ही राजनीतिक विवाद का हिस्सा हो, लेकिन किसी भी नए संगठन के लिए प्रतिनिधित्व का प्रश्न मामूली नहीं होता। यदि CJP खुद को किसी एक विचारधारा या दल के विकल्प के रूप में पेश करना चाहता है, तो उसके संगठनात्मक चेहरे में भी वही विविधता दिखनी चाहिए। वरना विरोधियों द्वारा लगाए जाने वाले ‘बी टीम’ के आरोपों को खारिज करना मुश्किल होगा।सवाल उठाने वाले किनारे लगें तो संगठन होगा कमजोर
मनीष ब्रह्मभट्ट और उनके सहयोगी राहुल पांड्या इससे पहले भी CJP की कोर कमेटी की बैठक को लेकर विरोध कर चुके थे। रिपोर्टों के अनुसार संभाजीनगर में दीपके के आवास पर हुई बैठक में उन्हें आमंत्रित नहीं किए जाने का उन्होंने विरोध किया था और इसके बाद मामला इतना बढ़ा कि दोनों की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा। यहीं किसी भी संगठन के नेतृत्व की असली परीक्षा होती है। असहमति को विद्रोह समझना भारी भूल है, लेकिन लोकतांत्रिक संगठन वही होता है जहां नेतृत्व अपने सबसे असुविधाजनक आलोचक को भी सुनने की क्षमता रखता हो। यदि कोर टीम में जगह पाने के लिए नेतृत्व की निकटता जरूरी हो जाए और सवाल उठाने वाले किनारे लगने लगें, तो संगठन बाहर से जितना मजबूत दिखाई देता है, भीतर से उतना ही कमजोर होता जाता है।

 ‘केजरीवाल टीम’ का आरोप दीपके के लिए कितना नुकसानदेह
ब्रह्मभट्ट का सबसे राजनीतिक रूप से विस्फोटक आरोप यही है कि CJP की नई संरचना पर अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक हितों का प्रभाव है। उन्होंने दीपके और केजरीवाल के बीच कथित ‘डील’ तक का आरोप लगाया। आरोप का असर केवल उसके सच या झूठ से तय नहीं होता; वह संगठन की सार्वजनिक छवि पर भी निर्भर करता है। CJP यदि खुद को पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग बताता है, तो उसके नेतृत्व की राजनीतिक निष्पक्षता पर सवाल उठना उसके लिए विशेष रूप से नुकसानदेह है। दीपके के लिए अब चुनौती केवल आरोपों का जवाब देना नहीं, बल्कि यह दिखाना भी है कि संगठन के निर्णय किसी बाहरी राजनीतिक शक्ति से प्रभावित नहीं हैं।

दीपके की बड़ी चूक, संगठन और आंदोलन को एक समझा
अभिजीत दीपके के सामने बड़ी राजनीतिक चुनौती शायद यही रही कि उसने जिस आंदोलन को खड़ा किया, उसकी ऊर्जा को स्थायी संगठनात्मक ढांचे में बदलने के ठोस प्रयास ही नहीं हुए। इसको लेकर पर्याप्त सहमति भी नहीं बना पाई। किसी आंदोलन में नेतृत्व स्वाभाविक रूप से एक-दो चेहरों के हाथ में आ सकता है, लेकिन जब वही आंदोलन पार्टी या राजनीतिक संगठन का रूप लेता है तो निर्णय प्रक्रिया को व्यक्ति-केंद्रित नहीं, संस्था-केंद्रित बनाना ही पड़ता है। दीपके संगठन और आंदोलन को एक ही समझते हुए यह नहीं कर पाए। दरअसल, किसी संगठन के मूल कार्यकर्ताओं को यह महसूस होने लगे कि फैसले ऊपर से हो रहे हैं और उनसे केवल समर्थन की अपेक्षा है, तो असंतोष देर-सबेर बाहर आता है। CJP में आज जो कुछ हुआ, उसे इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। यह केवल मनीष ब्रह्मभट्ट बनाम अभिजीत दीपके का विवाद नहीं है; यह उस मॉडल की परीक्षा है जिसमें आंदोलनकारी ऊर्जा को राजनीतिक संगठन में नहीं बदल पाई।

CJP का भविष्य अब सड़क नहीं, संगठन तय करेगा
कॉकरोच जनता पार्टी के लिए सबसे बड़ा खतरा बाहर का कोई राजनीतिक दल नहीं, बल्कि अंदर का अविश्वास है। मनीष ब्रह्मभट्ट ने CJP-D बनाकर चुनौती दे दी है। अब देखना यह है कि उनके साथ कितने आंदोलनकारी वास्तव में जाते हैं और दीपके अपने मूल संगठन को कितनी मजबूती से संभाल पाते हैं। राजनीति में पहला आंदोलन तालियां दिला सकता है, दूसरा आंदोलन पहचान दिला सकता है, लेकिन संगठन ही भविष्य देता है। CJP ने आंदोलन की ताकत देख ली है; अब उसे संगठन की ताकत साबित करनी है। यदि आरोपों के जवाब में केवल आरोप आए, असहमति के जवाब में निष्कासन और सवालों के जवाब में चुप्पी आई, तो CJP की सबसे बड़ी कमजोरी विरोधी दल नहीं होंगे, बल्कि उसकी अपनी आंतरिक दरारें ही मानी जाएंगी।

कौन है मनीष ब्रह्मभट्ट, लड़ चुके हैं गुजरात विधानसभा चुनाव
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के माय नेता पर दर्ज जानकारी के अनुसार मनीष ब्रह्मभट्ट गुजरात के पालनपुर के हैं। मनीष ने हेमचंद्राचार्य यूनिवर्सिटी से साल 2006 में एलएलबी की है। साल 2005 में उन्होंने इसी यूनिवर्सिटी से बीकॉम किया था। मनीष चुनावी राजनीति में भी अपनी किस्मत आजमा चुके हैं मगर कोई सफलता नहीं मिली। मनीष ने साल 2022 में पालनपुर सीट से ही गुजरात विधानसभा चुनाव लड़ा था। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था मगर उनको हार का सामना करना पड़ा था। मनीष ने दावा किया कि वे सीजेपी आंदोलन से जुड़े थे। उन्होंने जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा, आंदोलन देश का आंदोलन था। लोगों की वजह से आंदोलन सफल हुआ, आंदोलन खत्म होने के बाद इनका सौदा हो गया है। अब टीम केजरीवाल बन गई है।

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