आज भारत वैश्विक जियो-पॉलिटिक्स के केंद्र में खड़ा है। अमेरिका हो या रूस, यूरोप हो या खाड़ी देश, चीन हो या ग्लोबल साउथ, दुनिया की हर बड़ी ताकत के लिए भारत अब सिर्फ एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदार और निर्णायक शक्ति है। रक्षा से लेकर ऊर्जा तक, सेमीकंडक्टर से लेकर स्पेस टेक्नोलॉजी तक और QUAD से लेकर BRICS तक, भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

दुनिया में सप्लाई चेन का भूगोल बदल रहा है और अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता के बीच नई विश्व व्यवस्था आकार ले रही है। इस बदलाव के बीच भारत के प्रयासों को पूरी दुनिया में सराहना मिली है। G20 की अध्यक्षता ने भारत की वैश्विक भूमिका को नई मजबूती दी। Global South की आवाज बनकर भारत ने विकासशील देशों के मुद्दों को वैश्विक मंच पर प्रमुखता से उठाया। अमेरिका से रूस तक और यूरोप से खाड़ी देशों तक भारत ने अपने रणनीतिक रिश्तों का दायरा लगातार बढ़ाया। हाल के वर्षों में भारत वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली देश बनकर उभरा है।
हिंद महासागर में भारत की भौगोलिक स्थिति और दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में उसकी मौजूदगी ने इस महत्व को और बढ़ा दिया है। आज दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या आने वाली विश्व व्यवस्था में भारत सबसे महत्वपूर्ण पावर सेंटर में से एक बनने जा रहा है?
आखिर दुनिया में भारत की धाक क्यों बढ़ रही है? इसके पीछे की 25 बड़ी वजहें:
1. भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका

G20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने विकास, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, समावेशी विकास और Global South की प्राथमिकताओं को वैश्विक एजेंडे के केंद्र में लाने का प्रयास किया था। भारत की पहल से विकासशील देशों की आवाज को वैश्विक मंच पर नई मजबूती मिली और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे भारतीय मॉडल को भी व्यापक पहचान मिली। अब BRICS की अध्यक्षता के दौरान भारत के पास वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने का एक और बड़ा अवसर है।
इस मंच से भारत को विकासशील देशों की चिंताओं को मजबूती से उठाने का एक बार फिर अवसर मिला है। वैश्विक संस्थाओं में सुधार आर्थिक सहयोग, तकनीक और व्यापार जैसे मुद्दों पर भारत अपनी भूमिका को और मजबूत कर सकता है।
2. BRICS में भारत का बढ़ता प्रभाव

BRICS अब केवल पांच देशों का समूह नहीं रहा। इसके विस्तार के साथ इसका दायरा और प्रभाव दोनों बढ़े हैं और आज यह ग्लोबल साउथ की आवाज के साथ-साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था और बदलती विश्व व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है। ऐसे में BRICS में भारत की भूमिका भी पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
नई दिल्ली में हो रहे BRICS समिट में भारत की कोशिश सिर्फ घोषणाओं तक सीमित रहने के बजाय व्यावहारिक और परिणाम देने वाले सहयोग पर जोर देने की होगी। सप्लाई चेन को अधिक मजबूत और भरोसेमंद बनाना, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीकों में सहयोग बढ़ाना, आतंकवाद के खिलाफ साझा रणनीति तैयार करना, ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना और वैश्विक संस्थानों में सुधार जैसे मुद्दे भारत की प्राथमिकताओं में रहेंगे।
भारत BRICS के मंच का इस्तेमाल ग्लोबल साउथ की चिंताओं को मजबूती से सामने रखने के साथ-साथ विकसित और विकासशील देशों के बीच बेहतर संतुलन बनाने के लिए भी कर रहा है। यही वजह है कि BRICS में भारत का बढ़ता प्रभाव केवल इस समूह तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बदलते Global Order में भारत की बढ़ती कूटनीतिक और रणनीतिक भूमिका का भी संकेत है।
3. QUAD में भारत की अहम भूमिका

भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का QUAD इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग का एक महत्वपूर्ण मंच बन चुका है। इसका फोकस किसी एक देश के खिलाफ गठबंधन बनाने के बजाय मुक्त, खुले, समावेशी और नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक को मजबूत करना है। समुद्री सुरक्षा, महत्वपूर्ण और उभरती तकनीक, क्रिटिकल मिनरल्स, सप्लाई चेन की मजबूती और आपदा राहत जैसे क्षेत्रों में QUAD देशों के बीच सहयोग लगातार बढ़ रहा है। ऐसे समय में जब इंडो-पैसिफिक में चीन का आर्थिक और सैन्य प्रभाव बढ़ रहा है, भारत की भौगोलिक स्थिति, मजबूत समुद्री क्षमता और हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती भूमिका QUAD को और महत्वपूर्ण बनाती है। भारत के लिए यह मंच क्षेत्रीय सुरक्षा के साथ-साथ अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक प्रभाव को मजबूत करने का भी महत्वपूर्ण माध्यम है।
4. SCO में दो विपरीत ध्रुवों के बीच भारत

Shanghai Cooperation Organisation में भारत एक ऐसे महत्वपूर्ण मंच पर मौजूद है, जहां रूस, चीन और मध्य एशिया के प्रमुख देश एक साथ आते हैं। इससे भारत को एक ही मंच पर इन देशों के साथ संवाद और सहयोग का अवसर मिलता है। आतंकवाद से मुकाबला, क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा, व्यापार और कनेक्टिविटी जैसे मुद्दों पर SCO भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। खासतौर पर मध्य एशिया के साथ भारत के बढ़ते संबंधों के लिहाज से यह मंच अहम है। यहां भारत पश्चिमी गठबंधनों का हिस्सा बने बिना रूस, चीन और मध्य एशियाई देशों के साथ अपने हितों के अनुरूप संवाद बनाए रख सकता है। यही संतुलन भारत की Strategic Autonomy और Multi-Alignment की नीति को मजबूत करता है।
5. Global South की आवाज

भारत खुद को विकासशील देशों की आवाज के रूप में लगातार मजबूत कर रहा है। कर्ज के बढ़ते बोझ, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु वित्त, डिजिटल तकनीक, स्वास्थ्य, शिक्षा और सतत विकास जैसे मुद्दों पर भारत अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों के साथ सक्रिय रूप से जुड़ रहा है। भारत का जोर केवल इन चुनौतियों को वैश्विक मंचों पर उठाने तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यावहारिक समाधान और विकास के अपने अनुभव साझा करने पर भी है। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, क्षमता निर्माण और विकास साझेदारी के जरिए भारत विकासशील देशों के साथ अपने संबंधों को नई दिशा दे रहा है। यही सक्रियता भारत को Global South में एक विश्वसनीय साझेदार और प्रभावशाली आवाज के रूप में अलग पहचान देती है।
6. अमेरिका के साथ बढ़ती रणनीतिक साझेदारी

भारत-अमेरिका रिश्ते अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। रक्षा, क्रिटिकल टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक दोनों देशों का सहयोग तेजी से आगे बढ़ रहा है। अमेरिका के लिए भारत, चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है, जबकि भारत के लिए अमेरिका तकनीक, निवेश और रक्षा सहयोग का अहम स्रोत है।
7. रूस के साथ पुरानी दोस्ती, नए हित

रूस भारत का दशकों पुराना रक्षा साझेदार रहा है, लेकिन दोनों देशों के रिश्ते अब केवल हथियारों और रक्षा सौदों तक सीमित नहीं हैं। तेल और ऊर्जा से लेकर परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, उर्वरक, विज्ञान और नई तकनीकों तक दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार आगे बढ़ रहा है। यूक्रेन युद्ध के बावजूद भारत ने रूस के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप संवाद और आर्थिक सहयोग बनाए रखा है। वहीं, भारत ने अमेरिका और यूरोप सहित पश्चिमी देशों के साथ भी अपने रणनीतिक, आर्थिक और तकनीकी रिश्तों को नई ऊंचाई दी है। रूस के साथ पारंपरिक साझेदारी और पश्चिम के साथ बढ़ते सहयोग के बीच संतुलन बनाकर भारत अपनी Strategic Autonomy को मजबूत कर रहा है। यही संतुलित कूटनीति भारत को किसी एक गुट पर निर्भर हुए बिना अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार फैसले लेने की ताकत देती है।
8. चीन के साथ मुकाबला भी, संवाद भी

चीन भारत के लिए सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती है। सीमा विवाद और LAC पर तनाव के बावजूद दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है। यानि भारत की चीन नीति सिर्फ टकराव की नहीं, बल्कि इसमें मुकाबला, सावधानी और संवाद तीनों का मिश्रण है।
9. यूरोप के साथ नया कनेक्ट

भारत-EU रिश्ते अब केवल व्यापार और निवेश तक सीमित नहीं रहे हैं, बल्कि टेक्नोलॉजी, डिजिटल सहयोग, सुरक्षा, ग्रीन एनर्जी, जलवायु परिवर्तन और सप्लाई चेन जैसे रणनीतिक क्षेत्रों तक पहुंच गए हैं। दोनों पक्ष एक-दूसरे को भरोसेमंद और महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार के रूप में देख रहे हैं। इसी वर्ष जनवरी में भारत और EU ने FTA वार्ता पूरी की, जिसे दोनों पक्षों के बीच आर्थिक रिश्तों में एक बड़ा पड़ाव माना गया। इससे बाजारों तक पहुंच बढ़ने, व्यापार और निवेश को गति मिलने तथा भारतीय उद्योगों के लिए यूरोपीय बाजार में नए अवसर खुलने की उम्मीद है। इसके साथ ही, स्वच्छ ऊर्जा, महत्वपूर्ण तकनीक और resilient supply chains में बढ़ता सहयोग भारत और यूरोप की साझेदारी को व्यापार से आगे एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी का रूप दे रहा है।
10. मध्य पूर्व में भारत की मजबूत पकड़

UAE, सऊदी अरब, इजरायल और अन्य खाड़ी देशों के साथ भारत के रिश्ते तेजी से रणनीतिक हुए हैं। ऊर्जा और प्रवासी भारतीयों से आगे बढ़कर अब निवेश, रक्षा, खाद्य सुरक्षा, टेक्नोलॉजी और कनेक्टिविटी तक सहयोग पहुंच चुका है। यही कारण है कि पश्चिम एशिया की जियो-पॉलिटिक्स में भारत की आवाज पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
11. I2U2- चार देशों का नया रणनीतिक मंच

भारत, इजरायल, UAE और अमेरिका का I2U2 दिखाता है कि भारत किस तरह अलग-अलग शक्ति केंद्रों को एक साझा मंच पर ला रहा है। खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, टेक्नोलॉजी और निवेश जैसे क्षेत्रों में यह समूह आर्थिक सहयोग को रणनीतिक साझेदारी से जोड़ता है।
12. IMEC- भारत से यूरोप तक नया रास्ता

India-Middle East-Europe Economic Corridor भारत को पश्चिम एशिया के रास्ते यूरोप से जोड़ने वाली एक महत्वाकांक्षी कनेक्टिविटी परियोजना है। इसका उद्देश्य समुद्री और रेल मार्गों को जोड़कर भारत, खाड़ी देशों और यूरोप के बीच सामान की आवाजाही को अधिक तेज और प्रभावी बनाना है। इसका महत्व केवल व्यापार बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य की वैश्विक सप्लाई चेन को अधिक मजबूत और भरोसेमंद बनाने में भी अहम भूमिका निभा सकता है। ऊर्जा, डिजिटल कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में सहयोग के साथ IMEC भारत की पश्चिम एशिया नीति को भी नई रणनीतिक दिशा देता है। साथ ही, इससे भारत को यूरोपीय बाजारों से जोड़ने और वैश्विक व्यापार मार्गों में अपनी भूमिका बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण अवसर मिलने वाला है। ऐसे में IMEC भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के साथ-साथ उसकी रणनीतिक और भू-राजनीतिक पहुंच का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
13. भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत

भारत की विशाल अर्थव्यवस्था, तेजी से बढ़ता उपभोक्ता बाजार और बड़ी युवा आबादी दुनिया की बड़ी कंपनियों और सरकारों के लिए इसे एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बाजार बनाती है। तेज आर्थिक वृद्धि के साथ भारत वैश्विक निवेश आकर्षित करने, मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने और वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करने पर लगातार जोर दे रहा है। मेक इन इंडिया, उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार ने भारत को एक भरोसेमंद मैन्युफैक्चरिंग और निवेश वाले देश के रूप में स्थापित करने में मदद की है। सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, फार्मा, रक्षा और ग्रीन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भारत की संभावनाएं वैश्विक कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा कर रही हैं। यही वजह है कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भारत के साथ व्यापार, निवेश, तकनीक और सप्लाई चेन के क्षेत्र में साझेदारी बढ़ाने में रुचि दिखा रही हैं। भारत अब केवल एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के भविष्य का एक महत्वपूर्ण growth engine बनता जा रहा है।
14. Digital India बना वैश्विक मॉडल

UPI और Digital Public Infrastructure ने भारत की तकनीकी क्षमता को वैश्विक पहचान दिलाई है। भारत ने दिखाया है कि बड़े पैमाने पर डिजिटल सेवाओं को कम लागत में प्रभावी ढंग से संचालित किया जा सकता है। UPI ने डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में भारत को दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल किया है। Aadhaar, DigiLocker और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म ने करोड़ों लोगों तक सेवाओं की पहुंच आसान बनाई है। अब भारत अपने Digital Public Infrastructure के अनुभव और तकनीकी समाधान दूसरे देशों के साथ भी साझा कर रहा है। इससे भारत की तकनीकी विश्वसनीयता के साथ-साथ उसकी डिजिटल कूटनीति और सॉफ्ट पावर भी मजबूत हो रही है। यानी भारत अब सिर्फ डिजिटल सेवाओं का बड़ा बाजार नहीं, बल्कि दुनिया को बड़े पैमाने पर डिजिटल व्यवस्था का एक सफल मॉडल देने वाला देश बन रहा है।
15. सेमीकंडक्टर और टेक्नोलॉजी की दौड़

दुनिया चीन पर निर्भरता कम करने और सप्लाई चेन में विविधता लाने के लिए तेजी से प्रयास कर रही है। ऐसे में भारत सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, AI और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है। यूरोप के साथ भी क्रिटिकल टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन सहयोग बढ़ रहा है।
16. रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर हो रहा देश

भारत लंबे समय तक दुनिया के बड़े हथियार आयातकों में रहा, लेकिन अब उसकी प्राथमिकता रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने और एक प्रमुख रक्षा निर्यातक बनने की है। स्वदेशी मिसाइलों, युद्धपोतों, लड़ाकू विमानों, ड्रोन और आधुनिक रक्षा प्रणालियों के निर्माण ने भारत की सैन्य क्षमता को नई मजबूती दी है। मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के तहत घरेलू रक्षा उद्योग और निजी क्षेत्र की भागीदारी भी तेजी से बढ़ रही है। इसके साथ ही भारतीय रक्षा उत्पादों की मांग कई देशों में बढ़ रही है, जिससे भारत की वैश्विक रक्षा बाजार में मौजूदगी मजबूत हो रही है। रक्षा उत्पादन में बढ़ती क्षमता भारत को न केवल अपनी सुरक्षा जरूरतों के लिए अधिक सक्षम बना रही है, बल्कि रणनीतिक साझेदार देशों को रक्षा उपकरण और तकनीक उपलब्ध कराने की क्षमता भी दे रही है। इस तरह भारत की रक्षा शक्ति अब केवल सैन्य सुरक्षा का आधार नहीं, बल्कि उसकी रणनीतिक पहुंच, कूटनीतिक प्रभाव और वैश्विक शक्ति के बढ़ते कद का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही है।
17. इंडो-पैसिफिक में भारत की स्थिति

इंडो-पैसिफिक आज वैश्विक शक्ति संघर्ष का प्रमुख क्षेत्र है। भारत की भौगोलिक स्थिति उसे हिंद महासागर से लेकर पश्चिमी प्रशांत तक रणनीतिक महत्व देती है। यही कारण है कि अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय शक्तियां भारत को इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण साझेदार मानती हैं।
18. हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक बढ़त

दुनिया के महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार और ऊर्जा मार्ग हिंद महासागर से होकर गुजरते हैं। हिंद महासागर भारत के लिए सिर्फ समुद्र नहीं, बल्कि सुरक्षा, व्यापार, ऊर्जा और वैश्विक प्रभाव का रणनीतिक विस्तार है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार और ऊर्जा मार्गों में से एक होने के कारण इस क्षेत्र पर नियंत्रण या प्रभाव वैश्विक शक्ति-संतुलन को सीधे प्रभावित करता है। भारत की रणनीति इसी वजह से केवल अपनी समुद्री सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है। नई दिल्ली अब सुरक्षा देने वाली, कनेक्टिविटी बढ़ाने वाली और क्षेत्रीय साझेदारियों को मजबूत करने वाली शक्ति के रूप में अपनी भूमिका बढ़ा रही है।
19. भारत की ऊर्जा सुरक्षा की संतुलित नीति

भारत को अपनी विशाल अर्थव्यवस्था के लिए लगातार ऊर्जा की जरूरत है। रूस से तेल खरीदते हुए भारत खाड़ी देशों के साथ भी मजबूत रिश्ते बनाए रखता है। विदेश नीति में ऊर्जा सुरक्षा को राष्ट्रीय हित के हिसाब से साधने की कोशिश में भारत बहुत सफल रहा है।
20. चाबहार के जरिए मध्य एशिया का रास्ता

ईरान का चाबहार पोर्ट भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। इसके जरिए भारत पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच सकता है। यह व्यापार के साथ-साथ भारत की क्षेत्रीय रणनीतिक पहुंच को भी बढ़ाता है।
21. अफ्रीका के साथ बढ़ती साझेदारी

अफ्रीका भारत के लिए सिर्फ व्यापार का बाजार नहीं है। विकास सहयोग, स्वास्थ्य, शिक्षा, डिजिटल तकनीक, कृषि और क्षमता निर्माण के जरिए भारत वहां अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है। Global South की राजनीति में अफ्रीका के महत्व को देखते हुए यह साझेदारी और अहम हो जाती है।
22. अंतरिक्ष शक्ति के रूप में तेजी से बढ़ता भारत

Chandrayaan-3 की ऐतिहासिक सफलता ने भारत की अंतरिक्ष क्षमता को पूरी दुनिया में नई पहचान दिलाई। इस सफलता ने भारत को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला पहला देश बनाया। अब अंतरिक्ष क्षेत्र के विस्तार और Gaganyaan मिशन के जरिए भारत मानव अंतरिक्ष उड़ान की दिशा में बड़ा कदम बढ़ा रहा है। इसके साथ ही निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स की बढ़ती भागीदारी से भारत का स्पेस सेक्टर तेजी से विस्तार कर रहा है। सैटेलाइट, लॉन्च व्हीकल और स्पेस टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भारत नई क्षमताएं विकसित कर रहा है। इससे भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी बढ़ाने और वैश्विक बाजार में अपनी जगह मजबूत करने की संभावनाएं बढ़ी हैं। भारत कई देशों के साथ अंतरिक्ष सहयोग के जरिए अपनी तकनीकी और वैज्ञानिक साझेदारी भी विस्तार दे रहा है।यानी अंतरिक्ष अब भारत की वैज्ञानिक उपलब्धि के साथ-साथ आर्थिक क्षमता, तकनीकी शक्ति और वैश्विक कूटनीति का भी महत्वपूर्ण आधार बनता जा रहा है।
23. ‘सबसे दोस्ती, किसी से दुश्मनी नहीं’ वाला संतुलन

भारत की विदेश नीति का सबसे बड़ा हथियार उसका रणनीतिक संतुलन है। अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी के बावजूद रूस से रिश्ते कायम हैं। QUAD में सक्रियता के साथ BRICS और SCO में भी भागीदारी है। यूक्रेन युद्ध पर भारत का लगातार रूस और यूक्रेन दोनों से संवाद इसका उदाहरण है।
24. योग और आयुर्वेद से बढ़ती सॉफ्ट पावर

योग, आयुर्वेद, भारतीय संस्कृति, सिनेमा, खान-पान, भारत की युवा शक्ति और दुनिया भर में फैला भारतीय प्रवासी समुदाय भारत की सॉफ्ट पावर को लगातार मजबूती दे रहे हैं। भारतीय युवा अपनी प्रतिभा, नवाचार और उद्यमिता से दुनिया में भारत की नई पहचान बना रहे हैं, वहीं प्रवासी भारतीय अपनी सफलता, सांस्कृतिक जुड़ाव और वैश्विक नेटवर्क के जरिए भारत की छवि और प्रभाव को आगे बढ़ा रहे हैं। यानी भारत की ताकत केवल सैन्य या आर्थिक क्षमता तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी संस्कृति, युवा प्रतिभा और दुनिया भर में मौजूद भारतीयों के प्रभाव से भी भारत का वैश्विक कद बढ़ रहा है।
25. प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत कूटनीति से बढ़ी साख

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लगातार विदेश यात्राओं और वैश्विक नेताओं के साथ सीधे संवाद ने भारत की कूटनीतिक सक्रियता को नई पहचान दी है। अमेरिका से लेकर रूस, यूरोप, खाड़ी और Global South तक भारत लगातार उच्चस्तरीय संवाद में बना हुआ है। इसका असर यह है कि भारत अलग-अलग शक्ति समूहों के बीच संवाद का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनता दिखाई देता है। अमेरिका को भारत का साथ चाहिए, रूस भारत जैसे दोस्त को खोना नहीं चाहता, यूरोप भारत के बाजार और सप्लाई चेन को महत्व दे रहा है, खाड़ी देश भारत में निवेश और साझेदारी देख रहे हैं और चीन भी भारत के साथ संवाद बना कर चल रहा है। यही वजह है कि पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि उभरते Global Order को आकार देने में भारत कितनी निर्णायक भूमिका निभाएगा।









