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महिला प्रतिनिधित्व पर कांग्रेस का पाखंड बेनकाब: 4 राज्यों में महज 3 महिला मंत्री, तेलंगाना में महिला मंत्री बर्खास्त

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तेलंगाना की कांग्रेस सरकार द्वारा महिला मंत्री कोंडा सुरेखा को अचानक पद से हटाए जाने के बाद यह पूरी तरह साफ हो गया है कि कांग्रेस के ‘नारी न्याय’ और ‘Smash Patriarchy’ (‘स्मैश पैट्रिआर्की’) जैसे तमाम नारे केवल खोखले चुनावी जुमले हैं। ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ का ढिंढोरा पीटने वाली पार्टी आज अपने ही मुख्यमंत्रियों और शीर्ष नेताओं के पुरुष प्रधान और सामंती रवैये पर पूरी तरह मौन साधे बैठी है। सवाल उठता है कि मंचों से महिलाओं के हक में लंबे-चौड़े भाषण देने वाले राहुल गांधी का Smash Patriarchy का राग अब कहां गायब हो गया है? क्या वे अपनी ही चुनी हुई महिला मंत्री के इस सरेआम अपमान पर जुबान खोलेंगे? दरअसल कांग्रेस का चरित्र ही हमेशा से महिला विरोधी रहा है; यही वजह है कि जिस पार्टी ने दशकों तक सत्ता में रहकर 33 प्रतिशत महिला आरक्षण कानून को लटकाए रखा, वह आज अपने शासित राज्यों में महिलाओं को 5 प्रतिशत सत्ता और निर्णय लेने की हिस्सेदारी देने में भी पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है।

कैबिनेट में महिलाओं की अनदेखी: आंकड़ों ने खोली पोल
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने आधिकारिक आंकड़ों के साथ कांग्रेस की महिला विरोधी मानसिकता को उजागर किया। उन्होंने बताया कि कांग्रेस शासित राज्यों की कैबिनेट में मिलाकर केवल 3 महिला मंत्री बची हैं; कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में एक भी महिला को कैबिनेट में जगह नहीं दी गई है, जबकि तेलंगाना में अब सिर्फ एक महिला मंत्री रह गई हैं। यह स्थिति तब है जब कांग्रेस राष्ट्रीय मंचों पर महिलाओं को समान भागीदारी देने के बड़े-बड़े दावे करती है।

खरगे और राहुल गांधी की दोहरी नीति का पर्दाफाश
केंद्र सरकार द्वारा ऐतिहासिक ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पारित किए जाने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी लगातार केंद्र सरकार को पत्र लिखकर 33% महिला आरक्षण को तुरंत लागू करने की मांग कर रहे थे। भाजपा ने सवाल उठाया कि जो पार्टी अपने शासित राज्यों में महिलाओं को नाममात्र का प्रतिनिधित्व भी नहीं दे पा रही है, वह किस नैतिक अधिकार से केंद्र को उपदेश दे रही है? राहुल गांधी का Smash Patriarchy का प्रचार केवल चुनावी भाषणों और सोशल मीडिया कैंपेन तक ही सीमित है, जबकि जमीनी स्तर पर वे महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर रखते हैं।

कांग्रेस के विचार, बयान और काम में गहरा विरोधाभास
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कांग्रेस पर करारा हमला बोलते हुए कहा कि पार्टी के ‘विचार’, ‘बयान’ और ‘काम’—तीनों स्तरों पर महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर भारी अंतर्विरोध दिखाई देता है। एक तरफ मंचों से राहुल गांधी Smash Patriarchy का खोखला राग अलापते हैं, दूसरी तरफ केंद्र को पत्र लिखकर महिला आरक्षण का श्रेय लेने की होड़ में रहते हैं, लेकिन जब सत्ता और शासन में हिस्सेदारी देने का समय आता है तो उनकी अपनी सरकारों में महिला मंत्रियों को निपटाने का अभियान शुरू हो जाता है। कांग्रेस की यह कथनी और करनी का भेद अब देश के सामने पूरी तरह उजागर हो चुका है।

तेलंगाना में ‘ब्लैकमेल की राजनीति’ और पिछड़े वर्ग की महिला का अपमान
तेलंगाना में बर्खास्त मंत्री कोंडा सुरेखा द्वारा मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी पर लगाए गए गंभीर आरोपों ने कांग्रेस के अंतर्कलह और तानाशाही रवैये की पोल खोल दी है। भाजपा ने कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा अपनी ही कैबिनेट सहयोगी को ब्लैकमेल करने और फिर अपमानित कर पद से हटाने की घटना शर्मनाक है। कांग्रेस के भीतर पिछड़े वर्ग (OBC) और महिला नेताओं को सिर्फ वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है; जब वे अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाती हैं, तो उन्हें किनारे कर दिया जाता है।

200 करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार के आरोपों पर पर्दा डालने के लिए महिला मंत्री की बलि
तेलंगाना के सियासी घमासान में सबसे चौंकाने वाला पहलू भ्रष्टाचार का है। बर्खास्त मंत्री की बेटी सुष्मिता पटेल द्वारा मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के करीबियों पर ₹200 करोड़ के भ्रष्टाचार और मनमानी के गंभीर आरोप लगाए जाने के बाद कांग्रेस सरकार में हड़कंप मच गया था। भाजपा ने हमला बोलते हुए कहा कि सरकार को भ्रष्टाचार के इन संगीन आरोपों की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए थी, लेकिन मुख्यमंत्री ने अपना गुनाह छिपाने और आवाज दबाने के लिए सीधे अपनी महिला मंत्री को ही बर्खास्त कर दिया। यह साबित करता है कि कांग्रेस के लिए अपने कारनामों पर पर्दा डालना एक महिला जनप्रतिनिधि के स्वाभिमान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

‘स्मैश पैट्रिआर्की’ का नारा देने वालों ने महिला मंत्री का पद ही ‘स्मैश’ कर दिया
राहुल गांधी युवाओं के बीच जाकर Smash Patriarchy का खोखला उपदेश देते फिरते हैं, लेकिन कांग्रेस में पितृसत्ता तो खत्म नहीं हुई, अलबत्ता एक महिला का पद और अस्तित्व ही स्मैश कर दिया गया। जिस राज्य में कांग्रेस के पास गिनी-चुनी महिला मंत्री थीं, वहां एक महिला को तानाशाही अंदाज में बाहर का रास्ता दिखाकर कांग्रेस ने अपनी घोर पुरुष प्रधान सोच का परिचय दिया है। यह कांग्रेस के जुमलों और जमीनी हकीकत के बीच के गहरे फासले को उजागर करता है।

तेलंगाना में पहले ही नाममात्र की हिस्सेदारी, अब महिला प्रतिनिधित्व आधा
तेलंगाना में जब कांग्रेस की सरकार बनी थी, तभी पूरे मंत्रिमंडल में केवल दो महिला मंत्रियों (कोंडा सुरेखा और दानसारी अनसूया उर्फ सीताक्का) को जगह देकर कांग्रेस ने अपनी मानसिकता दिखा दी थी। अब राजनीतिक दुर्भावना और ब्लैकमेलिंग के चलते कोंडा सुरेखा को बर्खास्त कर कांग्रेस ने महिला प्रतिनिधित्व को आधा कर दिया है। पचास प्रतिशत महिला आबादी वाले राज्य में अब कैबिनेट में केवल एक अकेली महिला मंत्री बची हैं। यह आंकड़ा इस बात का जीता-जागता सबूत है कि कांग्रेस शासित राज्यों में महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया और सत्ता के गलियारों से पूरी तरह अलग-थलग किया जा रहा है।

सेना में परमानेंट कमीशन से लेकर फाइटर पायलट तक: मोदी सरकार का नया भारत
भाजपा ने स्पष्ट किया कि केंद्र की मोदी सरकार के लिए महिला सशक्तिकरण केवल भाषणों का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की धुरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन (Permanent Commission) देकर इतिहास रचा गया। आज देश की बेटियां राफेल और सुखोई जैसे लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं और सियाचिन जैसे दुर्गम युद्ध क्षेत्रों में देश की रक्षा कर रही हैं। इसके विपरीत, चार राज्यों में शासन चलाने वाली कांग्रेस अपनी राज्य सरकारों में महिलाओं को एक स्वतंत्र और सुरक्षित पद तक नहीं दे पा रही है।

‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ से ‘लड़की हो तो हटाई जाओगी’ तक का सफ
प्रियंका गांधी वाड्रा ने उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ का नारा देकर खूब सुर्खियां बटोरी थीं, लेकिन सत्ता में आते ही कांग्रेस का यह नारा पूरी तरह बेअसर साबित हुआ। हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना में सरकार बनने के बाद महिलाओं को न तो संगठन में सम्मानजनक जगह मिली और न ही सत्ता में भागीदारी। अब तेलंगाना में एकमात्र प्रमुख महिला मंत्री कोंडा सुरेखा को एक झटके में बर्खास्त कर कांग्रेस ने साबित कर दिया है कि उनके राज में लड़ना तो दूर, अगर कोई महिला अपने स्वाभिमान की बात करे तो उसे सीधे सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।

मोदी सरकार का ‘विमेन-लेड डेवलपमेंट’ बनाम कांग्रेस की दिखावे की राजनीति
एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश ‘महिला विकास’ से आगे बढ़कर ‘महिलाओं के नेतृत्व में विकास’ (Women-led Development) के युग में प्रवेश कर चुका है, जहां देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद एक जनजातीय महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु जी को सौंपा गया और केंद्रीय मंत्रिमंडल में वित्त व रक्षा जैसे शीर्ष मंत्रालय महिलाओं ने संभाले। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस का मॉडल केवल दिखावे की राजनीति तक सीमित है। चार राज्यों में सिमटी कांग्रेस की सरकारों में कुल मिलाकर केवल 3 महिला मंत्री होना यह दर्शाता है कि उनके पास महिला नेतृत्व को आगे बढ़ाने की न तो नीति है और न ही नीयत।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम: जिसने कांग्रेस के दशकों पुराने अवरोध को तोड़ा
दशकों तक केंद्र की सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस ने महिला आरक्षण विधेयक को लटकाए, भटकाए और अटकाए रखा। इसके विपरीत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के चलते संसद के नए भवन के पहले ही विशेष सत्र में ऐतिहासिक ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पारित हुआ। अब जब संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो चुकी है, तब अपने शासित राज्यों में महिलाओं को नाममात्र का पद न देने वाली कांग्रेस किस मुंह से महिला प्रतिनिधित्व की पैरवी कर सकती है?

सोनिया और प्रियंका गांधी ने साधी रहस्यमय चुप्पी
देश में किसी भी गैर-कांग्रेसी राज्य में महिलाओं से जुड़े किसी भी सामान्य मुद्दे पर राहुल, सोनिया और प्रियंका गांधी तुरंत सोशल मीडिया पर अभियान चलाने लगते हैं। लेकिन जब तेलंगाना में उनकी ही पार्टी के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी पर एक वरिष्ठ महिला मंत्री ने ब्लैकमेलिंग और तानाशाही का खुला आरोप लगाया, तो गांधी परिवार ने पूरी तरह रहस्यमयी चुप्पी साध ली। यह चुप्पी इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि कांग्रेस नेतृत्व के लिए महिला सुरक्षा और स्वाभिमान केवल राजनीतिक रोटियां सेकने का साधन है, अपनों के अत्याचार पर वे आंखें मूंद लेते हैं।

ओबीसी और वंचित वर्ग की महिला नेतृत्व पर सीधा प्रहार
तेलंगाना की हटाई गई मंत्री कोंडा सुरेखा पिछड़े वर्ग (OBC) से आती हैं। राहुल गांधी देशभर में घूम-घूमकर ‘जातिगत न्याय’ और ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ का ढिंढोरा पीटते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि उनकी ही सरकार में एक मजबूत पिछड़े वर्ग की महिला नेता को साजिश के तहत बेदखल कर दिया जाता है। यह घटना साफ करती है कि कांग्रेस की जातिगत राजनीति केवल बहुसंख्यक और पिछड़े समाज को बांटने का पाखंड है; वास्तविक प्रतिनिधित्व और सम्मान देने के समय वे सामंती और पितृसत्तात्मक मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाते।

बेटी की अभिव्यक्ति की सजा मां को: कांग्रेस के ढोंग की खुली पोल
जब भी कांग्रेस विपक्ष में खड़ी होकर केंद्र सरकार पर हमला बोलती है, तो वह अभिव्यक्ति की आजादी (Freedom of Speech) की सबसे बड़ी पैरोकार बनने का नाटक करती है। लेकिन तेलंगाना में एक बालिग बेटी द्वारा मुख्यमंत्री की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने के बदले में उसकी कैबिनेट मंत्री मां कोंडा सुरेखा को ही पद से हटा दिया गया। भाजपा ने इस पर करारा तंज कसते हुए कहा कि कांग्रेस में महिलाओं की अपनी कोई स्वायत्तता या व्यक्तिगत पहचान नहीं मानी जाती; वहां आज भी परिवार की आवाज दबाने के लिए महिलाओं को ही निशाना बनाया जाता है।

बिना सुनवाई सीधे बर्खास्तगी: कांग्रेस का आंतरिक तानाशाही मॉडल
कोंडा सुरेखा ने सार्वजनिक तौर पर खुलासा किया कि उन्हें अपना पक्ष रखने या सफाई देने तक का कोई अवसर नहीं दिया गया और सीधे तानाशाही फरमान सुनाकर बाहर कर दिया गया। एक तरफ राहुल गांधी हाथ में संविधान की प्रति लेकर देश भर में लोकतंत्र और न्याय का उपदेश देते फिरते हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी अपनी ही राज्य सरकारों में एक चुनी हुई महिला जनप्रतिनिधि को बुनियादी ‘प्राकृतिक न्याय’ (Natural Justice) तक नहीं दिया जाता। यह रवैया साबित करता है कि कांग्रेस का अंदरूनी ढांचा पूरी तरह सामंती और अलोकतांत्रिक है।

‘महालक्ष्मी’ और ‘गृहलक्ष्मी’ के नाम पर महिलाओं से छल
कर्नाटक और तेलंगाना के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने ‘महालक्ष्मी’ और ‘गृहलक्ष्मी’ जैसी गारंटियों के जरिए महिलाओं को हर महीने आर्थिक मदद देने के बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन सत्ता में आते ही उन योजनाओं में अनगिनत शर्तें थोप दी गईं और बजट की कमी का रोना रोया जाने लगा। इसके विपरीत, मोदी सरकार ने ‘उज्ज्वला योजना’, ‘मुद्रा लोन’, ‘पीएम आवास’ के तहत महिलाओं को घर का मालिकाना हक और ‘लखपति दीदी’ जैसी योजनाओं के जरिए महिलाओं को वास्तविक रूप से आत्मनिर्भर बनाया है। कांग्रेस महिलाओं को केवल चुनावी वोट बैंक मानकर झूठे वादे करती है, जबकि भाजपा उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बना रही है।

कांग्रेस की पुरानी सामंती परंपरा: एक परिवार से बाहर महिला नेतृत्व बर्दाश्त नहीं
कांग्रेस का यह पुराना इतिहास रहा है कि गांधी परिवार के दायरे से बाहर किसी भी मजबूत, स्वतंत्र और स्वाभिमानी महिला नेता को कभी आगे बढ़ने नहीं दिया गया। पार्टी के भीतर संगठन से लेकर सत्ता तक केवल उन्हीं को जगह मिलती है जो एक परिवार की जी-हुजूरी करें। तेलंगाना में कोंडा सुरेखा के साथ हुआ दुर्व्यवहार उसी पुरानी मानसिकता की अगली कड़ी है, जहां पार्टी के भीतर आत्मसम्मान के साथ राजनीति करने वाली उभरती महिला नेताओं को किनारे लगाकर केवल परिवार-केंद्रित सत्ता को ही बनाए रखने की होड़ मची रहती है।

मुख्यमंत्री के ब्लैकमेल के आगे लाचार खरगे और राहुल गांधी का सरेंडर
बर्खास्त महिला मंत्री कोंडा सुरेखा ने यह सनसनीखेज दावा किया कि कांग्रेस आलाकमान उन्हें पद से नहीं हटाना चाहता था, लेकिन मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने खुद इस्तीफा देने की धमकी देकर पार्टी हाईकमान को ब्लैकमेल किया। भाजपा ने सवाल उठाया कि जो राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे देश को मजबूत नेतृत्व देने का दावा करते हैं, वे अपने ही मुख्यमंत्री के अड़ियल रवैये के आगे इतने बेबस हो गए कि एक महिला मंत्री के आत्मसम्मान की रक्षा तक नहीं कर पाए। यह घटना साफ करती है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह कमजोर और लाचार हो चुका है।

पुरुष नेताओं की खुली बगावत माफ, महिला मंत्री पर तत्काल गाज: कांग्रेस का दोहरा पैमाना
कांग्रेस के भीतर का लैंगिक भेदभाव तब पूरी तरह उजागर हो गया जब कोंडा सुरेखा ने खुद याद दिलाया कि पार्टी के वरिष्ठ पुरुष नेता कोमाटिरेड्डी राजगोपाल रेड्डी और टी. जग्गा रेड्डी खुलेआम नेतृत्व और सरकार के खिलाफ बयानबाजी करते रहे हैं, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई करने की हिम्मत मुख्यमंत्री या आलाकमान में नहीं हुई। वहीं दूसरी तरफ, बिना किसी ठोस आधार के एक महिला मंत्री को तुरंत बलि का बकरा बना दिया गया। भाजपा ने इसे कांग्रेस का विकृत पुरुष प्रधान रवैया करार देते हुए कहा कि पार्टी में महिलाओं को आसान शिकार मानकर निशाना बनाया जाता है।

ओबीसी आक्रोश से डरकर डैमेज कंट्रोल का हड़बड़ी भरा नाटक
एक सशक्त पिछड़े वर्ग (OBC) की महिला मंत्री को असंवैधानिक रूप से हटाने के बाद जब तेलंगाना में भारी राजनीतिक विरोध और पिछड़ा वर्ग का गुस्सा फूटा, तो रेवंत रेड्डी सरकार ने रातों-रात तीन बीसी महिलाओं को विभिन्न आयोगों और निगमों में पद बांटकर डैमेज कंट्रोल की कोशिश की। भाजपा ने इसे कांग्रेस के अपराधबोध और राजनीतिक घबराहट का खुला सबूत बताया। भाजपा का कहना है कि एक कैबिनेट मंत्री का सार्वजनिक अपमान करने के बाद दिखावटी पद बांटना केवल जनता की आंखों में धूल झोंकने का असफल प्रयास है।

राज्यों में महिला प्रतिनिधित्व: भाजपा शासित राज्यों बनाम कांग्रेस का जमीनी सच
आधिकारिक आंकड़ों के जरिए भाजपा ने कांग्रेस के उस दुष्प्रचार को ध्वस्त कर दिया, जिसमें वह खुद को महिलाओं की सबसे बड़ी हितैषी बताती है। जहां चार राज्यों में सिमटी कांग्रेस की सरकारों में कुल मिलाकर केवल 3 महिला मंत्री बची हैं, वहीं दूसरी तरफ भाजपा और एनडीए शासित राज्यों में महिलाओं की मजबूत प्रशासनिक भागीदारी है। उत्तर प्रदेश में 6, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में 5-5, बिहार में 4 और गुजरात में 3 महिला मंत्री महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। यह तुलना स्पष्ट करती है कि महिला सशक्तिकरण कांग्रेस के लिए केवल भाषणों का विषय है, जबकि भाजपा के लिए यह शासन का मूल सिद्धांत है।

केरल में दलित महिला नेता पर हमला: कांग्रेस की हिंसक और महिला विरोधी मानसिकता
कांग्रेस में महिलाओं और विशेषकर वंचित वर्ग की महिला नेताओं के प्रति कैसा व्यवहार होता है, इसका घिनौना उदाहरण उसी समय केरल में देखने को मिला। तिरुवनंतपुरम जिले में कांग्रेस के ही स्थानीय पुरुष कार्यकर्ताओं ने अपनी ही पार्टी की दलित महिला नेता रम्या हरिदास पर हमला कर दिया, उनकी बांह मरोड़ी और धक्का-मुक्की की, जिससे घायल होकर उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। भाजपा ने इसे लेकर राहुल गांधी को आड़े हाथों लिया और कहा कि एक तरफ वे मंचों पर भाषण देकर पितृसत्ता खत्म करने का पाखंड करते हैं, और दूसरी तरफ उनकी ही पार्टी के कार्यकर्ता दलित महिला जनप्रतिनिधियों का हाथ मरोड़कर उन्हें आतंकित करते हैं।

पीएम मोदी की प्रामाणिकता बनाम राहुल गांधी की साख का संकट
प्रेस वार्ता में भाजपा ने स्पष्ट कहा कि महिलाओं के मान, सम्मान और वास्तविक सशक्तिकरण के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘प्रामाणिक विश्वसनीयता’ के प्रतीक हैं, जबकि राहुल गांधी ‘साख के संकट’ का पर्याय बन चुके हैं। राहुल गांधी जब मंचों पर युवाओं के सामने Smash Patriarchy का नारा उछालते हैं, तो ऐसा लगता है कि वे इतिहास और जमीनी हकीकत दोनों से आंखें मूंदे हुए हैं। सत्ता हाथ में होने पर महिला मंत्रियों को एक-एक करके बाहर का रास्ता दिखाना और सार्वजनिक रूप से उपदेश देना यह साबित करता है कि राहुल गांधी की राजनीति केवल शब्दों का आडंबर है, जिसमें विश्वसनीयता का नामोनिशान नहीं है।

कांग्रेस की कथनी और करनी का अंतर जान चुकी है जनता
कांग्रेस का ‘नारी न्याय’ का मॉडल असल में केवल पोस्टर, बैनर और भाषणों तक सीमित है। जहां एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने राष्ट्रपति पद से लेकर केंद्रीय मंत्रिमंडल और देश की संसद में महिलाओं को ऐतिहासिक प्रतिनिधित्व दिया है, वहीं कांग्रेस शासित राज्यों में महिलाओं को एक-एक पद के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश से लेकर तेलंगाना तक कांग्रेस के भीतर का पितृसत्तात्मक चेहरा बेनकाब हो चुका है और देश की जनता अब उनके इस पाखंड को अच्छी तरह समझ चुकी है। 

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