कांग्रेस आलाकमान के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब दूसरे दल नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर का आत्मघाती असंतोष बन चुका है। बिहार से लेकर पंजाब और राजस्थान से लेकर कर्नाटक तक, हर राज्य से उठती बगावत की चिंगारी यह साफ बयां करती है कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे का केंद्रीय नेतृत्व राज्यों के क्षत्रपों को साधने और अनुशासन का डंडा चलाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है। एक के बाद एक राज्यों में गुटबाजी, नेताओं के बीच बढ़ते मतभेद और संगठन के भीतर फैसलों को लेकर असंतोष तेज हो रहा है। इससे यह सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या राहुल गांधी और कांग्रेस आलाकमान अपने ही कुनबे को एकजुट रखने की क्षमता खोता जा रहा है? चुनावी मुहाने पर खड़े पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे बेहद महत्वपूर्ण राज्यों में कांग्रेस की यह आंतरिक खींचतान न केवल पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ रही है, बल्कि जनता के बीच भी बेहद नकारात्मक संदेश दे रही है। दरअसल, राहुल गांधी यह समझना ही नहीं चाहते कि चुनावी राजनीति केवल नैगेटिव नरेटिव और बहसों से नहीं, बल्कि एक अनुशासित, एकजुट और मजबूत सांगठनिक मशीनरी से जीती जाती है।
कांग्रेस की गुटबाजी डूबा देगी आगामी चुनावों की नैया?
अगले साल कुल सात राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनाव मुख्यतः फरवरी–मार्च 2027 के आसपास होने की संभावना है, जबकि हिमाचल प्रदेश और गुजरात में चुनाव वर्ष के अंत में, लगभग नवंबर–दिसंबर में अपेक्षित हैं। इनमें से सिर्फ हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है, जो अभी से एंटी इंकम्बेंसी फेक्टर से जूझ रही है। बाकि राज्यों में भी कांग्रेस संगठन की हालत खस्ता है। दरअसल, जिस पार्टी को चुनावी मैदान में सत्ता पक्ष को चुनौती देने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंकनी चाहिए, वहां नेताओं की ऊर्जा संगठन को संभालने के बजाय आपसी खींचतान और नेतृत्व पर उठते सवालों में खर्च हो रही है। सबसे बड़ा प्रश्न राहुल गांधी और कांग्रेस आलाकमान की राजनीतिक नेतृत्व क्षमता पर है। केंद्रीय नेतृत्व न तो राज्यों के क्षत्रपों के बीच संतुलन बना पा रहा है, न असंतोष को समय रहते थाम पा रहा है। कार्यकर्ताओं को एक स्पष्ट चुनावी दिशा नहीं मिलेगी तो तो आगामी चुनावों में कांग्रेस की मुश्किलें और बढ़ना तय है।
पंजाब में ‘एक अनार, सौ बीमार’: सीएम कुर्सी के लिए मची जंग
पंजाब में कांग्रेस अगले साल विधानसभा चुनाव की तैयारी करने के बजाय आपसी गुटबाजी से लहूलुहान हो रही है। यहां पर ‘एक अनार सौ बीमार’ वाली स्थिति बनी हुई है। दरअसल, हर कद्दावर नेता खुद को भावी मुख्यमंत्री मानकर चल रहा है। एक तरफ पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा का गुट है, तो दूसरी तरफ वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग अपनी जमीन मजबूत करने में लगे हैं। इन दोनों धड़ों के बीच नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा भी अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए लगातार दिल्ली दरबार के चक्कर काट रहे हैं। पार्टी के भीतर मचे इस जबरदस्त घमासान को शांत करने और सभी नेताओं के अहंकार (इगो) को साधने के लिए आलाकमान ने आखिरकार राजस्थान के पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट को पंजाब का नया प्रभारी नियुक्त किया है। पायलट तो खुद ही राजस्थान में नेताओं के अहंकार की लड़ाई में खुद को बचा नहीं पाए थे। वे कैसे पंजाब में नेताओं के बीच की गहरी खाई को पाटेंगे, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।
हिमाचल: गुटबाजी और वित्तीय संकट के बीच वेंटिलेटर पर सरकार
हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गुटबाजी के गंभीर भंवर में फंसी हुई है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और दिवंगत नेता वीरभद्र सिंह के परिवार (विशेषकर उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह और बेटे विक्रमादित्य सिंह) के बीच की तल्खी किसी से छिपी नहीं है। राज्यसभा चुनाव के दौरान पार्टी के भीतर हुआ विद्रोह और विधायकों की क्रॉस-वोटिंग इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण थी कि मुख्यमंत्री और आलाकमान का अपनी ही पार्टी के विधायकों पर नियंत्रण बेहद कमजोर हो चुका है। सरकार को बचाने के लिए आलाकमान को बार-बार शिमला में पर्यवेक्षक भेजने पड़े, लेकिन अस्थिरता का यह साया आज भी बरकरार है। राजनीतिक कमजोरी के साथ-साथ सुक्खू सरकार इस समय अभूतपूर्व वित्तीय संकट से भी जूझ रही है, जिसने सरकार की छवि को जनता के बीच बेहद कमजोर बना दिया है। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि मुख्यमंत्री, मंत्रियों और मुख्य सचिवों को अपनी सैलरी और भत्ते दो महीने के लिए स्थगित करने पड़े हैं। विकास कार्य पूरी तरह ठप हैं और कर्मचारियों के वेतन व पेंशन समय पर देना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि कांग्रेस न तो अपने नेताओं को संभाल पा रही है और ना ही राज्य की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित कर पा रही है।
उत्तराखंड : पहाड़ी राजनीति में समन्वय कांग्रेस के लिए पहाड़-सी चुनौती
उत्तराखंड में कांग्रेस के सामने अगले विधानसभा चुनाव की चुनौती केवल भाजपा से मुकाबले की नहीं, बल्कि अपने ही घर को संभालने की भी है। हिमाचल और पंजाब की तरह यहां भी पार्टी के भीतर गुटबाजी, नेताओं के बीच मतभेद और नेतृत्व को लेकर असंतोष समय-समय पर सतह पर आता रहा है। जनता सबसे गंभीर सवाल राहुल गांधी और कांग्रेस आलाकमान की भूमिका पर उठा रही है। उत्तराखंड जैसे छोटे लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण राज्य में यदि कांग्रेस नेतृत्व प्रदेश के नेताओं के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित नहीं कर पाता और असंतोष को नहीं थाम पाता तो इसका सीधा लाभ भाजपा को ही मिलेगा। भाजपा वैसे भी केंद्र से लेकर राज्य की जनकल्याणकारी योजनाओं के चलते प्रो-इंकम्बेंसी से बढ़त बनाए हुए है। सीएम धामी ने हाल ही में मदरसा बोर्ड खत्म करने का फैसला लिया है। उत्तराखंड की पहाड़ी राजनीति में कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, उसकी अपनी अंदरूनी दरारें बन सकती हैं।
डबिहार कांग्रेस का दिल्ली में दंगल: अपने ही दफ्तर पर धरना
कांग्रेस के भीतर पनप रहे असंतोष की ताजा और हैरान करने वाली बानगी देश की राजधानी दिल्ली में देखने को मिली। आम तौर पर राजनीतिक दल विपक्षी पार्टियों के दफ्तरों के बाहर अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते हैं, लेकिन दिल्ली में कांग्रेस के नए मुख्यालय के बाहर बिहार कांग्रेस के करीब 40 दिग्गज नेताओं ने डेरा डाल दिया। यह धरना किसी बाहरी मुद्दे पर नहीं, बल्कि अपने ही राज्य के प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी को हटाने की मांग को लेकर था। असंतोष की जड़ें पिछले विधानसभा चुनाव के खराब प्रदर्शन से जुड़ी हैं, जहां महागठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ा और वह बेहद कम सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि पटना में उनकी जायज शिकायतों को लगातार अनसुना किया गया, जिसके कारण उन्हें दिल्ली का रुख करना पड़ा। अनुशासनहीनता के नाम पर जारी कारण बताओ नोटिसों ने इस आग में घी का काम किया है। आलाकमान का संकट यह है कि वह इस विद्रोह को दबाने के लिए कड़े कदम नहीं उठा पा रहा है, जिससे प्रांतीय नेताओं के हौसले बुलंद हैं।
राजस्थान में शांत ज्वालामुखी: सियासी जंग की आहट
पंजाब के पड़ोसी राज्य राजस्थान की कहानी किसी से छिपी नहीं है। यहां अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट की ऐतिहासिक खींचतान ने पिछले चुनावों में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। हालांकि अगले विधानसभा चुनावों में अभी लंबा वक्त है, लेकिन भविष्य के नेतृत्व की जंग अभी से शुरू हो चुकी है। कांग्रेस आलाकमान ने सचिन पायलट को पंजाब जैसे हाई-प्रोफाइल राज्य का प्रभारी बनाकर यह साफ संकेत दे दिया है कि राष्ट्रीय राजनीति में उनका कद बढ़ने वाला है। लेकिन इस फैसले ने राजस्थान के भीतर एक शांत पड़े ज्वालामुखी को दोबारा भड़का दिया है। गहलोत गुट इस बदलाव को शांत बैठने वाला नहीं है। प्रदेश अध्यक्ष गोविंद डोटासरा अपनी अलग ही ढपली बजा रहे हैं। राजस्थान में नए संगठन की कमान किसके हाथ सौंपी जाती है, यह आलाकमान के लिए सबसे बड़ी सरदर्दी है। अगर राजस्थान में समय रहते शक्ति संतुलन नहीं बनाया गया, तो गुटबाजी का यह मर्ज और गहरा जाएगा।
तेलंगाना: सत्ता मिलने के बाद भी कांग्रेस अंतर्कलह से मुक्त नहीं
दक्षिण भारत के राज्य तेलंगाना में भी स्थिति पूरी तरह कांग्रेस आलाकमान के नियंत्रण में नहीं है। मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को अपनी ही कैबिनेट के भीतर से ही मिल रही चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है। हाल ही में एक बड़े विवाद के बाद मंत्री कोंडा सुरेखा को अपनी कैबिनेट कुर्सी गंवानी पड़ी। विवाद तब बढ़ा जब कोंडा सुरेखा के परिवार की तरफ से सीधे मुख्यमंत्री के अधिकारों और उनकी कार्यशैली पर तीखी टिप्पणियां की गईं, जिसे पार्टी विरोधी और नेतृत्व को खुली चुनौती माना गया। इस पूरे घटनाक्रम ने तेलंगाना कांग्रेस के भीतर ‘पुराने बनाम नए’ नेताओं के विवाद को हवा दे दी है। मुख्यमंत्री पर पिछड़ी जातियों की उपेक्षा करने के आरोप भी लगे, जिसके बाद डैमेज कंट्रोल के लिए उन्हें आनन-फानन में पिछड़ी जाति की दो महिलाओं को सरकारी पदों पर नियुक्त करना पड़ा। दक्षिण के इस अहम गढ़ में पनप रहा यह असंतोष साबित करता है कि सत्ता मिलने के बाद भी कांग्रेस अंतर्कलह से मुक्त नहीं हो पा रही है।
कर्नाटक में मलाईदार विभागों की होड़ और भ्रष्टाचार का कलंक
कर्नाटक में कांग्रेस की सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की सरकार लगातार किसी न किसी आंतरिक संकट से जूझ रही है। मंत्रिमंडल गठन से लेकर मलाईदार विभागों के बंटवारे तक मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को कई बार दिल्ली के चक्कर लगाने पड़े हैं। असंतोष का आलम यह है कि मनचाहा विभाग (बेंगलुरु विकास मंत्रालय) न मिलने पर वरिष्ठ मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने इस्तीफे की धमकी तक दे डाली थी, जिसके बाद केंद्रीय नेतृत्व को हस्तक्षेप कर उन्हें मनाना पड़ा। इसके अलावा, कैबिनेट मंत्री बी नागेंद्र पर लगे भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों और उनके इस्तीफे ने सरकार की छवि को गहरा धक्का पहुंचाया है। सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच की राजनीतिक तनातनी और समय-समय पर आने वाले विरोधाभासी बयान सरकार की स्थिरता और पार्टी की एकजुटता पर लगातार सवालिया निशान खड़े करते रहते हैं।









