Home उत्तर प्रदेश विशेष बांके बिहारी कॉरिडोर विरोध: 2027 चुनाव से पहले विपक्ष का तुष्टीकरण दांव

बांके बिहारी कॉरिडोर विरोध: 2027 चुनाव से पहले विपक्ष का तुष्टीकरण दांव

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में आज पूरे देश में सनातन विरासत को सहेजने और कल्चरल टूरिज्म को नई ऊंचाई देने का ऐतिहासिक कार्य हो रहा है। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की डबल इंजन सरकार ने कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाकर राज्य को भयमुक्त माहौल दिया है और विकास के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। अयोध्या में भव्य राम मंदिर, काशी विश्वनाथ धाम और उज्जैन में महाकाल लोक के निर्माण से देश में सांस्कृतिक पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को अभूतपूर्व पंख लगे हैं। पावन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर जब मथुरा-वृंदावन में 50 लाख से अधिक श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ता है, तो उनकी सुरक्षा और सुगम दर्शन के लिए आधुनिक व्यवस्था की आवश्यकता और भी प्रखर हो उठती है। हालांकि, उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले अपनी खोई जमीन तलाश रहे विपक्षी दलों को यह विकास और सांस्कृतिक जागरण पच नहीं रहा है। वोट बैंक को साधने और तुष्टीकरण की पुरानी राजनीति के तहत अब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी बांके बिहारी कॉरिडोर का विरोध करने पर उतर आई हैं। संभल से लेकर वृंदावन तक, आस्था के केंद्रों के पुनरुद्धार को रोकने की यह साजिश सीधे तौर पर प्रदेश के विकास और लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा व सुविधा को बाधित करने का कुत्सित प्रयास है।

मथुरा-वृंदावन बना 2027 की राजनीति का नया अखाड़ा: पश्चिमी यूपी में ध्रुवीकरण की फिराक में विपक्ष
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के मुहाने पर खड़े राज्य में मथुरा-वृंदावन अब सियासी टकराव का नया केंद्र बन चुका है। एक तरफ बीजेपी की डबल इंजन सरकार कॉरिडोर, सुगम दर्शन और सांस्कृतिक पर्यटन के जरिए ब्रज को विकास का वैश्विक मॉडल बनाने में जुटी है, वहीं मुद्दाविहीन विपक्ष स्थानीय विस्थापन और बुनियादी समस्याओं का झूठा हौव्वा खड़ा कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी खोई जमीन तलाश रहा है। आने वाले समय में बांके बिहारी कॉरिडोर का यह विषय केवल एक निर्माण कार्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पश्चिमी यूपी में राष्ट्रवाद और विकास बनाम अवसरवादी तुष्टीकरण की राजनीति के बीच एक निर्णायक चुनावी बहस का रूप लेगा। 

विकास के नाम पर विपक्ष का प्रलाप: अजय राय और प्रदीप माथुर के बेबुनियाद आरोप
बांके बिहारी मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ और सुरक्षा की आवश्यकता को नजरअंदाज करते हुए कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने परियोजना पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने वृंदावन पहुंचकर इसे विकास के नाम पर विध्वंस करार दिया और काशी विश्वनाथ धाम के कायाकल्प की तुलना करते हुए बेतुके आरोप लगाए कि स्थानीय पहचान खत्म की जा रही है। वहीं, कांग्रेस नेता प्रदीप माथुर ने भी भ्रम फैलाते हुए दावा किया कि कॉरिडोर के जरिए सेवायतों के अधिकार छीने जा रहे हैं और बाहरी लोगों को बसाया जा रहा है। असल में कांग्रेस का यह विरोध श्रद्धालुओं की बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा के प्रति उसकी घोर उपेक्षा को ही दर्शाता है।

राहुल के ‘ग्रंथ ज्ञान’ का ढोंग: जब सब पढ़ा तो हिंदू आस्था से बैर क्यों?
कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत सार्वजनिक मंचों पर दावा करती रही हैं कि राहुल गांधी ने दुनिया भर के धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया है, जिनमें रामायण, महाभारत, गीता और वेद-पुराण शामिल हैं। बड़ा सवाल यह उठता है कि यदि राहुल गांधी और उनकी पार्टी भारतीय सनातन संस्कृति और शास्त्रों के इतने बड़े ज्ञाता हैं, तो फिर हिंदू आस्था के केंद्रों के जीर्णोद्धार और श्रद्धालुओं की सुविधाओं के हर प्रयास का विरोध कांग्रेस क्यों करती है? काशी विश्वनाथ से लेकर बांके बिहारी तक, हर पवित्र धाम के पुनरुत्थान में अड़ंगा लगाना कांग्रेस के इस दोहरे चरित्र और ढोंग की पोल खोल देता है।

विभाजन की नींव रखने वाली कांग्रेस का सनातन के प्रति पुराना वैमनस्य
कांग्रेस का यह रुख कोई नया नहीं है। सत्ता की लालसा में पंडित जवाहरलाल नेहरू के दौर में धर्म के आधार पर देश का विभाजन स्वीकार करने वाली कांग्रेस आज भी उसी विभाजनकारी सोच पर चल रही है। तुष्टीकरण की नीति को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस दशकों तक भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठाती रही और अब संभल के प्राचीन स्थलों से लेकर वृंदावन के बांके बिहारी धाम तक हिंदुओं के पूज्य स्थलों के सुंदरीकरण और विकास को रोकने के लिए भ्रम का जाल बुन रही है।

सपा का दोहरा रुख: विकास के हर कदम पर रोड़ा अटकाने की आदत
समाजवादी पार्टी भी इस मामले में कांग्रेस से पीछे नहीं है। जून 2025 में सपा प्रमुख अखिलेश यादव के निर्देश पर राज्यसभा सांसद रामजीलाल सुमन वृंदावन पहुंचे और कॉरिडोर का विरोध करने वालों को हवा दी। सपा हमेशा से तुष्टीकरण की सियासत के जरिए एक खास वर्ग को खुश करने के लिए बहुसंख्यक समाज की आस्था से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर सवाल खड़े करती रही है। विस्थापन और स्थानीय अधिकारों की आड़ लेकर सपा असल में श्रद्धालुओं की सुरक्षा और वृंदावन के आधुनिकीकरण के खिलाफ खड़ी दिख रही है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर 50 लाख से अधिक श्रद्धालु: क्यों अनिवार्य है भव्य सुरक्षा और कॉरिडोर?
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर मथुरा-वृंदावन में धार्मिक उत्साह चरम पर नजर आया और प्रशासनिक अनुमानों के मुताबिक उत्सव में 50 लाख से अधिक श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ा। श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर मुख्य कार्यक्रम के अलावा बांके बिहारी मंदिर, द्वारिकाधीश, प्रेम मंदिर और इस्कॉन मंदिर में देश-विदेश से लाखों भक्त दर्शन के लिए पहुंचे। इतने विशाल जनप्रवाह को नियंत्रित करने के लिए मंदिरों और प्रमुख मार्गों पर भारी पुलिस बल तथा पीएसी के जवानों की तैनाती करनी पड़ी। 50 लाख से अधिक भक्तों की यह ऐतिहासिक आमद स्पष्ट रूप से सिद्ध करती है कि संकरी गलियों के भरोसे मथुरा-वृंदावन को नहीं छोड़ा जा सकता और बांके बिहारी कॉरिडोर जैसी आधुनिक व्यवस्था श्रद्धालुओं के जीवन की सुरक्षा के लिए कितनी अपरिहार्य बन चुकी है।

सनातन संस्कृति के केंद्रों का विकास अनवरत जारी रहेगा: सीएम योगी
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मथुरा पहुंचकर श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर भगवान श्रीकृष्ण की विशेष पूजा-अर्चना की और श्रद्धालुओं पर पुष्प वर्षा कर प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि की कामना की। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार विकास और जनकल्याण के कार्यों में जनता के साथ खड़ी है तथा बांके बिहारी मंदिर, बरसाना, वृंदावन और गोवर्धन सहित पूरे ब्रज के प्रमुख धार्मिक स्थलों के विकास की योजनाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं। विपक्ष पर तीखा हमला बोलते हुए सीएम योगी ने कहा कि जिन लोगों की आस्था कृष्ण, राम और भगवान विश्वनाथ में नहीं है, वे जनता की धार्मिक भावनाओं को कभी नहीं समझ सकते। उन्होंने साफ किया कि समाज में विभाजन और अविश्वास फैलाने वाले तत्वों के मंसूबों को सरकार कभी सफल नहीं होने देगी और सनातन संस्कृति के केंद्रों का विकास अनवरत जारी रहेगा।

मंदिर फंड पर विपक्ष का सफेद झूठ: ठाकुर जी के नाम ही होगी भूमि की रजिस्ट्री
कांग्रेस और सपा जनता के बीच यह भ्रामक प्रचार कर रहे हैं कि सरकार मंदिर का खजाना और फंड हड़पना चाहती है। जबकि वास्तविकता यह है कि सरकार ने अदालत और सार्वजनिक मंचों पर साफ किया है कि कॉरिडोर के लिए अधिग्रहित की जाने वाली 5 एकड़ भूमि सीधे तौर पर स्वयं ‘ठाकुर श्री बांके बिहारी जी महाराज’ के नाम ही दर्ज होगी। निर्माण और विकास कार्यों का मुख्य वित्तीय भार भी राज्य सरकार अपने बजट से वहन कर रही है। विपक्ष का यह अनर्गल प्रलाप केवल श्रद्धालुओं को भड़काने और मंदिर के विकास को रोकने की सोची-समझी चाल है।

सेवायतों का सम्मान सुरक्षित, बिचौलियों के सिंडिकेट पर चोट
विपक्ष यह भ्रम फैला रहा है कि प्रस्तावित मंदिर न्यास के जरिए स्थानीय गोस्वामियों और सेवायतों के अधिकार छीन लिए जाएंगे। हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। प्रस्तावित कानून में स्वामी हरिदास जी के वंशज गोस्वामी समाज के पूजा, सेवा, भोग और पारंपरिक धार्मिक अधिकारों को पूर्ण विधिक संरक्षण दिया गया है। ट्रस्ट में सेवायत प्रतिनिधियों की अनिवार्य भागीदारी तय की गई है। सरकार का उद्देश्य सेवायतों का हक छीनना नहीं, बल्कि मंदिर के नाम पर सक्रिय अवैध बिचौलियों, फर्जी गाइडों और श्रद्धालुओं से मनमानी वसूली करने वाले सिंडिकेट पर नकेल कसना है। विपक्ष असल में इसी सिंडिकेट के बचाव में ढाल बनकर खड़ा है।

गर्भगृह अछूता: कुंज गलियों के वास्तविक स्वरूप की रक्षा
अजय राय और विपक्षी नेता लगातार यह दुष्प्रचार कर रहे हैं कि कॉरिडोर से वृंदावन का प्राचीन स्वरूप और कुंज गलियां समाप्त हो जाएंगी। जबकि सरकार का प्लान स्पष्ट करता है कि मंदिर के प्राचीन गर्भगृह, पारंपरिक वास्तुशिल्प और आंतरिक स्वरूप को तनिक भी स्पर्श नहीं किया जाएगा। 5 एकड़ का होल्डिंग और सर्कुलेशन एरिया मंदिर के बाहरी परिधि क्षेत्र में बनाया जा रहा है। जब प्रतिदिन उमड़ने वाली लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ को बाहरी गलियारे में प्रबंधित कर लिया जाएगा, तब जाकर आंतरिक कुंज गलियों को अत्यधिक दबाव और जाम से मुक्ति मिलेगी तथा संतों और स्थानीय निवासियों के लिए वृंदावन का मूल शांत स्वरूप सुरक्षित रहेगा।

2022 के जन्माष्टमी हादसे की अनदेखी: क्या किसी नई त्रासदी का इंतज़ार कर रहा विपक्ष?
विपक्षी दलों का यह अंधा विरोध असल में श्रद्धालुओं के जीवन की सुरक्षा के प्रति उनकी आपराधिक अनदेखी को उजागर करता है। अगस्त 2022 में जन्माष्टमी की मंगला आरती के दौरान मंदिर परिसर में दम घुटने से दो निर्दोष श्रद्धालुओं की दर्दनाक मौत हो गई थी और कई लोग अचेत हो गए थे। संकरी गलियों में भारी भीड़ के दबाव को नियंत्रित करने और भविष्य में भगदड़ जैसी किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए ही योगी सरकार ने सुरक्षात्मक कॉरिडोर का ठोस कदम उठाया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सपा और कांग्रेस श्रद्धालुओं की सुरक्षा की कीमत पर अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं और किसी नए हादसे की प्रतीक्षा कर रहे हैं?

‘काशी-अयोध्या मॉडल’ से स्थानीय आर्थिकी में उछाल: झूठे भय का पर्दाफाश
जब काशी विश्वनाथ धाम और अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण शुरू हुआ था, तब भी विपक्ष ने व्यापारियों के उजड़ने और स्थानीय संस्कृति नष्ट होने का ऐसा ही झूठा डर फैलाया था। आज हकीकत सबके सामने है कि काशी और अयोध्या में पर्यटन कई गुना बढ़ चुका है, जिससे नाविकों, ई-रिक्शा चालकों, होटल संचालकों, फूल-माला और प्रसाद विक्रेताओं की आय में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। बांके बिहारी कॉरिडोर भी बाहरियों के लिए नहीं, बल्कि वृंदावन के स्थानीय युवाओं, व्यापारियों और कुटीर उद्योगों के लिए समृद्धि के नए द्वार खोलेगा, जिसे रोकने की कोशिश कर विपक्ष असल में स्थानीय विकास का ही गला घोंट रहा है।

बुजुर्गों, महिलाओं और दिव्यांगों की उपेक्षा: सुगम दर्शन के मानवीय पहलू पर हमला
वर्तमान में संकरी कुंज गलियों, अत्यधिक उमस और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण वृद्ध, महिलाएं, छोटे बच्चे और दिव्यांग श्रद्धालु ठाकुर जी के दर्शन के लिए भारी कष्ट सहने को विवश हैं। प्रस्तावित कॉरिडोर में एयर कूल्ड प्रतीक्षालय, आधुनिक व्हीलचेयर रैंप, मेडिकल इमरजेंसी कक्ष, साफ पेयजल, जूता स्टैंड और आधुनिक प्रसाधन जैसी विश्वस्तरीय नागरिक सुविधाएं शामिल हैं। इस जनहितकारी योजना का विरोध करके कांग्रेस और सपा सीधे तौर पर उन लाखों असहाय और बुजुर्ग राम-कृष्ण भक्तों के ‘सुगम दर्शन’ के अधिकार पर प्रहार कर रहे हैं।

न्यायपालिका के निर्देशों पर राजनीति: सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के विजन का विरोध
बांके बिहारी कॉरिडोर कोई मनमाना प्रशासनिक कदम नहीं है, बल्कि यह उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों और पूर्व न्यायाधीशों की निगरानी में बनी उच्चस्तरीय समिति की अनुशंसाओं पर आधारित है। जब देश की शीर्ष अदालतें भी श्रद्धालुओं की सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन और व्यवस्थागत सुधारों को अनिवार्य मान रही हैं, तब विपक्षी दलों द्वारा इसे ‘अवैध अधिग्रहण’ और ‘विनाश’ बताना सीधे तौर पर न्यायिक व्यवस्था और संविधान सम्मत प्रक्रियाओं का अपमान है।

संभल से वृंदावन तक सांस्कृतिक पुनरुत्थान: ऐतिहासिक गौरव की वापसी से विपक्ष असहज
यह परियोजना केवल एक रास्ते का निर्माण नहीं, बल्कि ब्रज तीर्थ विकास परिषद के तहत 84 कोस परिक्रमा मार्ग, गोवर्धन, बरसाना और नंदगांव के व्यापक पुनरुद्धार का अभिन्न अंग है। जिस प्रकार संभल के ऐतिहासिक मंदिर का सच सामने आने पर तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले दल विचलित हो उठे, ठीक उसी प्रकार ब्रज संस्कृति के अंतरराष्ट्रीय पटल पर स्थापित होने से विपक्षी खेमे में घबराहट है। सनातन प्रतीकों और तीर्थों के गौरव की पुनर्स्थापना से विपक्ष की विभाजनकारी सियासत की जमीन खिसक रही है, यही कारण है कि वे हर सांस्कृतिक कार्य में रुकावट पैदा करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं।

मुआवजा और पुनर्वास नीति: विस्थापन नहीं, व्यापारियों और परिवारों को सुरक्षित भविष्य की गारंटी
विपक्ष द्वारा यह सफेद झूठ फैलाया जा रहा है कि कॉरिडोर निर्माण से स्थानीय दुकानदारों और निवासियों को उजाड़ दिया जाएगा। हकीकत यह है कि योगी सरकार और मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने प्रभावित परिवारों और दुकानदारों के लिए अत्यंत पारदर्शी और सम्मानजनक पुनर्वास योजना तैयार की है। इसके तहत रुक्मिणी विहार और सुनरख बांगर में आधुनिक ग्रुप हाउसिंग योजना बनाकर प्रभावितों को बहुमंजिला फ्लैट्स दिए जा रहे हैं। साथ ही दुकानदारों को नए प्रस्तावित कॉरिडोर परिसर के भीतर प्राथमिकता के आधार पर दुकानें आवंटित करने और उचित आर्थिक मुआवजा देने का स्पष्ट प्रावधान है। काशी मॉडल की तरह यहां भी व्यापारियों के कारोबार को नया विस्तार मिलेगा, लेकिन विपक्ष इस कल्याणकारी योजना पर सिर्फ भ्रम फैला रहा है।

आम श्रद्धालु का सम्मान, घंटों धूप और धक्का से मिलेगी निजात
वर्तमान में बांके बिहारी मंदिर की संकरी गलियों में आम श्रद्धालु को घंटों चिलचिलाती धूप, उमस और भारी धक्का-मुक्की में पिसना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर, अव्यवस्था का फायदा उठाकर बिचौलियों और खास लोगों के लिए पिछले दरवाजों से दर्शन की व्यवस्थाएं आम भक्तों के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाती हैं। प्रस्तावित कॉरिडोर के बनने से आधुनिक कतार प्रबंधन प्रणाली, स्मार्ट होल्डिंग एरिया और व्यवस्थित सुरक्षा लेन स्थापित होंगी। इससे कतार में लगे हर सामान्य भक्त को बिना किसी भेदभाव और अपमान के सुगमता से ठाकुर जी के दर्शन सुलभ होंगे। विपक्ष असल में आम श्रद्धालुओं के इस सम्मान और समानता के अधिकार का ही विरोध कर रहा है।

यमुना शुद्धिकरण और गंदगी के अंबार से मुक्ति
वृंदावन की ऐतिहासिक कुंज गलियां वर्तमान में खुले नालों, सीवेज ओवरफ्लो और गंदगी के गंभीर संकट से जूझ रही हैं। इस अव्यवस्था के कारण गंदा पानी सीधे पावन यमुना नदी में गिरता है, जिससे तीर्थ की धार्मिक और पर्यावरणीय पवित्रता खंडित होती है। बांके बिहारी कॉरिडोर परियोजना के तहत भूमिगत सीवेज ड्रेनेज, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, एसटीपी और विशाल हरित पट्टी (ग्रीन बेल्ट) का निर्माण शामिल है। 100 फुट चौड़े रास्ते के जरिए मंदिर को सीधे जुगल घाट से जोड़ा जाएगा और यमुना के घाटों का जीर्णोद्धार होगा। विपक्ष का यह विरोध वृंदावन को गंदगी से मुक्त कर पावन यमुना के संरक्षण की दिशा में किए जा रहे प्रयासों को भी पटरी से उतारने की साजिश है।

अंतरराष्ट्रीय पटल पर ब्रज की ब्रांडिंग: वैश्विक पर्यटन और समृद्धि पर विपक्ष का प्रहार
वृंदावन केवल उत्तर प्रदेश या भारत का नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के कृष्ण भक्तों की आस्था का केंद्र है। प्रतिवर्ष लाखों विदेशी और अनिवासी भारतीय श्रद्धालु यहां आते हैं, लेकिन बुनियादी ढांचे और सुरक्षा के अभाव से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि प्रभावित होती रही है। यह कॉरिडोर वृंदावन को वेटिकन की भांति एक सुव्यवस्थित, सुरक्षित और विश्वस्तरीय आध्यात्मिक गंतव्य के रूप में स्थापित करेगा। इससे विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़ेगा, स्थानीय हस्तशिल्प, पोशाक और पेड़ा उद्योग को वैश्विक बाजार मिलेगा। देश के बढ़ते सांस्कृतिक प्रभाव और ब्रज के इस अंतरराष्ट्रीय उत्थान से कुंठित होकर ही विपक्ष इसके विरोध का षड्यंत्र रच रहा है।

क्या है 506 करोड़ का प्रस्तावित कॉरिडोर: सुरक्षा, सुविधा और आस्था का संगम
योगी सरकार का प्रस्तावित बांके बिहारी कॉरिडोर श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुगम दर्शन के लिए एक ऐतिहासिक कदम है। करीब 506 करोड़ रुपये की लागत से 5 एकड़ क्षेत्र में बनने वाला यह दो मंजिला गलियारा भक्तों को विश्वस्तरीय सुविधाएं देगा। संकरी कुंज गलियों की जगह 25-25 मीटर चौड़े तीन गलियारे और 900 वर्गमीटर का परिक्रमा पथ तैयार होगा। जुगल घाट से मंदिर तक 100 फुट चौड़े मार्ग के साथ यह कॉरिडोर मंदिर को सीधे पावन यमुना नदी से जोड़ेगा। इसके जरिए राधा वल्लभ और मदन मोहन जैसे प्राचीन मंदिरों को भी सुगम संपर्क मिलेगा, जिससे भगदड़ जैसी दुखद घटनाओं पर पूर्ण विराम लगेगा और सांस्कृतिक पर्यटन से स्थानीय युवाओं व व्यापारियों को बड़े पैमाने पर रोजगार मिलेगा।

विकास विरोधी और तुष्टीकरण की सियासत को जनता सिखाएगी सबक
बांके बिहारी कॉरिडोर का विरोध यह साफ कर देता है कि विपक्ष के लिए जनसुविधा, श्रद्धालुओं की जान-माल की सुरक्षा और राज्य का आर्थिक विकास कोई मायने नहीं रखता। जिस तरह काशी और अयोध्या के कायाकल्प ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाई दी, उसी तरह बांके बिहारी कॉरिडोर मथुरा-वृंदावन के गौरव को वैश्विक पटल पर स्थापित करने का माध्यम है। तुष्टीकरण और संकीर्ण वोट बैंक की राजनीति के चलते विकास कार्यों का विरोध करने वाले दलों को उत्तर प्रदेश की जागरूक जनता 2027 में एक बार फिर कड़ा सबक सिखाने के लिए तैयार है।

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