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Brics Summit: पुतिन से ऊर्जा-रक्षा और द्विपक्षीय सहयोग पर वार्ता, डॉलर की बादशाहत को मिल सकती है चुनौती

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राजधानी में शनिवार से शुरू हो रहे ब्रिक्स के 18वें शिखर सम्मेलन में विश्व व्यापार में अमरीकी डॉलर के एकाधिकार और वित्तीय व्यवस्था में पश्चिमी देशों का प्रभुत्व तोड़ने पर भी ब्रिक्स देश मंथन कर सकते हैं। दरअसल, शिखर सम्मेलन की तैयारियों के लिए हुई बैठकों में सदस्य देश डॉलर की मोनोपोली के विकल्प के रूप में सदस्य देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा डिजिटल मुद्रा को आपस में जोड़ने पर लगभग सहमति तक पहुंचे है। शिखर सम्मेलन में उसे आगे बढ़ाया जा सकता है। ऐसा होने पर देशों के बीच सीमा पार लेनदेन में मुद्रा बदलने की कई प्रक्रियाएं, खत्मे हो सकती है और कारोबार की लागत भी घट सकती है। हालांकि मुद्रा का आधार मूल्य डॉलर ही रहेगा, लेकिन इससे डॉलर पर निर्भरता कम होगी। ब्रिक्स देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान और डिजिटल भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देने पर विचार कर रहे हैं।मोदी-पुतिन में व्यापार, ऊर्जा, रक्षा और द्विपक्षीय सहयोग पर वार्ता
ब्रिक्स सम्मेलन से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात भी विशेष महत्व रखती है। दोनों नेताओं ने 11 सितंबर को नई दिल्ली में व्यापार, ऊर्जा, रक्षा और द्विपक्षीय सहयोग सहित कई मुद्दों पर बातचीत की। दोनों देशों के बीच संबंधों में ऊर्जा, रक्षा, परमाणु ऊर्जा, उर्वरक, महत्वपूर्ण खनिज, विनिर्माण और परिवहन जैसे क्षेत्र महत्वपूर्ण बने हुए हैं। रूस से भारत का ऊर्जा आयात भी इस रिश्ते का अहम हिस्सा है। दरअसल, ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत उसका आकार है। आज यह समूह दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका से शुरू हुआ यह समूह अब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया और सऊदी अरब जैसे देशों तक फैल चुका है। विस्तार ने ब्रिक्स को अधिक प्रभावशाली बनाया है, लेकिन इसके साथ चुनौतियां भी बढ़ी हैं।2,000 साल पुराना महान तमिल ग्रंथ ‘तिरुक्कुरल’ पुतिन को भेंट
भारत मंडपम में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान कूटनीति का एक बेहद खूबसूरत और सांस्कृतिक दृश्य भी देखने को मिला। सम्मेलन में बतौर पहले मेहमान पहुंचे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का स्वागत प्रधानमंत्री मोदी ने आत्मीयता से किया। इस अनौपचारिक संवाद के दौरान पीएम मोदी ने पुतिन को महान तमिल ग्रंथ ‘तिरुक्कुरल’ का रूसी अनुवाद उपहार स्वरूप भेंट की। पीएम मोदी ने भारत मंडपम में BRICS Business Forum को संबोधित भी किया। पुतिन को उनकी भेंट केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि भारत की सर्वसमावेशी सोच, प्राचीन विरासत और रूस के साथ गहरे सांस्कृतिक जुड़ाव का एक सजीव प्रतीक बनकर सामने आया है। तमिल सभ्यता और साहित्य की पहचान मानी जाने वाली ‘तिरुक्कुरल’ को ‘तमिल वेद’ कहा जाता है। लगभग दो हजार वर्ष पहले संत कवि और दार्शनिक तिरुवल्लुवर ने इसकी रचना की थी। 133 अध्यायों में शामिल 1,330 दोहे जीवन, आचार-विचार, राजनीति, प्रेम और मृत्यु जैसे विषयों पर मार्गदर्शन देते हैं। यही कारण है कि इसे धर्म और जाति से परे पूरी मानवता के लिए एक सार्वभौमिक जीवन-संहिता माना जाता है।ब्रिक्स सम्मेलन बदलती विश्व व्यवस्था का अहम पड़ाव
नई दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स सम्मेलन बदलती विश्व व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। सम्मेलन में भारत-रूस-चीन ग्लोबल साउथ के देशों का नेतृत्व करते हुए डॉलर को सीधी चुनौती देने के बजाय ब्रिक्स देशों में देशी मुद्रा में परस्पर व्यापार पर सहमत हो सकते हैं। इसका उद्देश्य किसी एक शक्ति को हटाकर दूसरी शक्ति को स्थापित करना नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था को अधिक संतुलित और बहुध्रुवीय है। भारत निश्चित रूप से आर्थिक सहयोग, संवाद, शांति और रणनीतिक स्वायत्तता को केंद्र में रखकर आगे बढ़ेगा। इससे ब्रिक्स उसके लिए केवल अंतरराष्ट्रीय मंच नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व की प्रयोगशाला बन सकता है। डॉलर की मोनोपोली टूटेगी या नहीं, इसका फैसला एक सम्मेलन में नहीं होगा; लेकिन यदि ब्रिक्स वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों, स्थानीय मुद्राओं और वित्तीय संस्थाओं में सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाता है, तो इतना जरूर कहा जा सकता है कि दुनिया की आर्थिक व्यवस्था में बदलाव की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ सकती है।डॉलर की मोनोपोली से आगे की दुनिया की तलाश
ब्रिक्स सम्मेलन के केंद्र में महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का भी है। अमेरिकी डॉलर दशकों से अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय लेन-देन की प्रमुख मुद्रा बना हुआ है, लेकिन रूस पर प्रतिबंधों और वैश्विक व्यापार में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने अनेक देशों को वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था के बारे में सोचने के लिए मजबूर किया है। ऐसे में डॉलर पर निर्भरता घटाने की चर्चा महज आर्थिक विषय नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक शक्ति-समीकरण की अभिव्यक्ति भी है। हालांकि भारत की सोच सीधे-सीधे डॉलर के खिलाफ मोर्चा खोलने की नहीं, बल्कि अधिक विकल्प और सुरक्षित भुगतान प्रणालियां विकसित करने की है। वैश्विक व्यापार के लिए ऐसी भुगतान व्यवस्था, जिसमें किसी एक देश की मुद्रा और वित्तीय प्रणाली पर अत्यधिक निर्भरता न हो।

आठ देशों में 49 वोस्ट्रो खाते खोलकर रुपये में व्यापार का करार
दरअसल, मोदी सरकार पहले से ही भारतीय मुद्रा में विदेश व्यापार को बढ़ावा देने की नीति पर चल रही है। बता दें कि यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस पर पश्चिमी देशों की पाबंदियों को देखते हुए भारत रुपये में विदेशी लेनदेन को बढ़ाने के निरंतर प्रयास कर रहा है। रुपये में कारोबार को लेकर श्रीलंका में कोलंबो स्थित भारतीय उच्चायोग ने इस पर चर्चा आयोजित की थी। बैंक ऑफ सीलोन, एसबीआई, इंडियन बैंक के प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव साझा किए। मोदी सरकार के प्रयासों का ही सुफल है कि अब तक आठ देशों के लिए 49 विशेष रुपया वोस्ट्रो खाते (एसआरवीए) खोले जा चुके हैं। इन खातों के जरिये आठ देशों रूस, मॉरीशस, श्रीलंका, मलयेशिया, म्यांमार, सिंगापुर, इस्राइल और जर्मनी के साथ रुपये में व्यापार हो सकेगा। भारत ने 8 देशों के साथ रुपये में व्यापार करने का करार पहले ही कर लिया है।

वोस्ट्रो खाता यानि देशों के बीच करेंसी एक्सचेंज और व्यापार की सुगमता
इसी प्रयास में सबसे पहले रूस के दो सबसे बड़े बैंक स्बेरबैंक (Sberbank) और वीटीबी बैंक (VTB Bank) ने रुपये में ट्रेंड करने के लिए वोस्ट्रो अकाउंट खोला था। आपको बता दें कि वोस्ट्रो खाता बैंक द्वारा नियोजित खाता है, जो ग्राहकों को दूसरे बैंक की ओर से पैसा जमा करने की सुविधा प्रदान करता है। विदेश का कोई बैंक वोस्ट्रो खाता खोलने के लिए भारत में बैंक से संपर्क कर सकता है। लेकिन इसके लिए बैंक को RBI से मंजूरी लेनी होती है। इसके बाद दोनों ही पक्ष करेंसी का एक्सचेंज रेट, मार्केट रेट आदि जरूरी चीजें तय कर लेते हैं और व्यापार शुरू कर सकते हैं। वोस्ट्रो एकाउंट खुलवाने की जरूरत तब पड़ती है जब किसी बैंक की विदेश में कोई शाखा नहीं होती है। वोस्ट्रो से ग्राहकों को किसी दूसरे बैंक के खाते में पैसा जमा करने की सुविधा मिलती है। अब जैसे किसी भारतीय आयातक को इजरायल में कारोबार करना है तो पहले उसे डॉलर में ही भुगतान करना होता था। लेकिन अब वह उसे रुपये में भी भुगतान कर सकता है। उसकी भुगतान राशि इस वोस्ट्रो खाते में जमा हो जाती है। इसी तरह, जब किसी भारतीय निर्यातक को माल और सेवाओं के लिए रुपये में भुगतान करना होता है, तो इस वोस्ट्रो खाते से राशि काट ली जाएगी और उसे निर्यातक के नियमित खाते में जमा कर दिया जाएगा।ग्लोबल करेंसी बनने की राह पर रुपया, 30 देश जल्द साथ आएंगे
अमेरिकी नीतियों के चलते दुनियाभर के कई देशों के लिए आयात महंगा हो रहा है। रुपये में कारोबार शुरु करने के पीछे उद्देश्य यही है कि इससे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम होगी। रुपये में व्यापार बढ़ने के साथ ही भारत को भारतीय मुद्रा के लिए खरीदार तलाशने की जरूरत नहीं होगी। इतना ही नहीं इंटरनेशनल बैंकों को कंवर्जन फीस नहीं देना होगा। इससे भारतीय रुपये की डिमांड में भी इजाफा होगा। गौरतलब है कि चीनी मुद्रा RMB दुनिया में अमेरिकी डॉलर, यूरो, येन और ब्रिटिश पाउंड के बाद पांचवी सबसे बड़ी मुद्रा है। पहली बार यूरोपीय यूनियन में शामिल देश जर्मनी एशिया की किसी मुद्रा यानी भारतीय मुद्रा रुपये के साथ व्यापार करने के लिए आगे आया है। अगर 30 देशों के साथ भारत का रुपए में कारोबार शुरु हो गया तो फिर रुपया अंतरराष्ट्रीय करेंसी बन जाएगा। भारत सरकार की मंशा साल आजादी के 100 साल होने पर 2047 तक इंडियन करेंसी को अंतरराष्ट्रीय करेंसी के तौर पर स्थापित करने की है।

 

आठ दशकों से अमेरिकी डॉलर का दबदबा, अब खत्म होगी बादशाहत
अमेरिकी डॉलर दुनिया में हर जगह मान्यता प्राप्त मुद्रा है, इसलिए ज्यादातर लेन-देन डॉलर में ही किए जाते हैं। पूरी वित्तीय दुनिया में 8 दशकों से इसका दबदबा है। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत के बाद दुनिया पस्त हो गई थी। तब 1944 में 44 देशों के प्रतिनिधि युद्ध के बाद विश्व अर्थव्यवस्था की मरम्मत के लिए ब्रेटन वुड्स, न्यू हैम्पशायर में मिले। तब इस बात पर सहमति बनी कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अमेरिका, डॉलर के मूल्य को सोने के मुकाबले तय करेगा और अन्य देश बदले में अपनी मुद्राओं को डॉलर के मुकाबले तय करेंगे। देशों को अब अपनी विनिमय दर को बनाए रखने के लिए रिजर्व में डॉलर रखना पड़ा, जिससे यह प्रमुख वैश्विक मुद्रा बन गई।‘डॉक्टर डूम’ का आंकलन, रुपया बनेगा दुनिया की ग्लोबल रिजर्व करेंसी
पीएम मोदी की विजनरी और राष्ट्र प्रथम की सोच के चलते आप इस बात पर विश्वास कर सकते हैं कि आने वाले समय में रुपये की तूती बोलेगी और भारतीय करेंसी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पर आ जाएगी। मशहूर अर्थशास्त्री नूरील रूबिनी का ऐसा मानना है कि भारतीय रुपया भविष्य में अंतरराष्ट्रीय करेंसी बनेगा। एक बिजनेस एंड इकोनॉमी न्यूजपेपर को दिए इंटरव्यू में रूबिनी ने कहा है कि भारतीय रुपया डॉलर की जगह लेने की ताकत रखता है। नूरील रूबिनी (Nouriel Roubini) वही अर्थशास्त्री हैं, जिन्होंने 2008 में आई वैश्विकी मंदी की सटीक भविष्यवाणी की थी और इस कारण अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने उन्हें ‘डॉक्टर डूम’ की उपाधि दी थी। इस प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ने अंग्रेजी बिजनेस अखबार ईटी नाउ को दिए इंटरव्यू में कहा, ‘कोई भी यह देख सकता है कि भारतीय अपनी जिस मुद्रा रुपये के जरिए दुनिया के साथ होने वाले कारोबार को करता है वो रुपया भारत के लिए व्हिकल करेंसी बन सकता है। यह (भारतीय रुपया) पेमेंट का साधन हो सकता है। यह स्टोर ऑफ वैल्यू भी बन सकता है। निश्चित रूप से, समय के साथ रुपया दुनिया में ग्लोबल रिजर्व करेंसी की डायवर्सिटी में से एक बन सकता है।

 

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