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BRICS की मेज पर श्रीअन्न से किनुआ बिरयानी तक देसी स्वाद, हमारी मिट्टी की खुशबू और ‘वोकल फॉर लोकल’ की गूंज

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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत की मेजबानी केवल कूटनीतिक संवाद, आर्थिक साझेदारी और वैश्विक मुद्दों तक सीमित नहीं रहने वाली है। इस बार सम्मेलन की मेज पर भारत की एक ऐसी तस्वीर भी सजेगी, जिससे पीएम मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल’ मंत्र की गूंज पूरी दुनिया में सुनाई देगी। इस देसीपन में देश की मिट्टी, मिलेट्स, मिठाई, कारीगरी, परंपरा और अलग-अलग राज्यों के स्वाद एक साथ दिखाई देंगे। विदेशी मेहमानों के सामने परोसा जाने वाला भोजन केवल भूख ही नहीं मिटाएगा, बल्कि भारत की विविधता को समझने का स्वादिष्ट माध्यम भी बनेगा। हमारे ज्वार-बाजरा और रागी जैसे पारंपरिक अनाज आधुनिक व्यंजनों का रूप लेकर अंतरराष्ट्रीय मेहमानों के दिलों में पैठ बनाएंगे। रागी डोसा, बाजरा उपमा, बाजरा रोटी, मिलेट लड्डू और मिलेट पोंगल जैसे व्यंजन भारतीय खान-पान की उद्दात परंपरा को सामने रखेंगे। पीएम मोदी के मिलेट्स को श्रीअन्न नाम देने से पहले लंबे समय तक इसे सामान्य ग्रामीण भोजन मानकर देखा गया, लेकिन अब वही श्रीअन्न वैश्विक पोषण और वैश्विक मंथन का हिस्सा बन चुका है।हमारे उत्पाद और परंपराओं को मिलेगी वैश्विक पहचान
भारत में होने वाले वैश्विक आयोजनों में प्रधानमंत्री मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल’ मंत्र की असली ताकत दिखाई देती है। भारत जब दुनिया के प्रमुख देशों के नेताओं और प्रतिनिधियों की मेजबानी करता है तो अपनी पहचान केवल बड़े उद्योगों, डिजिटल तकनीक, अंतरिक्ष उपलब्धियों और आर्थिक क्षमता से नहीं कराता, बल्कि गांव की रसोई, खेत की फसल, कारीगर के हाथ और स्थानीय बाजारों के इनोवेशन को भी सामने रखता है। ब्रिक्स बाजार में जयपुरी लाख की चूड़ियां, अलवर की कागजी पॉटरी, धार के बाग प्रिंट और देश के अलग-अलग हिस्सों की लोककलाएं विदेशी प्रतिनिधियों से संवाद करती दिखाई दे रही हैं। यानी भारत की कूटनीति इस बार भोजन की थाली से लेकर हस्तशिल्प की मेज तक एक ही संदेश देती नजर आएगी- We are Vocal for Local. हमारे उत्पाद और परंपराएं केवल स्थानीय नहीं, सही मंच मिलने पर वही वैश्विक पहचान भी बन सकते हैं।मिलेट्स और गुलाब-केसर से बने बेहद खास व्यंजन
दिल्ली में शनिवार (12 सितंबर) को शुरू हुए 18वें BRICS Leaders’ Summit में बैठकों का दौर जारी है। विदेशी मेहमानों और प्रतिनिधिमंडलों के स्वागत के लिए दिल्ली के कई लग्जरी होटलों में खास मेन्यू तैयार किए गए हैं। इन मेन्यू में सिर्फ विदेशी मेहमानों की पसंद का ध्यान नहीं रखा गया, बल्कि भारत की क्षेत्रीय रसोई को भी खास जगह दी गई है। इतना ही नहीं, कुछ होटलों ने बाजरे जैसे मिलेट्स से बने हेल्दी विकल्प और गुलाब, केसर व इलायची से तैयार खाने योग्य कमल जैसी खास प्रस्तुति भी तैयार की है। यानी इस बार दिल्ली के होटल सिर्फ मेहमानों की मेजबानी नहीं कर रहे, बल्कि थाली के जरिए भारत की विविधता और स्वाद की कहानी भी सुना रहे हैं। मिलेट्स को मेन्यू में जगह देने का महत्व केवल स्वाद तक सीमित नहीं है। इसके पीछे भारतीय कृषि और किसानों की कहानी भी है।


एक थाली में छह अलग-अलग राज्यों की रसोई का स्वाद
भारतीय खान-पान की सबसे बड़ी खासियत उसकी विविधता है। यही विविधता ब्रिक्स मेहमानों के लिए तैयार किए गए स्नैक्स में भी दिखाई देती है। नई दिल्ली के नामी होटल में ट्रेडीशनल टू टेबल के तहत छह अलग-अलग क्षेत्रों के पारंपरिक स्नैक्स को शामिल किया गया है। इसमें कश्मीर के मसालेदार अखरोट, पुरानी दिल्ली के मैदा काजू, महाराष्ट्र की भाकरवड़ी, राजस्थान की मिनी कचौरी, बंगाल की कुचो निमकी और तमिलनाडु का मुरुक्कू शामिल हैं। इन छोटे-छोटे स्नैक्स की खासियत यह है कि हर एक अपने साथ किसी न किसी राज्य की रसोई की पहचान लेकर आता है। यानी एक ही प्लेट में भारत के कई हिस्सों का स्वाद चखा जा सकता है।कूटनीति की मेज पर ‘विविधता में एकता’ का अध्याय
अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भोजन अक्सर औपचारिक व्यवस्था का हिस्सा माना जाता है, लेकिन भारत की परंपरा में भोजन स्वयं एक संस्कृति है। किसी अतिथि के सामने थाली रखना केवल व्यंजन परोसना नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता का परिचय देना है। ब्रिक्स के विदेशी मेहमान जब भारतीय व्यंजनों का स्वाद चखेंगे तो उनके सामने एक ऐसे देश की तस्वीर खुलेगी, जहां हर कुछ सौ किलोमीटर पर भोजन का स्वाद बदल जाता है और हर क्षेत्र अपने अनाज, मसाले, पकाने की विधि और पारंपरिक व्यंजन के साथ अपनी अलग पहचान रखता है। इसीलिए अलग-अलग राज्यों के प्रसिद्ध स्नैक्स को एक साथ परोसने की पहल भारत की ‘विविधता में एकता’ को स्वाद के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रभावी माध्यम बन रही है।

पीएम मोदी की श्री अन्न की सोच अब वैश्विक थाली तक
पीएम मोदी के विजन पर चलते हुए इस पूरी भोजन व्यवस्था में मिलेट्स यानी मोटे अनाज को मिली विशेष जगह अपने आप में महत्वपूर्ण है। बाजरा, ज्वार और रागी जैसे अनाज भारत की कृषि परंपरा के पुराने साथी रहे हैं। बदलती खाद्य आदतों और आधुनिक कृषि व्यवस्था के बीच इन अनाजों का महत्व कुछ समय के लिए पीछे जरूर गया, लेकिन अब दुनिया पोषण, जल संरक्षण और टिकाऊ कृषि की ओर देख रही है तो श्री अन्न फिर केंद्र में आ गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने मिलेट्स को देश की खाद्य संस्कृति और किसानों की अर्थव्यवस्था से जोड़ते हुए लगातार इसके व्यापक उपयोग और प्रचार पर जोर दिया है। ब्रिक्स के आधिकारिक भोज में इन अनाजों को स्थान मिलना उसी सोच को वैश्विक मंच पर आगे बढ़ाने जैसा है।बाजरा उपमा से रागी डोसा और मिलेट लड्डू तक सबकुछ
ब्रिक्स समिट में बाजरा उपमा, बाजरा रोटी, रागी डोसा, मिलेट लड्डू और मिलेट पोंगल जैसे व्यंजन यह दिखाते हैं कि पारंपरिक अनाज आधुनिक प्रस्तुति के साथ दुनिया के किसी भी भोजन मंच पर जगह बना सकते हैं। भारतीय रसोई की खूबी ही यही है कि साधारण सामग्री को भी विविध रूप देने की क्षमता मौजूद है। रागी का डोसा दक्षिण भारत की पहचान से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मेहमान की प्लेट तक पहुंचा है। बाजरा उपमा और रोटी पश्चिम तथा उत्तर भारत की कृषि परंपरा की याद दिलाते हैं। यह भोजन व्यवस्था किसी एक राज्य की संस्कृति नहीं, बल्कि पूरे भारत की खाद्य विरासत का संक्षिप्त परिचय बनी है।

सुपरफूड की किनुआ बिरयानी और सत्तू का नया मेल
भारतीय मेन्यू में पारंपरिकता के साथ आधुनिकता का संतुलन भी दिखाई देगा। किनुआ बिरयानी जैसे प्रयोग यह बताते हैं कि ‘वोकल फॉर लोकल’ का अर्थ दुनिया से दूरी बनाना नहीं, बल्कि अपनी खाद्य परंपरा को समय के साथ जोड़कर प्रस्तुत करना है। हैदराबादी और लखनवी पारंपरिक बिरयानी के विपरीत किनुआ बिरयानी चावल के स्थान पर सुपरफूड ‘किनुआ’ (Quinoa) का उपयोग करके बनाई जाती है। भारतीय स्वाद और आधुनिक खाद्य विकल्पों का यह मेल विदेशी मेहमानों को नया अनुभव और स्वाद एक साथ देगा। इसी तरह सत्तू जैसे देसी खाद्य पदार्थ को अंतरराष्ट्रीय मेहमानों के सामने रखना उस भारत की याद दिलाता है जहां पौष्टिक भोजन हमेशा महंगे और जटिल खाद्य पदार्थों का पर्याय नहीं रहा है।भोजन करता है बिना किसी भाषाई बाधा के संवाद स्थापित
भारत के अलग-अलग राज्यों के प्रसिद्ध स्नैक्स को एक थाली में परोसने का विचार अपने-आप में ही गहरा सांस्कृतिक संदेश है। दरअसल, भारत की खाद्य पहचान किसी एक व्यंजन से नहीं बनती। कहीं बाजरा प्रमुख है, कहीं चावल, कहीं रागी, कहीं दालें और कहीं मसालों, कहीं नमकीन, कहीं मिठाई की अलग दुनिया। हर क्षेत्र की अपनी जलवायु, कृषि और जीवन शैली ने भोजन को आकार दिया है। विदेशी प्रतिनिधियों के सामने जब अलग-अलग क्षेत्रों के स्वाद एक साथ आएंगे तो यह अनुभव भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता का सहज परिचय बनेगा। कूटनीति की भाषा जहां अक्सर औपचारिक और गंभीर होती है, वहीं भोजन बिना किसी भाषाई बाधा के संवाद स्थापित कर सकता है।

मध्यप्रदेश के धार के बाग प्रिंट से लोककला का विस्तार
मध्यप्रदेश के धार का बाग प्रिंट भी भारत की विविध हस्तकला परंपरा को सामने रखेगा। पारंपरिक छपाई तकनीक, प्राकृतिक रंगों और स्थानीय डिजाइन से जुड़ी यह कला भारतीय वस्त्र परंपरा की गहराई को दर्शाती है। ऐसे शिल्प को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थान मिलने का अर्थ है कि स्थानीय डिजाइन और पारंपरिक तकनीक को आधुनिक बाजार में नई संभावनाएं मिल सकती हैं। यही वह बिंदु है जहां संस्कृति और अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से जुड़ती हैं। कारीगर की कला तभी लंबे समय तक जीवित रह सकती है जब उसके लिए सम्मान के साथ बाजार भी उपलब्ध हो। ब्रिक्स सम्मेलन में भोजन और लोककला का यह संयोजन उसी व्यापक सांस्कृतिक शक्ति को सामने रखेगा। विदेशी प्रतिनिधि जिस भोजन का स्वाद चखेंगे और जिस वस्तु को हाथ में उठाकर देखेंगे, उसके पीछे किसी राज्य, किसी गांव, किसी किसान या किसी कारीगर की कहानी होगी।अलवर की पॉटरी और जयपुरी लाख की चूड़ियों की चमक
ब्रिक्स बाजार में जयपुरी लाख की चूड़ियां खास आकर्षण का केंद्र बन रही हैं। जयपुर की लाख कला पीढ़ियों से चली आ रही कारीगरी की मिसाल है। हाथों से आकार लेते लाख के रंग और डिजाइन राजस्थान की लोकसंस्कृति को अपने भीतर समेटे रहते हैं। अलवर की कागजी पॉटरी, जोधपुर की ब्लू पॉटरी भी इसी सांस्कृतिक यात्रा का हिस्सा बनेगी। अलवर की कला में मिट्टी को बेहद महीन और हल्का रूप देकर कागज जैसा प्रभाव पैदा करने वाली यह कला भारतीय कारीगरी की बारीकी का उदाहरण है। आधुनिक दुनिया में जब बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन सामान्य हो चुका है, तब हाथ से तैयार ऐसी वस्तुएं उस मानवीय स्पर्श की याद दिलाती हैं जो किसी उत्पाद को केवल वस्तु नहीं रहने देता। अलवर की पॉटरी का अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के सामने पहुंचना राजस्थान की मिट्टी से निकली रचनात्मकता को वैश्विक पहचान देने की दिशा में अहम कदम है।ब्रिक्स की मेज पर उभरता आत्मविश्वासी भारत
प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक सोच में स्थानीय उत्पादन को वैश्विक बाजार से जोड़ने का विचार लगातार महत्वपूर्ण रहा है। वे हमेशा स्थानीय को वैश्विक बनाने की नीति पर जोर देते रहे हैं। ब्रिक्स जैसे मंच पर जब भारतीय मिलेट्स, स्थानीय व्यंजन और हस्तशिल्प एक साथ प्रस्तुत होते हैं तो यह सोच जमीन पर दिखाई देती है। ‘वोकल फॉर लोकल’ का सबसे बड़ा उद्देश्य यही है कि भारतीय उत्पादों को भारतीय होने पर गर्व हो और दुनिया उन्हें गुणवत्ता, उपयोगिता तथा विशिष्टता के आधार पर स्वीकार करे। स्थानीय उत्पाद को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए उसकी कहानी भी उतनी ही जरूरी है जितनी उनकी गुणवत्ता जरूरी है।‘वोकल फॉर लोकल’ से ‘लोकल टू ग्लोबल’ तक
भारत के लिए यह भी इस ब्रिक्स सम्मेलन की सबसे खूबसूरत तस्वीरों में से एक बन सकती है। पीएम मोदी का ‘वोकल फॉर लोकल’ केवल देश के भीतर स्थानीय वस्तुओं की खरीद का आह्वान नहीं, बल्कि स्थानीय उत्पादों की क्षमता पर विश्वास का विचार है। जब बाजरा विदेशी मेहमान की थाली में पहुंचता है, रागी डोसा अंतरराष्ट्रीय स्वाद का हिस्सा बनता है, सत्तू भारतीय पोषण परंपरा की कहानी कहता है और जयपुरी चूड़ियां तथा अलवर की पॉटरी वैश्विक प्रतिनिधियों का ध्यान खींचती हैं, तब स्थानीय सचमुच वैश्विक यात्रा शुरू करता है। ब्रिक्स का यह मंच भारत की इसी यात्रा का प्रतीक है। यहां कूटनीति की भाषा में आर्थिक साझेदारी होगी, संवाद में वैश्विक सहयोग होगा और मेजबानी की थाली में भारत की मिट्टी, मेहनत, स्वाद और संस्कृति की खुशबू होगी।

VIP मेन्यू तैयार करने में करीब तीन से छह महीने का शोध
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली के पांच सितारा होटल के जनरल मैनेजर और एग्जीक्यूटिव शेफ बताते हैं कि करीब पांच दशक से हमारा होटल दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों और राजनयिकों की मेजबानी करता आया है। इस बार भी कोशिश है कि भारतीय खान-पान की विविधता के जरिए मेहमानों तक हमारी मेहमाननवाजी और संस्कृति की गर्माहट पहुंचाई जाए। मेन्यू तैयार करने में करीब तीन से छह महीने का शोध और तैयारी लगी। अलग-अलग देशों के मेहमानों की पसंद को समझकर मसालों और सामग्री का चुनाव किया गया। केसर, कॉफी और चाय जैसे स्वादों को भी स्वागत अनुभव का हिस्सा बनाया गया है। BRICS में शामिल प्रतिनिधियों के लिए अलग मेन्यू तैयार किया है। इसमें भारतीय क्षेत्रीय खान-पान को आधुनिक अंदाज में पेश किया गया। गालौटी कबाब और तंदूर में बनी रोटियों जैसे पारंपरिक व्यंजन इसमें शामिल हैं। इसके साथ ही मिलेट पर आधारित कई विकल्प रखे गए हैं। हमने भारतीय स्वाद के साथ कुछ अंतरराष्ट्रीय प्रभाव भी जोड़े हैं। इसमें मिसो पेस्ट के साथ ब्रेज्ड बैंगन, सिमर्ड चाइनीज कैबेज और एंबर सॉस के साथ जापानी अंदाज में तैयार स्वीट किडनी बीन्स जैसे व्यंजन शामिल हैं।

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