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जीडीपी के ‘सुपरडोज’ से कांग्रेस पस्त, विकास की रफ़्तार से बढ़ा बीपी, आंकड़ों की सच्चाई से 10 प्रोपेगंडा बेनकाब

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हाल ही में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के नए आंकड़े सामने आने के बाद मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की नींद उड़ गई है। विकास की तेज रफ्तार ने उनके ‘डेड इकॉनमी’ के प्रोपेगंडा की हवा निकाल दी है। इससे राहुल गांधी निराशा के गर्त में डूब चुके हैं। बढ़ती हताशा और निराशा ने उनका ब्लड प्रेशर (बीपी) बढ़ा दिया है। इसलिए वो और उनकी पार्टी कांग्रेस चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की 7.8 प्रतिशत विकास दर के खिलाफ फर्जी आंकड़ों के जरिए फर्जी नैरेटिव फैला रहे हैं। इसमें कांग्रेस परस्त पूर्व अधिकारी और अर्थशास्त्री आंकड़ों की बाजीगरी दिखाकर आम जनता को गुमराह कर रहे हैं। देश की जीडीपी विकास दर और उस पर उठे सियासी एवं आर्थिक सवालों पर सरकार ने आधिकारिक आंकड़ों के जरिए तीखा पलटवार किया है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि जब आप सच्चाई को तोड़-मरोड़ करके लोगों का हौसला तोड़ने की कोशिश करते हैं, तो आप जनता के साथ विश्वासघात कर रहे हैं।

आइए जानते हैं कि किस तरह भारत की विकास दर के खिलाफ कांग्रेस और उसके सरपरस्तों द्वारा प्रोपेगंडा किया जा रहा है और मोदी सरकार ने पुख्ता आंकड़ों के जरिए कैसे उन्हें बेनकाब किया है…

प्रोपेगंडा नंबर – 01- वास्तविक विकास दर काफी कम (लगभग 2.6%)
कांग्रेस ने पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के विश्लेषण का हवाला देते हुए दावा किया कि सरकार बेस ईयर (आधार वर्ष) और पिछली जीडीपी श्रृंखला में बदलाव करके आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही है। उनका तर्क है कि यदि पुराने मानकों से तुलना की जाए तो वास्तविक विकास दर काफी कम (लगभग 2.6%) है। 

सच्चाई: – पुराने और नए बेस ईयर के आंकड़ों की सीधी तुलना गलत
पूर्व वित्त सचिव के हवाले से 2.6% या बेस ईयर के बदलाव का जो दावा किया गया, उसे सांख्यिकी मंत्रालय ने तथ्यात्मक रूप से गलत बताया है। मंत्रालय के अनुसार, पूर्व वित्त सचिव ने पुरानी सीरीज (2011-12 बेस ईयर) के आंकड़े को नई सीरीज (2022-23 बेस ईयर) के साथ मिला दिया है।

नए बेस ईयर (2022-23) और पुरानी सीरीज (2011-12) के आंकड़ों की तुलना करना “सेब और संतरे की तुलना” करने जैसा है, जो सांख्यिकीय रूप से पूरी तरह गलत और अर्थहीन है। पहली तिमाही में मजबूत 7.8% की जीडीपी ग्रोथ दर्ज की है, जिसकी गणना एक समान और अद्यतन पद्धति से की गई है।

सांख्यिकी सचिव सौरभ गर्ग ने साफ-साफ कहा कि आलोचक दो ऐसी चीजों की तुलना कर रहे हैं जिनका आपस में कोई मेल नहीं है:

अलग-अलग आधार वर्ष: आलोचक जिस 86.05 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े का हवाला दे रहे हैं, वह पुराने ‘2011-12’ के आधार वर्ष पर आधारित था। सरकार की ओर से फरवरी 2026 में नया 2022-23 आधार वर्ष पेश किए जाने के बाद इस पुराने आंकड़े का कोई महत्व नहीं रह गया है।

चालू बनाम स्थिर कीमतें: जीडीपी की वास्तविक वृद्धि की गणना हमेशा स्थिर कीमतों पर की जाती है ताकि महंगाई के प्रभाव को हटाया जा सके, जबकि आलोचक चालू कीमतों की तुलना कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि चालू कीमतों (Current Prices) और पुराने बेस ईयर के आंकड़ों को जोड़कर निकाली गई कम विकास दर का तर्क आर्थिक गणना के स्थापित नियमों के विपरीत है। सरकार ने स्पष्ट किया कि Weights और डेटा सोर्स में बदलाव किए गए हैं। सरकार का कहना है कि जीडीपी की नई सीरीज और पुरानी सीरीज के आंकड़ों को आपस में मिलाकर भ्रामक बातें फैलाई जा रही हैं।

सरकार ने इसे सेब और संतरे की तुलना क्यों बताया?

प्रोपेगंडा नंबर – 02- क्या पिछले साल की जीडीपी को जानबूझकर घटाया गया?
पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग और कुछ राजनीतिक नेताओं ने सवाल उठाया कि पिछले साल के आंकड़ों में बदलाव करके बेस को कम किया गया है। पिछले साल के बेस को नीचे दिखाने से इस साल की पहली तिमाही की ग्रोथ (7.8%) ज्यादा दिख रही है।

सच्चाई: – डेटा में बदलाव किसी हेरफेर का हिस्सा नहीं
सांख्यिकी मंत्रालय ने साफ किया कि डेटा में बदलाव किसी हेरफेर का हिस्सा नहीं, बल्कि सामान्य संशोधन चक्र का हिस्सा है। 86.05 लाख करोड़ रुपये से घटकर 80.00 लाख करोड़ रुपये होना जीडीपी श्रृंखला में समय-समय पर किए गए संशोधनों का परिणाम है। ये संशोधन आधार वर्ष में बदलाव, बेहतर आंकड़ा स्रोतों और कार्यप्रणाली को शामिल करने तथा उपलब्ध संकेतकों को अद्यतन करने के कारण किए गए हैं। नए आधार वर्ष (2022-23) के तहत, पिछले साल की पहली तिमाही की जीडीपी शुरुआत में 80.32 लाख करोड़ रुपये आंकी गई थी, जिसे बाद में नए औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) और उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई) के आधार पर संशोधित कर क्रमशः 80.44 लाख करोड़ रुपये और अंततः 80 लाख करोड़ रुपये किया गया। इसलिए यह कहना गलत है कि आंकड़ों को कृत्रिम रूप से घटाया गया।

प्रोपेगंडा नंबर – 03- मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नेगेटिव डिफ्लेटर का क्या खेल है?
आलोचकों ने इस बात पर भी सवाल उठाए थे कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में वास्तविक वृद्धि (9.2%) नॉमिनल वृद्धि (7.7%) से अधिक कैसे हो सकती है?

सच्चाई: – ‘डबल डिफ्लेशन’ पद्धति के कारण वास्तविक वृद्धि नॉमिनल वृद्धि से अधिक
मंत्रालय ने समझाया कि ऐसा डबल डिफ्लेशन पद्धति के कारण हुआ है। जब कच्चे माल (इन्पुट) की कीमतें तैयार उत्पादों (आउटपुट) की तुलना में तेजी से बढ़ती हैं (जैसे कपड़ा, धातु और प्लास्टिक सेक्टर में हुआ), तो नॉमिनल ग्रॉस वैल्यू ऐडेड (जीवीए) वास्तविक जीवीए की तुलना में धीमा हो जाता है। इसके चलते ही वहां -1.5% का निगेटिव डिफ्लेटर दिखाई दे रहा है, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि फैक्टरी-गेट पर उत्पाद सस्ते हुए हैं।

प्रोपेगंडा नंबर – 04- विज्ञापनों के जरिए झूठी चमक दिखाने की कोशिश 
कांग्रेस पार्टी का मुख्य आरोप है कि पीआर (PR) और विज्ञापनों के जरिए अर्थव्यवस्था की चमक दिखाई जा रही है। 

सच्चाई: – ‘पीआर या झूठी तस्वीर’ बताना देश की संस्थाओं का अपमान
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि जीडीपी के आंकड़े कोई नेता या मंत्री घर में बैठकर नहीं बनाते। इन्हें स्थापित अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय सांख्यिकीय मानकों के तहत देश की स्वतंत्र संस्थाएं (MoSPI / NSO) तैयार करती हैं। इसे ‘पीआर या झूठी तस्वीर’ बताना देश की व्यवस्था और संस्थाओं का अपमान है।
सरकार का तर्क है कि विकास दर केवल कागजी नहीं है, बल्कि देश में वास्तविक उत्पादन बहुत तेजी से बढ़ा है। सीमेंट, स्टील, और ऑटोमोबाइल (वाहन उत्पादन) जैसे कोर सेक्टरों में पिछले साल की तुलना में 12% से 16% तक की उच्च वृद्धि दर्ज की गई है।

प्रोपेगंडा नंबर – 05- मुफ्त राशन पर निर्भरता और जमीनी हकीकत
कांग्रेस ने सवाल उठाया कि अगर विकास दर इतनी ही शानदार है, तो देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 80 करोड़ लोग) आज भी मुफ्त राशन पर निर्भर रहने के लिए क्यों मजबूर है? क्या इन लोगों ने मुफ्त राशन लेना छोड़ दिया है?

सच्चाई: – मुफ्त राशन कल्याणकारी योजना और असमानता से जुड़ा नीतिगत मुद्दा
जीडीपी देश के ‘कुल उत्पादन’ को मापती है, यह यह गारंटी नहीं देती कि उसका वितरण हर नागरिक तक समान रूप से हुआ है। हालांकि, इसे विकास दर के आंकड़े ‘झूठे’ होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता, बल्कि यह कल्याणकारी योजनाओं और असमानता से जुड़ा नीतिगत मुद्दा है। एसबीआई की रिपोर्ट बताती है कि इस मुफ्त अनाज वितरण योजना से देश के पिछड़े राज्यों में आय की असमानता (Income Inequality) में काफी कमी आई है। इससे छोटे किसानों को लाभ मिला है।

प्रोपेगंडा नंबर – 06- रोजगार और युवाओं की स्थिति पर सवाल
कांग्रेस ने पूछा कि इस जीडीपी ग्रोथ से देश के युवाओं को क्या मिला? क्या रोजगार कार्यालयों के बाहर युवाओं की लंबी कतारें खत्म हो गईं? पेपर लीक की घटनाएं और बेरोजगारी के संकट का समाधान कब होगा?

सच्चाई: – श्रम बाजार में मांग मजबूत, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियों का सृजन

श्रम बाजार में मांग मजबूत: विपक्ष के बेरोजगारी संबंधी आरोपों के जवाब में सरकार ने कहा कि श्रम बाजार में मांग मजबूत है। उदाहरण के लिए, कपड़ा उद्योग (जैसे तमिलनाडु के तिरुपुर) में श्रमिकों की भारी मांग है और रोजगार के अवसर लगातार सृजित हो रहे हैं।

विनिर्माण क्षेत्र में बढ़े अवसर : सरकार के अनुसार, विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र में 9.2% और निवेश में 11.9% की बड़ी वृद्धि दर्ज की गई है, जो सीधे तौर पर नए अवसरों को बढ़ावा दे रही है।

PLI के माध्यम से औपचारिक नौकरियों में लगातार वृद्धि : मार्च 2026 तक, PLI योजना के तहत 2.40 लाख करोड़ रुपये से अधिक का वास्तविक निवेश जमीन पर आ चुका है, जिसने 14.15 लाख से अधिक (प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष) नौकरियों का सृजन किया है।

नए यूनिवर्सल अकाउंट नंबर्स में बढ़ोतरी : वित्तीय वर्ष 2025-26 (FY26) में जेनरेट हुए कुल नए यूनिवर्सल अकाउंट नंबर्स (UAN) में से 79% सदस्य 18-30 आयु वर्ग के थे। इसमें से अकेले 21-25 आयु वर्ग की हिस्सेदारी 35% से अधिक थी, जो इसे औपचारिक नौकरी बाजार में प्रवेश करने वाला सबसे बड़ा समूह बनाती है।

युवा बेरोजगारी घटकर 9.9% : युवा बेरोजगारी दर का सिंगल डिजिट (9.9%) पर आना यह दिखाता है कि कौशल विकास (Skill Development) और बाजार की मांग के बीच का अंतर धीरे-धीरे कम हो रहा है।

अगस्त 2026 में जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार ईपीएफओ (EPFO) के लगभग 70% नए ग्राहक 18-25 आयु वर्ग के हैं। यह भारत की औपचारिक अर्थव्यवस्था में युवा कार्यबल की तेजी से बढ़ती भागीदारी को दर्शाती है।

औपचारिक रोजगार में तेजी : 18-25 आयु वर्ग के युवाओं का बड़ी संख्या में ईपीएफओ से जुड़ना यह दिखाता है कि भारत में पहली बार नौकरी पाने वाले युवा अब बिना किसी सामाजिक सुरक्षा वाली अनौपचारिक नौकरियों के बजाय सीधे भविष्य निधि (PF), पेंशन (EPS) और स्वास्थ्य बीमा लाभ वाली सुरक्षित नौकरियों में आ रहे हैं।

डेमोग्राफिक डिविडेंड का सही इस्तेमाल: भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में से एक है। इतनी बड़ी संख्या में युवाओं का सीधे उत्पादक और टैक्स-पेइंग (करदाता) औपचारिक क्षेत्रों से जुड़ना देश की जीडीपी (GDP) विकास दर को मजबूत करता है।

छोटे शहरों की आर्थिक समृद्धि: चूंकि 69% युवा टियर-2 और टियर-3 शहरों में काम कर रहे हैं, इसलिए ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में नकदी का प्रवाह बढ़ेगा। इससे स्थानीय बाजारों में वस्तुओं और सेवाओं की मांग (Consumer Demand) में भारी उछाल आएगा।

महिलाओं की बढ़ती भागीदारी: रिपोर्ट के अनुसार, युवाओं के साथ-साथ महिला कार्यबल (Female Workforce) का भी औपचारिक क्षेत्र में पंजीकरण लगातार बढ़ रहा है (उदाहरण के लिए जनवरी 2025 में ही 2.17 लाख नई महिलाएं जुड़ीं), जो कार्यस्थल पर लैंगिक समानता और समावेशिता को बढ़ावा दे रहा है।

प्रेंटिसशिप और ट्रेनिंग कल्चर का विकास: कंपनियां अब सीधे कॉलेजों और ट्रेनिंग संस्थानों से युवाओं को ‘लर्न एंड अर्न’ (सीखो और कमाओ) मॉडल के तहत जोड़ रही हैं, जिससे शिक्षा से सीधे रोजगार में संक्रमण (Transition) बेहद आसान हो रहा है।

जब युवाओं को नियमित वेतन वाली नौकरियां मिलती हैं, तो उनकी क्रय शक्ति (Purchasing Power) बढ़ती है, जिससे बाजार में मांग और आर्थिक विकास को गति मिलती है।

प्रोपेगंडा नंबर – 07- कृषि, MSME और असंगठित क्षेत्र की उपेक्षा
देश के सबसे बड़े कृषि क्षेत्र, एमएसएमई (MSME) सेक्टर और असंगठित क्षेत्र को इस विकास दर से क्या लाभ हुआ है, इस पर सरकार से स्पष्टीकरण मांगा गया है।

सच्चाई: – रिकॉर्ड उत्पादन और निर्यात में भारी वृद्धि

कृषि क्षेत्र के उत्पादन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी : सरकार का तर्क है कि कृषि क्षेत्र देश की रीढ़ है और खाद्यान्न, बागवानी तथा दुग्ध उत्पादन में लगातार रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है। किसानों को उनकी लागत पर डेढ़ गुना से अधिक एमएसपी (MSP) दी जा रही है।

किसानों की क्रय शक्ति में बढ़ोतरी : ‘पीएम-किसान सम्मान निधि’ के तहत देश के करोड़ों किसानों के खातों में सीधे पैसे ट्रांसफर किए जा रहे हैं, जिससे उनकी क्रय शक्ति बढ़ी है। इसके अलावा कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड (AIF) के जरिए गांवों में कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउस और प्रोसेसिंग यूनिट्स बनाई जा रही हैं, जिससे किसानों को बिचौलियों से मुक्ति मिल रही है।

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के निर्यात में में भारी वृद्धि: वाणिज्य मंत्रालय का यह भी तर्क है कि कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों (Processed Agri-foods) के निर्यात में भारी वृद्धि हुई है, जिससे वैश्विक बाजारों तक भारतीय किसानों की पहुंच मजबूत हुई है।

एमएसएमई सेक्टर का जीडीपी और निर्यात में भारी योगदान: सरकार के आंकड़ों के अनुसार, एमएसएमई सेक्टर देश की जीडीपी में 31% से अधिक और कुल निर्यात में लगभग 48% से 49% का योगदान देता है। यह कृषि के बाद सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता है, जो लगभग 32 करोड़ से अधिक लोगों को आजीविका देता है।

बिना गारंटी के ऋण से सेक्टर का विस्तार : सरकार ने छोटे कारोबारियों के लिए बिना किसी गारंटी (Collateral Free Loans) के मिलने वाले ऋण की सीमा को बढ़ाया है। मुद्रा योजना के तहत छोटे उद्यमियों को आसानी से कम ब्याज पर लोन मिल रहा है, जिससे इस सेक्टर का विस्तार हुआ है।

औपचारीकरण से योजनाओं और टैक्स लाभों का सीधा फायदा : ‘उद्यम’ और ‘उद्यम असिस्ट’ पोर्टलों के जरिए करोड़ों असंगठित सूक्ष्म इकाइयों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा गया है, जिससे उन्हें सरकार की तमाम योजनाओं और टैक्स लाभों का सीधा फायदा मिल रहा है।

डिजिटल समावेशन और सुरक्षा योजनाएं: सरकार का कहना है कि असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को समाज के हाशिये पर नहीं छोड़ा गया है। ‘ई-श्रम पोर्टल’ (e-Shram Portal) पर देश के करोड़ों असंगठित कामगारों का पंजीकरण किया गया है, जिससे उन्हें बीमा, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिल रहा है।

स्ट्रीट वेंडर्स के लिए ‘पीएम स्वनिधि योजना’: रेहड़ी-पटरी वालों और छोटे दुकानदारों को बिना गारंटी के आसान कार्यशील पूंजी (Working Capital) उपलब्ध कराई गई है, जिससे डिजिटल पेमेंट अपनाकर वे मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं।

प्रोपेगंडा नंबर – 08- महंगाई और आम आदमी की क्रय शक्ति
कांग्रेस ने तंज कसते हुए कहा कि पेट्रोल, डीजल, दूध, शक्कर और अन्य जरूरी चीजों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, जिससे आम आदमी की बचत घट रही है और उस पर कर्ज बढ़ रहा है। ऐसे में जीडीपी के बड़े आंकड़े आम जनता के जीवन में बदलाव नहीं ला रहे हैं।

सच्चाई: – जीडीपी के ऊंचे आंकड़ों का असर तुरंत नहीं दिखते
महंगाई और बेरोजगारी ऐसे जमीनी मुद्दे हैं जिनसे आम आदमी सीधे जूझता है। जीडीपी के ऊंचे आंकड़े अक्सर तुरंत हर नागरिक की जेब में नहीं दिखते, खासकर असंगठित क्षेत्र (Informal Sector) में। इसलिए कांग्रेस का यह सवाल राजनीतिक रूप से जनता के दर्द को रेखांकित करता है, लेकिन इसे जीडीपी के आंकड़ों की प्रमाणिकता पर तकनीकी सवाल के रूप में पूरी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता।

नियंत्रण में है खुदरा महंगाई (Retail Inflation): सरकार और रिजर्व बैंक (RBI) का आधिकारिक रुख यह रहा है कि भारत में खुदरा महंगाई दर काफी हद तक नियंत्रण में है और यह आरबीआई के संतोषजनक दायरे (लगभग 4% से 5.4% के आसपास) के भीतर बनी हुई है। सरकार का दावा है कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और ऊर्जा संकट के बावजूद भारत ने अन्य विकसित देशों की तुलना में महंगाई को बेहतर ढंग से संभाला है।

लक्षित कल्याणकारी योजनाएं और सब्सिडी: सरकार का तर्क है कि बढ़ती महंगाई के दबाव से आम आदमी को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर कदम उठाए गए हैं। उदाहरण के लिए, रसोई गैस (LPG) के दामों में राहत देना, किसानों को सस्ती खाद के लिए भारी सब्सिडी देना और 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराना—ये सभी उपाय आम जनता के बजट को संभालने के लिए ही किए गए हैं ताकि महंगाई की मार सीधे उनकी जेब पर न पड़े।

राज्यों के कर (VAT) पर सवाल: केंद्र सरकार ने कई मौकों पर यह तर्क दिया है कि पेट्रोल और डीजल पर केंद्र ने एक्साइज ड्यूटी घटाई थी, लेकिन कई विपक्षी दलों या गैर-भाजपा शासित राज्यों द्वारा वैट (VAT) न कम करने के कारण वहां ईंधन महंगा बना हुआ है। सरकार का कहना है कि ऊर्जा कीमतों पर वैश्विक दबाव के बावजूद वह घरेलू स्तर पर राहत देने के लिए निरंतर नीतिगत कदम उठा रही है।

प्रोपेगंडा नंबर – 09- निजी निवेश और उपभोक्ता विश्वास में कमी
कांग्रेस पार्टी का यह भी कहना है कि जीडीपी केवल कुल उत्पादन को मापती है, न कि हर नागरिक की व्यक्तिगत समृद्धि को। देश में निजी निवेश का रुझान कमजोर है और उपभोक्ता का आत्मविश्वास डिगा हुआ है।

सच्चाई: – निवेश पैटर्न में बदलाव, शेयर बाजार, वित्तीय परिसंपत्तियों में रिकॉर्ड निवेश

बचत और कर्ज के पैटर्न में बदलाव: अर्थशास्त्रियों का यह भी मानना है कि केवल बैंक खातों की पारंपरिक बचत कम होने को संकट नहीं माना जा सकता। आज का युवा और मध्यम वर्ग म्यूचुअल फंड (SIP), शेयर बाजार और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए वित्तीय परिसंपत्तियों (Financial Assets) में रिकॉर्ड निवेश कर रहा है, जिसे पारंपरिक बचत के आंकड़ों में अलग तरह से देखा जाता है।

निजी उपभोग के मजबूत आंकड़े: सरकार का खंडन है कि उपभोक्ता का आत्मविश्वास कमजोर है। आर्थिक आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा (लगभग 60% के आसपास) निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) से आता है, जिसमें लगातार अच्छी बढ़ोतरी देखी जा रही है।

पूंजीगत व्यय (CapEx) से ‘क्राउड इन’ (Crowding-in): सरकार का तर्क है कि पिछले कुछ वर्षों में देश का निवेशे दर (Investment Rate) जीडीपी के 30% से ऊपर पहुंच चुका है। सरकार ने खुद भारी-भरकम पूंजीगत व्यय (CapEx) किया है, जिससे निजी निवेशकों के लिए एक अनुकूल माहौल तैयार हुआ है।

निजी क्षेत्र की भागीदारी में तेजी: आर्थिक सर्वेक्षण और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, ऑटोमोबाइल, सीमेंट, मैन्युफैक्चरिंग और ग्रीन एनर्जी जैसे सेक्टरों में निजी क्षेत्र का निवेश लगातार बढ़ रहा है। रिजर्व बैंक (RBI) और विदेशी एजेंसियों (जैसे फिच और एसएंडपी) की रिपोर्टों का हवाला देते हुए सरकार कहती है कि कॉरपोरेट बैलेंस शीट पूरी तरह साफ हो चुकी हैं और बैंक कर्ज देने के लिए तैयार हैं, जिससे निजी निवेश में मजबूत सुधार दर्ज हो रहा है।

बढ़ता एफडीआई (FDI): सरकार ने इस बात पर भी जोर दिया है कि देश में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Net FDI) के आंकड़े इस बात का प्रमाण हैं कि वैश्विक निवेशकों का भारत की अर्थव्यवस्था पर पूरा भरोसा बना हुआ है।

प्रोपेगंडा नंबर – 10- बढ़ती जीडीपी से आम आदमी को फायदा नहीं
कांग्रेस का आरोप है कि जीडीपी का लाभ आम जनता और उपभोग की सुस्त रफ्तार तक नहीं पहुंच पा रहा है।

सच्चाई: – आम जनता की क्रय शक्ति में बढ़ोतरी
सरकार का कहना है कि जीडीपी का लाभ आम जनता को मिल रहा है। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में आम जनता की क्रय शक्ति और खर्च करने की क्षमता लगातार बनी हुई है और इसमें कोई सुस्ती नहीं है।

मल्टीप्लायर इफेक्ट (Multiplier Effect): सरकार का यह मानना है कि जब किसी देश में कुल उत्पादन (GDP) बढ़ता है, तो बुनियादी ढांचे, सड़कों, रेलवे, डिजिटलीकरण और आवास योजनाओं पर खर्च होने से रोजगार के नए अवसर बनते हैं। इससे आम लोगों की आय और क्रय शक्ति में बढ़ोतरी होती है।

उपभोग में ठोस बढ़ोतरी: सांख्यिकी मंत्रालय (MoSPI) के आंकड़ों के अनुसार, अर्थव्यवस्था में प्राइवेट फाइनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर (PFCE) में मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है, जो सीधे तौर पर यह मापता है कि देश के परिवार (Households) सामान और सेवाओं पर कितना खर्च कर रहे हैं।

वाहनों और ट्रैक्टरों की रिकॉर्ड बिक्री: ग्रामीण और शहरी उपभोग की रफ्तार को साबित करने के लिए सरकार वाहन पंजीकरण के आंकड़े रखती है। खुदरा बाजार में पैसेंजर कारों, दोपहिया वाहनों और विशेष रूप से ट्रैक्टरों की बिक्री में मजबूत उछाल आया है, जो यह दर्शाता है कि ग्रामीण और शहरी दोनों ही स्तरों पर मांग मजबूत है।

डिजिटल भुगतान और जीएसटी संग्रह: देश में यूपीआई (UPI) और अन्य माध्यमों से होने वाले डिजिटल ट्रांजैक्शन की संख्या और जीएसटी से मिलने वाला राजस्व लगातार नए रिकॉर्ड बना रहे हैं। सरकार का तर्क है कि यदि उपभोग सुस्त होता, तो व्यापार और डिजिटल भुगतान के ये आंकड़े इतने ऊंचे स्तर पर नहीं होते।

सकल स्थिर पूंजी निर्माण (GFCF): घरेलू स्तर पर निवेश में भारी तेजी (दहाई अंकों में वृद्धि) आई है। सरकार का तर्क है कि जब देश में पूंजीगत खर्च बढ़ता है, तो नए कारखाने, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और निर्माण कार्य शुरू होते हैं, जिससे सीधे तौर पर निचले और मध्यम वर्ग के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं।

सेवा और विनिर्माण क्षेत्र का बूम: मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर (जैसे ट्रेड, होटल, ट्रांसपोर्ट और आईटी) में मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है। सरकार का मानना है कि इन सेक्टरों की ग्रोथ बिना आम जनता की सक्रिय भागीदारी और उपभोग के संभव ही नहीं है।

भारत निराशावादी बातों को खारिज कर तेजी से आगे बढ़ रहा है
सरकार का कुल मिलाकर यह रुख रहा है कि जीडीपी की यह 7.8% वृद्धि दर किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके ‘मल्टीप्लायर इफेक्ट’ (Multiplier Effect) से कृषि, एमएसएमई और ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत किया जा रहा है। सरकार का कहना है कि जो लोग देश की आर्थिक प्रगति को पचा नहीं पा रहे हैं और केवल टीवी स्टूडियो में बैठकर नकारात्मकता फैलाते हैं, वे भारत को ‘डूबी हुई अर्थव्यवस्था’ के रूप में देखना चाहते हैं, लेकिन देश की जनता और अर्थव्यवस्था उनकी इन निराशावादी बातों को खारिज कर तेजी से आगे बढ़ रही है। सरकार ने रेखांकित किया कि पश्चिमी एशिया के संघर्षों और वैश्विक आर्थिक उथल-पुथल के दौर में भी भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना हुआ है। सांख्यिकी मंत्रालय के वर्तमान सचिव डॉ सौरभ गर्ग ने सारे आरोपों को खारिज किया है।  

प्रवासी भारतीयों ने जताया भारत के ग्रोथ रेट पर भरोसा, रिकॉर्ड 136.38 बिलियन डॉलर का फंड जमा 
प्रवासी भारतीयों (NRIs) ने भारतीय रिजर्व बैंक की विशेष योजना के तहत भारत में रिकॉर्ड 136.38 बिलियन डॉलर (लगभग 11.4 लाख करोड़ रुपये) का विदेशी फंड जमा किया है। यह विशाल राशि भारतीय बैंकिंग प्रणाली और विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुई है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा 8 जून, 2026 को शुरू की गई इस विशेष USD-INR फॉरेक्स स्वैप फैसिलिटी को उम्मीद से कहीं अधिक प्रतिक्रिया मिली। प्रवासियों के भारी उत्साह को देखते हुए आरबीआई ने इसे तय समय (30 सितंबर) से एक महीने पहले ही यानी 31 अगस्त 2026 को बंद कर दिया। कुल राशि का सबसे बड़ा हिस्सा प्रवासियों के फिक्स्ड टर्म डिपॉजिट से आया, जो 127.23 बिलियन डॉलर था। इसमें खास बात यह है कि एनआरआई अपनी विदेशी मुद्रा को बिना रुपये में बदले सीधे भारतीय बैंकों में जमा कर सकते हैं। OFCB (ओवरसीज फॉरेन करेंसी बॉरोइंग्स) के जरिए बैंकों ने 5.26 बिलियन डॉलर जुटाए। ECB (एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स) के माध्यम से 3.89 बिलियन डॉलर का निवेश आया।

जापानी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ने भारत के ग्रोथ रेट पर जताया भरोसा
ज‍िन्‍हें भारत की तरक्‍की नहीं द‍िख रही, उनके ल‍िए जवाब जापान से आया है। जापान क्रेडिट रेटिंग एजेंसी JCR ने भारत की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग को BBB+ से बढ़ाकर A- कर दिया है। एजेंसी मान रही क‍ि भारत की ग्रोथ रेट मजबूत है और यह तेजी से बढ़ने वाली है। एजेंसी ने कहा कि भारत की जीडीपी विकास दर 7% से अधिक की मजबूत रफ्तार से आगे बढ़ रही है। जापानी एजेंसी का ये भी मानना है क‍ि दुन‍िया से इन्‍वेस्‍टर्स भारत आने को मजबूर हैं, क्‍योंक‍ि यहां के लोग जमकर खर्च कर रहे हैं, जमकर खरीदारी कर रहे हैं। यानी ड‍िमांड खूब है। इतना ही नहीं, सरकार ने प‍िछले कुछ महीनों में ऐसे फैसले ल‍िए हैं, जिससे इकॉनमी को बूस्‍ट म‍िला है। इसका मतलब है कि JCR को भारत की अर्थव्यवस्था और वित्तीय स्थिति पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत और भरोसेमंद लग रही है।

वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर ने GDP पर उठे सवालों को खारिज किया
इस बीच वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा ने GDP पर उठ रहे सवालों को खारिज करते हुए तीखी टिप्पणी की है। नीलकंठ मिश्रा ने भारत की पहली तिमाही की 7.8% जीडीपी वृद्धि दर पर सवाल उठाने वाले दावों को ‘अल्पज्ञानी और सरासर गलत’ (ill-educated and egregiously wrong) करार दिया है। उन्होंने पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के उस दावे को खारिज किया जिसमें कहा गया था कि यदि पिछले साल के पुराने आधार का उपयोग किया जाए, तो मौजूदा विकास दर मात्र 2.6% बैठती है। मिश्रा ने स्पष्ट किया कि कार व एसयूवी की बिक्री (35% वृद्धि), दोपहिया वाहन बिक्री (20% से अधिक), कमर्शियल वाहनों की मांग (40% से अधिक), और बढ़ते टैक्स व क्रेडिट कलेक्शन जैसे जमीनी और हाई-फ्रिक्वेंसी आंकड़े अर्थव्यवस्था की मजबूत रफ्तार की गवाही देते हैं। उन्होंने कहा कि फरवरी 2026 में आई नई जीडीपी सीरीज ने कार्यप्रणाली और डेटा की गुणवत्ता में सुधार किया है, जिससे वास्तविक उत्पादन अनुमानों की विश्वसनीयता बढ़ी है।

पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के बदले सुर
तीखी आलोचना और सरकारी द्वारा उनके आंकड़ों को ‘सांख्यिकीय रूप से निरर्थक’ (Statistically Meaningless) बताए जाने के बाद, पूर्व वित्त सचिव सुभाष गार्ग के सुर बदल गए हैं। उन्होंने पहले भारत की असल जीडीपी ग्रोथ 2.6 प्रतिशत होने का दावा किया था और बाद में कहा कि देश 4 से 5 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रहा है। एक इंटरव्यू में माना कि भारतीय अर्थव्यवस्था की असल रफ्तार हेडलाइन में चल रहे 7.8% से कम, यानी 4 से 5 प्रतिशत के बीच है।

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