लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी पिछले कुछ समय से लगातार यह दावा कर रहे हैं कि भारत की जेनरेशन-जी (Gen-Z) संविधान बचाने, कथित वोट चोरी रोकने और सत्ता में बदलाव के लिए आगे आएगी। उनके हालिया भाषणों और सोशल मीडिया अभियानों में यह संदेश बार-बार दिखाई देता है कि आने वाले वर्षों का सबसे बड़ा राजनीतिक आंदोलन जेन-जी के कंधों पर खड़ा होगा। कई बार उन्होंने छात्र आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और यहां तक कि कॉकरोच पार्टी जैसे तथाकथित अभियानों को भी जेन-जी की बेचैनी और राजनीतिक बदलाव का नैरेटिव बनाने की कोशिश की है। लेकिन क्या वास्तव में पूरी जेन-जी की सोच इतनी ही सीमित है? क्या यह पीढ़ी केवल सत्ता परिवर्तन की राजनीति में रुचि रखती है? या फिर उसके सपने, प्राथमिकताएं और जीवन-दृष्टि कहीं अधिक व्यापक और आधुनिक हो चुकी हैं? इसका उत्तर हाल ही में पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की रिपोर्ट देती है। यह रिपोर्ट बताती है कि भारत का युवा तेजी से बदल रहा है। उसकी प्राथमिकताओं में राजनीति नहीं, बल्कि करियर, कौशल, उद्यमिता, डिजिटल तकनीक, आत्मविकास, पढ़ने की संस्कृति और आध्यात्मिक अनुभव प्रमुखता से उभर रहे हैं। विशेष रूप से धार्मिक और आध्यात्मिक पर्यटन में युवाओं की बढ़ती भागीदारी इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रमाण बनकर सामने आई है।
जेन-जी को स्वार्थ की राजनीति की भेंट चढ़ाना चाहते हैं राहुल
दरअसल, लोकसभा से लेकर विधानसभा चुनावों तक में लगातार हार का सामना कर रहे नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी अब इतने हताश हो चुके हैं कि वे युवा जेन जी को भी अपनी स्वार्थ की राजनीति की भेंट चढ़ाना चाहते हैं। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों में राहुल गांधी ने लगातार जेन-जी और युवा मतदाताओं को अपने राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रखने का प्रयास किया है। उनके भाषणों और संवादों में बार-बार यह संदेश दिखाई देता है कि देश के युवाओं को संविधान की रक्षा, लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने, सामाजिक असमानता और चुनावी प्रक्रिया में जैसे मुद्दों पर आगे आना चाहिए। हाल के वक्तव्यों में उन्होंने यह भी कहा कि आने वाले समय में बदलाव की सबसे बड़ी ताकत यही जेन-जी होगी और वही लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करते हुए सत्ता परिवर्तन में निर्णायक भूमिका निभाएगी। राहुल गांधी का मानना है कि नई पीढ़ी पुरानी राजनीतिक सोच को चुनौती देने और भारत की राजनीति की दिशा बदलने की क्षमता रखती है।
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बात करने तक की अक्ल नहीं आयी इस आदमी को?
11 साल से प्रोसेस चल रहा है… Zen G भारतीय सभ्यता को समझता है… इसीलिए इन्हें पप्पू कहता है।
pic.twitter.com/ONKnEcbuZz— Sudhir Mishra 🇮🇳 (@Sudhir_mish) July 15, 2026
जेन जी की आध्यात्मिक यात्राओं में 53% हिस्सेदारी
दूसरी ओर PHDCCI की रिपोर्ट भारतीय युवाओं की सोच को लेकर एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण संकेत देती है। रिपोर्ट के अनुसार, आंकड़े बताते हैं कि आज देश में आध्यात्मिक यात्राओं पर जाने वाले लोगों में आधी से ज्यादा यानि 53 प्रतिशत हिस्सेदारी जेन-जी की है। यह आंकड़ा अपने आप में उस धारणा को चुनौती देता है कि नई पीढ़ी धर्म, संस्कृति और आध्यात्म से दूर होती जा रही है। या फिर जेन जी राजनीति की ओर उन्मुख हो रही है। रिपोर्ट बताती है कि धार्मिक पर्यटन अब केवल मंदिरों के दर्शन तक सीमित नहीं रहा। जेन-जी के लिए यह अनुभव का हिस्सा बन चुका है। हकीकत में नई पीढ़ी इन्हें आधुनिक जीवन शैली के साथ जोड़कर देख रही है। हेरिटेज वॉक, गाइडेड स्टोरीटेलिंग, योग, मेडिटेशन, स्थानीय संस्कृति, लोककला, पारंपरिक भोजन और आध्यात्मिक जीवनशैली ये सभी अब धार्मिक यात्रा का अभिन्न हिस्सा बनते जा रहे हैं। नई पीढ़ी धार्मिक स्थलों को केवल आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता को समझने के माध्यम के रूप में देख रही है।
Gen-Z आंदोलन के ज्यादा वैश्विक अवसरों की ओर आकर्षित
भारत की जेन-जी दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादियों में से एक है। करोड़ों युवाओं वाली यह पीढ़ी इंटरनेट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में बड़ी हुई है। उसके सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सी पार्टी सत्ता में आएगी, बल्कि यह है कि वह अपने लिए बेहतर करियर, बेहतर कौशल और बेहतर जीवन कैसे बनाए। यही कारण है कि पीएम मोदी के विजन पर चलते हुए आज लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं, स्टार्टअप, डिजिटल कंटेंट, कोडिंग, डेटा साइंस, विदेशी भाषाओं, ऑनलाइन शिक्षा, उद्यमिता और वैश्विक रोजगार के अवसरों की ओर अधिक आकर्षित हैं। उनकी दिनचर्या का बड़ा हिस्सा स्वयं को बेहतर बनाने में बीतता है। ऐसे में यह मान लेना कि पूरी जेन-जी का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक आंदोलन करना है, वास्तविकता से कोसों दूर है।
काशी की गंगा आरती से लेकर केदार-तिरुपति तक जेन-जी
कभी धार्मिक यात्राएं मुख्यतः बुजुर्गों और परिवारों की गतिविधि मानी जाती थीं। आज स्थिति तेजी से बदल रही है। PHDCCI रिपोर्ट के अनुसार, आध्यात्मिक यात्रा करने वाले युवाओं में 69 प्रतिशत पुरुष और 31 प्रतिशत महिलाएं हैं। यह दर्शाता है कि आध्यात्म अब केवल परंपरा निभाने का माध्यम नहीं, बल्कि मानसिक शांति, आत्मविकास और जीवन के संतुलन की खोज का हिस्सा बन चुका है। काशी की गंगा आरती, उज्जैन का महाकाल लोक, अयोध्या का राम मंदिर, केदारनाथ, बद्रीनाथ, सोमनाथ, जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम, वैष्णो देवी और तिरुपति जैसे तीर्थों पर बड़ी संख्या में जेन जी और युवाओं का दिखाई देना इसी बदलाव का प्रमाण है। वे केवल पूजा करने नहीं जाते, बल्कि भारतीय इतिहास, स्थापत्य, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत को समझने भी जाते हैं।
धार्मिक पर्यटन की घरेलू पर्यटन में 60 प्रतिशत हिस्सेदारी
युवाओं की बढ़ती भागीदारी का प्रभाव केवल पर्यटन तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई दे रहा है। होटल, होम-स्टे, स्थानीय हस्तशिल्प, परिवहन, गाइड सेवाएं, स्ट्रीट फूड, सांस्कृतिक कार्यक्रम और छोटे व्यापारियों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि धार्मिक पर्यटन अब भारत के घरेलू पर्यटन का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा बन चुका है। आज भारत का जेन-जी युवा केवल राजनीतिक भाषणों या आंदोलनों से अपनी पहचान नहीं बनाना चाहता। वह तकनीक भी अपनाता है और परंपरा भी। करियर भी बनाना चाहता है और संस्कृति को भी समझना चाहता है। वैश्विक नागरिक भी बनना चाहता है और भारतीय सभ्यता से जुड़ा भी रहना चाहता है। इसलिए यह कहना कि जेन-जी की ऊर्जा राजनीतिक आंदोलनों में लगने वाली है, उसके बहुआयामी व्यक्तित्व को बहुत सीमित करके देखने जैसा होगा।
करियर के लिए राजनीतिक नारों से आगे बढ़ चुका है जेन-जी
यदि आज के भारतीय जेन-जी की सबसे बड़ी प्राथमिकता को एक शब्द में व्यक्त करना हो, तो वह है- भविष्य का निर्धारण। यह पीढ़ी अपने जीवन के हर निर्णय को दीर्घकालिक अवसरों के आधार पर देखती है। उसके सामने दुनिया पहले से कहीं अधिक प्रतिस्पर्धी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऑटोमेशन, वैश्विक रोजगार बाजार और तेजी से बदलती तकनीक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल डिग्री अब सफलता की गारंटी नहीं है। इसलिए आज का युवा राजनीतिक नारों से अधिक अपने कौशल, ज्ञान और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत बनाने में जुटा हुआ है। कुछ वर्ष पहले तक युवाओं का लक्ष्य केवल सरकारी नौकरी माना जाता था। आज तस्वीर बदल रही है। नई पीढ़ी अच्छी नौकरी के साथ-साथ स्टार्टअप, फ्रीलांसिंग, कंटेंट क्रिएशन, ई-कॉमर्स, एग्री-टेक, फिनटेक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में भी तेजी से अवसर तलाश रही है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है और इसमें सबसे बड़ी भागीदारी जेन जी और युवाओं की है। यह सोच बताती है कि जेन-जी का बड़ा वर्ग राजनीतिक आंदोलनों की अपेक्षा आर्थिक आत्मनिर्भरता को अधिक महत्व देता है।
आइए, जानते हैं पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की रिपोर्ट के मुताबिक जेन जी में आ रहे पांच प्रमुख बदलाव…
1.भारत का जेन-जी आज पहले से कहीं अधिक बहुआयामी
नई पीढ़ी की प्राथमिकताएं राजनीति से पूरी तरह अलग नहीं हैं, लेकिन उनका केंद्र बदल गया है। वह रोजगार चाहती है, अवसर चाहती है, वैश्विक पहचान चाहती है और मानसिक संतुलन भी चाहती है। वह सोशल मीडिया पर बहस भी करती है, लेकिन उसी समय ऑनलाइन कोर्स भी करती है। वह लोकतांत्रिक अधिकारों को महत्व देती है, लेकिन उतना ही महत्व अपनी आर्थिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत और देश के विकास को भी देती है। यही कारण है कि भारत का जेन-जी युवा आज पहले से कहीं अधिक बहुआयामी दिखाई देता है। वह आंदोलन भी समझता है और मेडिटेशन भी। लोकतंत्र भी समझता है और डिजिटल अर्थव्यवस्था भी। परंपरा का सम्मान भी करता है और आधुनिक तकनीक को भी अपनाता है।
2.धार्मिक पर्यटन के साथ अनुभव आधारित आध्यात्म की तलाश
यदि कांग्रेस नेता राहुल गांधी की तरह आज किसी को भी यह भ्रम है कि भारत का युवा केवल सोशल मीडिया, रील्स और राजनीतिक विमर्श तक सीमित हो गया है, तो उसे अपनी मानसिक सोच बदल लेनी चाहिए। PHDCCI की रिपोर्ट बताती है कि भारत में आध्यात्मिक यात्राओं पर जाने वालों में 53 प्रतिशत हिस्सेदारी जेन-जी की है। यह केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण संकेत है। स्पष्ट है कि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से कट नहीं रही, बल्कि आधुनिक जीवनशैली के साथ उन्हें नए तरीके से जोड़ रही है। उसके लिए धार्मिक यात्रा अब केवल मंदिर में दर्शन कर लौट आने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मअनुभूति, सांस्कृतिक खोज और मानसिक संतुलन का माध्यम बन चुकी है।
3. मंदिर ही नहीं पूरी सभ्यता को समझना चाहती है नई पीढ़ी
रिपोर्ट के अनुसार, आज के युवा धार्मिक स्थलों पर केवल पूजा-अर्चना के लिए नहीं जा रहे। वे वहां के इतिहास, स्थापत्य, लोककथाओं, स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को भी समझना चाहते हैं। यही कारण है कि हेरिटेज वॉक, गाइडेड स्टोरीटेलिंग, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, लोककला प्रदर्शन और स्थानीय व्यंजनों का आकर्षण लगातार बढ़ रहा है। काशी, उज्जैन, अयोध्या, पुरी, द्वारका, सोमनाथ और तिरुपति जैसे तीर्थ अब केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अनुभवों के जीवंत विश्वविद्यालय बनते जा रहे हैं। युवा वहां जाकर केवल तस्वीरें नहीं लेते, बल्कि उस विरासत को समझने की कोशिश करते हैं, जिसने हजारों वर्षों से भारत की पहचान गढ़ी है।
4. योग और मेडिटेशन बना रहे हैं नई जीवनशैली
पीएम मोदी के प्रोत्साहन के चलते पिछले एक दशक में योग और ध्यान का वैश्विक विस्तार हुआ है, लेकिन भारत में इसका सबसे अधिक प्रभाव युवाओं पर दिखाई दे रहा है। तेज रफ्तार जीवन, प्रतियोगिता, करियर का दबाव और डिजिटल दुनिया की लगातार सक्रियता के बीच मानसिक संतुलन बनाए रखना नई पीढ़ी के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। ऐसे में योग, मेडिटेशन और आध्यात्मिक रिट्रीट केवल धार्मिक गतिविधियां नहीं रह गई हैं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत विकास का हिस्सा बन गई हैं। यही कारण है कि धार्मिक पर्यटन में अब सुबह की योग कार्यशालाएं, ध्यान सत्र और आध्यात्मिक संवाद भी बड़ी संख्या में युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं।
5. डिजिटल तकनीक ने भी बदल दिया धार्मिक पर्यटन
पर्यटन उद्योग के विशेषज्ञ लंबे समय से कह रहे हैं कि आज का जेन-जी होटल और वाहन से अधिक अनुभव खरीदना चाहता है। वह स्थानीय लोगों से बातचीत करना चाहता है, पारंपरिक संगीत सुनना चाहता है, लोककथाएं जानना चाहता है और वहां की जीवनशैली को समझना चाहता है। इसलिए धार्मिक पर्यटन का चेहरा तेजी से बदल रहा है। रिपोर्ट बताती है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने धार्मिक पर्यटन को पहले से कहीं अधिक आसान बना दिया है। ऑनलाइन बुकिंग, वर्चुअल गाइड, बहुभाषी ऑडियो टूर, डिजिटल मैप, भीड़ प्रबंधन, ई-प्रसाद, मोबाइल ऐप और एआई आधारित यात्रा सुझावों ने युवाओं के लिए धार्मिक स्थलों तक पहुंच को बेहद सरल बना दिया है। तकनीक और परंपरा का यह संगम भारतीय पर्यटन के लिए एक नया अध्याय लिख रहा है।
विकसित भारत की सबसे बड़ी ताकत यही पीढ़ी है
पीएम मोदी अक्सर अपने भाषणों में कहते हैं कि यदि भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है, तो सबसे बड़ी भूमिका जेन-जी और हमारे युवा साथियों की होगी। क्योंकि इसकी सोच प्रो-प्रोग्रेस है। इसलिए यही युवा नई फैक्ट्रियां लगाएगा, नई तकनीक विकसित करेगा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता में नेतृत्व करेगा, वैश्विक कंपनियां बनाएगा, शोध करेगा और भारत की सांस्कृतिक विरासत को भी दुनिया तक पहुंचाएगा। यही वजह है कि आज युवा वर्ग स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, इनोवेशन मिशन, सेमीकंडक्टर, स्पेस मिशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उद्यमिता जैसे कार्यक्रमों पर विशेष फोकस कर रहा है। यह सब उसी पीढ़ी की आकांक्षाओं से जुड़ा है, जो अवसर चाहती है, केवल नारों से संतुष्ट नहीं होती।









