किसी प्रधानमंत्री का देशवासियों से यह कहना कि अनावश्यक सोना न खरीदें, विदेश यात्रा टालें और विदेश में शादियां करने के बजाय देश में ही खर्च करें, पहली नजर में कुछ असामान्य लग सकता है। आखिर सरकारें आम तौर पर लोगों से खर्च बढ़ाने, बाजार में मांग पैदा करने और उपभोग को गति देने की अपील करती हैं। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो बार अपील को इसी सामान्य नजरिए से देखना भारी भूल होगी। इसके पीछे उनका बहुत दूरगामी इकोनॉमिक विजन छिपा है। इसमें सिर्फ डॉलर बचाने की चिंता समाहित नहीं है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था को गति देने की प्रभावशाली रणनीति भी है। यही वजह है कि टैरिफ और युद्ध की अनिश्चिताओं के बीच भी हमारी अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की सबसे तेज रफ्तार से बढ़ रही है। यहीं से पीएम मोदी की अपील की वास्तविकता और असली अर्थ सामने आते हैं। दरअसल, यह ‘खर्च मत करो की बजाए, खर्च की दिशा बदलो’ की इकोनॉमिक स्ट्रेटेजी है। सोने की जगह वित्तीय परिसंपत्तियों में निवेश, विदेशी छुट्टियों की जगह घरेलू पर्यटन को बढ़ावा, विदेश में होने वाली शादियों की जगह देश में वेड इन इंडिया का मंत्र और विदेशी उत्पादों की जगह भारतीय उत्पाद की बिक्री की इस सोच का मूल उद्देश्य देश के भीतर मांग, निवेश, रोजगार और इकोनॉमी को मजबूत करना है।
प्रधानमंत्री का “सोना मत खरीदिए, विदेश मत घूमिए” वाला संदेश शब्दशः लेने के बजाय इसके आर्थिक आशय को समझना अधिक जरूरी है। आइए, 10 बिंदुओं में इसके पीछे छिपे देश की प्रगति के निहितार्थ जानते हैं…
1. ‘सोना मत खरीदिए’ के पीछे 72 अरब डॉलर की कहानी
प्रधानमंत्री मोदी ने मई 2026 में भी एक साल तक गैर-जरूरी सोने की खरीद और विदेश यात्राओं को टालने की अपील की थी। दरअसल, भारत में सोना सिर्फ आभूषण नहीं, भावनाओं, परंपरा और बचत का हिस्सा है। लेकिन आर्थिक नजरिए से तस्वीर अलग है। भारत अपनी सोने की जरूरत का अधिकांश हिस्सा आयात करता है। 2025-26 में देश का सोना आयात बिल करीब 71.98 अरब डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष के करीब 58 अरब डॉलर से काफी अधिक था। यानी जब भारतीय उपभोक्ता बड़े पैमाने पर सोना खरीदता है, तो उसका एक बड़ा हिस्सा विदेशी मुद्रा के रूप में देश से बाहर जाता है। यही कारण है कि मई में पश्चिम एशिया संकट के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों से एक साल तक गैर-जरूरी सोना खरीदने से बचने की अपील की। उस समय तेल की कीमतों और युद्ध से पैदा अनिश्चितता ने भारत के बाहरी खाते और रुपये पर दबाव बढ़ाया था। सोने की खरीद घटाने का सीधा तर्क यही था कि विदेशी मुद्रा को ऐसी खपत में खर्च न किया जाए, जिसे कुछ समय के लिए टाला जा सकता है।
PM @narendramodi renews call to embrace Swadeshi goods, avoid unnecessary purchase of gold & destination weddings abroad #PMModi #IndiaGrowth #EconomicGrowth #AtmanirbharBharat #ViksitBharat #IndianEconomy
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— All India Radio News (@airnewsalerts) September 2, 2026
2. मई की अपील का असर, सोना खरीद में 20% गिरावट
पीएम मोदी की मई की अपील के बाद सोने की खरीद में करीब 20 प्रतिशत की उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। इससे साफ है देशवासियों न सिर्फ लगातार तीसरी बार नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाया है, बल्कि अपने पीएम की अपील का भी उन पर खासा असर होता है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सोने की कम खरीद को पीएम की अपील और इससे बाजार में मांग पर पड़े असर के रूप में देखा जा सकता है। विश्व स्वर्ण परिषद के आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल-जून 2026 में भारत की सोने की मांग मात्रा के लिहाज से सालाना आधार पर 6 प्रतिशत घटी और आभूषणों की मांग 15 प्रतिशत से अधिक नीचे रही। व्यापक आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल-जून तिमाही में भारत की कुल सोने की मांग 131 टन, यानी सालाना आधार पर 6 प्रतिशत कम रही। आभूषणों की मांग 75 टन रही। परिषद ने मांग में कमी के पीछे अन्य कारणों के साथ पीएम मोदी की अपील को अहम कारण माना है। मई की अपील ने सोने की मांग को दबाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
3. देश का पैसा देश में खर्च होकर बना विकास का ग्रोथ इंजन
प्रधानमंत्री की एक और अपील विदेश यात्रा से जुड़ी है। इसका तर्क भी विदेशी मुद्रा से जुड़ा है। RBI के आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में भारतीयों का विदेश यात्रा खर्च करीब 16.87 अरब डॉलर रहा । यह पिछले वर्ष की तुलना में 2.3 प्रतिशत अधिक था, यानी विदेशी यात्रा से विदेशी मुद्रा का प्रवाह ज्यादा हो रहा था। पीएम की अपील का अर्थ यह नहीं कि भारतीय विदेश नहीं जा सकते या उन्हें अपनी पसंद से यात्रा करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। प्रधानमंत्री की अपील मूलतः अनावश्यक विदेशी खर्च को टालने की है। यदि वही पैसा राजस्थान, केरल, कश्मीर, पूर्वोत्तर, अयोध्या, वाराणसी, गोवा या देश के दूसरे पर्यटन केंद्रों में खर्च होता है, तो वह होटल, टैक्सी, रेस्तरां, स्थानीय बाजार, हस्तशिल्प और छोटे कारोबारों तक पहुंचता है। देश का पैसा देश में खर्च होकर विकास का ग्रोथ इंजन बनता है।
4. विदेशी में 75 हजार करोड़ के कारोबार का जवाब ‘वेड इन इंडिया ‘
विदेश में डेस्टिनेशन वेडिंग रोकने के पीछे भी इसी तर्क का विस्तार है। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘वेड इन इंडिया ‘ का मंत्र मुख्य रूप से देश का धन देश में ही सुरक्षित रखने और विदेशी मुद्रा के आउटफ्लो को रोकने के लिए दिया है, क्योंकि एक अनुमान के मुताबिक हर साल संपन्न परिवारों द्वारा विदेशों में की जाने वाली शादियों पर 75,000 करोड़ से 1 लाख करोड़ रुपये तक खर्च किए जाते हैं। यदि यही शादियों देश में हों, भले ही डेस्टिनेशन वेडिंग के रूप में हों तो इसके कई आर्थिक फायदे हैं। इनमें घरेलू पर्यटन, होटल एवं आतिथ्य सत्कार उद्योग, स्थानीय कारीगरों, इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों और परिवहन सेवाओं को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे देश के भीतर ही लाखों करोड़ रुपये का मजबूत घरेलू कारोबार होगा। स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित होने के साथ ही वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। क्योंकि करोड़ों रुपये किसी विदेशी डेस्टिनेशन पर खर्च होने के बजाय भारत में खर्च होते हैं तो उसका बड़ा हिस्सा घरेलू इकोनॉमी को गति देता है।
#WATCH | Prime Minister Narendra Modi posts on the social media platform, Instagram; PM says “… We must embrace the mantra of ‘Swadeshi’ and ‘Vocal for Local.’ We should avoid traveling abroad merely for leisure or hosting weddings in foreign lands; instead, we should live by… https://t.co/5ad5RKJiG5 pic.twitter.com/PVN04APP3e
— ANI (@ANI) September 1, 2026
5. पीएम की अपील ‘कम खपत’ नहीं, ‘बेहतर खपत’ का मंत्र है
पीएम मोदी की पहले और अब की गई दो अपीलों का निहितार्थ समझें तो पता चल जाएगा कि उनके संदेश का सार है- खर्च रोकिए नहीं, बल्कि खर्च की दिशा बदलिए। पीएम की अपील के पीछे यही दूरगामी विजन है। दरअसल, आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार इकोनॉमी को गति देने के लिए खर्च जरूरी है, लेकिन हर खर्च समान आर्थिक प्रभाव पैदा नहीं करता। विदेश में खर्च किया गया पैसा घरेलू GDP में उसी तरह योगदान नहीं करता, जिस तरह देश के भीतर होटल, पर्यटन, परिवहन, विनिर्माण या सेवाओं पर किया गया खर्च करता है। पीएम मोदी का वोकल फॉर लोकल का मंत्र भी देशवासियों का कारोबार बढ़ाने के साथ ही घरेलू इकोनॉमी को भी मजबूती देना है।
6. असली परीक्षा बचत ही नहीं, सुरक्षित निवेश भी जरूरी
पीएम मोदी की अपील के बाद असली सवाल है कि अगर किसी परिवार ने सोना खरीदने या विदेश यात्रा पर खर्च टाल दिया, तो उसके बाद वह पैसा कहां गया? यदि पैसा बैंक जमा, म्यूचुअल फंड, शेयर बाजार, बीमा, शिक्षा, कारोबार, घर, कौशल या किसी उत्पादक निवेश में जाता है तो देश के लिए उसका आर्थिक प्रभाव कहीं अधिक पॉजिटिव है। इसी तरह विदेश यात्रा का पैसा यदि देश के पर्यटन क्षेत्र में ही खर्च होता है तो घरेलू अर्थव्यवस्था को सीधा लाभ मिलेगा। देश की इकोनॉमी ने 7.8 प्रतिशत की तिमाही वृद्धि के साथ यह दिखाया है कि वैश्विक उथल-पुथल के बावजूद घरेलू आर्थिक इंजन मजबूत है। निजी निवेश में लगभग 12 प्रतिशत की छलांग और विनिर्माण में 9.2 प्रतिशत की वृद्धि इस कहानी को और अधिक मजबूती से बताते हैं। विकसित भारत का लक्ष्य साधने के लिए लंबे समय तक उच्च निवेश, उत्पादक रोजगार, निर्यात, विनिर्माण, तकनीक और घरेलू पूंजी निर्माण की जरूरत होगी।
7. ‘वोकल फॉर लोकल’ के साथ ही यह आर्थिक राष्ट्रवाद है
पीएम मोदी की वर्तमान अपील उनके पुराने विजन वोकल फॉर लोकल और आत्मनिर्भर भारत की सोच का विस्तार ही है। इतना फर्क जरूर है कि इस बार उनका संदेश सांस्कृतिक आग्रह से आगे बढ़कर विदेशी मुद्रा और बाहरी आर्थिक जोखिम से जुड़ गया है। इस अपील में आर्थिक राष्ट्रवाद का तत्व स्पष्ट है। लेकिन इसे सिर्फ राष्ट्रवादी नारे के रूप में देखना इसके आर्थिक पक्ष को छोटा करना होगा। भारत जैसे बड़े लेकिन अभी भी विकासशील देश के लिए विदेशी मुद्रा की हर इकाई महत्वपूर्ण है। खासकर तब, जब देश एक साथ ऊर्जा, सोना, तकनीक और पूंजीगत वस्तुओं के लिए वैश्विक बाजार पर निर्भर है। इसलिए अपील के मूल में यही संदेश छिपा है कि भारत की कमाई, भारत की क्षमता बढ़ाने में लगे।
8. किसी भी देश को विदेशी मुद्रा बचाना इसलिए है जरूरी
आर्थिक विश्लेषक इस बात पर जोर देते हैं कि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए विदेशी मुद्रा भंडार संकट के समय सुरक्षा कवच की तरह होता है। मोदी सरकार की दूरगामी नीतियों के चलते अगस्त 2026 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 729.33 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया है। लेकिन रिकॉर्ड भंडार का अर्थ यह नहीं कि विदेशी मुद्रा खर्च करने की कोई सीमा नहीं है। भारत के सामने तेल की कीमत, व्यापार घाटा, रुपये पर दबाव और वैश्विक भू-राजनीतिक जोखिम जैसे खतरे बने हुए हैं। अप्रैल-जून 2026 में भारत का चालू खाते का घाटा 4.2 अरब डॉलर यानी GDP का 0.5 प्रतिशत रहा। ऐसे में विदेशी मुद्रा भंडार को संकट के समय सुरक्षा कवच की तरह बनाए रखना बेहद जरूरी है।
PM Modi का Swadeshi और Vocal for Local पर बड़ा संदेश
✈️ सिर्फ leisure के लिए विदेश यात्रा से बचें
💍 विदेश में शादी करने की जरूरत नहीं — भारतीय परंपरा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा
🏭 जहां संभव हो, Made in India products चुनें
🪙 जरूरत न हो तो सोना खरीदने से बचें
💵 मकसद:… pic.twitter.com/qIIjxciKaa— CNBC-AWAAZ (@CNBC_Awaaz) September 1, 2026
9. GDP में वृद्धि निवेश, उत्पादन और घरेलू मांग का मजबूत संयोजन
दो दिन पहले ही जारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि 7.8 प्रतिशत रही। यह बाजार की करीब 7.1 प्रतिशत की उम्मीद और RBI के 7 प्रतिशत अनुमान से बहुत बेहतर है। निश्चित रूप से इस वृद्धि के पीछे सोने की खरीद में कमी, विदेश यात्रा घटाने और देश का पैसा देश में लगाकर वोकल फॉर लोकल का मंत्र साकार करने के अहम कारक मौजूद हैं। यानी मजूबत अर्थव्यवस्था की कहानी सिर्फ उपभोग की नहीं, बल्कि निवेश, उत्पादन, घरेलू मांग और सेवाओं के मजबूत संयोजन की है। आंकड़े बताते हैं कि इसके पीछे मोदी सरकार की कुछ और पहल भी काम आईं।
• निजी निवेश में 11.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
• निजी अंतिम उपभोग व्यय 7.1 प्रतिशत बढ़ा।
• विनिर्माण क्षेत्र में 9.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
• वित्तीय सेवाओं में वृद्धि करीब 12.1 प्रतिशत रही।
• सकल स्थिर पूंजी निर्माण का हिस्सा बढ़कर 34.3 प्रतिशत हो गया।
Rahul Gandhi’s political career might be “DEAD” with 100+ relaunches, but India’s economy is thriving and the fastest under Prime Minister Narendra Modi Ji’s (@narendramodi ) leadership.
7.8% real GDP growth
10.3% nominal GDP growth
India remains the fastest-growing major… pic.twitter.com/po9qrzKljx
— Pradeep Bhandari(प्रदीप भंडारी)🇮🇳 (@pradip103) August 31, 2026
10. युद्ध के वैश्विक संकट के बीच पीएम की नीतियां अधिक कारगर
एक सवाल यह आता है कि सोना और विदेश यात्रा इकोनॉमी की इस कहानी में कहां फिट होते हैं? दरअसल, यहीं प्रधानमंत्री की अपील महत्वपूर्ण हो जाती है। जब अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही हो, तब बाहरी झटकों से सुरक्षा भी जरूरी होती है। भारत अभी भी कच्चे तेल के लिए भारी मात्रा में आयात पर निर्भर है। पश्चिम एशिया में युद्ध या आपूर्ति संकट तेल की कीमत बढ़ाता है तो भारत को अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इसके ऊपर सोने का बड़ा आयात और विदेशी यात्रा जैसे खर्च विदेशी मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं। यही कारण है कि मोदी सरकार एक तरफ उत्पादन और निवेश बढ़ाने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ ऐसे आयातित खर्चों को सीमित करने की अपील कर रही है, जिनके बिना कुछ समय काम चल सकता है। विदेशी मुद्रा बचाने, आयातित गैर-जरूरी खपत घटाने और घरेलू खर्च को प्रोत्साहित करने जैसी नीतियां विकास को अधिक टिकाऊ और बाहरी झटकों के प्रति अधिक मजबूत बनाने वाली रणनीति का हिस्सा हैं।









