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पीएम मोदी पर प्रवासी भारतीयों का अटूट भरोसा: विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड स्तर पर, अमेरिका से 3 गुना आगे निकला भारत

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दुनिया भर में जारी तनाव और अनिश्चितता के बीच भारत की अर्थव्यवस्था ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक नया मुकाम हासिल किया है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 21 अगस्त को खत्म हुए हफ्ते में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 12.42 अरब डॉलर बढ़कर 729.33 अरब डॉलर के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। इसके साथ ही भारत पूरी दुनिया में चौथे नंबर पर बना हुआ है और हमारे पास अमेरिका (करीब 253 अरब डॉलर) से लगभग तीन गुना ज्यादा विदेशी पूंजी जमा हो चुकी है। देश की इस आर्थिक मजबूती और आत्मनिर्भरता की सबसे बड़ी वजह है दुनिया भर में रहने वाले अनिवासी भारतीयों (एनआरआई) का मोदी सरकार पर अटूट भरोसा। अगर पिछले दो दशकों की तुलना करें, तो मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के 10 सालों (2004 से 2014) में प्रवासियों ने अपने घर कुल मिलाकर करीब 400 से 450 अरब डॉलर भेजे थे और बैंकों में जमा करीब 70.5 अरब डॉलर ही बढ़ा था। इसके मुकाबले मोदी सरकार के 10 सालों (2014 से 2024) में प्रवासी भारतीयों ने अकेले घर पैसे भेजने (रेमिटेंस) के मामले में 1,000 अरब डॉलर (1 ट्रिलियन डॉलर) से ज्यादा की भारी भरकम रकम भारत भेजकर देश के खजाने को चट्टान जैसी ताकत दी है।

यूपीए बनाम मोदी सरकार: 10 वर्षों में प्रवासियों के पैसों का बहुत बड़ा अंतर
यूपीए सरकार के 2004 से 2014 के दौर में प्रवासियों द्वारा भारत भेजा जाने वाला पैसा सालाना 21 अरब डॉलर से बढ़कर सिर्फ 70 अरब डॉलर तक ही पहुंच सका था। इसके उलट मोदी सरकार के 10 सालों (2014-2024) में यह आंकड़ा लगभग दोगुना होकर 129.4 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इस समय पूरी दुनिया में जितना भी पैसा प्रवासी अपने देश भेजते हैं, उसका 14 प्रतिशत से ज्यादा अकेले भारत आता है। इसके अलावा, साल 2013 में जब यूपीए के समय रुपया बुरी तरह गिर रहा था, तब एनआरआई योजनाओं के जरिए करीब 34 अरब डॉलर ही जुटाए जा सके थे। वहीं मोदी सरकार पर भरोसे के कारण 2026 की खास जमा योजना में प्रवासियों ने 100 अरब डॉलर से ज्यादा का पैसा भारत के बैंकों में लगा दिया। साल 2014 में देश के पास कुल 304 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था, जो मोदी सरकार के दौर में दोगुने से भी ज्यादा बढ़कर अब 729.33 अरब डॉलर के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच चुका है।

भारत के काम आए प्रवासी भाई-बहन: बैंक योजना में रिकॉर्ड पैसा जमा किया
दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और डॉलर के मजबूत होने पर जब भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ रहा था, तब आरबीआई और सरकार ने प्रवासियों के लिए एक विशेष एफसीएनआर (बी) बैंक जमा योजना शुरू की। विदेशों में रहने वाले भारतीयों ने इस योजना पर इतना भरोसा जताया कि तय समय से एक महीना पहले (31 अगस्त) ही इसका लक्ष्य पूरा हो गया और इसे बंद करना पड़ा। इस योजना के जरिए 100 अरब डॉलर से अधिक की विदेशी पूंजी भारत आई। यह साफ दिखाता है कि विदेश में रहने वाले भारतीय अपनी मेहनत की कमाई को संभालने और बढ़ाने के लिए मोदी सरकार को सबसे सुरक्षित ठिकाना मानते हैं।

1991 में सोना गिरवी रखने की नौबत थी, आज 114 अरब डॉलर का सोने का खजाना
भारत का वह दौर भी याद करने लायक है जब 1991 में देश का विदेशी खजाना लगभग खाली हो गया था और सिर्फ 1.2 अरब डॉलर बचे थे। उस समय खर्च चलाने के लिए देश को 67 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान के पास गिरवी रखना पड़ा था। आज मोदी सरकार के दौर में वही भारत पूरी तरह आत्मनिर्भर बन चुका है और अकेले हमारा सोने का भंडार बढ़कर 114.22 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। यही नहीं, दशकों से विदेशों में रखा हुआ 100 टन से ज्यादा सोना अब आरबीआई सुरक्षित तरीके से अपने देश वापस ले आया है, जो देश के गौरव और बढ़ती हैसियत का सबूत है।

मोदी सरकार ने ब्रिटेन से वापस मंगाया 100 टन सोना: 1991 के बाद सबसे बड़ा ऐतिहासिक कदम
सोना गिरवी रखने के उस दौर से निकलकर मोदी सरकार के कार्यकाल में साल 2024 में एक और बड़ा इतिहास रचा गया। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर शक्तिकांत दास ने खुद यह जानकारी दी कि भारत ब्रिटेन में रखा अपना 100 टन सोना वापस देश ले आया है और उसे अपनी घरेलू तिजोरियों में सुरक्षित रख दिया गया है। साल 1991 के बाद यह पहला मौका है जब इतने बड़े पैमाने पर सोने को वापस भारत लाया गया है। 1991 में जहां संकट से निपटने के लिए सोना देश से बाहर भेजना पड़ा था, वहीं आज भारत लगातार सोना खरीद रहा है और देश के पास उसे सुरक्षित रखने की पूरी क्षमता है। आरबीआई ने साफ किया कि देश में अपनी मजबूत व्यवस्था होने की वजह से विदेशों में रखे सोने को अपनी सरजमीं पर वापस लाने का यह बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया गया। 

‘ब्रेन ड्रेन’ की चिंता छोड़कर बनाया ‘राष्ट्रदूत’: पीएम मोदी का प्रवासियों से खास रिश्ता
पहले की सरकारों के समय विदेशों में बसने वाले भारतीयों को सिर्फ इस नजर से देखा जाता था कि देश की प्रतिभा बाहर जा रही है यानी ‘ब्रेन ड्रेन’ हो रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया और प्रवासियों को भारत का ‘राष्ट्रदूत’ यानी विदेशों में देश का सबसे बड़ा प्रतिनिधि बनाया। अमेरिका के मेडिसन स्क्वायर से लेकर ऑस्ट्रेलिया के सिडनी और खाड़ी देशों तक, पीएम मोदी ने सीधे आम भारतीयों से संवाद किया। संकट के समय ‘ऑपरेशन गंगा’ और ‘वंदे भारत’ चलाकर विदेशों में फंसे भारतीयों को सुरक्षित घर लाया गया। इस अपनेपन और भरोसे की बदौलत आज प्रवासी भारतीय अपनी गाढ़ी कमाई भारत में भेज और निवेश कर रहे हैं।

‘फ्रेजाइल फाइव’ से निकलकर दुनिया की टॉप 5 अर्थव्यवस्थाओं में बनाई जगह
साल 2013 में यूपीए सरकार के समय दुनिया की बड़ी वित्तीय संस्था मॉर्गन स्टेनली ने भारत को दुनिया की पांच सबसे कमजोर अर्थव्यवस्थाओं यानी ‘फ्रेजाइल फाइव’ में गिना था। उस समय रुपया तेजी से गिर रहा था और देश का व्यापार घाटा बेकाबू था। लेकिन मोदी सरकार के 10 सालों में भारत 10वें नंबर से उठकर दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बन चुका है। 729 अरब डॉलर से ज्यादा का यह भारी भरकम खजाना अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों और पूरी दुनिया के सामने भारत की आर्थिक साख को मजबूत बनाता है।

पड़ोसी देश दाने-दाने को मोहताज, संकट के समय भारत बना मददगार
एक तरफ भारत के पड़ोस में श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो गया और वह दिवालिया हो गया, पाकिस्तान पाई-पाई के लिए आईएमएफ के सामने हाथ फैला रहा है और बांग्लादेश में भी विदेशी पूंजी का संकट बन गया। वहीं दूसरी तरफ भारत का खजाना 729 अरब डॉलर के पार चला गया। भारत ने न केवल खुद को संभाला, बल्कि संकट के समय श्रीलंका को करीब 4 अरब डॉलर की आर्थिक मदद, दवाइयां और तेल देकर बड़े भाई का फर्ज निभाया। इससे साबित होता है कि भारत की आर्थिक ताकत आज पूरे क्षेत्र के लिए सबसे बड़ा सहारा बन चुकी है।

गुजरात की गिफ्ट सिटी बनी प्रवासियों के निवेश का नया बड़ा केंद्र
मोदी सरकार ने गुजरात में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र यानी गिफ्ट सिटी (GIFT City) बनाकर एक बड़ा बदलाव किया है। पहले अनिवासी भारतीय अपना डॉलर या विदेशी कमाई दुबई, लंदन या सिंगापुर के बैंकों में रखते थे। लेकिन अब गिफ्ट सिटी में टैक्स में छूट और आसान नियमों के कारण प्रवासी सीधे भारत में ही डॉलर खाते खोल रहे हैं और यहां की व्यवस्था में पैसा लगा रहे हैं। इससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सीधे और तेजी से पूंजी आ रही है।

आम आदमी की रसोई पर महंगाई की मार रोकने वाली ढाल
इस विशाल विदेशी मुद्रा भंडार का सीधा फायदा देश के आम परिवार और आम आदमी की जेब को मिलता है। जब दुनिया में कच्चा तेल, गैस या खाने का तेल महंगा होता है, तो कमजोर मुद्रा वाले देशों में महंगाई बेकाबू हो जाती है। हमारे पास 729 अरब डॉलर का बड़ा सुरक्षा घेरा होने से आरबीआई जरूरत पड़ने पर बाजार में डॉलर देकर रुपये को ज्यादा गिरने से बचा लेता है। इससे पेट्रोल, डीजल और रोजमर्रा के जरूरी सामान के दाम काबू में रहते हैं और आम जनता पर अचानक महंगाई का बड़ा बोझ नहीं पड़ता।

‘चीन प्लस वन’ रणनीति: दुनिया की बड़ी कंपनियों की पहली पसंद बना भारत
दुनिया की बड़ी कंपनियां अब अपना सारा काम चीन पर निर्भर रखने के बजाय दूसरे देशों में बांटना चाहती हैं, जिसे बिजनेस की दुनिया में ‘चीन प्लस वन’ कहा जाता है। कंपनियां उसी देश में जाना पसंद करती हैं जहां की अर्थव्यवस्था स्थिर हो और कभी विदेशी पूंजी की कमी न पड़े। यूपीए सरकार के 10 सालों के 300 अरब डॉलर के मुकाबले मोदी सरकार के 10 सालों में 650 अरब डॉलर से ज्यादा का सीधा विदेशी निवेश (एफडीआई) भारत आया है। एप्पल और फॉक्सकॉन जैसी कंपनियां इसलिए भारत में कारखाने लगा रही हैं क्योंकि उन्हें भरोसा है कि भारत का खजाना मजबूत है और यहां काम कभी रुकेगा नहीं।

भारतीय कंपनियों के लिए विदेशों से सस्ता कर्ज: कारोबार और रोजगार को रफ्तार
जब किसी देश का विदेशी मुद्रा भंडार 700 अरब डॉलर से अधिक होता है, तो पूरी दुनिया के वित्तीय बाजार में उस देश की साख बहुत मजबूत हो जाती है। इसका सीधा फायदा भारतीय कंपनियों और उद्योगों को मिलता है। हमारे उद्योगपतियों को नए कारखाने लगाने और कारोबार का विस्तार करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बैंकों से बहुत सस्ती ब्याज दरों पर कर्ज (ईसीबी यानी एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग) मिल रहा है। विदेशी बैंकों को पूरा भरोसा है कि भारत में डॉलर की कोई कमी नहीं है और उनका पैसा पूरी तरह सुरक्षित है। पूंजी की यह आसान उपलब्धता देश में नए उद्योग लगाने और युवाओं के लिए रोजगार पैदा करने में बड़ी मदद कर रही है।

दुनिया का नया ‘एक्सपोर्ट पावरहाउस’ बनता भारत
यह ऐतिहासिक विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ प्रवासियों और विदेशी निवेशकों के पैसे से ही नहीं बना है, बल्कि इसमें भारत के अपने बढ़ते निर्यात की बहुत बड़ी भूमिका है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ की सफलता के चलते भारत का कुल निर्यात (सामान और सेवाएं) 775 अरब डॉलर के पार पहुंच चुका है। भारत अब केवल दुनिया से माल खरीदने वाला आयातक नहीं रहा, बल्कि खिलौने, दवाएं, मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा उपकरण पूरी दुनिया को बेचकर खुद डॉलर कमाने वाला एक मजबूत निर्यातक देश बन गया है।

विदेशी कर्ज के जाल से मुक्ति: आर्थिक रूप से अपने पैरों पर खड़ा भारत
दुनिया के कई विकासशील देश विदेशी कर्ज के बोझ तले दबकर अपनी जमीन और बंदरगाह तक गिरवी रखने को मजबूर हो रहे हैं। इसके विपरीत, भारत का 729 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार देश के कुल बाहरी कर्ज का एक बड़ा हिस्सा चुकाने के लिए पूरी तरह सक्षम है। इसका मतलब यह है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था या विदेशी ताकत के पास भारत पर शर्तें थोपने का कोई रास्ता नहीं बचा है और देश पूरी तरह आत्मनिर्भर होकर फैसले ले रहा है।

विदेशों में पढ़ रहे भारतीय छात्रों के परिवारों को बड़ी राहत
अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में उच्च शिक्षा हासिल कर रहे लाखों भारतीय छात्रों के परिवारों के लिए मजबूत खजाना एक बड़ा सहारा साबित हुआ है। जब देश के पास बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपया अचानक तेज गिरावट का शिकार नहीं होता। रुपया स्थिर रहने से छात्रों की ट्यूशन फीस और रहने का खर्च अचानक बेकाबू नहीं होता, जिससे भारत में बैठे उनके माता-पिता का मासिक बजट बिगड़ने से बच जाता है।

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भारतीय शेयर बाजार में छोटे निवेशकों की सुरक्षा: विदेशी बिकवाली का डर खत्म
पहले जब भी विदेशी निवेशक (एफआईआई) शेयर बाजार से अपना पैसा निकालते थे, तो बाजार ताश के पत्तों की तरह ढह जाता था और रुपया तेजी से टूट जाता था। लेकिन आज मोदी सरकार के दौर में म्यूचुअल फंड और एसआईपी के जरिए आम भारतीयों का निवेश इतना बड़ा हो चुका है और पीछे 729 अरब डॉलर का सुरक्षा घेरा खड़ा है कि विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली के बाद भी बाजार नहीं डगमगाता। इससे देश के करोड़ों छोटे और मध्यम निवेशकों की मेहनत की कमाई पूरी तरह सुरक्षित रहती है।

भूमिगत तेल भंडारों से पक्की हुई देश की सुरक्षा: जंग छिड़े तो भी नहीं रुकेगा पहिया
खाड़ी देशों और मध्य पूर्व में तनाव के चलते दुनिया भर में ईंधन की आपूर्ति ठप होने का डर बना रहता है। लेकिन मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार के दम पर भारत ने विशाखापट्टनम, मंगलुरु और पादुर में जमीन के नीचे विशाल आपातकालीन तेल भंडार (स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व) बना लिए हैं। इसके अलावा हमारे पास इतना विदेशी फंड है कि जरूरत पड़ने पर किसी भी वैकल्पिक रास्ते से तुरंत तेल खरीदा जा सके। इससे यह पक्का हो गया है कि दुनिया में कहीं भी युद्ध छिड़े, भारत के कारखानों, गाड़ियों और खेती का पहिया कभी नहीं थमेगा।

दुनिया में यूपीआई का परचम: डॉलर की मोहताजी खत्म करने की तरफ कदम
भारत अब केवल विदेशी मुद्रा जमा करने वाला देश नहीं रहा, बल्कि अपनी तकनीक के दम पर दुनिया के वित्तीय ढांचे को नई दिशा दे रहा है। मोदी सरकार के डिजिटल इंडिया मिशन का कमाल है कि भारत का देसी यूपीआई अब फ्रांस, यूएई, सिंगापुर, मॉरीशस और नेपाल जैसे कई देशों में सफलतापूर्वक काम कर रहा है। विदेशों में भारतीय अब बिना डॉलर बदले सीधे क्यूआर कोड स्कैन करके अपनी मुद्रा में भुगतान कर रहे हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर डॉलर पर निर्भरता लगातार कम हो रही है।

मदद मांगने वाले से मदद देने वाला बना भारत: वैश्विक पटल पर बढ़ी साख
आजादी के बाद दशकों तक भारत को किसी भी बड़ी आपदा या संकट के समय विकसित देशों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से मदद की गुहार लगानी पड़ती थी। लेकिन आज 729 अरब डॉलर के खजाने की ताकत और मजबूत अर्थव्यवस्था के चलते भारत दुनिया के किसी भी कोने में संकट आने पर सबसे पहले मदद पहुंचाने वाला देश बन चुका है। चाहे तुर्की और सीरिया का भूकंप हो, श्रीलंका का आर्थिक संकट हो या अफ्रीकी देशों को मुफ्त अनाज और दवाइयां भेजना हो, भारत अब हाथ फैलाने वाला नहीं, बल्कि संकटग्रस्त मानवता की ओर हाथ बढ़ाने वाला वैश्विक महाबली बन चुका है।

बिना किसी दबाव के अपनी मर्जी से फैसले लेने की आजादी
रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण दुनिया भर के देशों पर किसी न किसी गुट में शामिल होने या पाबंदियां मानने का दबाव रहता है। लेकिन 729 अरब डॉलर के भारी भरकम भंडार ने भारत को यह ताकत दी है कि वह किसी भी देश के दबाव के आगे न झुके। भारत अपनी जरूरत के हिसाब से जहां से सस्ता मिले वहां से कच्चा तेल खरीद रहा है और देशवासियों को लगातार ईंधन उपलब्ध करा रहा है। यह वित्तीय ताकत ही देश को अपनी शर्तों पर फैसले लेने की आजादी देती है।

11 महीने का जरूरी सामान खरीदने का पूरा इंतजाम, उद्योग-धंधों को रफ्तार
विदेशी मुद्रा भंडार का मतलब सिर्फ पैसा जमा रखना नहीं होता, बल्कि इसका सीधा मतलब यह है कि देश जरूरत की चीजें खरीदने में कितना सक्षम है। मौजूदा समय में भारत के पास इतना पैसा है कि वह अगले 11 महीने तक का कच्चा तेल, जरूरी दवाएं और मशीनें बिना किसी परेशानी के बाहर से खरीद सकता है। इससे देश में चल रही फैक्ट्रियों, मेक इन इंडिया प्रोजेक्ट्स और चिप (सेमीकंडक्टर) बनाने की योजनाओं को जरूरी सामान मंगाने में कोई दिक्कत नहीं आती और देश का विकास बिना रुके आगे बढ़ता रहता है।

दुनिया भर में रुपये की साख और 2047 के विकसित भारत की पक्की नींव
खजाने में 700 अरब डॉलर से अधिक की रकम होने से भारतीय रुपये की साख पूरी दुनिया में बढ़ गई है। अब भारत कई मित्र देशों के साथ सीधे रुपये में लेन-देन कर रहा है, जिससे हमें डॉलर पर बहुत ज्यादा निर्भर नहीं रहना पड़ता। यह मजबूत ढांचा रुपये को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत बना रहा है और प्रधानमंत्री मोदी के 2047 तक भारत को पूरी तरह विकसित और अपने पैरों पर खड़ा देश बनाने के सपने को एक मजबूत आधार दे रहा है।

आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में ऐतिहासिक मोड़: देश के उज्ज्वल भविष्य की पक्की गारंटी
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 729 अरब डॉलर के रिकॉर्ड शिखर पर पहुंचना सिर्फ कागजों पर दर्ज कोई सामान्य आंकड़ा भर नहीं है, बल्कि यह बदलते और सामर्थ्यवान नए भारत की जीती-जागती तस्वीर है। एक तरफ जहां दुनिया भर में आर्थिक मंदी, युद्ध और महंगाई का संकट छाया हुआ है, वहीं दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मजबूत नेतृत्व और प्रवासी भारतीयों के अटूट विश्वास ने देश को दुनिया के सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद आर्थिक केंद्रों में लाकर खड़ा कर दिया है। यूपीए के 10 सालों में जहां देश कमजोर अर्थव्यवस्थाओं की श्रेणी में खड़ा लाचार दिखता था, वहीं मोदी सरकार के पिछले एक दशक के ठोस आर्थिक सुधारों, डायस्पोरा कूटनीति और वित्तीय अनुशासन ने भारत को विदेशी कर्ज, डॉलर के दबाव और वैश्विक अस्थिरता से पूरी तरह मुक्त कर दिया है। आज भारत सिर्फ अपनी सीमाएं और अपनी मुद्रा ही नहीं संभाल रहा, बल्कि वैश्विक पटल पर एक आत्मनिर्भर महाशक्ति बनकर दुनिया का नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह तैयार खड़ा है।

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