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यूपी में दलित वोट बैंक पर महासंग्राम : चक्रव्यूह में घिरे राहुल गांधी, बैकफायर कर गया ‘शुद्धिकरण’ का दांव

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भारतीय राजनीति में दलित वोट बैंक को साधने की कवायद हमेशा से केंद्रीय बिंदु रहा है। उत्तर प्रदेश में  2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए दलित वोट बैंक पर कब्जे की जंग शुरू हो चुकी है। इस जंग में भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी से पार्टी से पिछड़ती आ रही कांग्रेस अब आगे निकलने के लिए नई-नई रणनीति अपना रही है। इसी रणनीति के तहत उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली के बाद हुए कथित ‘शुद्धिकरण’ के विवाद को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक बड़ा राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दा बनाने की कोशिश की है। हालांकि, यह दांव अब कांग्रेस और खुद राहुल गांधी के लिए एक सियासी चक्रव्यूह बनता नजर आ रहा है, जो कई मोर्चों पर बैकफायर (Backfire) होता दिख रहा है।

हल्द्वानी में मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली और शुद्धिकरण
दरअसल, 8 अगस्त 2026 को उत्तराखंड के हल्द्वानी स्थित रामलीला मैदान में कांग्रेस पार्टी की ‘विजय शंखनाद’ रैली हुई थी, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी शिरकत की थी। आरोप है कि इस दौरान मंच और मैदान से ‘अल्लाह हू अकबर’ / ‘नारा-ए-तकबीर’ जैसे नारे लगाए गए। इस रैली के दो दिन बाद यानी 10 अगस्त 2026 को उस स्थल पर कथित ‘शुद्धिकरण’ अनुष्ठान किया गया। ‘श्रीराम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास’ और स्थानीय हिंदू संगठनों ने रामलीला मैदान में शुद्धिकरण यज्ञ/हवन किया। आयोजकों का तर्क था कि रामलीला मैदान धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था का केंद्र है और वहां राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान मुस्लिम नारे लगाने से धार्मिक मर्यादा का उल्लंघन हुआ है, जिससे पवित्रता खंडित हुई। दक्षिणपंथी संगठनों और स्थानीय लोगों ने उस मंच व स्थल पर गंगाजल छिड़काव का अनुष्ठान किया, जिसको लेकर राजनीतिक विवाद और प्रदर्शन हुए। 

राहुल गांधी की भड़काने की कोशिश,एक्शन से बड़ा रिएक्शन होगा
कांग्रेस ने इस पूरी घटना को एक सियासी अवसर के रूप में देखा और मल्लिकार्जुन खड़गे के दलित समुदाय से होने से जोड़ दिया। राहुल गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इसे सीधे तौर पर ‘छुआछूत का दूसरा रूप’ और दलितों का अपमान करार दिया। राहुल ने मांग की कि ऐसा कृत्य करने वालों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट (SC/ST Act) के तहत सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। राहुल गांधी ने कहा कि हम चाहते हैं कि उत्तराखंड में हमारे अध्यक्ष को न्याय मिले। हमने फैसला कर लिया है। अब उनके कोर्ट में बॉल है। अगर वो एक्शन लें, जो लेना चाहिए… बहुत अच्छा, अगर एक्शन नहीं लेंगे, तो हमारा कोई ना कोई रिएक्शन आएगा। एक्शन से बड़ा रिएक्शन होगा। राहुल गांधी ने इसे खड़गे की दलित पहचान से जोड़ते हुए बीजेपी और आरएसएस की कथित मानसिकता पर सवाल उठाए। 

दलितों के अपमान मामले में राहुल गांधी पर SC/ST एक्ट के तहत FIR
इस मामले में नया मोड़ तब आया जब राहुल गांधी के आक्रामक बयानों के बाद उनके खिलाफ ही एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआईआर (FIR) दर्ज कर ली गई। इससे कांग्रेस की वह रणनीति उलटी पड़ गई जिसके तहत वे भाजपा को घेरने की योजना बना रहे थे। दरअसल, वाल्मीकि समुदाय से जुड़े अमित कुमार और अन्य स्थानीय लोगों ने हल्द्वानी कोतवाली में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि राहुल गांधी ने 29 अगस्त को दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हल्द्वानी के रामलीला मैदान में हुए धार्मिक अनुष्ठान और सफाई को ‘जातिवादी रंग’ दिया। राहुल गांधी ने कार्यक्रम में शामिल लोगों को ‘छुआछूत’ और ‘दलित विरोध’ से जोड़कर पेश किया, जिससे वाल्मीकि समुदाय की भावनाएं आहत हुई। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं और एससी/एसटी (SC/ST) एक्ट के तहत मामला दर्ज किया।

राहुल गांधी पर दलितों का अपमान, वैमनस्य बढ़ाने, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप
पुलिस ने बताया कि शिकायत के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है और इनमें अलग-अलग समूहों के बीच वैमनस्य बढ़ाने, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से किए गए जानबूझकर कृत्यों से संबंधित प्रावधान शामिल हैं। इसके अलावा प्राथमिकी में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की संबंधित धाराएं भी जोड़ी गई हैं।

राहुल गांधी दलित पर ही एससी/एसटी एक्ट लगाना चाहते हैं- विनोद आर्य
श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास के सदस्य विनोद आर्य ने शुद्धिकरण कार्यक्रम का बचाव किया। उनका कहना है कि सनातन परंपरा के अनुयायी के रूप में जिस स्थान पर भगवान श्रीराम की पूजा और धार्मिक आयोजन होते हैं, वहां स्वच्छता सुनिश्चित करना उनका अधिकार और कर्तव्य है। उनके मुताबिक उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया। विनोद आर्य ने कहा, “रैली के दौरान बोतल में यूरिन भरकर फेंका गया था। गुटका खाकर थूका गया था। बहुत गंदकी की गई थी। इसकी हमने सफाई की थी। हम सनातनी है। हमारा फर्ज है कि जहां हमारे भगवान श्रीराम की पूजा होती है और अन्य कार्यक्रम होते हैं। खुद मैं एक दलित हूं। राहुल गांधी जी कह रहे हैं कि इन पर मुकदमा करो, कार्रवाई करो। मैं खुद दलित हूं और दलित समुदाय के और भी लोग थे शुद्धिकरण में शामिल थे। हम चाहते हैं कि राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर हो। हम दलित है और हमारे ऊपर ही एसटी-एससी एक्ट के तहत मुकदमा करने के लिए दबाव बना रहे हैं। हमें डर है कि हमारे साथ कुछ गलत नहीं हो जाए। इसलिए हम मुकदमा लिखवाने आए हैं।”

धार्मिक आस्था बनाम जातिगत रंग, राहुल पर गलत नैरेटिव फैलाने का आरोप
जहां कांग्रेस इसे दलित स्वाभिमान और छुआछूत से जोड़ रही है, वहीं आयोजक पक्ष और वाल्मीकि समुदाय इसे राजनीतिक दलों के आयोजनों के बाद सामान्य धार्मिक अनुष्ठान या स्थल की शुद्धता से जुड़ा विषय बता रहे हैं। शुद्धिकरण के कार्यक्रम में शामिल अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित एक अन्य युवक ने बताया कि कार्यक्रम में अलग-अलग वर्गों के लोगों के साथ अनुसूचित जाति के लोग भी शामिल थे और इस कार्यक्रम का खड़गे की जाति से कोई संबंध नहीं था। वाल्मीकि समुदाय के युवक ने कहा, “मैं भगवान वाल्मीकि का उपासक हूं। तो ऐसा नैरेटिव कांग्रेस नहीं फैलाए कि कोई दलित आया और उसका हमने विरोध किया। ये गलत चीज है। देश और जनता जानती है कि वो गलत नैरेटिव फैला रहे हैं।”

सड़क पर उतरा आक्रोशित बहुसंख्यक वर्ग, राहुल गांधी का पुतला दहन
इस मुद्दे को जरूरत से ज्यादा तूल देने से बहुसंख्यक वर्ग में एक विपरीत संदेश जा रहा है। बहुसंख्यक वर्ग के लोगों के अनुसार, राहुल गांधी ने बिना पूरी जानकारी के इस विशुद्ध धार्मिक और नागरिक कार्य को “जातिवाद” और “छुआछूत” का रंग दे दिया। इस तरह के बयानों से समाज में बेवजह विभाजन और वैमनस्य पैदा होता है, जिससे बहुसंख्यक समाज में काफी आक्रोश है। बहुसंख्यक वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनीतिक नेताओं का आरोप है कि विपक्ष इस धार्मिक शुद्धि और स्वच्छता के मुद्दे को तूल देकर समाज को जाति और संप्रदाय के आधार पर विभाजित करने का प्रयास कर रहा है। अब लोग सड़क पर उतर कर राहुल गांधी का पुतला फूंक रहे हैं। लोगों को कहना है कि राहुल गांधी और कांग्रेस के लोग गंदी राजनीति कर रहे हैं। उत्तराखंड एक देवभूमि है। देवभूमि का माहौल हम खराब नहीं होने देंगे। 

राहुल गांधी के लिए बीजेपी ने कराया ‘बुद्धि शुद्धि हवन’
उत्तराखंड में कांग्रेस और बीजेपी के बीच सियासी घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस के सचिवालय कूच के बाद बीजेपी ने राहुल गांधी पर पलटवार किया है। बीजेपी ने देहरादून में राहुल गांधी की तस्वीर के साथ ‘बुद्धि शुद्धि’ का हवन किया। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी अनुसूचित जाति का अपमान कर रहे हैं। उन्होंने कांग्रेस पर भी दलित समाज को लेकर राजनीति करने का आरोप लगाया। बीजेपी के इस कार्यक्रम में राहुल गांधी की तस्वीर रखी गई थी। हवन के दौरान उनके लिए ‘बुद्धि शुद्धि’ की बात कही गई। बीजेपी नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी को सच्चाई समझनी चाहिए। उनका आरोप है कि कांग्रेस नेता हल्द्वानी के शुद्धिकरण कार्यक्रम को लेकर गलत बयान दे रहे हैं। बीजेपी नेता भगवत मकवाना ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने अनुसूचित जाति का अपमान किया है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष हैं, लेकिन अगर कोई भी नेता गलत करेगा तो कार्रवाई होनी चाहिए।

दलित अपमान का नैरेटिव, निशाने पर यूपी विधानसभा चुनाव 
हल्द्वानी शुद्धिकरण विवाद को उत्तर प्रदेश के चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा था कि इससे गैर-जाटव दलितों के बीच कांग्रेस के लिए जमीन तैयार होगी। लेकिन राहुल गांधी के कानूनी पचड़े में फंसने के कारण यह मुद्दा अब स्थानीय सहानुभूति के बजाय एक लंबी कानूनी और राजनीतिक रस्साकसी में तब्दील हो गया है। अब कानूनी शिकंजा चाहे जो रंग लाए, लेकिन कांग्रेस के हाथ बैठे-बिठाए एक ऐसा मुद्दा लग गया है जिसे वह उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनाव तक भुनाने के मूड में दिख रही है। राहुल गांधी का यह पैंतरा सीधे तौर पर यूपी की गद्दी पर निशाना साधता नजर आ रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरन राहुल और अखिलेश की जोड़ी ने बीजेपी के ‘400 पार’ के नारे को संविधान बदलने की साजिश बताकर बीजेपी को झटका दिया था। अब 2027 के लिए भी ठीक वैसा ही चक्रव्यूह रचा जा रहा है, जहां बीजेपी पर ‘भेदभाव और छुआछूत’ का टैग चिपका कर दलितों को अपने पक्ष में गोलबंद करना है।

यूपी में दलितों की कुल आबादी और वोट प्रतिशतकुल आबादी
उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति (SC/दलित) की कुल आबादी राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 21% से 21.5% है, जो देश के किसी भी राज्य में सबसे ज्यादा है। यह वोट बैंक राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से 85 आरक्षित सीटों पर जीत-हार तय करता ही है, साथ ही यूपी की करीब 140 से अधिक विधानसभा सीटों पर दलित मतदाता हार-जीत तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यूपी के दलित समाज में लगभग 66 उप-जातियां हैं, जिन्हें मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटा जाता है।

जाटव समुदाय:
यह दलित आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा है, जो कुल दलित आबादी का लगभग 51% से 54% (यानी यूपी की कुल आबादी का करीब 11%) है। यह बहुजन समाज पार्टी (BSP) और मायावती का पारंपरिक और सबसे मजबूत कोर वोट बैंक माना जाता है।

गैर-जाटव दलित समुदाय:
इसमें पासी (लगभग 16%), धोबी (लगभग 6%), कोरी, वाल्मीकि, खटीक, धानुक आदि जातियां शामिल हैं, जो कुल दलित आबादी का करीब 46% हिस्सा बनाती हैं। हाल के वर्षों में गैर-जाटव जातियों का झुकाव भारतीय जनता पार्टी (BJP) और अन्य दलों की तरफ तेजी से बढ़ा है।

दलित वोटों के लिए चक्रव्यूह में फंसी कांग्रेस 
यूपी के 21% दलितों में से 11% जाटव मतदाता अब भी मुख्य रूप से बसपा के साथ अपनी निष्ठा रखते हैं या बंटे हैं, जबकि 10% के करीब गैर-जाटव मतदाता सत्ता और विकास समीकरणों के चलते सबसे ज्यादा राजनीतिक दलों (विशेषकर बीजेपी और सपा) के बीच खिंच रहे हैं। यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हर दल इस वर्ग को अपने पाले में करने के लिए रणनीति बना रहा है। उत्तर प्रदेश में कमजोर होती बसपा (BSP) के बाद अब दलित वोटों के लिए मुख्य रूप से भाजपा, सपा, कांग्रेस और आजाद समाज पार्टी के बीच चतुष्कोणीय संघर्ष है। विभिन्न चुनावों और सर्वे के आंकड़े राजनीतिक हिस्सेदारी की यह तस्वीर पेश करते हैं:

बहुजन समाज पार्टी (BSP):
कभी पूरे दलित वोट बैंक (विशेषकर जाटव और कुछ हद तक गैर-जाटव) पर एकाधिकार रखने वाली बसपा का जनाधार पिछले कुछ चुनावों में जरूर कमजोर हुआ है, लेकिन इसके बावजूद मायावती के पास अब भी एक ठोस कोर जाटव वोट बैंक सुरक्षित है। बसपा के कुल वोट शेयर का बड़ा हिस्सा इन्हीं दलितों पर टिका है। मायावती आगामी विधानसभा चुनावों (विशेषकर उत्तर प्रदेश 2027) को ध्यान में रखते हुए अपने खिसकते आधार और कैडर वोट बैंक को बचाने के लिए नए सिरे से रणनीति बना रही है। मायावती ने घोषणा की है कि बसपा उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब समेत किसी भी राज्य में बड़ा या छोटा चुनाव किसी दल के साथ गठबंधन करके नहीं लड़ेगी। पार्टी का मानना है कि गठबंधन करने से कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है और कोर वोट ट्रांसफर न होने से पार्टी का वोट प्रतिशत कमजोर होता है।

समाजवादी पार्टी (SP):
सपा अपने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंखयक) फॉर्मूले के जरिए गैर-जाटव और असंतुष्ट दलितों को अपने साथ जोड़ने की पुरजोर कोशिश कर रही है। पार्टी का मुख्य फोकस मायावती के कमजोर होने से बिखर रहे दलित वोटों को अपने पाले में खींचना है। दलितों के बीच अपनी पैठ बढ़ाने और डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों को घर-घर तक पहुंचाने के लिए पार्टी ने ‘समाजवादी बाबा साहेब वाहिनी’ का गठन किया है। 2024 के लोकसभा चुनाव की तरह ही आगामी चुनावों में भी गैर-यादव जातियों और दलित उम्मीदवारों को बेहतर प्रतिनिधित्व देने की रणनीति अपनाई जा रही है ताकि यह धारणा तोड़ी जा सके कि सपा केवल एक विशेष जाति की पार्टी है।

कांग्रेस पार्टी:
राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ‘संविधान बचाओ’, जातिगत जनगणना और शुद्धिकरण के नैरेटिव के जरिए खासकर युवा और गैर-जाटव दलितों के बीच अपनी जमीन तलाश रही है। हालांकि, संगठनात्मक तौर पर यूपी में उनका दलित कैडर अभी सीमित है। 2027 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस पार्टी ने सामाजिक न्याय सम्मेलनों और ‘बहुजन विचार’ अभियान की शुरुआत की है।

आज़ाद समाज पार्टी (ASP – कांशीराम):
चंद्रशेखर आजाद की पार्टी भी पश्चिमी यूपी और कुछ अन्य क्षेत्रों में आक्रामक तरीके से दलित और मुस्लिम गठजोड़ के जरिए अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी बनाने की जंग में उतरी है। वर्ष 2024 के आम चुनाव में पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया। नगीना सीट से चंद्रशेखर आजाद ने जीत दर्ज की, जिससे पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव (मिशन 2027) के लिए पार्टी ने जमीन पर अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं।

भारतीय जनता पार्टी (BJP):
बीजेपी ने ‘सोशल इंजीनियरिंग’ और कल्याणकारी योजनाओं के जरिए गैर-जाटव दलितों (जैसे पासी, वाल्मीकि, कोरी) के एक बड़े वर्ग को अपने पाले में जोड़ा है। अध्ययनों के अनुसार, लोकसभा चुनावों में एक बड़ा गैर-जाटव और यहां तक कि जाटव मतदाताओं का हिस्सा भी बीजेपी को वोट करता रहा है। पार्टी संगठन और जिला स्तर पर भी दलित चेहरों को लगातार प्रतिनिधित्व दिया जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी केवल सरकारी योजनाओं के भरोसे नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी जमीनी स्तर पर ‘सामाजिक समरसता’ के सिद्धांत पर काम कर रहा है। जहां ‘एक कुआं, एक श्मशान’ के विचार के साथ छुआछूत मिटाने का काम किया जा रहा है।

यूपी के दलित वोट बैंक की असली बिसात और कांग्रेस की चुनौतियां
यूपी में सपा पहले से ही पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्संख्यक) के जरिए दलितों को साध रही है, जबकि बीजेपी अपनी कल्याणकारी योजनाओं के बूते गैर-जाटव दलितों में मजबूत पकड़ बनाए हुए है। ऐसे में कांग्रेस केवल बयानों और एक-दो मुद्दों के सहारे अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने में संघर्ष कर रही है। विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी राष्ट्रीय स्तर पर ‘सामाजिक न्याय’ और ‘संविधान बचाओ’ का बड़ा नैरेटिव गढ़ने में कामयाब रहे हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के बूथ स्तर पर पार्टी के पास उस नैरेटिव को वोटों में बदलने के लिए मजबूत कैडर और नेतृत्व की कमी है।

BSP के वोट बैंक पर राहुल गांधी की नजर
राहुल गांधी की नजर उन सीटों पर भी है जहां बहुजन समाज पार्टी (BSP) कमजोर हुई है। 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में BSP को एक भी सीट नहीं मिली थी और उसका वोट शेयर करीब 9.4% था। इससे अन्य दल इस कोर वोट बैंक को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं। दलितों और पिछड़ों को जोड़ने के लिए कांग्रेस गाँवों और शहरी वार्डों में संविधान चर्चा जैसे अभियानों पर जोर दे रही है। मायावती के अकेले चुनाव लड़ने के ऐलान के बाद कांग्रेस दलित और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को सीधा संदेश देने की जुगत में है। लेकिन, यह मानना अतिशयोक्ति होगी कि मायावती की सामाजिक विरासत खत्म हो गई है। जाटवों के बीच BSP अब भी मजबूत है। 

मायावती ने राजेंद्र पाल गौतम को दिखाई औकात 
कांग्रेस पार्टी के अनुसूचित जाति विभाग के प्रमुख और उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम 19 मई 2026 को मायावती से मिलने पहुंचे, लेकिन, दरवाजा नहीं खुला। मुलाकात की अनुमति नहीं मिली, और वहीं से लौट जाना पड़ा। तब इस वाकये की काफी चर्चा हुई थी। दरअसल, मायावती ने अपने वोट बैंक पर नजर गड़ाए राजेंद्र पाल गौतम को औकात बता दी। राजेंद्र पाल गौतम ने सफाई देते हुए कहा कि वे किसी राजनीतिक चर्चा या गठबंधन के लिए नहीं, बल्कि समाज की एक वरिष्ठ नेता का हालचाल जानने व्यक्तिगत तौर पर गए थे।

हिन्दू विरोधी राजेंद्र पाल गौतम का कांग्रेस में विरोध
आम आदमी पार्टी से कांग्रेस में आए राजेंद्र पाल गौतम को महज दो साल के भीतर अविनाश पांडे को हटाकर यूपी जैसे महत्वपूर्ण राज्य का प्रभारी बनाया जाना महत्वपूर्ण था। लेकिन एक ब्राह्मण को हटाकर एक दलित को प्रभारी बनाने से कांग्रेस के अंदर का विरोध खुलकर सामने आ गया, जब कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में ही टकराव देखने को मिला। राजेंद्र पाल गौतम पर सनातन विरोधी कार्यक्रमों में शामिल होने का विरोध है। वहीं कांग्रेस भी अब दलित ओबीसी वोटरों की राजनीति की तरफ शिफ्ट करती दिख रही है, इससे सवर्ण मतदातों में नाराजगी है।

दलित राजेंद्र पाल गौतम ने हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा नहीं करने की दिलाई थी शपथ
दिल्ली की केजरीवाल सरकार में मंत्री रहे राजेंद्र पाल गौतम को विवादों के कारण इस्तीफा देना पड़ा था। तब दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे अरविंद केजरीवाल गुजरात में चुनावी रैली कर रहे थे, और राजेंद्र पाल गौतम ने वहीं इस्तीफा भेज दिया था। असल में, 5 अक्टूबर 2022 को दिल्ली के आंबेडकर भवन में ‘मिशन जय भीम’ कार्यक्रम हुआ था। कार्यक्रम में शामिल करीब 10 हजार लोगों के साथ तत्कालीन मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने कुछ प्रतिज्ञाएं दोहराई थीं। राजेंद्र पाल गौतम लोगों को ब्रह्मा, विष्णु, महेश, राम और कृष्ण को ईश्वर ना मानने और इनकी कभी पूजा नहीं करने की शपथ दिलाई।

हिन्दुओं के धर्मांतरण के लिए “मिशन जय भीम” 
राजेंद्र पाल गौतम ने इस कार्यक्रम की जानकारी देते हुए ट्विटर पर लिखा, ”चलो बुद्ध की ओर मिशन जय भीम बुलाता है। आज “मिशन जय भीम” के तत्वाधान में अशोका विजयदशमी पर डॉ. अंबेडकर भवन रानी झांसी रोड पर 10,000 से ज्यादा बुद्धिजीवियों ने तथागत गौतम बुद्ध के धम्म में घर वापसी कर जाति विहीन व छुआछूत मुक्त भारत बनाने की शपथ ली। नमो बुद्धाय, जय भीम!” राजेन्द्र पाल गौतम के इस ट्वीट के बाद राजनीतिक तूफान उठ खड़ा हुआ था।

मायावती और चंद्रशेखर के बीच दलित नेतृत्व और वर्चस्व को लेकर मुकाबला
आजाद समाज पार्टी के नेता चन्द्रशेखर आज़ाद और बहुजन समाज पार्टी (BSP) की प्रमुख मायावती के बीच उत्तर प्रदेश के दलित नेतृत्व और राजनीतिक वर्चस्व को लेकर तीखा मुकाबला और वैचारिक मतभेद रहा है। मायावती चंद्रशेखर आजाद की सड़क जाम करने और उग्र प्रदर्शन जैसी आक्रामक शैली के खिलाफ हैं। उनका मानना है कि ऐसी राजनीति से अराजकता फैलती है और पीड़ितों की समस्याएं बढ़ती हैं, हाल ही में मेरठ में एक दलित छात्रा की हत्या के बाद हुए प्रदर्शनों पर दोनों आमने-सामने आ गए। मायावती ने तंज कसा कि कुछ दलों के नेता घटनास्थल पर जाकर सिर्फ ‘मगरमच्छ के आंसू’ बहाते हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के मद्देनजर मायावती अपने समर्थकों को विपक्ष के बहकावे में न आने की सलाह दे रही हैं, वहीं आजाद समाज पार्टी बहुजन समाज के एक नए विकल्प के रूप में उभरने का प्रयास कर रही है।

राहुल गांधी का दलितों का सबसे बड़ा हितैषी दिखाने का सियासी प्रपंच
दलितों को दो प्रबल दावेदारों (मायावती और चंद्रशेखर) के बीच छिड़ी जंग में राहुल गांधी की एंट्री काफी दिलचस्प है। राहुल गांधी का ‘शुद्धिकरण’ वाला दांव मूल रूप से दलित समुदाय के बीच खुद को उनका सबसे बड़ा हितैषी दिखाने का एक बड़ा राजनीतिक प्रयोग है। लेकिन, कानूनी दांवपेंच में फंसने और खुद पर एफआईआर दर्ज होने के बाद यह रणनीति अब कांग्रेस के लिए गले की फांस बनती दिख रही है। राजनीति के गलियारों में तो चर्चा यहां तक है कि राहुल गांधी इस मुद्दे पर आर-पार के मूड में हैं। छुआछूत के खिलाफ अपनी इस लड़ाई को धार देने के लिए, अगर एससी/एसटी एक्ट के तहत उन्हें सलाखों के पीछे भी जाना पड़े, तो वे अपनी गिरफ्तारी देने से भी पीछे नहीं हटेंगे। यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इस कानूनी और राजनीतिक चक्रव्यूह से बाहर निकलकर 2027 के चुनावों से पहले यूपी के दलित मतदाता को कितना और कैसे साध पाती है। लेकिन राहुल गांधी का दलित विरोधी अतीत उनके आज के दावों की पोल खोलता है।

कांग्रेस का दलित विरोधी चेहरा

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