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ISRO का ऐतिहासिक शंखनाद: GSLV-F17 और EOS-05 मिशन की सफलता से देश की सुरक्षा और होगी मजबूत

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पीएम नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में पिछले एक दशक से अधिक समय में भारत ने स्पेस सेक्टर में ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने एक बार फिर ब्रह्मांड की अनंत गहराइयों में सफलता का नया स्वर्णिम अध्याय लिख दिया है। पीएम मोदी के विजनरी नेतृत्व में भारत का स्पेस सेक्टर महज उपग्रहों को लॉन्च करने वाले देश से आगे बढ़कर आज अंतरिक्ष विज्ञान की वैश्विक महाशक्ति बनने की ओर तेजी से अग्रसर है। ISRO ने एक बार फिर भारतीयों को उपलब्धि पर गर्व करने का मौका दिया है। भारतीय स्पेस एजेंसी ने देर रात 2.55 बजे EOS-05 मिशन को सफलतापूर्व लॉन्च किया। मिशन को अंजाम देने के लिए ISRO ने GSLV-F17 रॉकेट का इस्तेमाल किया। इस मिशन का सफल होना इसलिए भी बेहद खास है, क्योंकि यह जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट से काम करेगा और ऐसा करने वाला यह भारत का पहला इमेजिंग स्पेसक्राफ्ट होगा। इससे हमारे देश और उसके आस-पास के भूभाग पर हर वक्त पैनी नजर रहेगी। इस उपलब्धि पर प्रधानमंत्री मोदी ने ISRO और देश के वैज्ञानिकों को बधाई दी है।पीएम मोदी के विजन से स्पेस सेक्टर की बनी वैश्विक पहचान
अंतरिक्ष क्षेत्र में कभी भारत दूसरे विकसित देशों की उपलब्धियों के पीछे चलना वाला देश था। पीएम मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके तीन कार्यकाल में स्पेस सेक्टर में नित-नई ऐतिहासिक उपलब्धियों से यह साबित किया है अब भारतीय मेधा किसी के पीछे चलने के लिए नहीं, बल्कि दुनिया का नेतृत्व करने के लिए तैयार है। चंद्रयान-3 की चांद के अछूते दक्षिणी ध्रुव पर तिरंगा फहराने की अद्वितीय कामयाबी से लेकर, सूर्य की धधकती सीमाओं को नापने वाले आदित्य-एल1 तक और निजी रॉकेटों के सफल प्रक्षेपण से लेकर अंतरिक्ष में सैटेलाइट्स को आपस में जोड़ने (SpaDeX) की जादुई तकनीक तक, भारत ने हर मोर्चे पर नया कीर्तिमान गढ़ा है। यह न केवल इसरो की तकनीकी श्रेष्ठता को वैश्विक पटल पर साबित करता है, बल्कि यह भी बताता है कि कैसे ये अंतरिक्षीय सफलताएं आम भारतीय के जीवन को सुगम, सुरक्षित और समृद्ध बना रही हैं।

युगांतकारी शंखनाद: GSLV-F17 और EOS-05 की बड़ी सफलता
भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का दिन (4 सितंबर) सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है। इसरो के भरोसेमंद ‘नॉटी बॉय’ कहे जाने वाले क्रायोजेनिक इंजन से लैस GSLV-F17 रॉकेट ने EOS-05 (अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट) को अंतरिक्ष की तय ऊंचाई पर सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया। यह कोई सामान्य सैटेलाइट लॉन्च नहीं है, बल्कि यह भारत की धरती से अंतरिक्ष में स्थापित की गई एक ऐसी तीसरी आंख है, जो चौबीसों घंटे बिना पलक झपकाए हमारे देश और उसके आस-पास के भूभाग पर पैनी नजर रखेगी।

रक्षा और सुरक्षा: देश को EOS-05 से होने वाले अभूतपूर्व लाभ
तकनीकी रूप से यह उपग्रह भारत के लिए गेम-चेंजर साबित होने जा रहा है। इसका सबसे बड़ा फायदा हमारे रणनीतिक सुरक्षा तंत्र और आपदा प्रबंधन को मिलेगा। चूंकि यह सैटेलाइट पृथ्वी की घूर्णन गति के साथ तालमेल बैठाकर एक ही जगह पर स्थिर रहकर निगरानी करेगा, इसलिए यह भारत की सीमाओं पर होने वाली हर संदेहास्पद हलचल, चक्रवातों के आने की पूर्व आहट, अचानक आने वाली बाढ़ और जंगलों की आग जैसी प्राकृतिक आपदाओं की रीयल-टाइम (तत्काल) तस्वीरें और डेटा उपलब्ध कराएगा। इससे देश के रक्षा बलों को सटीक सामरिक बढ़त मिलेगी और आपदाओं के समय समय रहते लाखों नागरिकों की जान-माल की रक्षा की जा सकेगी।

इसरो की एक और शानदार उपलब्धि पर देश को गर्व – पीएम मोदी
इस पहले एडवांस्ड इमेजिंग सैटेलाइट की सफलता पर प्रधानमंत्री मोदी ने वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए इसे नए भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा प्रतीक बताया है। नरेंद्र मोदी ने ‘एक्स’ पर पोस्ट कर लिखा, ‘इसरो की एक और शानदार उपलब्धि और हमारे देश के लिए गर्व का पल। भारत के पहले इमेजिंग सैटेलाइट ईओएस-05 को जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में ले जाने वाले जीएसएलवी-एफ17 का सफल लॉन्च, भारत के स्पेस सेक्टर की उत्कृष्टता, इनोवेशन और बढ़ती क्षमताओं को दर्शाता है। इसरो और भारतीय इंडस्ट्री के बीच बढ़ती साझेदारी हमारे स्पेस प्रोग्राम को नई ताकत और विस्तार दे रही है, साथ ही पूरे स्पेस इकोसिस्टम में भारत की क्षमताओं को बढ़ा रही है।’

जानिए, GSLV को क्यों कहा जाता है इसरो का ‘नॉटी बॉय’?
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के GSLV (जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल) रॉकेट को इसके अनिश्चित और उतार-चढ़ाव भरे ट्रैक रिकॉर्ड के कारण ‘नॉटी बॉय’ का उपनाम मिला है। इसरो के अन्य रॉकेटों जैसे PSLV (जो 60 में से केवल दो बार असफल रहा) और LVM3 (जिसका रिकॉर्ड शत-प्रतिशत सफल रहा है) की तुलना में GSLV का फेलियर रेट अधिक रहा है। यह रॉकेट अपने अब तक के 19 मिशनों में से 6 बार पूरी तरह या आंशिक रूप से नाकाम साबित हुआ है। इसके शरारती व्यवहार के पीछे मुख्य कारण इसके तीसरे चरण में इस्तेमाल होने वाला क्रायोजेनिक इंजन है। इसकी जटिल तकनीक के कारण यह रॉकेट कई बार ऐन वक्त पर रास्ता भटक गया या मिशन को पूरा नहीं कर सका। अब GSLV-F17 की ताजा कामयाबी ने इसके माथे से इस दाग को धोकर इसे बेहद भरोसेमंद साबित कर दिया है।

दो बड़ी नाकामियां: जब GSLV ने बढ़ाई इसरो की धड़कनें
GSLV के इतिहास की हालिया दो सबसे बड़ी नाकामियां साल 2021 और 2010 में देखी गईं, जिसने हमारे मेधावी वैज्ञानिकों को भी गहरे मंथन में डाल दिया था।
1. अगस्त 2021 (GSLV-F10 / EOS-03 मिशन): इस मिशन के तहत भारत बेहद महत्वपूर्ण अर्थ इमेजिंग सैटेलाइट GISAT-1 (EOS-03) को लॉन्च कर रहा था। उड़ान के पहले और दूसरे चरण सामान्य रहे, लेकिन तीसरे चरण में क्रायोजेनिक अपर स्टेज का इंजन तकनीकी खराबी (हाइड्रोजन टैंक में दबाव की कमी) के कारण समय पर स्टार्ट नहीं हो सका। करोड़ों का सैटेलाइट अंतरिक्ष में खो गया। आज लॉन्च हुआ EOS-05 असल में इसी अधूरे मिशन की पूरी भरपाई है।
2. अप्रैल 2010 (GSLV-D3 मिशन): यह भारत के लिए बेहद संवेदनशील मिशन था। इसमें इसरो पहली बार पूरी तरह स्वदेशी तौर पर विकसित क्रायोजेनिक अपर स्टेज का परीक्षण कर रहा था। लेकिन उड़ान भरने के मात्र 5 मिनट बाद ही इसका फ्यूल बूस्टर पंप फेल हो गया, जिससे रॉकेट नियंत्रण से बाहर हो गया और यह मिशन पूरी तरह विफल रहा।

चीन और पाकिस्तान पर नजर रखने में रणनीतिक महत्व
सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से EOS-05 सैटेलाइट का GSLV-F17 रॉकेट द्वारा सफल प्रक्षेपण भारत की रक्षा प्रणाली के लिए एक अद्वितीय घटना है। दरअसल, भारत के पास मौजूद अन्य अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट पृथ्वी की निचली कक्षा में होते हैं, जो घूमते हुए एक निश्चित समय पर ही किसी क्षेत्र के ऊपर से गुजरते हैं। लेकिन EOS-05 को Geosynchronous Orbit यानी करीब 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया गया है, जिसका मतलब है कि यह उपग्रह अंतरिक्ष में एक जगह स्थिर रहकर चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर 24 घंटे बिना पलक झपकाए लाइव नजर रख सकेगा। लद्दाख की दुर्गम चोटियों से लेकर हिंद महासागर और पाकिस्तान सीमा तक, दुश्मन की सेनाओं की हर छोटी से छोटी हलचल, बख्तरबंद गाड़ियों के मूवमेंट और किसी भी नापाक घुसपैठ की रीयल-टाइम तस्वीरें सीधे भारतीय कमांड सेंटर्स को मिलेंगी, जिससे भारत को युद्ध जैसी स्थितियों में अचूक सामरिक बढ़त हासिल होगी।

आइए, अब पीएम मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक की अभूतपूर्व वैज्ञानिक उपलब्धियों और उनके देश को फायदों पर एक नजर डालते हैं….

चंद्रयान-3: दक्षिणी ध्रुव पर पहली बार सिर्फ भारत पहुंचा
सफलता – साल 2023 में भारत ने वह कर दिखाया जो अमेरिका, रूस और चीन जैसी महाशक्तियां भी नहीं कर सकी थीं। इसरो के चंद्रयान-3 मिशन ने चंद्रमा के अत्यंत दुर्गम और अंधकारमय ‘दक्षिणी ध्रुव’ (South Pole) पर सफल ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ करके इतिहास रच दिया। वैश्विक स्तर पर तब अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया स्तब्ध रह गई थी, क्योंकि भारत चांद के इस हिस्से पर कदम रखने वाला दुनिया का पहला और इकलौता देश बन गया। इस मिशन ने दुनिया को दिखाया कि कैसे सीमित बजट और स्वदेशी तकनीक के दम पर नामुमकिन को भी मुमकिन बनाया जा सकता है।
फायदा – चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पानी के बर्फ के रूप में मौजूद विशाल भंडार और ‘सल्फर’ समेत अन्य बहुमूल्य खनिजों की मौजूदगी की पुष्टि इसरो के प्रज्ञान रोवर ने की है। यह डेटा भविष्य में मानव बस्तियां बसाने या चांद को एक स्पेस स्टेशन के रूप में इस्तेमाल करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

आदित्य-एल1: सूर्य की चौखट पर हमारी पहली वैज्ञानिक दस्तक
सफलता – पीएम मोदी की कार्यशैली के अनुरूप चंद्रमा पर फतह करने के बाद भी भारत रुका नहीं। इसके तुरंत बाद देश ने अपनी नजरें सौरमंडल के राजा सूर्य पर टिका दीं। वर्ष 2023 में ही भारत की पहली सौर वेधशाला Aditya-L1 को पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर लैग्रेंजियन प्वाइंट 1 पर सफलतापूर्वक स्थापित किया गया। वैश्विक अंतरिक्ष विज्ञान में इस मिशन को अत्यंत जटिल माना गया, क्योंकि सूर्य के तीव्र गुरुत्वाकर्षण और रेडिएशन के बीच एक निश्चित बिंदु पर सैटेलाइट को बनाए रखना बेहद कठिन था। इस मिशन की सफलता ने भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा कर दिया जो सौर तूफानों और अंतरिक्ष के मौसम का अध्ययन करने की क्षमता रखते हैं।
फायदा – सूर्य से निकलने वाले विनाशकारी सौर तूफान पृथ्वी के चारों ओर चक्कर काट रहे हमारे संचार उपग्रहों, मोबाइल नेटवर्क, जीपीएस और जमीन पर मौजूद पावर ग्रिड्स को पल भर में ठप कर सकते हैं। आदित्य-एल1 से मिलने वाला रीयल-टाइम डेटा भारत को इन सौर तूफानों की चेतावनी कई घंटे पहले दे देता है। इससे देश को अपने करोड़ों रुपये के पावर ग्रिड्स और संवेदनशील संचार उपग्रहों को ‘सेफ मोड’ में डालने का समय मिलेगा। इससे ब्लैकआउट की स्थिति से बचने में मदद मिलेगी।

स्पैडेक्स मिशन: अंतरिक्ष में दो सैटेलाइट्स को जोड़ने का करिश्मा
सफलता – अंतरिक्ष में भारत की तकनीकी श्रेष्ठता का एक और बड़ा मील का पत्थर तब स्थापित हुआ, जब इसरो ने ‘स्पैडेक्स’ (Space Docking Experiment) का सफल परीक्षण किया। इस मिशन के तहत अंतरिक्ष की असीम शून्यता में तैरते हुए दो उपग्रहों को अत्यंत सटीकता के साथ आपस में जोड़ा गया। अंतरिक्ष में Autonomous Docking और उनके बीच डेटा व ऊर्जा का ट्रांसफर किया गया। वैश्विक स्तर पर यह तकनीक इतनी जटिल है कि इस पर केवल दुनिया के 3-4 देशों का ही एकाधिकार था, लेकिन इसरो ने अपने स्वदेशी एल्गोरिदम और रोबोटिक कंट्रोल के दम पर इस क्लब में अपनी धमाकेदार एंट्री दर्ज कराई है।
फायदा – स्पैडेक्स तकनीक के कारण भारत अब अंतरिक्ष में ही अपने सैटेलाइट्स में दोबारा ईंधन भर सकेगा, जिससे उपग्रहों की उम्र कई साल बढ़ जाएगी और नए सैटेलाइट भेजने का सैकड़ों करोड़ का खर्च बचेगा। यह तकनीक भविष्य में अंतरिक्ष के मलबे को साफ करने और मानव मिशनों को धरती पर सुरक्षित लाने में रीढ़ की हड्डी साबित होगी।

नासा-इसरो निसार (NISAR): दो महाशक्तियों का संयुक्त रडार मिशन
सफलता – भारत की बढ़ती साख का ही परिणाम है कि दुनिया की सबसे अमीर अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने इसरो (ISRO) के साथ मिलकर पृथ्वी की निगरानी के लिए अब तक का सबसे महंगा और अत्याधुनिक रडार उपग्रह ‘निसार’ (NISAR) विकसित किया। ड्युअल-फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक अपर्चर रडार से लैस यह उपग्रह पूरी पृथ्वी की सतह के सूक्ष्म से सूक्ष्म बदलावों को भी स्कैन करने की क्षमता रखता है। वैश्विक स्तर पर इस मिशन को जलवायु परिवर्तन और भूवैज्ञानिक हलचलों को समझने के लिए सदी का सबसे महत्वपूर्ण मिशन माना जा रहा है, जिसमें भारत एक बराबर के हिस्सेदार के रूप में नेतृत्व कर रहा है।
फायदा – निसार सैटेलाइट से मिलने वाला डेटा कृषि प्रधान देश के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यह उपग्रह घने बादलों और रात के अंधेरे में भी जमीन के नीचे की नमी, फसलों के स्वास्थ्य, जंगलों के कटान और ग्लेशियरों के पिघलने की ऐसी सटीक मैपिंग करेगा। इससे मौसम वैज्ञानिकों को मानसून का सटीक पूर्वानुमान लगाना आसान होगा।

निजी स्पेस सेक्टर: स्काईरूट और पिक्सेल की ऐतिहासिक उड़ान
सफलता – प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल का सबसे क्रांतिकारी और नीतिगत फैसलों में से एक स्पेस सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए खोलना रहा। इसके बाद साल 2026 में ही भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ (Skyroot Aerospace) ने भारत का पहला निजी तौर पर विकसित रॉकेट ‘विक्रम-एस’ लॉन्च कर इतिहास रच दिया। जबकि ‘पिक्सेल’ (Pixxel) जैसी कंपनियों ने हाइपरस्पेक्ट्रल सैटेलाइट्स की दुनिया में वैश्विक पहचान बनाई। दुनिया ने देखा कि भारत में अब सिर्फ सरकारी स्तर पर ही नहीं, बल्कि प्राइवेट सेक्टर में भी एलन मस्क की ‘स्पेसएक्स’ जैसी कंपनियों को टक्कर देने वाले युवा उद्यमी तैयार हो चुके हैं।
फायदा – स्पेस सेक्टर में निजीकरण से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के क्षेत्र में स्टार्टअप्स की बाढ़ आ गई है। इससे न केवल भारत के हजारों मेधावी युवाओं को देश के भीतर ही उच्च स्तर के रोजगार मिल रहे हैं और ब्रेन ड्रेन रुका है, बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ के तहत रॉकेट और सैटेलाइट के पुर्जे भारत में ही बनने लगे हैं।

 

 

 

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