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फैक्ट चेक से डरीं सोनिया गांधी? पेंगुइन ने नकारी आत्मकथा, इतिहास बदलने की कोशिश नाकाम!

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कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी की आत्मकथा ‘बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ के प्रकाशन को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने इस किताब को भारत में प्रकाशित करने से साफ इनकार कर दिया है। पब्लिशर ने पांडुलिपि में जरूरी संपादकीय बदलाव, तथ्य जांच (फैक्ट चेक) और कुछ असत्यापित अंशों को हटाने का सुझाव दिया था, जिसे सोनिया गांधी ने मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद प्रकाशक ने अपने हाथ पीछे खींच लिए, जिसके चलते अब कांग्रेस पार्टी हताशा में वैश्विक प्रकाशन का हवाला देकर अपनी साख बचाने की जुगत में लगी है।

फैक्ट चेक से क्यों पीछे हटीं सोनिया गांधी?
प्रकाशक पेंगुइन इंडिया का साफ कहना है कि किसी भी प्रतिष्ठित पब्लिशर के लिए तथ्यों की जांच करना और जरूरी संपादकीय सुधार सुझाना एक सामान्य और जिम्मेदार प्रक्रिया है। लेकिन सोनिया गांधी ने इन बदलावों को मानने से इनकार कर दिया। इस रुख ने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आत्मकथा के जरिए ऐतिहासिक और राजनीतिक घटनाओं को एकतरफा नजरिए से थोपने की तैयारी थी? जब भारतीय कानूनों और ऐतिहासिक कसौटियों पर दावों को परखा गया, तो सोनिया गांधी सुधार के लिए तैयार क्यों नहीं हुईं?

गांधी परिवार की कहानी पर पब्लिशर की असहमति
यह किताब इटली से भारत आने, राजीव गांधी से विवाह और सत्ता के गलियारों में बिताए गए दशकों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। नेहरू-गांधी परिवार से जुड़े कई राजनीतिक घटनाक्रमों और इंदिरा गांधी, संजय गांधी व राजीव गांधी की मौतों से जुड़ी त्रासदियों को इसमें शामिल किया गया है। लेकिन पेंगुइन इंडिया द्वारा भारत में इसे न छापने का फैसला यह साबित करता है कि घरेलू स्तर पर कानूनी और ऐतिहासिक तथ्यों के मामले में किताब के दावे कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे थे। बिना बदलाव किए केवल एकतरफा नैरेटिव थोपने की कोशिश को बड़ा झटका लगा है।

कानूनी मुकदमों और मानहानि के डर से पब्लिशर की दूरी
भारत में मानहानि और संवेदनशील राजनीतिक दावों को लेकर सख्त कानूनी प्रावधान हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पेंगुइन इंडिया द्वारा संपादकीय कटौती की मांग इसी डर से की गई होगी ताकि किताब कानूनी विवादों में न फंसे। जब सोनिया गांधी ने आपत्तिजनक या अपुष्ट दावों को हटाने से मना कर दिया, तो प्रकाशक ने संभावित अदालती मुकदमों और विवादों से बचने के लिए खुद को इस प्रोजेक्ट से पूरी तरह अलग करना ही बेहतर समझा।

नरवणे की किताब पर संसद में ड्रामा, अपनी आत्मकथा पर बैकफुट पर कांग्रेस
इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस के दोहरे चरित्र को भी उजागर कर दिया है। कुछ समय पहले जब पेंगुइन ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम एम नरवणे की किताब को नहीं छापा था, तब राहुल गांधी संसद में उसकी अनधिकृत हार्ड कॉपी लहराकर खूब राजनीति कर रहे थे। आज जब उसी पब्लिशर ने सोनिया गांधी की किताब में तथ्यात्मक और संपादकीय सुधार मांगे तो कांग्रेस भड़क उठी और पब्लिशर की प्रक्रिया पर ही सवाल उठाने लगी। जब मामला खुद के परिवार का आया तो कांग्रेस का यह दोहरा रवैया पूरी तरह बेनकाब हो गया है।

पीएम मोदी से मुलाकातों और नीतियों पर तथ्य जांच से इनकार
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी की आत्मकथा ‘बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ के प्रकाशन पर लगे ब्रेक की एक बड़ी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े संदर्भ बताए जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, पांडुलिपि में प्रधानमंत्री मोदी के साथ हुई मुलाकातों, उनकी कार्यशैली और केंद्र सरकार की नीतियों पर राजनीतिक हमले किए गए थे। पेंगुइन इंडिया इन बयानों और दावों की सत्यता को लेकर जरूरी तथ्यात्मक प्रमाण और संपादन चाहता था। लेकिन सोनिया गांधी ने किसी भी बदलाव से साफ मना कर दिया। बिना पुख्ता आधार के देश के शीर्ष नेतृत्व पर किए गए दावों की जवाबदेही से बचने के कारण प्रकाशक ने घरेलू प्रकाशन से अपने हाथ खींच लिए।

संघ पर बेबुनियाद आरोपों और पुराने नैरेटिव को पब्लिशर की ना
आत्मकथा में दूसरा बड़ा विवाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की भूमिका और देश के सामाजिक ताने-बाने पर उसके प्रभाव को लेकर किए गए दावों पर खड़ा हुआ। किताब में संघ पर कांग्रेस के पुराने और अप्रमाणित आरोपों को दोहराने की कोशिश की गई थी। कानूनी और ऐतिहासिक कसौटियों पर परखे जाने के दौरान प्रकाशक ने इन संवेदनशील और अपुष्ट टिप्पणियों में संशोधन या जरूरी कटौती की मांग की। सोनिया गांधी के इस पर अड़ जाने से यह साफ हो गया कि वह ऐतिहासिक निष्पक्षता के बजाय केवल राजनीतिक दुर्भावना से भरा एजेंडा आगे बढ़ाना चाहती थीं, जिसे जिम्मेदार प्रकाशक ने छापने से इनकार कर दिया।

यूपीए काल की ‘सुपर पीएम’ छवि पर पर्दा डालने की कोशिश?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस आत्मकथा का मुख्य मकसद 2004 से 2014 के बीच के यूपीए शासनकाल में सोनिया गांधी की कथित ‘सुपर पीएम’ वाली भूमिका को एक नया भावनात्मक रंग देना हो सकता है। पर्दे के पीछे से सरकार चलाने और बिना किसी जवाबदेही के असीमित अधिकारों के इस्तेमाल पर विपक्ष हमेशा से सवाल उठाता रहा है। आशंका जताई जा रही है कि किताब में इन दस वर्षों के घोटालों और नीतिगत पंगुता (पॉलिसी पैरालिसिस) से जुड़े कड़वे सच को दरकिनार कर केवल एकतरफा सहानुभूति बटोरने की पटकथा तैयार की गई थी, जिस पर पब्लिशर के संपादन ने ब्रेक लगा दिया।

कड़वे सच पर खामोशी: क्या इन असहज सवालों का जवाब दे पाएंगी सोनिया गांधी?
राजनीतिक हलकों में यह सवाल भी तेजी से उठ रहा है कि क्या सोनिया गांधी अपनी इस आत्मकथा में उन असहज और कड़वे पन्नों को छूने की हिम्मत जुटा पाएंगी, जिन पर गांधी परिवार हमेशा से पर्दा डालता रहा है? क्या वह राजीव गांधी से मिलने से पहले अपने पारिवारिक पृष्ठभूमि और शुरुआती कामकाज के सच को सामने रखेंगी? क्या इसमें पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी के साथ हुए कथित अपमानजनक दुर्व्यवहार की सच्चाई दर्ज होगी? यही नहीं, 2004 में प्रधानमंत्री न बन पाने की असली वजहों, मेनका गांधी को परिवार से बाहर का रास्ता दिखाए जाने के पारिवारिक विवादों और वर्षों की कोशिशों के बाद भी राहुल गांधी को सत्ता के शीर्ष तक न पहुंचा पाने की राजनीतिक व्यथा का क्या कोई निष्पक्ष जिक्र होगा? आलोचकों का साफ कहना है कि तथ्य जांच से बचने की असली वजह यही है कि आत्मकथा में इन असहज सच्चाइयों को स्वीकार करने के बजाय केवल चुनिंदा और सुविधाजनक इतिहास परोसने की तैयारी थी। 

2004 के ‘त्याग’ वाले नैरेटिव पर पर्दा और असल वजहों को छिपाने की कोशिश
किताब में 2004 में प्रधानमंत्री पद ठुकराने के फैसले को एक बड़े ‘त्याग’ और ‘अंतरात्मा की आवाज’ के तौर पर पेश किए जाने का दावा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उस समय विदेशी मूल के मुद्दे और संवैधानिक पेचीदगियों के कारण बने वास्तविक राजनीतिक दबाव को आत्मकथा में नजरअंदाज करने की कोशिश की गई है। पब्लिशर संभवतः इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के सभी पक्षों और निष्पक्ष तथ्यों का संतुलन चाहता था, लेकिन सोनिया गांधी केवल अपने गढ़े हुए त्याग वाले नैरेटिव पर अड़ी रहीं।

पूर्व किताबों बनाम इस आत्मकथा का विरोधाभास: निजी जवाबदेही से असहजता
सोनिया गांधी ने इससे पहले भी राजीव गांधी और इंदिरा गांधी पर किताबें लिखी और संपादित की हैं, लेकिन तब कभी इस तरह का कोई विवाद खड़ा नहीं हुआ। उस समय केवल पारिवारिक यादों और चुनिंदा संस्मरणों को पेश किया गया था। लेकिन इस बार जैसे ही उन्होंने अपने खुद के सक्रिय राजनीतिक जीवन, नीतिगत फैसलों और सत्ता के दौर पर लिखना शुरू किया, तथ्यों की जांच होते ही बड़ा विवाद खड़ा हो गया। यह विरोधाभास साफ दिखाता है कि जब अपने खुद के फैसलों और राजनीतिक भूमिका की वास्तविक जवाबदेही की बात आई, तो गांधी परिवार के लिए निष्पक्ष जांच का सामना करना असहज हो गया।

परिवारवाद और राहुल गांधी की री-ब्रांडिंग का विफल प्रयास
आत्मकथा के समय (टाइमिंग) पर भी सवाल उठ रहे हैं। कई जानकारों का मानना है कि इस किताब के जरिए गांधी परिवार के त्याग और संघर्ष की भावनात्मक कहानी को दोबारा स्थापित करने की कोशिश थी, ताकि राहुल गांधी के नेतृत्व को एक बार फिर से नई मजबूती और पारिवारिक विरासत का सहारा मिल सके। लेकिन पब्लिशर के इनकार ने इस सोची-समझी पीआर और री-ब्रांडिंग की मुहिम को रिलीज से पहले ही बड़ा झटका दे दिया है।

‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का राग अलापने वाली कांग्रेस का दोहरा मापदंड
कांग्रेस पार्टी अक्सर देश में असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा होने का झूठा नैरेटिव बनाती रही है। लेकिन आज जब एक वैश्विक और स्वतंत्र प्रकाशक (पेंगुइन इंडिया) ने संपादकीय स्वतंत्रता का इस्तेमाल करते हुए किताब में तथ्यात्मक सुधार और संतुलन की बात कही, तो कांग्रेस ने पब्लिशर की स्वतंत्रता पर ही सवाल खड़े कर दिए। यह रुख दिखाता है कि कांग्रेस के लिए अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब केवल उनकी मनमर्जी और एकतरफा प्रचार होना है।

सोनिया गांधी की चुप्पी पर उठे सवाल, एजेंट भी साधे रहे मौन
इस पूरे विवाद पर जहां पेंगुइन इंडिया ने पेशेवर रुख अपनाते हुए तथ्य जांच को अपनी प्राथमिकता बताया, वहीं सोनिया गांधी और उनके विदेशी एजेंट डेविड गॉडविन ने सवालों पर साधी चुप्पी से संदेह को और गहरा कर दिया है। न तो नॉफ पब्लिकेशन और न ही सोनिया गांधी की टीम यह स्पष्ट कर पाई कि पांडुलिपि के किन हिस्सों पर पब्लिशर को आपत्ति थी। क्या वे अंश राष्ट्रीय सुरक्षा, पूर्व सरकारों के गोपनीय फैसलों या परिवार के राजनीतिक इतिहास से जुड़े थे? यह खामोशी साबित करती है कि पार्टी के पास पेशेवर सवालों का कोई ठोस जवाब नहीं है।

विदेशी धरती से भारत में एजेंडा सेट करने का पुराना पैटर्न
कांग्रेस पार्टी का यह तर्क कि अमेरिका में अल्फ्रेड ए नॉफ इसे छाप रहा है तो भारत में समस्या क्यों है, खुद उनकी मंशा को उजागर करता है। आलोचकों का कहना है कि विदेशी पब्लिशिंग का सहारा लेकर भारत के भीतर अपना अनुकूल नैरेटिव थोपना कांग्रेस की पुरानी रणनीति रही है। भारत के सख्त कानूनी और ऐतिहासिक मानकों से बचने के लिए विदेशी प्रकाशक का कवच इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन जब घरेलू प्रकाशक ने जवाबदेही की मांग की, तो कांग्रेस तिलमिला गई।

1 लाख कॉपियों का अंतरराष्ट्रीय पीआर और जमीनी हकीकत
अमेरिका की नॉफ पब्लिकेशन द्वारा 1 लाख प्रतियों की पहली प्रिंटिंग का भारी प्रचार किया जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि यह केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक भव्य माहौल बनाने की रणनीति है। असल सवाल यह है कि जब किताब के मुख्य पात्र और घटनाएं भारत से जुड़ी हैं, तो भारतीय पाठकों के सामने आने से पहले तथ्यों की कसौटी पर खरी क्यों नहीं उतरी? विदेशों में किताब बेचकर भारतीय मतदाताओं के बीच साख वापस पाने की यह कोशिश नाकाम साबित हो रही है।

घरेलू जवाबदेही से बचने के लिए विदेशी पब्लिशिंग हाउस का सहारा
किताब के मुख्य विषय, घटनाएं और प्रभाव पूरी तरह से भारतीय राजनीति और इतिहास से जुड़े हैं। इसके बावजूद भारतीय कानूनों, ऐतिहासिक साक्ष्यों और घरेलू पब्लिशर की जांच से बचकर सीधे अमेरिका की एजेंसी के जरिए दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। देश के नागरिकों को यह जानने का पूरा हक है कि भारत की जनता पर राज करने वाले परिवार की आत्मकथा को घरेलू पब्लिशर की कसौटियों पर खरी उतरने से क्यों रोका गया।

इतिहास को दोबारा लिखने का कांग्रेस का प्रयास विफल
आजादी के बाद से ही नेहरू-गांधी परिवार के इर्द-गिर्द भारतीय इतिहास को सीमित रखने का आरोप कांग्रेस पर लगता रहा है। इस किताब के जरिए भी इटली से लेकर भारत के सत्ता शीर्ष तक के सफर को एक पारिवारिक गाथा के रूप में पेश करने की तैयारी थी, जिसमें ऐतिहासिक भूलों पर लीपापोती की गई हो। पेंगुइन इंडिया द्वारा भारत में इसे छापने से इनकार करना इस बात का सबूत है कि अब बिना तथ्य और ऐतिहासिक प्रमाण के गढ़े गए राजनीतिक आख्यानों को देश में आसानी से स्वीकार नहीं किया जाएगा।

नए प्रकाशक की तलाश में कांग्रेस, हार्पर कॉलिन्स पर नजर
पेंगुइन इंडिया के पल्ला झाड़ने के बाद अब कांग्रेस पार्टी इस विवाद पर पर्दा डालने में जुट गई है। अमेरिका में अल्फ्रेड ए नॉफ द्वारा इसे प्रकाशित किए जाने का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, लेकिन भारत में वितरण के लिए अब आनन-फानन में हार्पर कॉलिन्स इंडिया जैसे दूसरे प्रकाशकों के साथ बात आगे बढ़ाई जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तथ्य जांच के अभाव में आने वाली किसी भी किताब से राजनीतिक और ऐतिहासिक बहसों में कांग्रेस के पुराने नैरेटिव की कलई खुल सकती है।

सच की कसौटी से भागकर नहीं गढ़े जा सकते इतिहास के नए पन्ने
पेंगुइन इंडिया द्वारा सोनिया गांधी की आत्मकथा से हाथ खींचने का यह फैसला केवल एक पब्लिशिंग विवाद नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के उस दौर का आईना है जहां अब केवल राजनीतिक रसूख के दम पर एकतरफा नैरेटिव नहीं थोपा जा सकता। ऐतिहासिक तथ्यों की पड़ताल, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मामलों की जवाबदेही और अतीत की कड़वी सच्चाइयों से मुंह मोड़कर कोई भी राजनीतिक दल अपनी साख दोबारा हासिल नहीं कर सकता। विदेशी पब्लिशर का सहारा लेकर या किसी अन्य प्रकाशक के जरिए किताब को बाजार में उतारने की कोशिश भले ही कर ली जाए, लेकिन तथ्य जांच से पीछे हटने की इस घटना ने जनता के सामने यह साफ कर दिया है कि जब सच की कसौटी पर कसने की बारी आई, तो गांधी परिवार के पास ठोस जवाबों की जगह केवल खामोशी और असहजता ही बची।

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