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2026 के आधुनिक भारत की 1303 के चित्तौड़ से बेतुकी तुलना: स्वरा भास्कर के एजेंडे पर भड़का युवा भारत

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हिंदू समाज से जौहर और सती प्रथा जैसी कुरीतियां लगभग 200 वर्ष पूर्व ही समाप्त हो चुकी हैं। इसके बावजूद वर्तमान समय में ऐसे अप्रासंगिक ऐतिहासिक विषयों को विवाद का रूप देकर उठाना एक सुनियोजित राजनीतिक नैरेटिव की ओर संकेत करता है। रानी पद्मावती और चित्तौड़ की हजारों वीरांगनाओं के सर्वोच्च बलिदान को आज के आधुनिक चश्मे से देखकर उसे ‘कायरता’ या केवल ‘शारीरिक शुद्धता’ से जोड़ना न केवल इतिहास की विकृति है, बल्कि सनातन संस्कृति पर सीधा आघात है। दरअसल लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर इस प्रकार के मुद्दों के जरिए समाज को बांटने और राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास कर रहा है। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकास और राष्ट्रवाद के सुदृढ़ विमर्श के सामने ऐसे घिसे-पिटे विभाजनकारी नैरेटिव पूरी तरह निष्प्रभावी साबित होकर ध्वस्त हो रहे हैं।

आक्रांताओं की अमानवीय क्रूरता के आगे स्वाभिमान का सर्वोच्च संकल्प
मध्यकालीन दौर में कोई आधुनिक न्याय प्रणाली, पुलिस, अदालत या मानवाधिकार आयोग नहीं था जो आक्रांताओं के हमलों के समय महिलाओं और बच्चों की रक्षा कर सके। उस बर्बर कालखंड में बंदी बनाई जाने वाली स्त्रियों को बाजार में बेचे जाने और जीवन भर अमानवीय क्रूरता का सामना करने का संकट रहता था। ऐसी भयावह परिस्थितियों में दासता और हरम की क्रूरता स्वीकार करने के बजाय देह त्याग का निर्णय लेना कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि अपने आत्मसम्मान और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का चरम संकल्प था। आधुनिक युग के वातानुकूलित कमरों में बैठकर सदियों पुरानी युद्धकालीन विवशताओं और बलिदानों को ‘कायरता’ करार देना केवल ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ना-मरोड़ना है।

2026 के भारत की 1303 के चित्तौड़ से बेतुकी तुलना: विपक्ष की समझ पर करारा वार
ऐतिहासिक बलिदानों को विकृत करने की इस वामपंथी कोशिश पर भाजपा नेता शहजाद पूनावाला ने सीधा प्रहार करते हुए इसे विपक्ष की समझ का दिवालियापन करार दिया। आज के एक लोकतांत्रिक और संवैधानिक राष्ट्र की तुलना 1303 के घिरे हुए चित्तौड़ से करना केवल राहुल गांधी और उनके समर्थक इकोसिस्टम की सतही समझ का परिचायक है। आज महिलाओं के पास संविधान, पुलिस और अदालतों की व्यवस्था है, जबकि उस मध्ययुगीन दौर में अलाउद्दीन खिलजी जैसे दरिंदे ने एक ही दिन में 30,000 हिंदुओं को सूखी घास की तरह काट डाला था। ऐसी भयावह स्थिति में 800 से अधिक राजपूत वीरांगनाओं के सामने बंदी बनाए जाने, दासी बनने और आजीवन अमानवीय अत्याचार सहने के खतरे के अलावा कोई विकल्प नहीं था। आधुनिक दौर के विशेषाधिकारों में बैठकर उस ऐतिहासिक पीड़ा और विवशता को आज के संदर्भ में तौलना न केवल अज्ञानता की पराकाष्ठा है, बल्कि वीरांगनाओं के अदम्य साहस का जानबूझकर किया गया घोर अपमान है।

चौतरफा घिरने पर अनुवाद का बहाना: बैकफुट पर आते ही सफाई का नया पैंतरा
अभिनय की दुनिया से लंबे समय तक दूर रहने के बाद अचानक ऐतिहासिक मुद्दों पर विवादास्पद बयान देकर चर्चा बटोरने की कोशिश जब उल्टी पड़ गई, तो बचाव में लीपापोती का दौर भी शुरू हो गया। 31 अगस्त को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान 2018 की फिल्म ‘पद्मावत’ के जौहर दृश्य पर की गई अमर्यादित टिप्पणी पर जब राष्ट्रव्यापी आक्रोश भड़का, तो अभिनेत्री ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर खुद को निर्दोष बताने का प्रयास किया। अभिनेत्री का दावा है कि उनके बयान का गलत अनुवाद किया गया और उन्होंने वीरांगनाओं को सीधे तौर पर ‘कायर’ नहीं कहा था, बल्कि फिल्म देखते समय अपने व्यक्तिगत विचारों को साझा किया था। किंतु जागरूक समाज इसे अपनी चूक छिपाने और बैकफुट पर आने के बाद गढ़ी गई एक सोची-समझी दलील मान रहा है।

अभिव्यक्ति की आड़ में सनातनी इतिहास को लांछित करने का एजेंडा
अपने स्पष्टीकरण में अभिनेत्री यह कहती नजर आईं कि फिल्म का दृश्य देखते समय उन्हें ऐसा आभास हुआ कि यदि कोई अपराध पीड़िता आत्महत्या नहीं करती तो क्या वह कायर कहलाएगी। किंतु सवाल यह उठता है कि वर्तमान समय में अपराध पीड़िताओं के जीवन के अधिकार और पुनर्वास के संवेदनशील विषय को सदियों पुराने युद्धकालीन जौहर से जोड़कर भ्रम पैदा करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी? जब फिल्म रिलीज हुए कई वर्ष बीत चुके हैं और हिंदू समाज शताब्दियों पहले ऐसी प्रथाओं से आगे निकल चुका है, तब जबरन इस विमर्श को खींचना यह सिद्ध करता है कि मकसद अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास की महान वीरांगनाओं के त्याग को कमतर आंकना और सस्ती लोकप्रियता के लिए विवाद को जिंदा रखना था।

चुनावी मंच से मजहबी कार्ड: वोट बैंक के लिए सीधे जनभावनाओं को भड़काया
सोशल मीडिया पर आलोचक स्वरा भास्कर के राजनीतिक रुख और बयानों की निष्पक्षता पर लगातार गंभीर सवाल उठा रहे हैं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान अपने पति के समर्थन में आयोजित एक जनसभा में उन्होंने सीधे तौर पर मजहबी कार्ड खेलते हुए भीड़ को उकसाने वाले मुद्दों को चुनावी केंद्र में ला खड़ा किया था। मंच से भाषण देते हुए उन्होंने कहा था कि पैगंबर के सम्मान के लिए किसी विशेष जाति में पैदा होना जरूरी नहीं है, और ‘नबी की शान में गुस्ताखी’ जैसे संवेदनशील विषयों को उठाकर पूछा था कि ऐसे मामलों पर लोगों का ईमान कहां चला जाता है। एक तरफ जहां सनातन धर्म की ऐतिहासिक परंपराओं, त्याग और वीरांगनाओं के शौर्य पर प्रगतिशीलता का चोला ओढ़कर कटाक्ष किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ चुनावी रैलियों में वोट बैंक को साधने और लोगों को भड़काने के लिए खुलेआम धार्मिक कट्टरता से जुड़े संवेदनशील नैरेटिव का सहारा लिया जाता है। यह रुख तथाकथित लिबरल खेमे के दोहरे चरित्र को पूरी तरह उजागर करता है।

हरम की घिनौनी दासता ठुकराकर चुना गरिमायुक्त आत्मबलिदान
जीवन जीने और गरिमायुक्त जीवन जीने के बीच एक गहरा अंतर होता है। मध्यकालीन युद्धों के दौरान जब पराजय तय दिखती थी, तब स्त्रियों के सामने केवल दो ही रास्ते बचते थे—या तो वे आक्रांताओं के हरम में जाकर दास बनकर घुट-घुट कर जिएं, या फिर अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दे दें। आज के समय में किसी अपराध पीड़िता को न्याय, गरिमा और पुनर्वास का पूर्ण अधिकार है, किंतु सात सौ वर्ष पूर्व युद्ध हारने के बाद दासता से बचने के उस अंतिम ऐतिहासिक निर्णय को वर्तमान अपराधों से जोड़ना पूरी तरह अनुचित है। जब तक उस दौर की अमानवीय हिंसा और आक्रांताओं के अत्याचारों पर बात नहीं होगी, तब तक केवल बलिदान देने वाली नारियों के निर्णय पर सवाल उठाना एकतरफा और पूर्वाग्रह से ग्रसित सोच को दर्शाता है।

वीरांगनाओं के आत्मनिर्णय पर सवाल उठाकर तार-तार हुआ ‘माय चॉइस’ का ढोंग
तथाकथित आधुनिक फेमिनिज्म का सबसे बड़ा नारा रहा है कि स्त्री के शरीर और उसके निर्णयों पर केवल उसी का संप्रभु अधिकार है। किंतु जब चित्तौड़ की वीरांगनाओं द्वारा आक्रांताओं की क्रूर दासता स्वीकार न करते हुए अपनी मर्जी से देह त्याग करने का प्रसंग आता है, तो यही लिबरल वर्ग उस निर्णय को ‘कायरता’ कहकर नकारने लगता है। यदि किसी महिला का अपनी गरिमा के लिए स्वयं निर्णय लेना उसकी सर्वोच्च एजेंसी है, तो फिर इन वीरांगनाओं के आत्मनिर्णय का उपहास क्यों उड़ाया जा रहा है? यह दोहरापन साबित करता है कि आधुनिक फेमिनिज्म का यह वर्ग केवल सनातन विरोध और सिलेक्टिव नैरेटिव गढ़ने के लिए अपने ही तय किए गए सिद्धांतों की धज्जियां उड़ाने से नहीं हिचकता।

केसरिया बाना और अग्नि समाधि: योद्धा संस्कृति के संयुक्त महासंकल्प पर चोट
इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाले अक्सर जौहर को एक एकाकी घटना के रूप में दिखाने की भूल करते हैं, जबकि वास्तविकता में जौहर और साका एक ही सिक्के के दो पहलू थे। जब किले के बाहर विशाल आक्रांता सेना से अंतिम सांस तक लड़ने के लिए योद्धा केसरिया बाना पहनकर ‘साका’ करने रणभूमि में उतरते थे, तब महिलाएं पीछे से अग्नि समाधि लेकर ‘जौहर’ करती थीं। यह एक सुविचारित सामरिक संकल्प था ताकि रणभूमि में लड़ रहे योद्धाओं का ध्यान पीछे छूटे परिजनों की सुरक्षा से न भटके और वे बिना किसी समझौते के अंतिम दम तक शत्रु का संहार कर सकें। इस महान संयुक्त बलिदान को कायरता कहना भारतीय योद्धा संस्कृति और मातृशक्ति के पराक्रम का खुला अपमान है।

60 रानियों ने अपने हाथों काटे शीश: डीग का वो जौहर जो इतिहास में अमर हुआ
भारत का इतिहास केवल चित्तौड़ तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वाभिमान की रक्षा के लिए दिया गया देश का अंतिम जौहर भरतपुर के जाट साम्राज्य की अमिट वीरता का साक्षी है। 30 अप्रैल 1776 को डीग के महल में घटी यह ऐतिहासिक घटना मातृशक्ति के सर्वोच्च पराक्रम को दर्शाती है। दिल्ली के वजीर नजफ खां की सेना द्वारा सात महीने तक डीग किले की घेराबंदी के बाद जब विपरीत परिस्थितियां बनीं, तब जाट साम्राज्य की 60 रानियों और दासियों ने मुग़ल आक्रांताओं के समक्ष घुटने टेकने या उनकी दासता स्वीकार करने के बजाय अपने हाथों से अपने शीश काटकर स्वाभिमान की वेदी पर न्योछावर कर दिए। महाराजा सूरजमल की वीर परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इन वीरांगनाओं ने यह सिद्ध किया कि भारतीय नारी के लिए आत्मसम्मान और सांस्कृतिक मर्यादा से बढ़कर कुछ भी नहीं था। ऐसे अद्वितीय और रोंगटे खड़े कर देने वाले बलिदान को आज के आधुनिक चश्मे से कायरता कहना समूचे राष्ट्र के गौरवशाली इतिहास और मातृशक्ति के पराक्रम पर सीधा प्रहार है।

क्या भगत सिंह की शहादत भी कायरता थी? प्राण से ऊपर स्वाभिमान का राष्ट्रधर्म
यदि प्राण बचाना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य होता, तो सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को गले न लगाया होता। क्या सीमाओं पर मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले भारतीय सेना के वीर जवान अपने जीवन को सबसे ऊपर रखते हैं? जिस प्रकार देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान राष्ट्रभक्ति का शिखर माना जाता है, ठीक उसी प्रकार बर्बर विदेशी आक्रांताओं के सामने घुटने न टेकते हुए अपने धर्म, कुल और अस्मिता की रक्षा के लिए देह को समर्पित कर देना अदम्य वीरता का प्रमाण है। इसे केवल शारीरिक स्तर पर तौलने वाली सोच कभी शहादत और बलिदान के मर्म को नहीं समझ सकती।

खिलजी के खूनी पंजों पर पर्दा डालकर पीड़ितों को ही कठघरे में खड़ा करने की साजिश
इस पूरे विवाद में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि विमर्श की सुई आक्रांताओं की बर्बरता से हटाकर पीड़ितों के निर्णय पर केंद्रित कर दी गई है। अलाउद्दीन खिलजी जैसे मध्यकालीन हमलावरों की युद्ध संस्कृति, लूट और महिलाओं को युद्ध सामग्री की तरह इस्तेमाल करने के क्रूर इतिहास पर एक शब्द नहीं बोला जाता। इसके विपरीत, अपनी अस्मिता बचाने के लिए प्राण न्योछावर करने वाली वीरांगनाओं के चरित्र और साहस पर उंगलियां उठाई जा रही हैं। यह आक्रांताओं के इतिहास को सफेद करने और उल्टे पीड़ितों को ही दोषी ठहराने की पुरानी वामपंथी रणनीति का हिस्सा है, जिसे आज का प्रबुद्ध समाज पूरी तरह समझ चुका है।

राजपूत और हिंदू अस्मिता पर हमला कर जातिगत खाई चौड़ी करने का चुनावी दांव
संसद से लेकर सड़क तक सनातन और भारतीय गौरव के प्रतीकों को निशाना बनाना विपक्ष के सोचे-समझे चुनावी खेल का हिस्सा है। मेवाड़ और राजस्थान के शौर्य को विवादित बनाकर बहुसंख्यक समाज के भीतर जातिगत आधार पर दरार डालने का प्रयास किया जा रहा है। आगामी विधानसभा चुनावों में विकास के मुद्दों पर भाजपा से सीधे मुकाबला करने में असमर्थ विपक्ष इस प्रकार के ऐतिहासिक और भावनात्मक मामलों को हवा देकर समाज को जातियों में उलझाने की फिराक में है। हालांकि, देश की जनता यह देख रही है कि कैसे एक तरफ तुष्टीकरण की राजनीति की जा रही है और दूसरी तरफ राष्ट्र की एकता को खंडित करने का प्रयास हो रहा है।

मोदी के ‘पंच प्रण’ ने तोड़ी औपनिवेशिक मानसिकता, दरबारी विमर्श हुआ बेअसर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को औपनिवेशिक व विदेशी दासता की मानसिकता से मुक्ति पाने और अपनी गौरवशाली विरासत पर गर्व करने का ‘पंच प्रण’ दिया है। केंद्र सरकार जहां इतिहास के उन विस्मृत नायकों और वीरांगनाओं को मुख्यधारा में लाकर उनका सम्मान कर रही है जिन्होंने मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया, वहीं दूसरी ओर एक विशेष वर्ग आज भी उसी पुरानी दरबारी मानसिकता में जकड़ा हुआ है। यह वर्ग भारतीय इतिहास के त्याग और बलिदान को तुच्छ साबित करने के लिए विदेशी चश्मे का इस्तेमाल कर रहा है, जिसे ‘पंच प्रण’ के पथ पर अग्रसर नया भारत सिरे से खारिज कर रहा है।

सनातन पर आक्रामक और कुरीतियों पर खामोश: लिबरल बिरादरी का दोगलापन
हिंदू समाज ने सदियों पहले सामाजिक बुराइयों का त्याग कर व्यापक सुधारों को आत्मसात किया, लेकिन आज भी एक विशेष विचारधारा केवल सनातन परंपराओं और ऐतिहासिक घटनाओं को ही कठघरे में खड़ा करने का काम करती है। दूसरी ओर, अन्य समुदायों में आज भी जारी कुप्रथाओं पर तथाकथित प्रगतिशील पूरी तरह मौन साध लेते हैं। यह दोहरा मापदंड स्पष्ट करता है कि उद्देश्य नारी सम्मान नहीं, बल्कि बहुसंख्यक समाज की आस्था और गौरवशाली इतिहास को लांछित करना है। भारतीय समाज की सहिष्णुता और लोकतांत्रिक मूल्यों का ही यह परिणाम है कि संवेदनशील और पूज्य प्रतीकों पर अनर्गल बयानबाजी करने वाले लोग बिना किसी जवाबदेही के समाज में सक्रिय बने रहते हैं।

वीरांगनाओं के अपमान पर कांग्रेस की चुप्पी: वोट बैंक के आगे इतिहास की बलि
चित्तौड़ की वीरांगनाओं का जौहर कोई कमजोरी नहीं, बल्कि युद्ध और क्रूर कैद के भय के बीच अपनी गरिमा और संप्रभुता की रक्षा का एक असाधारण निर्णय था। ऐसे बलिदानों को राजनीतिक एजेंडे के तहत विकृत करने के प्रयासों पर विपक्षी दलों का रुख भी सवालों के घेरे में है। नारी सम्मान की बड़ी-बड़ी बातें करने वाली पार्टियां, विशेषकर कांग्रेस, अपने समर्थक विचारकों और कलाकारों द्वारा ऐतिहासिक वीरांगनाओं का उपहास उड़ाए जाने पर पूरी तरह चुप्पी साधे बैठी हैं। इस मौन से साफ जाहिर होता है कि तुष्टीकरण और चुनावी लाभ के लिए इतिहास की बलि चढ़ाने में किसी को कोई संकोच नहीं है।

खोखली वामपंथी बयानबाजी के बरक्स मोदी सरकार का ठोस नारी सशक्तीकरण
तथाकथित उदारवादियों का नारी सशक्तीकरण केवल सोशल मीडिया पर विवादित बयान देने और सांस्कृतिक प्रतीकों को नीचा दिखाने तक सीमित रह गया है। इसके विपरीत, वर्तमान केंद्र सरकार ने जमीनी स्तर पर नारी शक्ति को राष्ट्र निर्माण की धुरी बनाया है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के जरिए संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को ऐतिहासिक आरक्षण देना हो, तीन तलाक जैसी कुप्रथा से मुक्ति दिलाना हो या सशस्त्र बलों में स्थायी कमीशन देकर बेटियों को फ्रंटलाइन कमांड सौंपना हो—यह वास्तविक सशक्तीकरण का प्रमाण है। वामपंथी फेमिनिज्म जहां महिलाओं को अपनी ही संस्कृति से विमुख करने का षड्यंत्र रचता है, वहीं भारतीय परंपरा नारी को शक्ति और स्वाभिमान का साक्षात स्वरूप मानती है।

पद्मिनी के आत्मबल से राष्ट्रपति की एडीसी तक: अदम्य साहस की वही अविचल धारा
भारतीय संस्कृति में नारी के अदम्य साहस की धारा युगों-युगों से प्रवाहित होती रही है। जिस सभ्यता ने पद्मिनी और कर्णावती जैसी वीरांगनाओं के आत्मबल को संजोया है, उसी भारत की बेटियां आज सेना, प्रशासन और राष्ट्र के सर्वोच्च पदों पर आसीन होकर नेतृत्व कर रही हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की पहली महिला एडीसी के रूप में मेजर नव्या शेखावत की नियुक्ति इस बात का जीवंत प्रमाण है कि समय के साथ वीरता का स्वरूप बदला है, लेकिन भारतीय नारी का आत्मसम्मान और संकल्प आज भी अडिग है। जिन्होंने अतीत में विदेशी आक्रांताओं के समक्ष घुटने नहीं टेके, उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने वाली आज की बेटियां उन ताकतों को करारा जवाब दे रही हैं जो भारतीय संस्कृति को हीन दिखाने का प्रयास करती हैं।

अब सनातनी समाज रक्षात्मक नहीं: तथ्यों से वामपंथी एजेंडे की धज्जियां उड़ाती युवा पीढ़ी
एक समय था जब सनातन प्रतीकों और ऐतिहासिक नायकों का उपहास उड़ाए जाने पर समाज रक्षात्मक मुद्रा में आ जाता था या चुप रह जाता था। किंतु सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के इस नए युग में भारतीय समाज बौद्धिक हीनभावना से पूरी तरह बाहर आ चुका है। आज की युवा पीढ़ी ऐतिहासिक साक्ष्यों और तथ्यों के साथ खुलकर अपनी बात रख रही है और बॉलीवुड या वामपंथी विमर्शकारों की बौद्धिक ठेकेदारी को सीधे चुनौती दे रही है। समाज का यह मुखर स्वरूप दर्शाता है कि अब झूठे विमर्शों के दम पर देश के आत्मगौरव को दबाया नहीं जा सकता।

फ्लॉप करियर को चमकाने के लिए सनातन विरोध का आजमाया हुआ नुस्खा
सिनेमा और कला जगत के एक विशेष धड़े का यह पुराना ढर्रा रहा है कि मुख्यधारा के विमर्श से ओझल होते ही सनातन धर्म और भारतीय गौरव पर विवादास्पद टिप्पणियां करके फिर से सुर्खियों में आने की कोशिश की जाए। जब वास्तविक सामाजिक सुधारों या अन्य मजहबों की कुरीतियों के विरुद्ध खड़े होने की बात आती है, तब यह तथाकथित प्रगतिशील जमात पूरी तरह खामोश हो जाती है। यह कोई वास्तविक स्त्री विमर्श नहीं, बल्कि एक सुनियोजित एजेंडा है जिसके तहत सस्ती लोकप्रियता पाने और अपने वैचारिक आकाओं को संतुष्ट करने के लिए गौरवशाली इतिहास को लांछित किया जाता है। किंतु विकास और राष्ट्रगौरव के पथ पर बढ़ते भारत में अब ऐसे हथकंडे पूरी तरह बेअसर साबित हो रहे हैं।

विकास और राष्ट्रगौरव के आगे नतमस्तक हुआ तुष्टीकरण का हर विभाजनकारी षड्यंत्र
चित्तौड़ के दुर्ग से लेकर डीग के महलों तक भारत की माटी वीरांगनाओं के अद्वितीय शौर्य, आत्मसम्मान और अमर बलिदान की गाथाओं से सिंचित है। सदियों पूर्व आक्रांताओं के बर्बर अत्याचारों के विरुद्ध अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए उठाए गए उन पवित्र कदमों को आज का प्रबुद्ध और स्वाभिमान से भरा युवा राष्ट्र का अमूल्य गौरव मानता है। लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम और चुनावी लाभ के लिए सनातन प्रतीकों को लांछित करने वाली ताकतों को यह समझना होगा कि आधुनिक भारत औपनिवेशिक हीनभावना की जंजीरों को तोड़ चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘पंच प्रण’ और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पथ पर अग्रसर यह देश अब न तो अपने पूर्वजों के त्याग का उपहास बर्दाश्त करेगा और न ही तुष्टीकरण के झूठे नैरेटिव से अपनी एकता को खंडित होने देगा। यह विवाद स्पष्ट कर चुका है कि विकास, विरासत और राष्ट्रगौरव के महाविमर्श के आगे समाज को बांटने वाली हर वैचारिक साजिश का ध्वस्त होना तय है।

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