कांग्रेस बीजेपी को घेरने के लिए मुद्दे तो उठाती है, लेकिन हर बार निशाना साधते-साधते खुद ही ‘सेल्फ गोल’ कर बैठती है। कभी ‘भारत जोड़ो’ के बाद बांटने वाली राजनीति को हवा, कभी संविधान और आरक्षण के मुद्दे पर कन्फ्यूज।
राहुल का डिस्पोजेबल वाला झूठ हुआ एक्सपोज
उत्तर प्रदेश के चुनावी गणित का हिसाब लगाकर अब राहुल गांधी ने चाय की दुकान पर ‘दो कप सिस्टम’ का झूठ बोला है। उनका दावा है कि देश के कई गांवों-कस्बों की चाय दुकानों पर आज भी दो तरह की व्यवस्था चलती है। आम ग्राहकों को कांच के कप में चाय दी जाती है, जबकि दलितों के लिए यूज-एंड-थ्रो प्लास्टिक या पेपर कप अलग से रखे जाते हैं।

युवराज ने चायवालों का अपमान किया, तो दूसरे कांग्रेसी भी सुर में सुर मिलाने लगे। उदित राज तो चार कदम आगे निकल गए और जाति के हिसाब से चाय का पूरा बिजनेस मॉडल लेकर सामने आ गए।
चायवालों ने निकाली राहुल के एजेंडे की हवा
अब दिल्ली ही नहीं, देशभर के चायवाले गुस्से में हैं। राहुल गांधी का बयान सिर्फ उनकी मेहनत और रोजगार का अपमान नहीं, बल्कि समाज को जाति के नाम पर बांटने की खतरनाक सियासत का हिस्सा है। चाय बेचने वाले मेहनत से अपना कारोबार खड़ा करते हैं, लेकिन कांग्रेस उन्हें भी जाति के चश्मे से देखने और समाज में भेदभाव का नैरेटिव खड़ा करने से बाज नहीं आ रही।
कांग्रेस पर बीजेपी ने भी बोला जोरदार हमला
सोशल मीडिया पर कांग्रेस की इस सस्ती सियासत का जमकर मजाक उड़ रहा है। समाज को जाति के नाम पर बांटकर वोट की राजनीति करने का कांग्रेस का एजेंडा अब सवालों के घेरे में है। बीजेपी ने भी कांग्रेस के इस प्रोपेगेंडा पर तीखा हमला बोलते हुए उसके दावों पर सवाल खड़े किए हैं।

पिछड़ों के नाम पर राहुल गांधी का झूठा नैरेटिव
राहुल गांधी का यह बयान अचानक नहीं आया है। दरअसल, कांग्रेस को लगता है कि पिछड़ों के नाम पर नैरेटिव गढ़कर और झूठे दावे फैलाकर चुनाव में कुछ वोट हासिल किए जा सकते हैं। यही वजह है कि कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस लगातार ऐसी बयानबाजी कर रही है। वो ऐसे दावों को हवा दे रही है, जिनका जमीनी हकीकत से लेना-देना नहीं है।

हाल ही में हल्द्वानी में भी कांग्रेस ने पिछड़ा कार्ड खेलने की कोशिश की। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद मंच के ‘शुद्धिकरण’ का आरोप लगाकर पार्टी ने इसे पिछड़ों के अपमान से जोड़ने की कोशिश की।

वोट के लिए कांग्रेस का देशविरोधी एजेंडा
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस जमीनी स्तर पर माहौल बनाने और वंचित एवं पिछड़े वर्गों को अपने साथ जोड़ने के लिए हर सियासी हथकंडा आजमा रही है। पार्टी खुद को सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाली ताकत के तौर पर पेश करना चाहती है। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी अपनी हर जनसभा में संविधान की कॉपी लेकर नजर आए। उन्होंने लगातार दावा किया कि अगर बीजेपी दोबारा सत्ता में आई, तो संविधान बदल देगी। इसी के साथ बीजेपी पर आरक्षण विरोधी होने के आरोप भी लगाए गए। कांग्रेस को लगता है कि इस तरह की राजनीति से आने वाले विधानसभा चुनाव में भी उसे फायदा मिल सकता है।

अब तक पिछड़ों का वोट साधने के लिए कांग्रेस ने जिन मुद्दों का सहारा लिया है, उनका असर तो पता नहीं, लेकिन सोशल मीडिया पर उसकी सियासत का मजाक जरूर बना है।

जाति के नाम पर बांटकर नहीं मिलेंगे वोट
कांग्रेस को उम्मीद है कि पिछड़ों के नाम पर नैरेटिव गढ़कर वो उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में सियासी फायदा हासिल कर सकती है। लेकिन सिर्फ पिछड़ा कार्ड खेलना चुनावी सफलता की गारंटी नहीं है। हकीकत यह है कि पिछड़ी जातियों के बीच कांग्रेस का कोई मजबूत जनाधार नहीं है और न ही जमीनी स्तर पर उसका संगठन उतना मजबूत है। ऐसे में मंचों से बड़े-बड़े दावे और जातीय मुद्दों की सियासत कांग्रेस के लिए वोट में कितना बदल पाएगी, यह बड़ा सवाल है। ऊपर से पार्टी के नेतृत्व को लेकर युवाओं के बीच भरोसे के संकट से भी कांग्रेस की राह मुश्किल है।









