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वोटबैंक के लिए मनुस्मृति जलाने का स्टंट: यूपी 2027 में राहुल गांधी को फिर मिलेगा हार का मेडल!

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कांग्रेस नेता राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के लिए इस कदर अधीर हो चुके है कि उन्हें अब राजनीतिक मर्यादाओं का भान भी नहीं रहा। उन्हें भलीभांति पता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है, जहां 2027 में विधानसभा चुनाव होने है। यूपी में अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन तलाशने में जुटी कांग्रेस के पास आज कोई ठोस मुद्दा ही नहीं बचा है। ऐसे में अपने खास वोटबैंक को खुश करने के लिए राहुल गांधी कभी ईवीएम का रोना रोते है, तो कभी सनातन धर्म और मनुस्मृति के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी करते है। हद तो तब हो गई जब उनसे दो कदम आगे बढकर कांग्रेस कार्यकर्ता आरएसएस मुख्यालय के बाहर मनुस्मृति जलाने जैसी ओछी हरकत पर उतर आए। आखिर क्या वजह है कि राहुल गांधी कभी दूसरे धर्मों की किताबों या उनकी कुप्रथाओं पर एक शब्द भी बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते? कडवी सच्चाई यही है कि तुष्टिकरण की वेदी पर सनातन धर्म को नीचा दिखाना और अपमानित करना कांग्रेस का पुराना शगल बन चुका है। लेकिन वे भूल गए हैं कि यह सोशल मीडिया का दौर है, जहां जनता इनका असली चेहरा पहचान चुकी है। यूपी की जागरूक जनता इनके हर तिकड़म को समझती है, चुनाव में इनकी दाल नहीं गलने वाली और इनका सूपडा साफ होना तय है।

‘Smash the Patriarchy’ का पाखंड: कट्टरपंथी मुफ्ती-मौलानाओं पर होंठ सिले क्यों?
मनुस्मृति पर सवाल उठाकर “Smash the Patriarchy” का झंडा बुलंद करने वाले राहुल गांधी और वायनाड सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा की असल राजनीतिक नीयत बेनकाब हो चुकी है। जब केरल के ग्रैंड मुफ्ती अबू बकर अहमद महिलाओं को ‘तिजोरी के सोने’ की तरह घर में कैद रखने की वकालत करते है और अब्दुल हाकिम अंसारी जैसे मौलाना कामकाजी महिलाओं को समाज पर बोझ बताते है, तब इन भाई-बहन के मुंह पर ताला लग जाता है। कांग्रेस और उनकी सहयोगी मुस्लिम लीग को देश को बताना होगा कि क्या उनका फेमिनिज्म और महिला सशक्तिकरण केवल सनातन धर्म को कोसने के लिए है? “Smash the Patriarchy” का नारा किसी एक धर्म या राजनीतिक मंच तक सीमित कैसे हो सकता है?

नारों की राजनीति बनाम वास्तविक सम्मान: बीजेपी का सशक्तिकरण मॉडल
कांग्रेस के लिए महिला सशक्तिकरण केवल ‘लडकी हूं, लड सकती हूं’ जैसे चुनावी जुमलो और ट्विटर के नारों तक सीमित है। इसके विपरीत भाजपा की डबल इंजन सरकार ने मातृशक्ति को जमीन पर मान-सम्मान दिया है। उज्ज्वला योजना से चूल्हे के धुएं से आजादी, स्वच्छ भारत के तहत इज्जत घर, पीएम आवास में घर का मालिकाना हक सीधे महिलाओं के नाम और उत्तर प्रदेश में ‘मिशन शक्ति’ के जरिए सुरक्षा का पुख्ता माहौल दिया गया। जहां भाजपा सरकार बेटियों के हाथ में कलम और आत्मनिर्भरता थमा रही है, वहीं कांग्रेस रूढिवादी मौलानाओं के पीछे खडी होकर महिलाओं को चारदीवारी में कैद रखने वाली सडी-गली मानसिकता को संरक्षण दे रही है।

संदेशखाली पर होंठ सिले क्यों? गठबंधन की खातिर पीड़ित बहनों का सौदा
‘लडकी हूं, लड सकती हूं’ का ढिंढोरा पीटने वाले गांधी परिवार का असली चेहरा पश्चिम बंगाल के संदेशखाली कांड में पूरी तरह बेनकाब हुआ। जब तृणमूल के गुंडों द्वारा दलित और वंचित समाज की महिलाओं का दैहिक और मानसिक शोषण किया जा रहा था, तब राहुल और प्रियंका गांधी के मुंह से एक सांत्वना का शब्द तक नहीं निकला। इंडी गठबंधन की खातिर और ममता बनर्जी को नाराज न करने के डर से कांग्रेस ने उन असहाय बहनों के आंसुओं का सौदा कर लिया। जहां सत्ता और गठबंधन की बात आती है, वहां राहुल-प्रियंका का फेमिनिज्म पूरी तरह गायब हो जाता है।

समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का विरोध: महिलाओं को बराबरी देने से भागती कांग्रेस
यदि राहुल और प्रियंका गांधी वास्तव में पितृसत्ता को समाप्त करने के पक्षधर है, तो वे समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का विरोध क्यों करते हैं? यूसीसी का सीधा अर्थ है हर धर्म की बेटी और बहन को विवाह, तलाक और संपत्ति में बराबरी का कानूनी अधिकार। उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने इसे लागू कर महिलाओं को सशक्त बनाया, लेकिन कांग्रेस ने मौलानाओं के तुष्टिकरण के लिए इसका डटकर विरोध किया। यह स्पष्ट प्रमाण है कि कांग्रेस मुस्लिम महिलाओं को कट्टरपंथी पितृसत्ता के चंगुल से मुक्त नहीं कराना चाहती, बल्कि उन्हें हमेशा शरीयत और मुफ्ती-मौलानाओं के रहमोकरम पर छोडना चाहती है।

शाह बानो से आज तक: जब भी बात मुस्लिम बहनों के हक की आई, मौलानाओं के आगे झुकी कांग्रेस
कांग्रेस का महिला सशक्तिकरण कितना खोखला है, इसका सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण शाह बानो प्रकरण है। 1985 में जब सर्वोच्च न्यायालय ने एक बुजुर्ग बेसहारा मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता देने का फैसला सुनाया, तब राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी की सरकार ने संसद में कानून बदलकर कट्टरपंथी मौलानाओं के आगे आत्मसमर्पण कर दिया था। चार दशक पहले एक लाचार महिला का हक छीनकर रूढिवादिता को संरक्षण देने वाली कांग्रेस की वही मानसिकता आज भी बरकरार है। आज जब मुफ्ती और मौलाना महिलाओं को तिजोरी में बंद रखने और उन्हें बोझ बताने का फतवा जारी करते है, तो राहुल-प्रियंका का मौन साबित करता है कि इनका डीएनए आज भी कट्टरपंथ के सामने नतमस्तक होने वाला ही है।

40 प्रतिशत टिकट का चुनावी स्टंट: 2 सीटों पर सिमटे, फिर भूल गए ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’
उत्तर प्रदेश की जनता भूली नहीं है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी वाड्रा ने ‘लड़की हूं, लड सकती हूं’ का नारा उछालकर महिलाओं को 40 प्रतिशत टिकट बांटने का भारी आडंबर रचा था। लेकिन जनता ने इस पाखंड को नकार दिया और कांग्रेस महज 2 सीटो पर सिमट गई, जबकि उनकी 97 प्रतिशत से अधिक महिला उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। चुनाव हारते ही प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश की जमीन छोडकर निकल गईं और कथित महिला सशक्तिकरण का सारा तमाशा हवा हो गया। आज फिर जब चुनाव नजदीक आ रहे है, तो नए नारों और मनुस्मृति दहन के जरिए आधी आबादी को लुभाने की कोशिश हो रही है, जबकि मुफ्ती-मौलानाओं द्वारा महिलाओं को कैद रखने के बयानो पर इनके मुंह में दही जम जाता है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर रोड़े अटकाना: कथनी में ‘लड़की हूं’, करनी में आरक्षण विरोधी
मोदी सरकार ने संसद और विधानसभाओं में मातृशक्ति को 33 प्रतिशत आरक्षण देकर ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को कानून का रूप दिया। दशकों तक सत्ता में रहकर इस ऐतिहासिक सुधार को अटकाने वाली कांग्रेस आज भी इस पर अड़ंगे लगाने से बाज नहीं आई। राहुल गांधी ने संसद में नए-नए बहाने बनाकर महिला आरक्षण में रोडे अटकाने का कुत्सित प्रयास किया। भाषणों में आधी आबादी के झूठे हमदर्द बनने वाले भाई-बहन हकीकत में कभी नहीं चाहते थे कि महिलाएं सत्ता के शीर्ष पर बैठकर फैसले ले। इनका असली मकसद महिलाओं को सशक्त बनाना नहीं, बल्कि उन्हें केवल वोट बैंक की सीढ़ी समझना है।

‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ का ढोंग: तीन तलाक और हिजाब पर मौन समर्थन क्यों?
उत्तर प्रदेश में कभी ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ का खोखला नारा उछालने वाली प्रियंका गांधी वाड्रा का महिला सशक्तिकरण केवल राजनीतिक भाषणो तक सीमित है। जब केंद्र की मोदी सरकार ने तीन तलाक जैसी अमानवीय कुप्रथा को समाप्त कर मुस्लिम बहनों को गरिमापूर्ण जीवन दिया, तब कांग्रेस कट्टरपंथियो के साथ खडी दिखाई दी। हिजाब के नाम पर बालिकाओं को आधुनिक शिक्षा से दूर रखने की पैरवी करने वाली कांग्रेस आज भी मौलानाओं के रूढिवादी फरमानों पर मौन साधे बैठी है। क्या मुस्लिम महिलाओं की आजादी और आत्मसम्मान के लिए लडना राहुल और प्रियंका के एजेंडे में शामिल नहीं है?

वक्फ सुधारों का विरोध: मुस्लिम महिलाओं को संपत्ति और अधिकार देने से खौफजदा विपक्ष
जब भी मुस्लिम बहनों को कानूनी संरक्षण और वक्फ जैसी संपत्तियो में बराबरी की भागीदारी देने की बात होती है, कांग्रेस सबसे पहले मौलानाओं की ढाल बनकर खडी हो जाती है। वक्फ संशोधन कानून में सुधारों का विरोध करके कांग्रेस ने फिर साबित कर दिया कि उसे मुस्लिम महिलाओं के मानवाधिकारों और संपत्ति के अधिकारों की कोई परवाह नहीं है। एक तरफ हिंदू धर्मग्रंथो को जलाकर खुद को प्रगतिशील साबित करने का ढोंग और दूसरी तरफ वक्फ के नाम पर कट्टरपंथी ताकतो का खुला समर्थन, कांग्रेस के इस दोहरे चरित्र को देश की महिलाएं अब अच्छी तरह समझ चुकी है।

‘हिंदू बनाम हिंदुत्ववादी’ की थ्योरी का सच: सनातन को बांटने की पुरानी साजिश
पिछले चुनाव के समय राहुल गांधी ने जयपुर की रैली से ‘हिंदू बनाम हिंदुत्ववादी’ का नया विवाद खडा करके हिंदू समाज को आपस में लडाने की चाल चली थी। खुद को सच्चा हिंदू और दूसरों को विभाजनकारी बताने वाले राहुल गांधी का असली एजेंडा तब सामने आ गया जब उनके नेता सनातन को कभी डेंगू-मलेरिया बताते है तो कभी सडक पर मनुस्मृति जलाने का कुचक्र रचते है। अपने चुनावी भाषणो में खुद को जनेऊधारी साबित करने वाले राहुल गांधी की यह वैचारिक हिपोक्रेसी है कि वे बहुसंख्यक समाज की आस्था पर प्रहार करने का कोई मौका नहीं छोडते, लेकिन मुस्लिम समाज की कुप्रथाओ पर उंगली उठाने से भी खौफ खाते है।

कभी जनता को कोसा, अब खुद जाति की राजनीति में धंसे: कांग्रेस का दोगला चरित्र
2022 के चुनाव प्रचार के दौरान प्रियंका गांधी ने यूपी की जनता को यह कहकर अपमानित किया था कि ‘तुम जाति और धर्म के नाम पर वोट देते हो इसलिए नेता निकम्मे हो गए है’। जो कांग्रेस कल तक जनता को जाति से ऊपर उठने का ज्ञान दे रही थी, वही आज 2027 चुनाव के लिए जातिगत उन्माद भडकाने और मनुस्मृति का हौव्वा खडा करने में लगी है। जब विकास, सुशासन और कानून-व्यवस्था के नाम पर योगी सरकार को चुनौती नहीं दी जा सकी, तो कांग्रेस फिर से समाज को जातियों में बांटकर अपनी डूबती नैया पार लगाने के पुराने फॉर्मूले पर लौट आई है।

विपक्ष में मनुस्मृति जलाने वाले, सत्ता में आए तो क्या करेंगे?
जब आपके पास कोई मुद्दा न हो, खुद को बुद्धिजीवी और ‘वोक’ (Woke) साबित करना हो, तो मनुस्मृति को गाली देना इंडी गठबंधन का प्रिय शगल बन गया है। कांग्रेस विपक्ष में रहते हुए आरएसएस मुख्यालय के सामने मनुस्मृति जलाने का दुस्साहस करती है। जो पार्टी देश के संसाधनो पर पहला अधिकार मुसलमानो का बताती हो, सोचिए अगर वह गलती से भी सत्ता में आ गई तो क्या होगा? देश के कौन-कौन से ग्रंथ जलाए जाएंगे? यह सिर्फ सपा के वोट बैंक में सेंध लगाने और खुद को सबसे बड़ा ‘सहिष्णु’ साबित करने की होड़ है। लेकिन इसका सीधा परिणाम यह होगा कि हिंदू समाज के मन में कांग्रेस के प्रति नफरत दोगुनी होगी। यह अकारण नहीं है कि राहुल गांधी को भाजपा का ‘स्टार प्रचारक’ कहा जाता है।

विदेशी चश्मे से सनातन को देखने वाले मनुस्मृति का सच क्या जानें
विदेशी माता के पुत्र और विदेशी शिक्षा से ग्रसित मानसिकता वाले लोग यह नहीं समझ सकते कि मनुस्मृति में महिला को पुरुष के अधीन नहीं, बल्कि उसके संरक्षण में रखने की बात कही गई है। जैसे पुलिस हमारी सुरक्षा करती है, तो हम पुलिस के गुलाम नहीं हो जाते। बचपन में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्र का संरक्षण महिलाओं के सम्मान का प्रतीक है। मनुस्मृति के काल में राजा के साथ राज सिंहासन पर बैठकर रानियां राजकाज में सलाह देती थीं। उसी काल में 15 महिलाएं बिना किसी आरक्षण के संविधान सभा तक पहुंची थीं। सावित्री, माता सीता, द्रौपदी और अहिल्या के उदाहरण बताते है कि उस समय महिलाओं को अपना जीवनसाथी चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। लेकिन आज जिन्हें वोटबैंक की राजनीति करनी है, वे सनातन के इस गौरवशाली इतिहास को कलंकित करने पर तुले हैं।

चुनावी ‘जनेऊधारी’ का असली रूप: वोट के लिए मंदिर दर्शन, हार की बौखलाहट में ग्रंथ दहन
चुनाव आते ही कोट के ऊपर जनेऊ धारण करने वाले और मंदिर-मंदिर जाकर माथा टेकने वाले राहुल गांधी का पाखंड अब पूरी तरह उजागर हो चुका है। जब चुनाव में हिंदू वोटो की जरूरत होती है, तब वे खुद को शिवभक्त और कश्मीरी कौल ब्राह्मण बताने लगते हैं। लेकिन जैसे ही जनता उन्हें नकारती है, उनकी पार्टी और कार्यकर्ता हिंदू आस्था पर चोट करने और पवित्र ग्रंथों को जलाने का कुत्सित प्रयास करने लगते हैं। यह दोहरापन साफ बताता है कि उनका हिंदू प्रेम केवल एक छलावा था, जबकि उनकी असल राजनीति सनातन को अपमानित करने और तुष्टिकरण की आग भड़काने पर ही टिकी है।

वायनाड तुष्टिकरण मॉडल: मुस्लिम लीग के सामने गांधी परिवार का वैचारिक समर्पण
राहुल गांधी के बाद अब प्रियंका गांधी वाड्रा के वायनाड से जुड़ने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि गांधी परिवार की पूरी राजनीति अब केरल के तुष्टिकरण मॉडल के इर्द-गिर्द सिमट चुकी है। वायनाड में मुस्लिम लीग और कट्टरपंथी संगठनों के समर्थन से अपनी राजनीतिक नैया पार लगाने वाले भाई-बहन कभी केरल के मुफ्ती-मौलानाओं के महिला विरोधी बयानों के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा सकते। वहां के वोटबैंक को खुश रखने की इसी मजबूरी के कारण आज कांग्रेस उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में भी बहुसंख्यक समाज की आस्था को आहत करने और मनुस्मृति जलाने की घिनौनी चाल चल रही है।

‘संविधान बचाओ’ का पाखंड: किताबें जलाकर किस तालिबानी संस्कृति को बढ़ावा दे रही कांग्रेस?
हाथ में लाल रंग का संविधान लेकर घूमने वाले राहुल गांधी को देश को जवाब देना चाहिए कि क्या बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर का संविधान किसी भी समुदाय के ग्रंथों को चौराहे पर जलाने की इजाजत देता है? बाबासाहेब ने देश को कानून का राज और लोकतांत्रिक मर्यादाएं दी, लेकिन कांग्रेस आज ग्रंथ जलाकर ठीक उसी असहिष्णु और तालिबानी मानसिकता का प्रदर्शन कर रही है जिससे सभ्य समाज को खतरा है। संविधान की दुहाई देकर सडक पर अराजकता फैलाना और समाज को बांटना ही कांग्रेस की असली कार्यशैली बन चुका है, जिसे जनता भलीभांति देख और समझ रही है।

बाबासाहेब के नाम पर केवल सियासत: वैचारिक आंदोलन बनाम कांग्रेस का चुनावी स्टंट
जिस कांग्रेस ने बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर को जीवन भर राजनीतिक रूप से हाशिए पर रखा और संसद पहुंचने से रोका, वही कांग्रेस आज दलित वोटो की खातिर उनका नाम भुनाने में जुटी है। महाड आंदोलन में डॉ. आंबेडकर का कदम सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ एक गहरा वैचारिक आत्ममंथन था, लेकिन कांग्रेस आज उत्तर प्रदेश में सपा के पीडीए वोटबैंक में सेंध लगाने के लिए ग्रंथ जलाने जैसी अराजक नौटंकी कर रही है। यह आंबेडकर के विचारों का सम्मान नहीं, बल्कि चुनावी फायदे के लिए समाज को जातियों में बांटने की कांग्रेस की पुरानी ‘फूट डालो और राज करो’ वाली नीति है।

विकास पर जवाब नहीं, तो दंगा भड़काने की साजिश
उत्तर प्रदेश में जब से योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में डबल इंजन की सरकार आई है, राज्य से दंगे और अराजकता पूरी तरह समाप्त हो चुके है। विकास, एक्सप्रेसवे और निवेश के पैमाने पर जब कांग्रेस सरकार का मुकाबला नहीं कर पा रही, तो वह सडक पर ग्रंथ जलाकर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की साजिश रच रही है। शांति और कानून के राज से चलने वाले उत्तर प्रदेश को कांग्रेस फिर से तुष्टिकरण और दंगो की आग में झोंकना चाहती है, लेकिन यूपी की कानून-व्यवस्था से खिलवाड करने का उनका यह मंसूबा कभी कामयाब नहीं होगा।

वामपंथी विचारधारा की बंधक बनी कांग्रेस: भारतीय संस्कृति और परिवार व्यवस्था पर वार
कांग्रेस अब महात्मा गांधी के सिद्धांतों वाली पार्टी नहीं रही, बल्कि पूरी तरह जेएनयू मार्का वामपंथी इकोसिस्टम के शिकंजे में जा चुकी है। पश्चिम से आयातित ‘Smash the Patriarchy’ जैसे खोखले नारों की आड़ में कांग्रेस सीधे तौर पर भारतीय परिवार व्यवस्था और सनातन परंपराओं को निशाना बना रही है। जहां भारतीय दर्शन में नारी को शक्ति और पूजनीय माना गया है, वहां वामपंथी चश्मे से भारतीय संस्कृति को केवल शोषक बताकर नई पीढी को भडकाने का काम किया जा रहा है, जबकि वास्तविक पितृसत्तात्मक कट्टरपंथ पर ये तथाकथित लिबरल हमेशा खामोश रहते है।

पाखंड की राजनीति का अंत तय: 2027 में जनता सिखाएगी विभाजनकारी ताकतों को सबक
कुल मिलाकर, मनुस्मृति जलाने की नौटंकी और महिला अधिकारों का खोखला प्रलाप कांग्रेस की हताशा का जीता-जागता प्रमाण है। विकास और सुशासन के मोर्चे पर पूरी तरह विफल हो चुकी कांग्रेस अब केवल सामाजिक विभाजन और तुष्टिकरण के सहारे अपनी राजनीतिक सांसें गिन रही है। लेकिन देश और उत्तर प्रदेश की जनता अब जागरूक है। जनता भलीभांति समझ चुकी है कि जिनका फेमिनिज्म मौलानाओं के आगे नतमस्तक हो जाता है और जिनका संविधान-प्रेम केवल ग्रंथ जलाने तक सीमित है, वे समाज का भला कभी नहीं कर सकते। 2027 के चुनाव में तुष्टिकरण और सनातन-विरोध की इस विभाजनकारी राजनीति को यूपी की जनता एक बार फिर करारा जवाब देकर हमेशा के लिए खारिज करने जा रही है।

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