पंजाब में साल 2022 के विधानसभा चुनावों के दौरान ‘बदलाव’ की आंधी पर सवार होकर सत्ता में आई आम आदमी पार्टी और उसके बहुचर्चित ‘केजरी मॉडल’ की कलई अब पूरी तरह खुल चुकी है। मुफ्त बिजली और लोक-लुभावन गारंटी के विज्ञापनों की चमक के पीछे वित्तीय कुप्रबंधन का एक ऐसा दलदल तैयार हो गया है, जिसमें राज्य की रीढ़ कहे जाने वाले सरकारी कर्मचारी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। जिस प्रदेश को देश के सामने एक आदर्श गवर्नेंस मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा था, आज उसी पंजाब के 3 लाख से अधिक सरकारी कर्मचारी और पेंशनभोगी सड़कों पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। यह अभूतपूर्व संकट कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि यह उन झूठे चुनावी वादों, प्रशासनिक अहंकार और वित्तीय कंगाली का सीधा परिणाम है, जिसने पंजाब की प्रशासनिक मशीनरी को पूरी तरह वेंटिलेटर पर लाकर खड़ा कर दिया है।
महा-हड़ताल ने आर्थिक रूप से पंगु बने राज्य की पोल खुली
राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए हवा में उछाले गए ‘केजरी मॉडल’ की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि जो पार्टी कल तक कर्मचारियों के हर धरने में जाकर उनके हक की वकालत करती थी, आज सत्ता के सिंहासन पर बैठते ही वह उनके प्रति क्रूर और उदासीन हो गई है। इससे साफ है कि कर्मचारियों के हक की बातें सिर्फ झूठा स्वांग भर ही थीं। मुख्यमंत्री भगवंत मान का आंदोलनकारी कर्मचारियों से बात करने से साफ इनकार कर देना और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकियां देना साफ दर्शाता है कि ‘आप’ सरकार संवादहीनता के उस दौर में पहुंच चुकी है, जहां जनता और कर्मचारियों की जायज मांगें भी उसे गुनाह नजर आती हैं। 27 अगस्त की ऐतिहासिक महा-हड़ताल ने यह साबित कर दिया है कि पंजाब का कर्मचारी अब केवल कागजी आश्वासनों से बहलने वाला नहीं है। मुफ्तखोरी की राजनीति और बजटीय प्राथमिकताओं को दरकिनार करने के कारण समृद्ध राज्य आर्थिक रूप से पंगु हो चुका है और उसके कर्मचारी अपने ही हक के लिए लाठियां और पानी की बौछारें सहने को विवश हैं।
भगवंत मान सरकार ने चार सालों में केवल आश्वासन दिए
पंजाब की आप सरकार पर सवालिया निशान यह है कि आखिरकार राज्य के कर्मचारी इतने उग्र क्यों हो रहे हैं। वे सामूहिक अवकाश लेकर पूरे राज्य को ठप करने जैसा आत्मघाती कदम उठाने को क्योकर विवश हो रहे हैं? इसका सीधा-सा जवाब है कि लगातार टूटते वादे और आर्थिक शोषण। कर्मचारियों का आरोप है कि भगवंत मान सरकार ने पिछले चार सालों में केवल आश्वासन दिए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर एक भी वित्तीय मांग को पूरा नहीं किया। यह आंदोलन तब और भड़क उठा जब पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा कर्मचारियों के हक में फैसला दिए जाने के बावजूद मान सरकार ने उनके बकाया भत्तों का भुगतान नहीं किया। इसे कर्मचारी न्यायपालिका का अपमान और अपने अधिकारों पर डकैती मान रहे हैं।
कर्मचारियों को न महंगाई भत्ता न ही मिल रहा पूरा वेतन
सबसे अहम बात यह है कि राज्य के कर्मचारी संगठनों (सांझा मुलाजम मंच और पेंशनर्स फ्रंट) की मांगें कोई नई या नाजायज नहीं हैं। उनकी सबसे पहली मांग है पिछले लंबे समय से लंबित 18 प्रतिशत महंगाई भत्ता (DA) और छठे वेतन आयोग (6th Pay Commission) के बकाए का तुरंत भुगतान किया जाए। यह लगातार लेटलतीफी के चलते करीब 20,161 करोड़ रुपये का आंकड़ा छू रहा है। इसके अलावा, पुरानी पेंशन योजना (OPS) की पूर्ण बहाली, कच्चे और कॉन्ट्रैक्ट (ठेके) पर काम कर रहे कर्मचारियों का नियमितीकरण, और 17 जुलाई 2020 के उस काले नोटिफिकेशन को रद्द करना जिसके तहत नए भर्ती कर्मचारियों को केवल मूल वेतन दिया जा रहा है। ये ऐसी मांगें हैं जिन पर आम आदमी पार्टी ने विपक्ष में रहते हुए कर्मचारियों के साथ धरने पर बैठकर सहमति जताई थी।
The model AAP followed in Delhi, making Sheesh Mahal while its leaders benefited but not the general public, is now being applied in Punjab.
They are deeply embroiled in corruption, while employees are not getting their DA.
Corrupt AAP has burdened every person in Punjab with… pic.twitter.com/9HEiSHOnU7
— BJP (@BJP4India) August 27, 2026
‘केजरी मुफ्त मॉडल’ के चलते सरकार पर कर्ज का बोझ
सरकार की नीयत पर उठने वाला बड़ा सवाल यह है कि जो सरकार विज्ञापनों पर पानी की तरह पैसा बहा रही है, वह अपने कर्मचारियों की मांगें पूरी क्यों नहीं कर पा रही? असल में, ‘केजरी मॉडल’ का पूरा ढांचा मुफ्त बिजली, महिलाओं को भत्ते और अन्य लोक-लुभावन गारंटियों पर टिका है। इन गारंटियों को पूरा करने के चक्कर में पंजाब का खजाना पूरी तरह खाली हो चुका है। राज्य पर कर्ज का बोझ लगातार अधिक से अधिक होते हुए अब रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। सरकार के पास दैनिक प्रशासनिक खर्चे और कर्मचारियों को समय पर वेतन देने तक के पैसे नहीं हैं, तो वह 20 हजार करोड़ से अधिक का डीए बकाया कहां से चुकाएगी? अपनी इसी वित्तीय विफलता को छिपाने के लिए सरकार कभी अदालतों का बहाना बनाती है तो कभी केंद्र सरकार पर फंड रोकने का आरोप लगाती फिरती है।
चपेट में कई प्रमुख विभाग: सचिवालय से अस्पताल तक ठप
राज्य के कर्मचारियों की इस महा-हड़ताल का असर पंजाब के किसी एक कोने में नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर देखने को मिल रहा है। पंजाब सिविल सचिवालय के कर्मचारी, डीसी दफ्तरों के कर्मचारी, राजस्व विभाग के तहसीलदार (जो पहले से ही सतर्कता छापों के खिलाफ हड़ताल पर थे), शिक्षा विभाग के सरकारी शिक्षक और पंजाब रोडवेज के कर्मचारी समेत कई संगठनों के कर्मचारी इसमें शामिल हैं। सबसे दुखद स्थिति स्वास्थ्य विभाग की है, जहां सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के हड़ताल पर जाने के कारण ओपीडी सेवाएं पूरी तरह बंद रहीं। गरीब मरीज इलाज के लिए दर-दर भटकते रहे, लेकिन भगवंत मान सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी है।
‘नशा मुक्त पंजाब’ का झूठा सपना दिखाकर सत्ता हथियाने वाली आम आदमी पार्टी अब जनता की आँखों में आँखें डालने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रही है। झूठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती।
पंजाब की जनता अब जाग चुकी है, ठगों को खदेड़ रही है। समझ लीजिए, पंजाब में AAP के अब गिने-चुने दिन बचे हैं pic.twitter.com/GJS75rd00v
— MEHR MEENA🐦 (@mehrRj11) August 27, 2026
आप के चुनावी वादों की फेहरिस्त अब तो ‘जुमला’ बन गई
साल 2022 के चुनाव प्रचार के दौरान अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान ने पंजाब के हर वर्ग के कर्मचारियों से बड़े-बड़े वादे किए थे। उन्होंने कहा था कि सरकार बनते ही कैबिनेट की पहली बैठक में सभी कच्चे कर्मचारियों को पक्का कर दिया जाएगा। उन्होंने हिमाचल और छत्तीसगढ़ की तर्ज पर पंजाब में भी पुरानी पेंशन योजना (OPS) लागू करने का ढिंढोरा पीटा था। लेकिन सत्ता में आने के बाद ओपीएस के नाम पर केवल एक कागजी अधिसूचना जारी करके छोड़ दी गई, जिसे आज तक अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। कच्चे कर्मचारियों को पक्का करने की फाइलें आज भी सचिवालय की अलमारियों में धूल फांक रही हैं।
तानाशाही और वार्ता से इनकार: संकट में और बढ़ता अहंकार
लोकतंत्र में किसी भी संकट का हल संवाद और बातचीत से निकलता है, लेकिन मान सरकार ने यहां भी अहंकार का रास्ता चुना है। जालंधर में कर्मचारी प्रतिनिधियों के साथ तय बैठक को मुख्यमंत्री भगवंत मान ने ऐन वक्त पर यह कहकर रद्द कर दिया कि जब तक हड़ताल वापस नहीं होगी, कोई बातचीत नहीं होगी। इतना ही नहीं, कार्मिक विभाग ने सभी विभागाध्यक्षों को पत्र जारी कर हड़ताली कर्मचारियों की सूचियां मांगी हैं, ताकि उनके खिलाफ सेवा नियमों के तहत सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जा सके। यह तानाशाही रवैया आग में घी डालने का काम कर रहा है, जिससे कर्मचारियों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है।
अगले साल विधानसभा चुनाव में सबक सिखाएंगे कर्मचारी
पंजाब का मौजूदा कर्मचारी संकट यह साफ संकेत दे रहा है कि ‘केजरी मॉडल’ वित्तीय रूप से टिकाऊ नहीं है। केवल मुफ्त की घोषणाएं करके आप किसी राज्य को लंबे समय तक नहीं चला सकते, जब तक कि आपके पास राजस्व बढ़ाने का कोई ठोस जरिया न हो। अपने ही कर्मचारियों को प्रताड़ित कर और न्यायपालिका के आदेशों की अवहेलना कर भगवंत मान सरकार ने अपनी राजनीतिक कब्र खुद खोदनी शुरू कर दी है। पंजाब के ये 3 लाख कर्मचारी और उनके परिवार आने वाले 2027 के विधानसभा चुनावों में ‘आप’ के इस विश्वासघात का हिसाब चुकता करने के लिए तैयार बैठे हैं। सरकार को अगर अपनी साख बचानी है, तो उसे दमन का रास्ता छोड़कर तुरंत कर्मचारियों की जायज मांगों को पूरा करना होगा, वरना बदलाव की जिस आंधी ने उन्हें अर्श पर बिठाया था, वही आंधी उन्हें फर्श पर लाने में देर नहीं लगाएगी।
😂😂AAP situation will be the same in upcoming Punjab election. pic.twitter.com/m3gjGrxMqN
— Akshay Kumar (@akshay_vicky) August 27, 2026
पंजाब के इतिहास में यह पहली बार सड़कों पर इतने कर्मचारी – भाजपा
भाजपा पंजाब के प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने राज्य में कर्मचारियों और पेंशनरों द्वारा की गई महा-हड़ताल को लेकर आम आदमी पार्टी सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि कर्मचारी हर सरकार की रीढ़ की हड्डी होते हैं, लेकिन पंजाब के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि लाखों की संख्या में सरकारी कर्मचारी और पेंशनर अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर हुए हैं। ढिल्लों ने आरोप लगाया कि ‘आप’ सरकार ने कर्मचारियों का लगभग 15,000 करोड़ रुपये का महंगाई भत्ता नहीं देकर उनके साथ सीधे तौर पर धोखा किया है। माननीय हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद सरकार डीए जारी करने से बच रही है। उन्होंने कहा कि सरकार ने दूसरे राज्यों के चुनावों में वोट बटोरने के लिए करोड़ों रुपये विज्ञापन पर खर्च कर दिए, लेकिन अपने ही राज्य के कर्मचारियों को उनका हक देने के समय खजाना खाली होने का बहाना बनाया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा कर्मचारी संगठनों के साथ तय बैठकों से दो-दो बार पीछे हटना बेहद निंदनीय है। सरकार की इस टालमटोल की नीति के कारण आज आम जनता को सरकारी कार्यालयों में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी भगवंत मान सरकार की है।
कर्मचारियों के साथ पंजाब के युवा और बेरोजगार भी पेपर लीक होने से मान सरकार से खासे नाराज हैं। आइए, अब जानते हैं कि आप सरकार के दौरान किन-किन परीक्षाओं में पेपर लीक हुए…
1.फॉर्मेसी का पेपर लीक, कीमत 3.5 लाख से 13 लाख रुपये
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के तहत 454 फार्मेसी अफसरों की भर्ती के लिए हाल ही में बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज (BFUHS) द्वारा परीक्षा आयोजित की गई थी। इसमें करीब 7,000 उम्मीदवार शामिल हुए थे। ये परीक्षा शुरू होने के कुछ ही मिनटों के भीतर स्पेशल काउंटर इंटेलिजेंस और पुलिस की फ्लाइंग टीमों ने फरीदकोट, फिरोजपुर और कोट कपूरा के सेंटरों पर छापेमारी की। इसमें 28 उम्मीदवारों सहित कुल 35 लोगों को धर दबोचा। अभ्यर्थी पगड़ी, जुराबों और अंडरगारमेंट्स में बटन और छोटे वायरलेस ब्लूटूथ डिवाइस छिपाकर लाए थे। फिरोजपुर के एक सेंटर से पेन कैमरे से प्रश्नपत्र स्कैन कर व्हाट्सएप पर लीक करके भेजा गया, जहां हरियाणा और राजस्थान से ऑपरेट हो रहे कंट्रोल रूम से अभ्यर्थियों को उत्तर बोले जा रहे थे। खबरों के मुताबिक ये गैंग प्रति कैंडिडेट 3.5 लाख से 13 लाख रुपये वसूल रहा था। इस भारी सुरक्षा चूक और धांधली के बाद स्वास्थ्य मंत्री बलबीर सिंह और शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस के इस्तीफे की मांग उठना बेहद लाजिमी है, क्योंकि यह सीधे तौर पर प्रदेश के युवाओं के भविष्य के साथ हुआ एक खिलवाड़ है।

2.कृषि विकास अधिकारी (ADO) भर्ती: अन्नदाताओं से छल
पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्य में जहां कृषि विकास अधिकारी (ADO) की भर्ती सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र मानी जानी चाहिए थी, वहां भी धांधली की दीमक ने पूरे सिस्टम को खोखला कर दिया। परीक्षा के आयोजन से लेकर उसके प्रश्नपत्रों की गोपनीयता बनाए रखने में पंजाब का प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह विफल साबित हुआ। जब इस परीक्षा के पेपर लीक और उत्तर पुस्तिकाओं में हेरफेर की खबरें आम हुईं, तो योग्य उम्मीदवारों का मनोबल पूरी तरह टूट गया। आम आदमी पार्टी जो ‘बदलाव’ के बड़े-बड़े दावे कर सत्ता में आई थी, उसकी नाक के नीचे कृषि विभाग की रीढ़ मानी जाने वाली इस परीक्षा का सौदा हो गया, लेकिन सरकार आज भी जांच के नाम पर लीपापोती करने में व्यस्त है। विपक्ष ने इसे सीधा पेपर लीक और सिस्टम की नाकामी करार देते हुए राज्य के जिम्मेदार मंत्री के इस्तीफे की मांग की है।

3.नायब तहसीलदार भर्ती परीक्षा: प्रशासनिक साख पर बट्टा
राज्य में प्रशासनिक अधिकारियों की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक, नायब तहसीलदार की भर्ती परीक्षा का पेपर लीक होना पंजाब सरकार के माथे पर एक गहरा कलंक है। इस परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने और परीक्षा केंद्रों से ब्लूटूथ के जरिए नकल के तार सीधे तौर पर बड़े रसूखदारों से जुड़े पाए गए थे। इस घोटाले ने यह साबित कर दिया कि पंजाब में पीपीएससी (PPSC) जैसी संवैधानिक संस्थाओं की गोपनीयता को भी बड़े सिंडिकेट्स ने पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। इसके बावजूद जिम्मेदार मंत्रियों पर कार्रवाई करने के बजाय पूरी व्यवस्था को ढंकने की पुरजोर कोशिश की गई, जो सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
4.PSTET बोर्ड परीक्षा: खुद ही नकल की थाली परोसी
पंजाब स्टेट टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (PSTET) 2023 के दौरान जो ऐतिहासिक ब्लंडर सामने आया, उसने शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस के सभी दावों की धज्जियां उड़ा दी थीं। परीक्षा में सामाजिक विज्ञान के प्रश्नपत्र में 50 से अधिक प्रश्नों के सही उत्तर पहले से ही बोल्ड अक्षरों में छाप दिए गए थे। यह किसी पेपर लीक से भी बदतर प्रशासनिक अक्षमता का उदाहरण था, जहां पेपर सेट करने वालों ने खुद ही नकल की थाली परोस दी थी। इस भयंकर लापरवाही के बाद पूरी परीक्षा को रद्द करना पड़ा, जिससे लाखों अभ्यर्थियों का समय और पैसा दोनों बर्बाद हुए, लेकिन इस ब्लंडर के मुख्य राजनीतिक जिम्मेदार आज भी अपने पदों पर शान से बरकरार हैं।
5.पंजाब बोर्ड का 12वीं कक्षा का अंग्रेजी विषय का पेपर लीक
पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड (PSEB) की 12वीं कक्षा की अंग्रेजी (अनिवार्य) परीक्षा का प्रश्नपत्र परीक्षा शुरू होने से ऐन पहले लीक हो गया था। इस पेपर लीक में पंजाब बोर्ड मुख्य प्रशासनिक लापरवाही सामने आई। यह परीक्षा दोपहर 2:00 बजे शुरू होनी थी, लेकिन सोशल मीडिया (व्हाट्सएप और टेलीग्राम ग्रुप्स) पर प्रश्नपत्र वायरल होने के बाद परीक्षा शुरू होने से महज एक से डेढ़ घंटा पहले इसे रद्द कर दिया गया। इसके चलते लाखों छात्र प्रभावित हुए। परीक्षा केंद्रों पर पहुंच चुके लगभग 3 लाख छात्रों को ऐन वक्त पर मायूस होकर लौटना पड़ा था। परीक्षा रद्द होने के बाद भी बोर्ड की एक और शर्मनाक लापरवाही सामने आई। लुधियाना और फिरोजपुर के दो परीक्षा केंद्रों पर स्टाफ ने नया प्रश्नपत्र देने के बजाय गलती से बैंक लॉकर से पुराना लीक हो चुका प्रश्नपत्र ही दोबारा बांट दिया। इसके चलते उन केंद्रों के छात्रों को तीसरी बार परीक्षा में बैठना पड़ा था।
6.पंजाब एक्साइज एंड टैक्स इंस्पेक्टर भर्ती में फर्जीवाड़ा
पंजाब एक्साइज एंड टैक्स इंस्पेक्टर भर्ती (197 पद) की मेरिट लिस्ट में गंभीर और तकनीकी विसंगतियां सामने आने के बाद यह पूरी भर्ती प्रक्रिया विवादों के घेरे में आ गई है। पंजाब अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (PSSSB) द्वारा जारी की गई आधिकारिक मेरिट लिस्ट में भारी प्रशासनिक लापरवाही और फर्जीवाड़ा पकड़ा गया। विपक्षी नेताओं और उम्मीदवारों द्वारा उजागर किए गए तथ्यों के अनुसार, मेरिट लिस्ट में अभ्यर्थियों के असली नामों की जगह SBI, GIPS और यहां तक कि Photo जैसे फर्जी नाम दर्ज पाए गए। इस डेटाबेस विसंगति, पारदर्शिता की कमी और व्यापक धांधली के खिलाफ उम्मीदवारों (अलका और अन्य) ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का रुख किया। अदालत में चौतरफा घिरने के बाद, पंजाब सरकार को हाई कोर्ट में अंडरटेकिंग (लिखित आश्वासन) देना पड़ा कि वे फिलहाल इस आबकारी निरीक्षक भर्ती की चयन प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाएंगे और इस पर रोक लगा दी गई है। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और पंजाब के स्थानीय विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री भगवंत मान की ‘आम आदमी पार्टी’ सरकार पर तीखा राजनीतिक हमला बोला। विपक्ष का आरोप है कि पंजाब में मेरिट पर नौकरी देने के दावे पूरी तरह खोखले हैं और यह सीधे तौर पर होनहार युवाओं के भविष्य के साथ हुआ एक बड़ा ‘सिस्टमैटिक विश्वासघात’ है।
7.PSSSB की ग्रुप-बी संयुक्त भर्ती परीक्षा गंभीर धांधलियां
पंजाब अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड की दो परीक्षाओं में पेपर लीक के आरोप लगे। (PSSSB) द्वारा आयोजित ग्रुप-बी (Group-B) संयुक्त भर्ती परीक्षा गंभीर धांधली, अनियमितताओं और पेपर लीक के आरोपों के कारण बड़े विवाद में है। यह कंबाइंड परीक्षा 408 उच्च पदों के लिए आयोजित की गई थी, जिसमें राज्य के लगभग 1 लाख अभ्यर्थी शामिल हुए। इस भर्ती की कई धांधलियों में से एक बठिंडा से असामान्य टॉपर लिस्ट रही। परीक्षा के नतीजे जारी होने के बाद सबसे बड़ा विवाद इसके मेरिट पैटर्न को लेकर हुआ। राज्य की अंतिम टॉप-100 उम्मीदवारों की सूची में से 22 अभ्यर्थी अकेले बठिंडा क्षेत्र से थे। इस संदेहास्पद सूची में एक ही परिवार के करीबी रिश्तेदार (पति-पत्नी, भाई-बहन और चचेरे भाई-बहन) एक साथ टॉपर लिस्ट में चयनित हुए। अभ्यर्थियों का आरोप है कि पेपर परीक्षा से एक दिन पहले ही बठिंडा में लीक होकर चुनिंदा सेंटरों तक पहुंच गया था। बठिंडा के परीक्षा केंद्रों से यह गंभीर शिकायत सामने आई कि उम्मीदवारों को बांटे जाने से पहले ही प्रश्नपत्रों और सील में व्हाइटनर लगाकर बदलाव किए गए थे। दिलचस्प तथ्य यह भी रहा कि इसकी पूर्व की परीक्षाओं में फेल छात्र अब टॉपर बन गए थे। चौतरफा विरोध और मुख्यमंत्री भगवंत मान तक मामला पहुंचने के बाद, चयन बोर्ड (SSSB) ने खुद पंजाब विजिलेंस ब्यूरो को पत्र लिखकर इस महाघोटाले की उच्च स्तरीय जांच सौंप दी।









