Home पोल खोल नेहरू के अहंकार से राहुल के अविश्वास तक: कांग्रेस के ‘सेना अपमान’...

नेहरू के अहंकार से राहुल के अविश्वास तक: कांग्रेस के ‘सेना अपमान’ और राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ का पूरा सच

SHARE

भारतीय सैन्य इतिहास में 1 सितंबर 1959 का दिन एक बड़ा मोड़ था, जब राजनीतिक अहंकार और विचारहीनता के चलते देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर संकट में डाला गया। तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल के.एस. थिमैया ने जब चीन के बढ़ते खतरे और सेना की कमजोर तैयारियों को लेकर रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन की मनमानी का विरोध करते हुए इस्तीफा दिया, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सैन्य सलाह सुनने के बजाय अपने करीबी मंत्री का पक्ष लिया। नेहरू के इस रवैये और संसद में आर्मी चीफ के अपमान ने न केवल भारतीय सेना के मनोबल को गहरी चोट पहुंचाई, बल्कि 1962 के युद्ध में देश की पराजय की नींव भी रख दी। सैन्य नेतृत्व की अनदेखी करने, जीती हुई बाजी कूटनीति की मेज पर गंवाने और राष्ट्रीय सुरक्षा पर सवाल खड़े करने की यह कांग्रेसी सोच 1947 के नेहरू से शुरू होकर आज राहुल गांधी के दौर तक लगातार देखने को मिलती है।

कांग्रेस के कारनामे – उपेक्षा, अहंकार और राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ का इतिहास

‘सेना की जरूरत ही क्या है’ – जब नेहरू ने पहले सेना प्रमुख करियप्पा की सलाह का उड़ाया मजाक
1947 में आजादी के तुरंत बाद भारत के पहले कमांडर-इन-चीफ फील्ड मार्शल के.एम. करियप्पा ने जब देश की उत्तरी सीमाओं की सुरक्षा और सेना के आधुनिकीकरण का प्रस्ताव रखा, तो प्रधानमंत्री नेहरू ने उनकी दूरदर्शिता को खारिज करते हुए कहा था कि भारत को सेना की आवश्यकता ही नहीं है, पुलिस ही देश चलाने के लिए काफी है। देश की सुरक्षा के प्रति इस बुनियादी उपेक्षा ने शुरुआती दौर में ही सेना के विकास और रक्षा ढांचे को कमजोर कर दिया।

एकतरफा सीजफायर और यूएन की भूल – PoK का नासूर पैदा करने वाली नीति
1948 में कबायली हमले के दौरान जब भारतीय सेना शौर्य का प्रदर्शन करते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों को पीछे धकेल रही थी, तब नेहरू ने सेना को आगे बढ़ने से रोककर एकतरफा युद्धविराम घोषित कर दिया। सेना को अपनी सीमाएं पूरी तरह सुरक्षित करने का अवसर दिए बिना इस आंतरिक मामले को संयुक्त राष्ट्र (UN) के मंच पर ले जाने की ऐतिहासिक भूल की गई। इसी अदूरदर्शी फैसले के कारण पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) का विवाद पैदा हुआ, जिसका नुकसान देश आज तक उठा रहा है।

‘जीप घोटाला’ – रक्षा खरीद में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद की शुरुआत
1948 में वी.के. कृष्ण मेनन ब्रिटेन में उच्चायुक्त रहते हुए सेना के लिए जीप खरीद के चर्चित मामले के केंद्र में थे। निष्पक्ष जांच कराने के बजाय नेहरू ने उनका बचाव किया और बाद में उन्हें देश का रक्षा मंत्री तक बना दिया। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सौदों में बिचौलियों और राजनीतिक संरक्षण का यह पहला बड़ा उदाहरण बना, जिसने रक्षा खरीद तंत्र को प्रभावित किया।

अनुच्छेद 370 और 35A का थोपाव – कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद की नींव
1949 में सरदार पटेल और डॉ. आंबेडकर की असहमतियों के बावजूद नेहरू सरकार ने संविधान में अनुच्छेद 370 और बाद में 1954 के राष्ट्रपति आदेश से 35A को जोड़कर जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दे दिया। अलग संविधान, अलग झंडे और दोहरी व्यवस्था ने देश की एकता को चोट पहुंचाई और दशकों तक कश्मीर में अलगाववाद व सीमा पार आतंकवाद का आधार तैयार किया, जिसकी कीमत भारतीय सैनिकों और नागरिकों ने अपने बलिदान से चुकाई।

कोको द्वीप की अनदेखी – चीन को सामरिक जासूसी अड्डा सौंपने वाली ऐतिहासिक चूक
1950 के दशक के आरंभ में बंगाल की खाड़ी में अंडमान द्वीप समूह के ठीक उत्तर में स्थित रणनीतिक कोको द्वीप समूह पर भारत का मजबूत ऐतिहासिक दावा था। लेकिन नेहरू सरकार की उदासीनता और कूटनीतिक ढिलाई के कारण यह क्षेत्र म्यांमार के नियंत्रण में चला गया। आज इसी कोको द्वीप पर चीन ने अपना इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस और सैन्य निगरानी बेस बना रखा है, जहां से वह भारत के मिसाइल परीक्षणों, अंतरिक्ष अभियानों और नौसैनिक गतिविधियों पर सीधी नजर रखता है।

रदार पटेल की चिट्ठी की उपेक्षा – जब पहले गृह मंत्री की चेतावनी को रद्दी समझा गया
7 नवंबर 1950 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने नेहरू को एक विस्तृत पत्र लिखकर तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद भारत की सीमाओं पर मंडराते खतरे से आगाह किया था। पटेल ने स्पष्ट कहा था कि चीन शांति का मुखौटा पहनकर आक्रामकता की तैयारी कर रहा है। लेकिन नेहरू ने अपने उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की इस दूरदर्शी चेतावनी को भी यह कहकर खारिज कर दिया कि चीन कभी भारत पर हमला नहीं करेगा।

यूएन सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट पर चीन को तरजीह देने की भूल
1950 के दशक में जब वैश्विक मंच पर भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता के अनौपचारिक अवसर मिले, तब नेहरू ने चीन के पहले हक और एशियाई एकजुटता के नाम पर इसे ठुकरा दिया। भारत के हितों की अनदेखी कर चीन की स्थायी सदस्यता की पैरवी करने की इस भूल का नुकसान आज तक भारत उठा रहा है, जहां वही चीन वीटो पावर का इस्तेमाल कर भारत की राह में बाधाएं खड़ी करता है और आतंकवादियों का बचाव करता है।

पंचशील समझौता और तिब्बत सरेंडर – बफर स्टेट गंवाने की ऐतिहासिक भूल
1954 में नेहरू सरकार ने चीन के साथ पंचशील समझौता करते हुए बिना किसी सीमा निर्धारण के तिब्बत पर चीन के कब्जे को आधिकारिक मान्यता दे दी। भारत ने सदियों पुराने अपने सामरिक, व्यापारिक और सैन्य अधिकार बिना किसी ठोस गारंटी के छोड़ दिए। भारत और चीन के बीच की ऐतिहासिक बफर सीमा समाप्त हो गई और चीन की सेना सीधे भारत की हिमालयी सीमाओं पर आकर तैनात हो गई।

जनरल थिमैया की अनसुनी चेतावनी और ‘नेहरू-मेनन’ की मनमानी
1959 में जब सीमा पर चीनी गतिविधियां बढ़ रही थीं, तब जनरल थिमैया ने सरकार को सेना की स्थिति, हथियारों की कमी और चीन के आक्रामक इरादों को लेकर आगाह किया था। लेकिन तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन ने पेशेवर सैन्य सलाह को दरकिनार करते हुए रक्षा नीतियों में दखलंदाजी शुरू कर दी। सेना की जरूरतों को पूरा करने के बजाय आयुध कारखानों की प्राथमिकताओं को भटकाया गया और वरिष्ठता को नजरअंदाज कर पसंदीदा अफसरों को पदोन्नत किया गया। जब थिमैया ने इसके विरोध में इस्तीफा दिया, तो नेहरू सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय मानने के बजाय अपनी प्रतिष्ठा की लड़ाई बना लिया।

अक्साई चिन पर चीनी कब्जा – ‘घास का तिनका नहीं उगता’ कहकर 38,000 वर्ग किमी जमीन गंवाना
1950 के दशक के मध्य में जब चीन ने भारत के लद्दाख स्थित अक्साई चिन क्षेत्र में गुपचुप तरीके से शिनजियांग-तिब्बत राजमार्ग (Highway 179) बना लिया, तब नेहरू सरकार वर्षों तक देश और संसद से इस घुसपैठ को छिपाए रही। जब 1959 में यह सच सामने आया, तो संसद में भारतीय सीमा की रक्षा का संकल्प लेने के बजाय प्रधानमंत्री नेहरू ने यह कहकर अपनी लाचारी पर पर्दा डाला कि ‘अक्साई चिन में तो घास का एक तिनका भी नहीं उगता, वह बंजर इलाका है।’ इस गैर-जिम्मेदाराना रुख के कारण भारत ने अपनी 38,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक संप्रभु भूमि हमेशा के लिए गंवा दी। 

संसद में सेना प्रमुख का सार्वजनिक अपमान – सैन्य मनोबल पर गहरी चोट
1959 में नेहरू ने जनरल थिमैया को इस्तीफा वापस लेने के लिए मना तो लिया, लेकिन इसके तुरंत बाद संसद के पटल पर दिए अपने बयान में आर्मी चीफ के रुख को मामूली और तुच्छ कहकर खारिज कर दिया। देश की संसद में सेना प्रमुख के स्वाभिमान को आहत करने की इस घटना ने पूरी सैन्य कमान का मनोबल तोड़ दिया। यह संदेश गया कि तत्कालीन सरकार के लिए राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा से अधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक हठ था।

बिना तैयारी की ‘फॉरवर्ड पॉलिसी’ – बिना बैकअप जवानों को मोर्चे पर झोंकना
1961 में नेहरू सरकार की रणनीतिक अदूरदर्शिता का बड़ा उदाहरण उनकी बिना तैयारी वाली फॉरवर्ड पॉलिसी थी। सेना के पास पर्याप्त रसद, भारी तोपखाने, गर्म कपड़े और गोला-बारूद का बैकअप मौजूद नहीं था, फिर भी सैनिकों को दुर्गम चौकियों पर आगे बढ़ने का निर्देश दिया गया। पेशेवर सैन्य कमांडरों की व्यावहारिक आपत्तियों को दरकिनार कर लागू की गई इस नीति ने भारतीय जवानों को विपरीत परिस्थितियों में ला खड़ा किया।

वायुसेना को जंग से बाहर रखने की ऐतिहासिक भूल
1962 के युद्ध का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह था कि भारतीय वायुसेना के पास सक्षम लड़ाकू विमान मौजूद थे, जो चीनी सेना की लंबी सप्लाई लाइनों को ध्वस्त कर सकते थे। इसके बावजूद नेहरू सरकार ने युद्ध के फैलने के डर से वायुसेना के लड़ाकू विमानों के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी। राजनीतिक संकोच के कारण देश की वायु शक्ति जमीन पर खड़ी रही और पैदल सैनिक बिना एयर सपोर्ट के मुकाबला करते रहे।

हेंडरसन ब्रूक्स रिपोर्ट को दबाना – 1962 की नाकामी पर पर्दा डालने का काम
1963 में 1962 की पराजय के कारणों की जांच के लिए सेना ने लेफ्टिनेंट जनरल हेंडरसन ब्रूक्स और ब्रिगेडियर पी.एस. भगत की समिति बनाई थी। इस रिपोर्ट में साफ दर्ज था कि विफलता के लिए सेना नहीं, बल्कि अपरिपक्व फॉरवर्ड पॉलिसी, सैन्य सलाह की अनदेखी और राजनीतिक दखलंदाजी जिम्मेदार थी। कांग्रेस सरकारों ने दशकों तक इस रिपोर्ट को गोपनीय बनाकर दबाए रखा, ताकि तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व की कमियां सामने न आ सकें।

शक्सगाम घाटी का हस्तांतरण – चीन-पाक गठजोड़ पर कूटनीतिक लाचारी
1963 में 1962 के युद्ध के बाद उपजी परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए पाकिस्तान ने भारत के PoK क्षेत्र की 5,180 वर्ग किलोमीटर की सामरिक शक्सगाम घाटी चीन को सौंप दी। 1948 में PoK का मुद्दा अधूरा छोड़ने और 1962 की पराजय के कारण उपजी दुर्बलता के चलते नेहरू सरकार चीन और पाकिस्तान के इस गठजोड़ और भारतीय भूमि के बंटवारे को रोकने में पूरी तरह विफल रही।

कच्छ के रण में मध्यस्थता – सीमा विवाद पर अंतरराष्ट्रीय दबाव में झुकना
1965 के मुख्य युद्ध से पहले जब पाकिस्तान ने गुजरात के कच्छ के रण में भारतीय चौकियों पर हमला किया, तो तत्कालीन सरकार ने इस घुसपैठ का सैन्य रूप से निर्णायक जवाब देने के बजाय मामले को अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल के हवाले कर दिया। मध्यस्थता स्वीकार करने की इस कमजोर कूटनीति के कारण भारत को अपनी 350 वर्ग मील भूमि का हिस्सा गंवाना पड़ा, जिसने पाकिस्तान का दुस्साहस बढ़ाया।

ताशकंद समझौता – हाजी पीर दर्रा लौटाकर घुसपैठ का स्थायी रास्ता खोलना
1965 के युद्ध में भारतीय सेना ने अदम्य साहस दिखाते हुए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हाजी पीर दर्रे पर विजय प्राप्त की थी। लेकिन 1966 के ताशकंद समझौते में राजनीतिक नेतृत्व ने सेना के बलिदान से जीती गई इस सामरिक चोटी को पाकिस्तान को वापस सौंप दिया। इसी हाजी पीर दर्रे का इस्तेमाल पाकिस्तान आज तक कश्मीर में आतंकियों की घुसपैठ कराने के लिए मुख्य रास्ते के तौर पर करता आ रहा है।

शिमला समझौते में 93,000 युद्धबंदी छोड़े – PoK का मौका गंवाने वाला आत्मसमर्पण
1971 के युद्ध में भारतीय सेना ने अदम्य पराक्रम दिखाते हुए पाकिस्तान के दो टुकड़े किए और 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर किया। लेकिन 1972 के शिमला समझौते की मेज पर इंदिरा गांधी की सरकार ने इस ऐतिहासिक सैन्य जीत को कूटनीतिक विफलता में बदल दिया। बिना किसी ठोस लिखित गारंटी के, PoK का स्थायी समाधान निकाले बिना और हमारे लापता 54 युद्धबंदियों को छुड़ाए बिना ही सभी 93,000 पाकिस्तानी बंदियों को रिहा कर दिया गया।

चार दशकों तक फौजी हक पर ताला – OROP को अटकाने की शुरुआत
1973 में इंदिरा गांधी की सरकार ने पूर्व सैनिकों की पेंशन गणना के नियमों को एकतरफा बदलकर उनके लाभ कम कर दिए। इसके बाद से चार दशकों तक पूर्व सैनिक ‘वन रैंक, वन पेंशन’ (OROP) की अपनी मांग को लेकर संघर्ष करते रहे। कांग्रेस की सरकारों ने फंड का बहाना बनाकर इसे टाला और 2014 के चुनावी बजट में महज 500 करोड़ रुपये का प्रावधान कर औपचारिकता निभाई।

कच्चातीवु द्वीप को सौंपना – सीमाओं के साथ समझौते की मिसाल
1974 में इंदिरा गांधी सरकार ने संसद और देश को विश्वास में लिए बिना सामरिक रूप से महत्वपूर्ण कच्चातीवु द्वीप श्रीलंका को सौंप दिया। बिना किसी कूटनीतिक लाभ के भारत की संप्रभु भूमि को सौंपने के इस फैसले का नुकसान आज तक भारतीय मछुआरों को अपनी आजीविका और सुरक्षा गंवाकर भुगतना पड़ रहा है।

बोफोर्स विवाद – तोपखाने की खरीद पर 30 साल का अघोषित विराम
1986 के बोफोर्स तोप सौदे में दलाली और अनियमितताओं के आरोपों में घिरने के बाद कांग्रेस सरकारों में ऐसा संकोच बैठा कि तीन दशकों तक भारतीय सेना के लिए नई आधुनिक तोपों की खरीद ठंडे बस्ते में डाल दी गई। इस नीतिगत जड़ता के कारण सेना 30 साल तक तोपखाने के आधुनिकीकरण के लिए जूझती रही, जिससे सीमा पर सेना की मारक क्षमता प्रभावित हुई।

ऑपरेशन ब्रासटैक्स – जब सेना प्रमुख जनरल सुंदरजी का हौसला तोड़ा गया
1987 में सेना प्रमुख जनरल के. सुंदरजी ने पश्चिमी सीमा पर भारतीय सेना की युद्धक क्षमता की परख के लिए बड़ा युद्धाभ्यास ‘ऑपरेशन ब्रासटैक्स’ आयोजित किया था। इस अभ्यास से पाकिस्तान दबाव में आ गया था, लेकिन राजीव गांधी की सरकार ने अपने ही सेना प्रमुख का समर्थन करने के बजाय उनका राजनीतिक रूप से उपहास उड़ाया और असहज स्थिति पैदा की।

आईपीकेएफ का श्रीलंका मिशन – बिना स्पष्ट रणनीति 1,100 जवानों का बलिदान
1987 में राजीव गांधी सरकार ने बिना किसी स्पष्ट सैन्य रणनीति, ठोस खुफिया जानकारी और एग्जिट प्लान के भारतीय शांति सेना (IPKF) को श्रीलंका में भेजा। इस राजनीतिक फैसले के कारण 1,100 से अधिक भारतीय जवान बलिदान हुए। सेना को बिना तैयारी के समझौते की भेंट चढ़ाया गया और मिशन की समाप्ति के बाद सैनिकों के इस बलिदान को उचित सम्मान तक नहीं दिया गया।

आईएनएस विराट का निजी उपयोग – रक्षा संसाधनों के दुरुपयोग की सोच
1987 के अंत में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनके परिवार द्वारा लक्षद्वीप के द्वीपों पर छुट्टियां मनाने के लिए भारतीय नौसेना के प्रमुख विमानवाहक पोत ‘आईएनएस विराट’ और नौसैनिक हेलीकॉप्टरों का उपयोग किया गया। देश की समुद्री सुरक्षा के लिए तैनात शीर्ष युद्धपोत को पारिवारिक यात्रा के लिए इस्तेमाल करने की यह घटना रक्षा संसाधनों के अनुचित उपयोग की बड़ी मिसाल बनी।

शहीदों के पार्थिव शरीर घर न भेजने की संवेदनहीन परंपरा बनाम वाजपेयी सरकार का सम्मान
1999 से पहले के दशकों लंबे कांग्रेसी शासनकाल में युद्धों और सीमाई झड़पों में शहीद होने वाले वीर जवानों के पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांवों और परिवारों तक पूरे सम्मान के साथ नहीं भेजे जाते थे, बल्कि मोर्चे के पास ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाता था। देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले जवानों के परिवारों को उनके अंतिम दर्शन के अवसर से वंचित रखने की यह व्यवस्था लंबे समय तक चलती रही। 1999 के करगिल युद्ध के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने इस पुरानी व्यवस्था को समाप्त किया। वाजपेयी सरकार ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए पहली बार शहीदों के पार्थिव शरीर को पूरे सैन्य सम्मान के साथ तिरंगे में लपेटकर उनके घर पहुंचाने की व्यवस्था लागू की, जिससे पूरे राष्ट्र और समाज को अपने वीर बलिदानियों को नमन करने का गौरव प्राप्त हुआ।

वाजपेयी सरकार द्वारा गठित करगिल समिति की सिफारिशों को 10 साल तक लटकाए रखना
1999 के करगिल युद्ध में विजय के तुरंत बाद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने देश के रक्षा तंत्र की कमियों को दूर करने के लिए के. सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में ऐतिहासिक करगिल रिव्यू कमेटी का गठन किया था। इस समिति ने तीनों सेनाओं के संयुक्त तालमेल के लिए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS), थिएटर कमांड्स और खुफिया तंत्र में व्यापक सुधारों की सिफारिश की थी। लेकिन 2004 में सत्ता में आई कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने राजनीतिक अनिर्णय और उपेक्षा के चलते वाजपेयी सरकार द्वारा तैयार इस पूरे सुधार रोडमैप को 10 साल तक ठंडे बस्ते में डाले रखा, जिससे देश का सुरक्षा ढांचा लंबे समय तक आधुनिक तालमेल से वंचित रहा।

सियाचिन से सेना हटाने का मसौदा – कूटनीति के नाम पर रणनीतिक जोखिम
2006 में यूपीए के कार्यकाल के दौरान पाकिस्तान के साथ बातचीत के नाम पर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सियाचिन ग्लेशियर से भारतीय सेना को पीछे हटाने का मसौदा तैयार किया जा रहा था। भारतीय सेना के कड़े रुख के बाद इस कदम को रोका जा सका। यह दिखाता था कि किस तरह सामरिक चौकियों को बातचीत की मेज पर दांव पर लगाने का प्रयास किया गया।

26/11 तटीय सुरक्षा चूक और हमलों के बाद बंधे रखे सेना के हाथ
2008 में समुद्री सीमा की निगरानी के लिए कोस्टल रडार नेटवर्क के प्रस्ताव फाइलों में अटके रहे, जिसके चलते पाकिस्तानी आतंकी समुद्र के रास्ते मुंबई में दाखिल हुए और 26/11 का हमला किया। इसके बाद भी, जब भारतीय सेना और वायुसेना ने आतंकी ठिकानों पर प्रहार करने की योजना तैयार कर ली थी, तब तत्कालीन सरकार ने जवाबी कार्रवाई की अनुमति नहीं दी।

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ समझौता और वैचारिक भटकाव
2008 में कांग्रेस पार्टी ने बीजिंग में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के साथ औपचारिक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। डोकलाम गतिरोध के समय राहुल गांधी की चीनी राजदूत से मुलाकात और राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन से मिले अनुदान पर सवाल उठना—राष्ट्रीय सुरक्षा के संवेदनशील मुद्दों पर पार्टी का रुख हमेशा संदेह के घेरे में रहा।

‘भगवा आतंकवाद’ के नैरेटिव के लिए सैन्य खुफिया की साख पर हमला
2008 में यूपीए शासन के दौरान राजनीतिक लाभ के लिए गढ़े गए ‘भगवा आतंकवाद’ के नैरेटिव के तहत भारतीय सेना की अत्यंत गोपनीय शाखा मिलिट्री इंटेलिजेंस (MI) के जांबाज अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित को मालेगांव मामले में मोहरा बनाकर झूठे आरोपों में फंसाया गया। खुफिया तंत्र के पेशेवर अधिकारियों को नौ साल तक जेल में प्रताड़ित करने की इस घटना ने पहली बार देश की सुरक्षा से जुड़ी पेशेवर सैन्य खुफिया व्यवस्था की साख और मनोबल को राजनीतिक लाभ के लिए गंभीर चोट पहुंचाई।

टाट्रा ट्रक मामला – सेना प्रमुख को 14 करोड़ की खुली रिश्वत और रक्षा खरीद में बिचौलिए
2010-2012 के दौरान यूपीए शासन में सेना के लिए बीईएमएल (BEML) के जरिए खरीदे जा रहे घटिया टाट्रा ट्रकों की खरीद का गंभीर मामला सामने आया। तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वी.के. सिंह ने सार्वजनिक खुलासा किया था कि 1,676 सब-स्टैंडर्ड ट्रकों की खरीद फाइल पास कराने के लिए पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल तेजिंदर सिंह द्वारा उनके कार्यालय में 14 करोड़ रुपये की सीधी रिश्वत की पेशकश की गई थी। इस प्रकरण ने उजागर किया कि कांग्रेस के दौर में रक्षा सौदों में बिचौलियों का नेटवर्क इतना बेखौफ था कि वे सीधे सेना प्रमुख को प्रभावित करने का दुस्साहस कर रहे थे।

सेना पर अविश्वास – तख्तापलट की अफवाह फैलाकर सैन्य साख पर हमला
2012 में यूपीए कार्यकाल के दौरान सेना की हिसार (हरियाणा) स्थित 33 आर्म्ड डिवीजन की मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री यूनिट और आगरा (उत्तर प्रदेश) स्थित 50 पैरा ब्रिगेड की एक टुकड़ी के नियमित कोहरे कालीन अभ्यास को लेकर सत्ता प्रतिष्ठान के करीबी हलकों द्वारा तख्तापलट की झूठी बात फैलाई गई। राजनीतिक अविश्वास और घबराहट के चलते देश की अत्यंत अनुशासित सेना के शीर्ष नेतृत्व पर संदेह जताना और वैश्विक मंच पर भारतीय सेना की साख को बट्टा लगाना कांग्रेस की नकारात्मक राजनीति का चरम था।

संसद में ‘सड़कें न बनाने’ की पराजयवादी नीति का बयान
6 सितंबर 2013 को तत्कालीन रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने संसद के पटल पर आधिकारिक रूप से स्वीकार किया था कि आजादी के बाद दशकों तक भारत की आधिकारिक नीति यही रही कि सीमावर्ती इलाकों में सड़कें न बनाई जाएं, ताकि युद्ध की स्थिति में चीनी सेना उन सड़कों का इस्तेमाल करके भारतीय क्षेत्र में तेजी से आगे न बढ़ सके। बुनियादी ढांचे को जानबूझकर अविकसित रखने की इस नीति ने लद्दाख और अरुणाचल सीमा पर भारतीय सेना के लॉजिस्टिक्स और अग्रिम मोर्चों तक पहुंच को पंगु बनाए रखा।

बुलेटप्रूफ जैकेट, गोला-बारूद और लड़ाकू विमानों पर नीतिगत सुस्ती
2013-14 में संसद में पेश सीएजी (CAG Report No. 19) की आधिकारिक रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि सेना के 170 प्रकार के गोला-बारूद में से 50% से अधिक का स्टॉक अनिवार्य 40 दिनों के न्यूनतम युद्ध भंडार (WWR) के मुकाबले 10 दिन से भी कम बचा था। अग्रिम मोर्चे के जवानों के लिए 1.86 लाख आधुनिक बुलेटप्रूफ जैकेट्स की मांग 2009 से अटकी रही और 2007 से शुरू हुई 126 मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (MMRCA/राफेल) की खरीद प्रक्रिया को 8 साल तक नीतिगत अनिर्णय में लटकाए रखा गया, जिससे वायुसेना की स्क्वाड्रन क्षमता घटकर 32 पर आ गई।

शहीदों के सम्मान में 60 साल का सूखा – नेशनल वॉर मेमोरियल की उपेक्षा
आजादी के बाद से देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले 26,000 से अधिक वीर जवानों के सम्मान में एक राष्ट्रीय युद्ध स्मारक बनाने की मांग 1960 के दशक से लंबित थी। कांग्रेस के दशकों लंबे शासनकाल में स्मारकों की झड़ी लगाई गई, लेकिन सीमाओं पर बलिदान देने वाले वीर शहीदों के लिए दिल्ली में एक संयुक्त राष्ट्रीय स्मारक बनाने पर ध्यान नहीं दिया गया।

सर्जिकल स्ट्राइक और गलवान पर सवाल – सेना के शौर्य पर अविश्वास
1959 में जो काम नेहरू ने संसद में आर्मी चीफ का उपहास उड़ाकर किया था, वही प्रवृत्ति आज राहुल गांधी और उनकी पार्टी के बयानों में दिखाई देती है। उरी सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद सेना की कार्रवाई पर सवाल उठाना, गलवान घाटी की हिंसक झड़प में जवानों के पराक्रम के बीच आधिकारिक रुख पर अविश्वास जताना और सैन्य नेतृत्व पर बयानबाजी करना—यह सब पुरानी मानसिकता की निरंतरता को दर्शाता है।

मोदी सरकार के निर्णायक कदम – सशक्त सेना और आत्मनिर्भर भारत का युग

सेना को रणनीतिक खुली छूट और निर्णायक नेतृत्व
2014 के बाद से भारत ने संकोची रुख को पूरी तरह त्याग दिया है। राजनीतिक नेतृत्व ने सेना पर भरोसा जताते हुए फील्ड कमांडरों को सीमा पर किसी भी उकसावे का मुंहतोड़ जवाब देने की पूरी छूट दी। डोकलाम में महीनों तक डटे रहना हो, गलवान में चीनी सैनिकों को पीछे धकेलना हो, या सीमा पार जाकर सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयरस्ट्राइक को अंजाम देना—आज का नेतृत्व सेना के पीछे मजबूती से खड़ा रहता है।

‘घर में घुसकर प्रहार’ का नया सुरक्षा डॉक्ट्रिन: आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस
पुरानी संकोची नीति को समाप्त कर भारत ने प्रोएक्टिव सुरक्षा नीति अपनाई है। उरी और पुलवामा के बाद सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयरस्ट्राइक ने दुनिया को संदेश दिया कि भारत अब केवल अपनी सीमा में रक्षा नहीं करेगा, बल्कि आतंकी आकाओं के ठिकानों पर सीमा पार जाकर सीधा प्रहार करेगा। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के आतंकी तंत्र को उजागर कर उसे कूटनीतिक रूप से अलग-थलग किया गया।

अनुच्छेद 370 का खात्मा: कश्मीर में अलगाववाद और टेरर नेटवर्क पर प्रहार
5 अगस्त 2019 को दशकों पुरानी भूल को सुधारते हुए अनुच्छेद 370 और 35A को समाप्त कर दिया गया। इस साहसिक कदम ने जम्मू-कश्मीर को देश की मुख्यधारा से पूरी तरह जोड़कर अलगाववाद, पत्थरबाजी और सीमा पार से संचालित होने वाले टेरर नेटवर्क की रीढ़ तोड़ दी। सुरक्षाबलों को आतंकवादियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई का अधिकार मिला, जिससे घाटी में शांति और विकास का मार्ग खुला।

ऐतिहासिक सैन्य सुधार: चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) और थियेटराइजेशन
दशकों से लंबित पड़ी चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) की मांग को पूरा करते हुए मोदी सरकार ने तीनों सेनाओं—थल, जल और नभ—के बीच बेहतर समन्वय और संयुक्त रणनीति की नींव रखी। आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुसार सेना का आधुनिकीकरण और थिएटर कमांड्स का गठन यह सुनिश्चित कर रहा है कि तीनों सेनाएं एक संयुक्त शक्ति के रूप में कार्य करें।

स्पेस, साइबर और स्पेशल ऑपरेशंस डिवीजन: आधुनिक युद्ध के लिए एकीकृत कमान
आधुनिक तकनीकी युद्ध की चुनौतियों से निपटने के लिए मोदी सरकार ने तीनों सेनाओं की संयुक्त आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल ऑपरेशंस डिवीजन (AFSOD), डिफेंस स्पेस एजेंसी (DSA) और डिफेंस साइबर एजेंसी (DC&SA) का गठन किया। इस एकीकृत ढांचे ने सुनिश्चित किया है कि भारतीय सेना भविष्य के अंतरिक्ष, साइबर और विशेष कमांडो अभियानों में पूरी तरह सक्षम रहे।

बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर में क्रांति: टनल और रणनीतिक सड़कें
सड़क न बनाने की पुरानी नीति को पलटते हुए लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक सीमावर्ती बुनियादी ढांचे का व्यापक विकास किया गया है। अटल टनल, सेला टनल और नीचीफू टनल जैसी आधुनिक सुरंगों के निर्माण से भारतीय सेना की अग्रिम चौकियों तक साल के 12 महीने सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित हुई है। इसके साथ ही दरबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी (DS-DBO) रोड जैसे विशाल प्रोजेक्ट्स ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारतीय सेना के कनेक्टिविटी नेटवर्क को मजबूत किया है।

त्वरित मोबिलाइजेशन की अभूतपूर्व सैन्य ताकत
सीमावर्ती आधुनिक सड़कों और टनल नेटवर्क के बल पर आज भारतीय सेना की प्रतिक्रिया क्षमता कई गुना बढ़ चुकी है। आपात स्थिति में अब भारतीय सेना कुछ ही घंटों के भीतर सीमा पर इन्फैंट्री, तोपखाना, टैंक और बख्तरबंद गाड़ियां तैनात करने में पूरी तरह सक्षम है। मोर्चे पर सेना की इस तीव्र गतिशीलता ने सीमा पार बैठे विरोधियों के लिए किसी भी दुस्साहस का जोखिम बहुत बढ़ा दिया है।

वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम: सीमावर्ती गांव बने ‘पहली रक्षा पंक्ति’
सीमावर्ती इलाकों से पलायन रोकने और सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए मोदी सरकार ने वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम शुरू किया। इस योजना के जरिए दुर्गम सीमाई गांवों को 24 घंटे बिजली, शुद्ध पेयजल, पक्की ऑल-वेदर सड़कों और डिजिटल कनेक्टिविटी से जोड़ा जा रहा है। इन अग्रिम गांवों को सभी आधुनिक सुविधाओं से लैस कर देश की सशक्त पहली रक्षा पंक्ति के रूप में विकसित किया गया है।

स्मार्ट बॉर्डर फेंसिंग और एंटी-ड्रोन ग्रिड: सीमाओं पर डिजिटल निगरानी
संवेदनशील सीमाओं पर व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली (CIBMS) के तहत स्मार्ट फेंसिंग, थर्मल इमेजर और लेजर बैरियर का आधुनिक ग्रिड स्थापित किया गया है। सीमा पार से होने वाली ड्रोन घुसपैठ और हथियारों की तस्करी को रोकने के लिए स्वदेशी एंटी-ड्रोन सिस्टम्स और एआई-आधारित निगरानी तैनात कर भारतीय सीमाओं को अभेद्य बनाया गया है।

पूर्वोत्तर में स्थायी शांति: शांति समझौतों से बदला माहौल, अफस्पा के दायरे में कमी
दशकों तक अशांति में रहे पूर्वोत्तर राज्यों में ऐतिहासिक शांति समझौतों के जरिए विद्रोही गुटों को मुख्यधारा में शामिल कराया गया। सुरक्षा स्थिति में आए व्यापक सुधार के चलते पूर्वोत्तर के अधिकांश हिस्सों से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (AFSPA) के दायरे को चरणबद्ध तरीके से कम कर दिया गया, जिससे पूरे क्षेत्र में विकास और शांति को बल मिला।

लक्षद्वीप और अंडमान की रणनीतिक किलेबंदी: ‘आईएनएस जटायु’ से समुद्री निगरानी
जिस लक्षद्वीप का उपयोग पहले केवल यात्राओं के लिए देखा गया था, उसी लक्षद्वीप के मिनिकॉय द्वीप पर मोदी सरकार ने नया नौसैनिक बेस ‘आईएनएस जटायु’ स्थापित किया है। अंडमान-निकोबार में ‘आईएनएस कोहासा’ और ‘आईएनएस बाज’ के आधुनिकीकरण के साथ भारत ने मलक्का जलडमरूमध्य से लेकर पूरे हिंद महासागर के अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर निगरानी रखने वाला मजबूत सुरक्षा ढांचा तैयार किया है।

पारदर्शी रक्षा खरीद: G2G मॉडल से राफेल जैसे आधुनिक हथियारों का आगमन
दलाली और बिचौलियों के दौर को समाप्त करते हुए मोदी सरकार ने रक्षा सौदों में पूर्ण पारदर्शिता और सरकार-से-सरकार (G2G) खरीद मॉडल को प्राथमिकता दी। इसी व्यवस्था के चलते भारतीय वायुसेना को बिना किसी देरी के 36 राफेल लड़ाकू विमान, एस-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम और आधुनिक सिग सॉर राइफल्स समय पर प्राप्त हुए।

रक्षा बजट का स्वदेशीकरण: पूंजीगत खरीद का 75% फंड भारतीय उद्योग के नाम
रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा विदेशी कंपनियों को सौंपने की पुरानी परिपाटी पर मोदी सरकार ने विराम लगाया। अब रक्षा आधुनिकीकरण (Capital Procurement) बजट का लगभग 75% हिस्सा केवल भारतीय उद्योगों, एमएसएमई और रक्षा स्टार्टअप्स से खरीद के लिए आरक्षित कर दिया गया है। इससे देश का संसाधन देश के भीतर हथियार निर्माण और अनुसंधान में लग रहा है।

पॉजिटिव इंडिजनाइजेशन लिस्ट्स: 509 प्रमुख हथियारों और रक्षा उपकरणों के आयात पर रोक
विदेशी हथियार लॉबी और बिचौलियों पर स्थायी रोक लगाने के लिए मोदी सरकार के रक्षा मंत्रालय ने 2020 से 2024 के बीच 5 अलग-अलग सूचियां जारी कर 509 प्रमुख रक्षा उपकरणों, तोपखानों, स्वदेशी लाइट टैंक (जोरावर), मिसाइल कोरवेट और आधुनिक गोला-बारूद के आयात पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया। इसके साथ ही रक्षा उपक्रमों (DPSUs) के लिए 4,600 से अधिक कलपुर्जों की अलग सूची जारी कर तीनों सेनाओं के लिए अनिवार्य किया गया कि वे इन हथियारों की खरीद केवल भारतीय उद्योगों और स्टार्टअप्स से ही करें। 

ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों का कायाकल्प: 200 साल पुराने ढांचे को बदला कॉर्पोरेट कंपनियों में
सुस्ती और गुणवत्ता की कमी से जूझ रहे 200 साल पुराने ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड (OFB) का पुनर्गठन करते हुए सरकार ने 41 कारखानों को 7 पेशेवर और प्रतिस्पर्धी कॉर्पोरेट रक्षा कंपनियों (DPSUs) में बदल दिया। इस सुधार ने रक्षा कारखानों की कार्यकुशलता और हथियारों की गुणवत्ता को बेहतर किया, जिससे आज ये कंपनियां सेना की जरूरतें पूरी करने के साथ विदेशी देशों को भी निर्यात कर रही हैं।

डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर्स: उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में हथियार निर्माण
देश में रक्षा विनिर्माण को गति देने के लिए उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में दो विशाल डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर स्थापित किए गए हैं। अमेठी, बुंदेलखंड और चेन्नई जैसे केंद्रों में एके-203 असाल्ट राइफल्स, तोपें, मिसाइल घटक और एडवांस ड्रोन प्रणालियों का निर्माण हो रहा है, जिससे आत्मनिर्भरता के साथ युवाओं को बड़े पैमाने पर तकनीकी रोजगार मिल रहा है।

आईडेक्स (iDEX) और रक्षा स्टार्टअप्स: एआई और ड्रोन तकनीक की क्रांति
रक्षा मंत्रालय की इनोवेशंस फॉर डिफेंस एक्सीलेंस (iDEX) पहल के जरिए देश के युवा इनोवेटर्स, स्टार्टअप्स और एमएसएमई को सेना की आधुनिक जरूरतों से जोड़ा गया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, क्वांटम कंप्यूटिंग, एंटी-ड्रोन सिस्टम और स्वदेशी स्वार्म ड्रोन तकनीक में भारतीय प्रतिभाएं सेना को आधुनिक टूल्स उपलब्ध करा रही हैं।

आधुनिक इन्फैंट्री का कायाकल्प: सिग सॉर, एके-203 और सुरक्षा उपकरण
अग्रिम मोर्चे पर तैनात जवानों को आधुनिक सिग सॉर (Sig Sauer 716) राइफल्स, एके-203, आधुनिक बैलिस्टिक हेलमेट, थर्मल साइट्स, नाइट विजन उपकरण और स्वदेशी बुलेटप्रूफ जैकेट्स से पूरी तरह सुसज्जित किया गया है, जिससे जवानों की व्यक्तिगत सुरक्षा और मारक क्षमता में भारी वृद्धि हुई है।

अभेद्य एयर डिफेंस शील्ड: एस-400 और स्वदेशी मिसाइलों का सुरक्षा घेरा
देश के हवाई क्षेत्र को सुरक्षित करने के लिए भारत ने अत्याधुनिक एस-400 ट्रायम्फ मिसाइल सिस्टम तैनात किया है। इसके साथ ही स्वदेशी आकाश, समर और क्यूआरएसएएम जैसी मिसाइल प्रणालियों का बहुस्तरीय सुरक्षा कवच तैयार किया गया है, जो किसी भी हवाई खतरे को समय रहते नष्ट करने में सक्षम है।

न्यूक्लियर ट्रायड की पूर्णता: जल, थल और नभ में परमाणु सुरक्षा कवच
स्वदेशी परमाणु पनडुब्बियों आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात के संचालन के साथ भारत ने अपने न्यूक्लियर ट्रायड को पूरी तरह सक्रिय कर लिया है। जमीन से अग्नि मिसाइलें, हवा से लड़ाकू विमान, और समुद्र की गहराइयों से परमाणु क्षमता हासिल कर भारत ने अपनी सेकंड स्ट्राइक क्षमता को मजबूत किया है, जिससे देश के खिलाफ कोई भी परमाणु ब्लैकमेल बेअसर हो चुका है।

मिशन शक्ति (A-SAT): अंतरिक्ष में सैटेलाइट मार गिराने वाला चौथा महाशक्ति भारत
2019 में मिशन शक्ति के तहत भारत ने अंतरिक्ष में 300 किलोमीटर दूर लाइव सैटेलाइट को मिसाइल से मार गिराकर एंटी-सैटेलाइट (A-SAT) क्षमता हासिल की। इस उपलब्धि के साथ भारत अमेरिका, रूस और चीन के बाद स्पेस डिफेंस क्षमता रखने वाला दुनिया का चौथा देश बना।

औपनिवेशिक प्रतीकों से मुक्ति: नौसेना के ध्वज पर छत्रपति शिवाजी महाराज की मुहर
गुलामी की मानसिकता के प्रतीकों को हटाते हुए भारतीय नौसेना के ध्वज से ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रतीक सेंट जॉर्ज क्रॉस को हमेशा के लिए विदा किया गया। नौसेना के नए ध्वज पर भारतीय नौसैनिक परंपरा के जनक छत्रपति शिवाजी महाराज की नौसैनिक राजमुद्रा (अष्टकोण) को अंकित कर राष्ट्रीय गौरव को पुनर्स्थापित किया गया।

हिंद महासागर में भारत का दबदबा: समुद्री सुरक्षा का मजबूत केंद्र
सागर (SAGAR) विजन और क्वाड (Quad) संवाद के जरिए भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में अपनी नौसैनिक उपस्थिति को मजबूत किया है। ओमान के दुक्म पोर्ट, अंडमान कमान के विस्तार और मित्र देशों के साथ सामरिक तालमेल के जरिए भारतीय नौसेना पूरे क्षेत्र में सुरक्षा की प्रमुख धुरी बनी है।

ब्रह्मोस और पिनाका का वैश्विक निर्यात: रक्षा कूटनीति में भारत की धमक
हथियारों के आयातक से आगे बढ़कर भारत आज घातक हथियारों का निर्यातक बन चुका है। फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और आर्मेनिया को स्वदेशी पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर व तोपों की आपूर्ति ने अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार में भारत के बढ़ते प्रभाव को स्थापित किया है।

संकटग्रस्त युद्धक्षेत्रों में तिरंगे की ताकत: ऑपरेशन गंगा और कावेरी
यूक्रेन में ऑपरेशन गंगा, सूडान में ऑपरेशन कावेरी, अफगानिस्तान में ऑपरेशन देवी शक्ति और यमन में ऑपरेशन राहत के जरिए भारतीय वायुसेना और नौसेना ने संकट के बीच हजारों नागरिकों को सुरक्षित निकाला। इसने साबित किया कि दुनिया में कहीं भी संकट आने पर भारतीय तिरंगा अपने नागरिकों की सुरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी है।

सैन्य मोर्चे पर नारी शक्ति: फाइटर पायलट से लेकर सियाचिन तक
राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) और सैनिक स्कूलों के द्वार बेटियों के लिए खोले गए। सेना की तीनों शाखाओं में महिलाओं को स्थायी कमीशन दिया गया। आज बेटियां लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं, नौसैनिक युद्धपोतों की कमान संभाल रही हैं और सियाचिन जैसे दुर्गम युद्धक्षेत्र की अग्रिम चौकियों पर तैनात होकर सेवाएं दे रही हैं।

‘आत्मनिर्भर भारत’: रक्षा निर्माण में ऐतिहासिक रिकॉर्ड
तेजस लड़ाकू विमान, प्रचंड हेलीकॉप्टर, आईएनएस विक्रांत विमानवाहक पोत, ब्रह्मोस मिसाइलें, के-9 वज्र और धनुष तोपों का निर्माण देश में ही हो रहा है। रिकॉर्ड रक्षा उत्पादन और 21,000 करोड़ रुपये से अधिक के रक्षा निर्यात ने साबित किया है कि आज का भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय आत्मनिर्भर बन रहा है।

सैनिकों का सर्वोच्च सम्मान: OROP और नेशनल वॉर मेमोरियल
मोदी सरकार ने चार दशकों से लंबित ‘वन रैंक, वन पेंशन’ (OROP) को लागू कर पूर्व सैनिकों के खातों में हजारों करोड़ रुपये की राशि पहुंचाई। इसके साथ ही दिल्ली के इंडिया गेट पर भव्य नेशनल वॉर मेमोरियल का निर्माण कर आजादी के बाद से देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले प्रत्येक बलिदानी को राष्ट्रीय पटल पर अमर सम्मान दिया गया है।

उपेक्षा के अंधकार से आत्मनिर्भरता के नए सवेरे तक: बदलता भारत
इतिहास के पन्ने इस बात के गवाह हैं कि कांग्रेस के लंबे शासनकाल में राजनीतिक अहंकार, नीतिगत अनिर्णय और रक्षा सौदों में बिचौलियों के दखल ने देश की सीमाओं और सेना के स्वाभिमान को बार-बार आहत किया। 1959 में जनरल थिमैया के अपमान से शुरू हुआ वह सिलसिला 1962 की पराजय और दशकों तक सैन्य जरूरतों की उपेक्षा के रूप में सामने आया। इसके विपरीत, बीते एक दशक में मोदी सरकार के निर्णायक नेतृत्व ने न केवल इन ऐतिहासिक गलतियों को सुधारा है, बल्कि ‘राष्ट्र प्रथम’ की नीति के साथ भारतीय सेना को आधुनिक तकनीक, स्वदेशी हथियारों और रणनीतिक खुली छूट से लैस किया है। आज का भारत रक्षात्मक संकोच से बाहर निकलकर अंतरिक्ष से लेकर समुद्र की गहराइयों तक एक आत्मनिर्भर, सशक्त और वैश्विक महाशक्ति के रूप में सीना तानकर खड़ा है।

Leave a Reply