प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने शिक्षा को देश के विकास और युवाओं की क्षमता को मजबूत करने का प्रमुख आधार बनाया है। मोदी राज में भारत का उच्च शिक्षा क्षेत्र पिछले एक दशक में तेजी से बदला है। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की संख्या बढ़ी है, छात्रों का नामांकन बढ़ा है और महिलाओं के साथ-साथ एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों की भागीदारी में भी सुधार हुआ है। यह बदलाव भारत के उस बड़े लक्ष्य से जुड़ा है, जिसमें देश को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर ले जाने और उच्च शिक्षा को ज्यादा सुलभ, समान और गुणवत्तापूर्ण बनाने पर जोर है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 इसी सोच का एक बड़ा उदाहरण है। इसका लक्ष्य ऐसी शिक्षा व्यवस्था तैयार करना है, जिसमें केवल डिग्री हासिल करना ही मकसद न हो, बल्कि विद्यार्थियों को बहु-विषयक ज्ञान, कौशल, रचनात्मकता, शोध और नवाचार के अवसर भी मिलें। यह व्यवस्था सतत विकास लक्ष्य-4 यानी सभी के लिए समावेशी और समान गुणवत्ता वाली शिक्षा के लक्ष्य के अनुरूप भी है।

बढ़ता उच्च शिक्षा नेटवर्क, बढ़ते अवसर
ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (एआईएसएचई) के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दशक में भारत का उच्च शिक्षा नेटवर्क तेजी से फैला है। वर्ष 2014-15 में देश में विश्वविद्यालयों की संख्या 760 थी, जो 2023-24 में बढ़कर 1,289 हो गई। यानी करीब 69.6 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इसी तरह कॉलेजों की संख्या 38,498 से बढ़कर 48,246 हो गई, जो 25.3 प्रतिशत की वृद्धि है। स्टैंडअलोन संस्थानों की संख्या भी 12,276 से बढ़कर 15,221 हो गई। इसका सीधा मतलब है कि देश में उच्च शिक्षा के लिए संस्थागत आधार पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत हुआ है। यह विस्तार सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है। नए संस्थानों के बढ़ने का मतलब है कि ज्यादा युवाओं के लिए उच्च शिक्षा के दरवाजे खुले हैं। छोटे शहरों और अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों को भी आगे बढ़ने के ज्यादा अवसर मिले हैं।
4.50 करोड़ छात्रों तक पहुंची उच्च शिक्षा
उच्च शिक्षा में विद्यार्थियों की बढ़ती भागीदारी इस बदलाव की सबसे बड़ी तस्वीर पेश करती है। 2014-15 में देश में उच्च शिक्षा के कुल नामांकन की संख्या 3.42 करोड़ थी, जो 2023-24 में बढ़कर 4.50 करोड़ हो गई। यानी एक दशक में करीब 31.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात यानी जीईआर भी लगातार बढ़ा है। 2014-15 में यह 23.7 प्रतिशत था, जो 2022-23 में 29.5 प्रतिशत और 2023-24 में बढ़कर 30 प्रतिशत हो गया। यह प्रगति एनईपी 2020 के उस लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जिसमें 2035 तक जीईआर को 50 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है।
अलग-अलग स्तरों पर भी विद्यार्थियों की भागीदारी बढ़ी है। पीएचडी में नामांकन 1.17 लाख से बढ़कर 3.43 लाख हो गया, यानी करीब 193 प्रतिशत की वृद्धि। पोस्ट-ग्रेजुएट स्तर पर नामांकन 38.53 लाख से बढ़कर 57.85 लाख हुआ, जबकि अंडर-ग्रेजुएट विद्यार्थियों की संख्या 2.71 करोड़ से बढ़कर 3.45 करोड़ हो गई। इंटीग्रेटेड पाठ्यक्रमों में तो करीब 301 प्रतिशत की असाधारण वृद्धि दर्ज की गई। यह बदलाव बताता है कि विद्यार्थी अब पारंपरिक डिग्री के साथ-साथ नए और अधिक लचीले शिक्षा विकल्पों की ओर भी बढ़ रहे हैं।

बेटियों की बढ़ती भागीदारी, बदलती तस्वीर
उच्च शिक्षा में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी इस दशक के सबसे सकारात्मक बदलावों में शामिल है। महिला विद्यार्थियों का नामांकन 2014-15 में 1.57 करोड़ था, जो 2023-24 में बढ़कर 2.24 करोड़ हो गया। यानी करीब 42.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई। महिलाओं का जीईआर भी 22.9 प्रतिशत से बढ़कर 31.2 प्रतिशत हो गया। खास बात यह है कि 2023-24 में महिलाओं का जीईआर पुरुषों के 28.9 प्रतिशत से अधिक रहा। लगातार सातवें वर्ष महिला जीईआर का पुरुषों से आगे रहना उच्च शिक्षा में बदलती लैंगिक तस्वीर का बड़ा संकेत है। जेंडर पैरिटी इंडेक्स यानी जीपीआई भी 0.92 से बढ़कर 1.08 हो गया। सरल शब्दों में कहें तो उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी अब पुरुषों के मुकाबले बराबरी के स्तर को पार कर चुकी है। एससी वर्ग में जीपीआई 0.91 से बढ़कर 1.11 और एसटी वर्ग में 0.81 से बढ़कर 1.08 हुआ है।
सामाजिक समावेशिता को मिली मजबूती
मोदी सरकार के नेतृत्व में शिक्षा व्यवस्था में सामाजिक रूप से वंचित वर्गों की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। एआईएसएचई के आंकड़े बताते हैं कि कुल नामांकन में एससी विद्यार्थियों की हिस्सेदारी 13.44 प्रतिशत से बढ़कर 15.5 प्रतिशत हो गई। एसटी विद्यार्थियों की हिस्सेदारी भी 4.8 प्रतिशत से बढ़कर 6.4 प्रतिशत हुई। वहीं ओबीसी विद्यार्थियों की भागीदारी 32.8 प्रतिशत से बढ़कर 40.1 प्रतिशत हो गई। यानी उच्च शिक्षा का दायरा अब पहले की तुलना में ज्यादा सामाजिक रूप से विविध हुआ है। एससी विद्यार्थियों का जीईआर 18.9 प्रतिशत से बढ़कर 27.8 प्रतिशत और एसटी विद्यार्थियों का जीईआर 13.5 प्रतिशत से बढ़कर 22.8 प्रतिशत हो गया। ये आंकड़े बताते हैं कि उच्च शिक्षा अब समाज के ज्यादा व्यापक वर्ग तक पहुंच रही है।
दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए भी बढ़े अवसर
समावेशी शिक्षा की तस्वीर में बेंचमार्क विकलांगता वाले विद्यार्थियों यानी पीडब्ल्यूबीडी की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। इन विद्यार्थियों का नामांकन 2014-15 में 64,298 था, जो 2022-23 में बढ़कर 88,816 हो गया। इस दौरान करीब 38.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। हालांकि इस क्षेत्र में अभी कुछ चुनौतियां भी बनी हुई हैं। 2023-24 में 54,080 पीडब्ल्यूबीडी विद्यार्थी नामांकित थे, जिनमें 34,080 पुरुष और 20,000 महिलाएं थीं। यानी दिव्यांग महिलाओं की उच्च शिक्षा में भागीदारी बढ़ाने के लिए अभी और प्रयास की जरूरत है। समावेशी शिक्षा की अगली चुनौती यही है कि पहुंच का लाभ हर वर्ग और हर जेंडर तक समान रूप से पहुंचे।

स्टेम शिक्षा पर बढ़ा जोर
विकसित भारत के निर्माण में विज्ञान और तकनीक की भूमिका को देखते हुए स्टेम यानी साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथमेटिक्स की शिक्षा भी महत्वपूर्ण हो गई है। पिछले दशक में इन विषयों में विद्यार्थियों की संख्या लगातार बढ़ी है। स्टेम में कुल नामांकन 2014-15 में 91.5 लाख था, जो 2023-24 में बढ़कर 1.02 करोड़ हो गया। करीब 11.5 प्रतिशत की यह वृद्धि बताती है कि भारतीय युवा तेजी से तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं। डिजिटल टेक्नोलॉजी, नवाचार, रिसर्च और रोजगार के नए अवसरों ने इस बदलाव को गति दी है। भारत को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था और वैश्विक इनोवेशन हब बनाने की दिशा में स्टेम शिक्षा आने वाले वर्षों में और महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
दुनिया के विद्यार्थियों के लिए भी भारत बना आकर्षण
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था का अंतरराष्ट्रीयकरण भी इस दशक में आगे बढ़ा है। देश में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों की संख्या 2014-15 में 42,293 थी, जो 2023-24 में बढ़कर 58,134 हो गई। यानी करीब 37.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह वृद्धि भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों की वैश्विक पहुंच और अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सहयोग की बढ़ती संभावनाओं को दिखाती है। भारत की शिक्षा व्यवस्था अब केवल देश के विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि वैश्विक ज्ञान नेटवर्क का हिस्सा बनने की दिशा में भी आगे बढ़ रही है।
शिक्षकों की संख्या में भी बढ़ोतरी
विद्यार्थियों की संख्या बढ़ने के साथ उच्च शिक्षा में शिक्षकों की संख्या बढ़ना भी जरूरी है। इस मोर्चे पर भी पिछले दशक में अच्छी प्रगति हुई है। 2014-15 में उच्च शिक्षा में शिक्षकों की संख्या 14.73 लाख थी, जो 2023-24 में बढ़कर 17.32 लाख हो गई। यानी करीब 2.59 लाख शिक्षकों की वृद्धि हुई। महिला शिक्षकों की संख्या में तो इस अवधि में 36.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। 2022-23 में कुल शिक्षण कार्यबल में महिला शिक्षकों की हिस्सेदारी 44.3 प्रतिशत थी, जो 2023-24 में बढ़कर 44.9 प्रतिशत हो गई।

कैंपस में सुविधाओं का विस्तार
उच्च शिक्षा की गुणवत्ता केवल कक्षाओं और शिक्षकों से तय नहीं होती। आधुनिक कैंपस में लाइब्रेरी, प्रयोगशाला, खेल सुविधाएं, कंप्यूटर सेंटर, स्वास्थ्य केंद्र और कौशल विकास जैसी सुविधाएं भी जरूरी हैं। पिछले दशक में इन बुनियादी सुविधाओं के विस्तार पर भी ध्यान दिया गया है। 2023-24 में 98 प्रतिशत विश्वविद्यालयों, 98 प्रतिशत कॉलेजों और 98 प्रतिशत स्टैंडअलोन संस्थानों में लाइब्रेरी की सुविधा थी। प्रयोगशालाएं 89 प्रतिशत विश्वविद्यालयों, 85 प्रतिशत कॉलेजों और 94 प्रतिशत स्टैंडअलोन संस्थानों में उपलब्ध थीं। खेल सुविधाओं की बात करें तो 94 प्रतिशत विश्वविद्यालयों, 95 प्रतिशत कॉलेजों और 91 प्रतिशत स्टैंडअलोन संस्थानों में खेल का मैदान मौजूद था। इसके अलावा कंप्यूटर सेंटर, कौशल विकास केंद्र, स्वास्थ्य सुविधाएं, ऑडिटोरियम और कॉन्फ्रेंस हॉल जैसी सुविधाओं का भी विस्तार हुआ है।
बढ़े आउटपुट, मजबूत हुआ ज्ञान तंत्र
उच्च शिक्षा की सफलता सिर्फ इस बात से नहीं मापी जाती कि कितने विद्यार्थियों ने दाखिला लिया, बल्कि यह भी देखा जाता है कि कितने विद्यार्थी अपनी पढ़ाई पूरी करके आगे बढ़े। 2014-15 में उच्च शिक्षा से निकलने वाले विद्यार्थियों की संख्या 88.28 लाख थी, जो 2023-24 में बढ़कर 1.09 करोड़ से ज्यादा हो गई। करीब 24.06 प्रतिशत की यह वृद्धि बढ़ते नामांकन, विद्यार्थियों के बेहतर बने रहने, कार्यक्रम पूरा करने की क्षमता और संस्थानों की बढ़ती क्षमता की ओर इशारा करती है। यानी उच्च शिक्षा व्यवस्था में इनपुट के साथ-साथ आउटपुट भी मजबूत हुआ है।
विकसित भारत के लिए तैयार होती नई शिक्षा व्यवस्था
पिछला एक दशक भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए विस्तार और बदलाव का दशक रहा है। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की बढ़ती संख्या से लेकर 4.50 करोड़ छात्रों के नामांकन, महिलाओं की रिकॉर्ड भागीदारी, एससी-एसटी-ओबीसी विद्यार्थियों की बढ़ती हिस्सेदारी और स्टेम शिक्षा के विस्तार तक, तस्वीर में बड़ा बदलाव दिखाई देता है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में एनईपी 2020 ने इस बदलाव को एक व्यापक दिशा देने का काम किया है। इसका फोकस ऐसी शिक्षा व्यवस्था पर है, जो पहुंच के साथ गुणवत्ता, समानता के साथ उत्कृष्टता और डिग्री के साथ कौशल व नवाचार को महत्व दे। आने वाले वर्षों में चुनौती इन उपलब्धियों को और आगे ले जाने की है। 2035 तक 50 प्रतिशत जीईआर का लक्ष्य, शोध और नवाचार को बढ़ावा, दिव्यांग और वंचित वर्गों की भागीदारी बढ़ाना तथा भारतीय संस्थानों को वैश्विक स्तर पर और मजबूत बनाना अगला पड़ाव होगा।

कुल मिलाकर, पिछले दस वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था अब सिर्फ अधिक युवाओं को शिक्षा देने तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसी ज्ञान व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जो अधिक व्यापक, समावेशी, तकनीक-सक्षम और भविष्य के लिए तैयार है। यही बदलाव विकसित भारत@2047 के लिए देश की युवा शक्ति को ज्ञान, कौशल और अवसरों से जोड़ने की मजबूत नींव तैयार कर रहा है।








