मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव तक समाजवादी पार्टी की राजनीति लंबे समय तक मुस्लिम-यादव समीकरण के इर्द-गिर्द घूमती रही है। मुलायम ने मुसलमानों को सपा का मजबूत राजनीतिक आधार बनाया और पार्टी की पहचान मुस्लिम हितों की राजनीति करने वाली पार्टी के तौर पर स्थापित की। 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले जारी घोषणापत्र में भी मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण देने जैसे कई वादे किए गए थे।
लेकिन अखिलेश यादव के दौर में इन वादों, मुस्लिम प्रतिनिधित्व और पार्टी की राजनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर लगातार सवाल उठते रहे। समय के साथ सपा के भीतर और बाहर से मुस्लिम नेताओं की नाराजगी के स्वर भी सामने आए। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों से लेकर आजम खान प्रकरण, शफीकुर्रहमान बर्क और सलीम शेरवानी की नाराजगी और अब इमरान मसूद व मौलाना शहाबुद्दीन रजवी के बयानों तक, कई घटनाओं ने मुस्लिम समाज में सपा के प्रति भरोसे और अखिलेश यादव के नेतृत्व पर सवाल खड़े किए।
इन घटनाओं ने उस राजनीतिक धारणा को भी चुनौती दी है कि उत्तर प्रदेश का मुस्लिम मतदाता एकतरफा तौर पर समाजवादी पार्टी के साथ है। सवाल यह है कि जिस मुस्लिम समर्थन को अखिलेश की पार्टी अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत मानती है, उसी समुदाय के भीतर से पार्टी और अखिलेश के नेतृत्व के खिलाफ असंतोष के स्वर बार-बार क्यों उठ रहे हैं?
इमरान मसूद ने दी अखिलेश को सीधी चुनौती
हाल ही में कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर अखिलेश यादव की पार्टी के ‘बीजेपी बनाम सपा’ वाले नैरेटिव को सीधे चुनौती दी। मसूद ने कहा कि गठबंधन के लिए शोर समाजवादी पार्टी ही मचा रही है, लेकिन समाजवादी पार्टी किसी मुस्लिम नेता को बर्दाश्त नहीं कर सकती, जो अपनी बात रखता हो, और ऐसा नेता अब कांग्रेस में है।

इमरान मसूद के ये बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से आते हैं, जहां मुस्लिम मतदाता चुनावी राजनीति में अहम भूमिका निभाते हैं। उनका रुख सपा के उस दावे पर सवाल खड़ा करता है कि मुस्लिम वोटों का सबसे मजबूत और स्वाभाविक विकल्प वही है। यह चुनौती सिर्फ गठबंधन की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि मुस्लिम नेतृत्व और प्रतिनिधित्व के सवाल से भी जुड़ती है।
शहाबुद्दीन रजवी ने भी साधा अखिलेश पर निशाना
बरेली के मौलाना शहाबुद्दीन रजवी भी अखिलेश यादव पर लगातार निशाना साधते रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश मुस्लिम मुद्दों पर बात करने से बचते हैं और मुस्लिमों से सपा का विकल्प तलाशने की अपील की। शहाबुद्दीन रजवी ने सपा से मुस्लिम मुख्यमंत्री चेहरा घोषितकरने की मांग भी की।

इन बयानों से यह संकेत मिलता है कि मुस्लिम नेतृत्व के भीतर अखिलेश की पार्टी को लेकर एकरूपता नहीं है। कहीं पार्टी से नाराजगी है तो कहीं मुस्लिम प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग। यानी जिस समुदाय को सपा अपना मजबूत राजनीतिक आधार मानती है, उसके भीतर नेतृत्व और प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल लगातार उठ रहे हैं।
रजवी ने बाद में अखिलेश पर और तीखे बयान दिए, अखिलेश यादव को बीजेपी का एजेंट तक बताया। ऐसे बयानों से यह बहस और तेज हुई कि मुस्लिम समाज के प्रभावशाली चेहरों के बीच अखिलेश यादव की स्वीकार्यता पहले जैसी है या नहीं।

अखिलेश को उल्टा पड़ा मुस्लिमों को साधने का दावा?
समाजवादी पार्टी लंबे समय से मुस्लिम वोटों को साधने के लिए तुष्टिकरण की राजनीति करती रही है। पार्टी ने मुस्लिम छात्रों और युवाओं से जुड़े कई वादे किए। इनमें मुस्लिम युवाओं के खिलाफ आतंकवाद से जुड़े कथित झूठे मामलों की समीक्षा, मुस्लिम छात्राओं के लिए आर्थिक सहायता और अन्य योजनाओं के वादे शामिल थे। लेकिन इन वादों के पूरा न होने से मुस्लिम समुदाय के बीच अखिलेश को लेकर गुस्सा बढ़ता रहा है।

‘रिहाई मंच’ जैसे संगठनों ने अखिलेश पर आरोप लगाया कि उन्होंने ‘झूठे वादे’ कर मुसलमानों को गुमराह किया।
18 प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण पर अखिलेश का झूठ
2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अपने घोषणापत्र में मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण देने का वादा किया था। उस समय उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 18-19 प्रतिशत बताई जाती थी, इसलिए इस वादे को राजनीतिक तौर पर 18 प्रतिशत आरक्षण के वादे के रूप में प्रचारित किया गया।
सरकार बनने के बाद यह वादा लागू नहीं हो सका। दिसंबर 2016 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों ने अखिलेश यादव सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर 18 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की मांग उठाई। प्रदर्शन के दौरान वोट बैंक की राजनीति से आगे बढ़ने की अपील वाले पोस्टर भी लगाए गए।
अखिलेश सरकार के कार्यकाल के आखिरी दौर में मुस्लिम छात्रों के बीच से ही सपा सरकार के वादों पर सवाल उठ रहे थे। इससे मुसलमानों से अखिलेश की पार्टी के झूठे वादे और उनके अमल के बीच की दूरी सामने आई।

अखिलेश राज में मुजफ्फरनगर दंगे
2012 के घोषणापत्र में समाजवादी पार्टी ने सांप्रदायिक दंगे रोकने का वादा किया था। लेकिन अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते 2013 में मुजफ्फरनगर में बड़ा सांप्रदायिक दंगा हुआ। इसमें 62 लोगों की मौत हुई और हजारों लोग विस्थापित हुए।
मुजफ्फरनगर दंगों ने अखिलेश सरकार के सामने सबसे कठिन राजनीतिक सवाल खड़े किए। खासकर मुस्लिम समुदाय के बीच यह सवाल उठा कि जिस सरकार से सुरक्षा की उम्मीद की गई थी, उसके कार्यकाल में इतनी बड़ी सांप्रदायिक हिंसा कैसे हुई।
दंगों के बाद सपा के उन दावों पर भी सवाल उठे, जिनमें सांप्रदायिक हिंसा रोकने की गारंटी दी गई थी। मुस्लिमों की सुरक्षा को लेकर बनाया गया राजनीतिक भरोसा इस घटना से गहरे सवालों के घेरे में आया।

अखिलेश सरकार पर फूटा शाही इमाम का गुस्सा
मुजफ्फरनगर दंगों के बाद दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने मुलायम सिंह यादव को पत्र लिखकर मुस्लिमों में बढ़ती नाराजगी की बात कही थी। उन्होंने अखिलेश सरकार के दौरान सांप्रदायिक हिंसा बढ़ने का आरोप लगाया और चेतावनी दी कि यदि स्थिति नहीं बदली तो मुस्लिमों को सपा के बारे में अपना रुख बदलने पर मजबूर होना पड़ सकता है। बुखारी ने सपा के घोषणापत्र में किए गए कई वादों के पूरी तरह लागू न होने का भी सवाल उठाया। यानी अखिलेश सरकार के कार्यकाल में मुस्लिम असंतोष की आवाज केवल विपक्षी दलों से नहीं, बल्कि मुस्लिम धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व के कुछ हिस्सों से भी उठ रही थी।

2017 में मुलायम ने अखिलेश पर उठाया सवाल
अखिलेश यादव के खिलाफ मुस्लिम असंतोष की चर्चा उस समय और गंभीर हो गई, जब खुद सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने उन पर सवाल उठाए। 16 जनवरी 2017 को मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश पर मुस्लिमों के प्रति ‘negative approach’ रखने की बात कही।
मुलायम ने कहा कि उन्होंने एक मुस्लिम अधिकारी को प्रदेश का DGP बनाने की कोशिश की थी, लेकिन अखिलेश इससे नाराज थे। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर मुस्लिमों के हित की बात आई तो वह अपने बेटे अखिलेश के खिलाफ भी लड़ेंगे। यह बयान इसलिए अहम था क्योंकि आरोप किसी विपक्षी नेता ने नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी के संस्थापक और अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव ने लगाए थे। इससे यह सवाल और गहरा हुआ कि क्या अखिलेश की राजनीतिक प्राथमिकताएं मुलायम के दौर की मुस्लिम-केंद्रित राजनीति से बदल चुकी थीं?

सपा के मुस्लिम नेता खुलकर करने लगे असंतोष की बात
2022 के विधानसभा चुनाव के बाद सपा के भीतर से भी मुस्लिम असंतोष खुलकर सामने आने लगा। सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने अप्रैल 2022 में अपनी ही पार्टी पर मुस्लिमों के हित में पर्याप्त काम न करने का आरोप लगाया।
यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि यह आरोप किसी विरोधी दल के नेता की ओर से नहीं, बल्कि सपा के अपने सांसद की ओर से आया था। इससे पार्टी के मुस्लिम आधार के भीतर प्रतिनिधित्व और राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर असंतोष के तौर पर देखा गया।

‘अखिलेश यादव नहीं चाहते आजम खान जेल से बाहर आएं’
आजम खान प्रकरण ने भी सपा और उसके मुस्लिम आधार के बीच बढ़ती दूरी को सामने ला दिया। आजम खान के करीबी फसाहत अली खान ‘शानू’ ने अखिलेश यादव पर आजम खान और मुस्लिम समुदाय की अनदेखी का आरोप लगाया।
उन्होंने दावा किया कि अखिलेश जेल में आजम खान से केवल एक बार मिले और उनकी रिहाई के लिए पार्टी ने पर्याप्त प्रयास नहीं किया। आजम खान मामले में सवाल उठे की मुश्किल के समय अखिलेश अपने मुसलमान नेताओं ाका साथ नहीं देते, बल्कि उन्हें केवल वोट के लिए इस्तेमाल करते हैं।

ओवैसी का अखिलेश पर ‘one-sided love’ वाला तीर
2022 में ओवैसी ने मुस्लिमों के सपा के प्रति समर्थन को ‘one-sided love’बताया। उनका आरोप था कि मुस्लिम मतदाता सपा को समर्थन देते हैं, लेकिन बदले में उन्हें राजनीतिक नेतृत्व और पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता।
ओवैसी ने मुजफ्फरनगर दंगों और मुस्लिम युवाओं से जुड़े मामलों को भी अखिलेश सरकार के खिलाफ अपने तर्क का हिस्सा बनाया। उनका निशाना सिर्फ अखिलेश नहीं था, बल्कि मुस्लिम मतदाताओं के उस राजनीतिक व्यवहार पर भी था जिसमें वे लगातार एक ही पार्टी को समर्थन देते रहे, जबकि प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी को लेकर सवाल बने रहे।
मुस्लिमों के मामले नें एक्टीव क्यों नहीं अखिलेश
2022 में अखिलेश यादव के आजमगढ़ दौरे और जेल में बंद रामाकांत यादव से मुलाकात को लेकर भी मुस्लिम नेताओं ने सवाल उठाए। AIMIM, राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल और अन्य नेताओं की ओर से पूछा गया कि मुस्लिम नेताओं से जुड़े मामलों में अखिलेश उतनी सक्रियता क्यों नहीं दिखाते। इससे एक बड़ा सवाल सामने आया कि अखिलेश यादव की पार्टी मुस्लिम नेताओं की तुलना में अपने यादव आधार को अधिक राजनीतिक महत्व दे रही है?

यह मामला सपा के पारंपरिक मुस्लिम आधार के भीतर उठ रहे उस सवाल का हिस्सा बना कि क्या पार्टी मुस्लिम नेताओं के बजाय अपने यादव आधार को ज्यादा राजनीतिक महत्व दे रही है?
2023: मेरठ में मुस्लिम वोटों का बदला रुख
2023 के निकाय चुनावों ने भी समाजवादी पार्टी के लिए एक राजनीतिक संकेत दिया। मेरठ मेयर चुनाव में AIMIM उम्मीदवार मोहम्मद अनस दूसरे स्थान पर रहे। रिपोर्टों में मुस्लिम मतदाताओं के एक हिस्से के सपा के बजाय AIMIM के साथ जाने की बात सामने आई।
सहारनपुर में भी मुस्लिम मतदाताओं के एक हिस्से ने सपा उम्मीदवार का समर्थन नहीं किया। ये घटनाएं इस मायने में महत्वपूर्ण थीं कि इन्होंने मुस्लिम वोटों के अखिलेश यादव के नाम पर पूरी तरह एकजुट रहने की धारणा को चुनौती मिली।

2024 में सलीम शेरवानी का इस्तीफा
फरवरी 2024 में सपा के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलीम इकबाल शेरवानी ने पार्टी पद से इस्तीफा दे दिया। उनका सवाल मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर था। शेरवानी ने कहा कि वह लंबे समय से अखिलेश यादव को बता रहे थे कि मुस्लिम समाज और पार्टी के बीच दूरी बढ़ रही है। उन्होंने यह भी पूछा कि अखिलेश यादव ‘मुस्लिम’ शब्द बोलने से क्यों झिझकते हैं।
शेरवानी का इस्तीफा इसलिए अहम था क्योंकि वह लंबे समय से सपा से जुड़े प्रमुख मुस्लिम नेताओं में रहे थे। उनके सवालों ने अखिलेश की पार्टी के मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर चल रही बहस को और धार मिली।

रामपुर-मुरादाबाद: आजम खान खेमे से टकराव
2024 लोकसभा चुनाव के दौरान रामपुर और मुरादाबाद में उम्मीदवारों को लेकर पैदा हुए विवाद ने सपा के मुस्लिम नेतृत्व में चल रही खींचतान को सामने ला दिया। यही वह दौर था जब सपा की पुरानी MY राजनीति और अखिलेश की नई PDA राजनीति के बीच अंतर भी ज्यादा साफ दिखाई देने लगा। मुस्लिम नेतृत्व के एक हिस्से के लिए यह बदलाव प्रतिनिधित्व और राजनीतिक हिस्सेदारी के सवाल से जुड़ा था। इससे अखिलेश यादव के मुस्लिमों के सबसे बड़े राजनीतिक पैरोकार होने के दावे पर भी सवाल उठे।

अखिलेश से मुस्लिम नेताओं की नाराजगी
अब सवाल यह है कि क्या समाजवादी पार्टी का मुस्लिम वोटबैंक पहले की तरह उसके साथ है? सपा को भरोसा है कि मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा उसके साथ है। लेकिन दूसरी ओर मुस्लिम प्रतिनिधित्व, आजम खान प्रकरण, टिकट वितरण और मुस्लिम मुद्दों पर पार्टी की आवाज को लेकर समय-समय पर सपा के भीतर और बाहर से सवाल उठते रहे हैं।
मुलायम सिंह यादव का 2017 का बयान, 2022 में शफीकुर्रहमान बर्क और आजम खान खेमे की नाराजगी, 2023 के निकाय चुनाव में मुस्लिम वोटों के बिखराव, 2024 में सलीम शेरवानी का इस्तीफा और 2026 में इमरान मसूद व मौलाना शहाबुद्दीन रजवी के हमले। ये घटनाएं कम से कम इतना जरूर दिखाती हैं कि मुस्लिम समाज के भीतर सपा और अखिलेश यादव को लेकर असमंजस है।
मुस्लिमों से वादा, लेकिन कितने पूरे हुए?
अखिलेश और उनकी पार्टी के सामने एक और चुनौती झूठे चुनावी वादों को लेकर है। सपा ने 2012 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं को साधने के लिए कई बड़े वादे किए थे। इनमें अल्पसंख्यक छात्रों के लिए मेडिकल शिक्षा में आरक्षण, सरकारी सुरक्षा बलों में मुस्लिमों की भर्ती के लिए विशेष शिविर और मुस्लिम छात्राओं के लिए आर्थिक सहायता जैसे वादे शामिल थे।

लेकिन सरकार बनने के बाद इन वादों के अमल को लेकर सवाल उठे। मेडिकल शिक्षा में मुस्लिम छात्रों के लिए अलग आरक्षण व्यवस्था लागू नहीं हो सकी। सरकारी सुरक्षा बलों में मुस्लिमों की भर्ती के लिए घोषणापत्र के अनुरूप किसी बड़े विशेष अभियान का परिणाम सामने नहीं आया।
मुस्लिम छात्राओं के लिए 30 हजार रुपये की सहायता का भी वादा किया गया था। इसके तहत दसवीं पास मेधावी मुस्लिम लड़कियों को आर्थिक सहायता देने की बात कही गई थी। सरकार ने बाद में ‘हमारी बेटी उसका कल’ योजना शुरू की, जिसका दायरा सभी अल्पसंख्यक समुदायों तक बढ़ाया गया और सहायता राशि में भी बदलाव हुआ। बाद में यह योजना बंद हो गई।
यानी सपा के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि उसने मुसलमानों के लिए कितने वादे किए, बल्कि यह भी है कि उन वादों का कितना हिस्सा जमीन पर उतरा। यही अंतर समय-समय पर मुस्लिम नेताओं और संगठनों की नाराजगी की वजह बनता रहा है।
लेकिन सवाल सिर्फ चुनावी वादों के पूरे होने या न होने का नहीं है। सवाल यह भी है कि जिस मुस्लिम समर्थन को अखिलेश की पार्टी अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत मानती रही, उसी समुदाय के नेताओं और प्रभावशाली चेहरों का एक वर्ग समय-समय पर अखिलेश के नेतृत्व पर सवाल क्यों उठाता रहा है?

यही घटनाएं उस नैरेटिव को चुनौती देती हैं कि मुस्लिम वोट स्वाभाविक और एकतरफा तौर पर अखिलेश यादव के साथ है। मुलायम के दौर में मजबूत हुए मुस्लिम-यादव समीकरण से लेकर अखिलेश के दौर में मुस्लिम प्रतिनिधित्व, वादों, नेतृत्व और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर उठे सवालों तक की कहानी बताती है कि समाजवादी पार्टी और मुस्लिम समाज का रिश्ता अब पहले जितना निर्विवाद नहीं रह गया है।










