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कर्नाटक में फिर नाटक: सिद्धारमैया की मूर्ति को सीएम शिवकुमार के दौर के चलते हटाया, सिद्धारमैया समर्थकों में आक्रोश

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कर्नाटक के कलबुर्गी में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की नौ फीट ऊंची मूर्ति का रातों-रात प्रकट होना और कुछ ही घंटों बाद उसका गायब हो जाना अपने आप में जितना दिलचस्प है, उससे कहीं ज्यादा दिलचस्प उसके पीछे दिखाई देने वाली कांग्रेस की कुत्सित राजनीति है। हाईकोर्ट रोड चौराहे पर सिद्धारमैया की मूर्ति स्थापित की गई। गुरुवार को मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार कर्नाटक उत्सव के लिए कलबुर्गी में थे और उनका काफिला इसी मार्ग से गुजरने वाला था। इसकी भनक लगते ही कलबुर्गी नगर निगम ने प्रशासन ने उसे हटा दिया। बड़ा सवाल यही है कि नौ फुट लंबी मूर्ति लगने के दौरान क्या नगर निगम प्रशासन सो रहा था? या फिर मुख्यमंत्री शिवकुमार की नाराजगी झेलने से बचने के लिए अब अधिकारियों की नींद खुली है? यह भी जानना जरूरी होगा कि कांग्रेस के राज में कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री की मूर्ति लगाने की अनुमति भी ली गई थी या नहीं? या फिर नियम-कायदों को ठेंगा दिखाते हुए पोपाबाई का राज ही चल रहा था!

दौरे से पहले मूर्ति हटाना कांग्रेस की सत्ता-कशमकश को फिर चर्चा में लाया
यह तो निश्चित ही है कि मूर्ति लगाने वाले कांग्रेसी और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के समर्थक रहे होंगे। इसमें सिद्धारमैया की भी सहमति हो सकती है। फिर मूर्ति लगाने के लिए आधिकारिक अनुमति क्यों नहीं ली गई? नींद में गाफिर नगर निगम प्रशासन अब तर्क दे रहा है कि मूर्ति बिना अनुमति लगाई गई थी। इसलिए उसे पुलिस की मौजूदगी में हटाया गया। स्थानीय स्तर पर मूर्ति लगाने को सिद्धारमैया समर्थकों की पहल बताया गया है, जबकि कांग्रेस के भीतर इस घटना को लेकर किसी आधिकारिक आदेश का कोई प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए मुख्यमंत्री शिवकुमार के कलबुर्गी कार्यक्रम से पहले मूर्ति हटवाई गई है। दरअसल, राजनीति में कई बार घटनाओं का महत्व केवल इस बात से तय नहीं होता कि आदेश किसने दिया। समय, स्थान और प्रतीक भी अपना संदेश देते हैं। यह वही चौराहा है, जिस पर पहले भी सिद्धारमैया के नाम पर सर्किल बनाने की मांग होती रही है। उसी जगह उनकी नौ फीट की मूर्ति का लगना और मुख्यमंत्री शिवकुमार के दौरे से ठीक पहले हट जाना स्वाभाविक रूप से कर्नाटक कांग्रेस की पुरानी सत्ता-कशमकश को फिर चर्चा में ले आया है।कांग्रेस के भीतर दोनों के समर्थक खेमों के बीच सत्ता-संघर्ष कलबुर्गी की यह मूर्ति भले कुछ दिन की मेहमान रही हो, लेकिन उसने कर्नाटक में कांग्रेस के लगातार जारी नाटक की उस कहानी को फिर सामने ला दिया है जिसमें दो बड़े नेताओं के बीच नेतृत्व और प्रभाव की रस्साकशी लंबे समय से चलती रही है। सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा 2023 के मुख्यमंत्री चयन से शुरू हुई थी, ऐसा कहना इतिहास को छोटा करना होगा। 2019 में ही दोनों के बीच संगठन और राजनीतिक रणनीति को लेकर मतभेदों की खबरें सामने आ चुकी थीं और 2021 में कांग्रेस के भीतर दोनों के समर्थक खेमों के बीच सत्ता-संघर्ष को लेकर खुली चर्चा होने लगी थी। मूर्ति लगाने के बाद कथित रूप से सरकारी आदेश से मूर्ति को हटाने से सिद्धारमैया समर्थकों में भारी आक्रोश है।

रस्साकशी कोई नई नहीं, 2023 में ही सीएम बनना चाहते थे शिवकुमार
2019 के उपचुनावों में उम्मीदवारों के चयन को लेकर सिद्धारमैया और शिवकुमार अलग-अलग रणनीति के साथ दिखाई दिए थे। उस समय भी दोनों को कर्नाटक कांग्रेस के दो प्रभावशाली ध्रुवों के रूप में देखा जा रहा था। 2021 तक आते-आते यह विभाजन और स्पष्ट हुआ और कांग्रेस के भीतर दोनों नेताओं के बीच सत्ता-संतुलन को लेकर मतभेदों की चर्चा सार्वजनिक हो गई। यानी आज की कहानी अचानक पैदा हुई कोई नई दरार नहीं है; इसके पीछे कई वर्षों से बनता-बिगड़ता आया राजनीतिक समीकरण ही है। मई 2023 में कांग्रेस को कर्नाटक विधानसभा में 135 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिला। चुनाव के दौरान सिद्धारमैया और शिवकुमार दोनों पार्टी के सबसे प्रमुख चेहरों में थे, लेकिन मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इस सवाल ने कांग्रेस नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी।

कांग्रेस हाईकमान के लिए ढाई साल का फार्मूला बना राजनीतिक भूत
अंततः सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बने और शिवकुमार उपमुख्यमंत्री तथा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की भूमिका में रहे। उस समय ढाई-ढाई साल के कथित सत्ता-बंटवारे की चर्चा भी खूब हुई, हालांकि कांग्रेस ने इस तरह के किसी औपचारिक समझौते की सार्वजनिक पुष्टि नहीं की। इसके बाद कर्नाटक कांग्रेस की राजनीति में तथाकथित ‘2.5 साल के फार्मूले’ की चर्चा बार-बार लौटती रही। 2025 में यह विवाद इतना बढ़ा कि कांग्रेस हाईकमान को मजबूरी में कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन करना पड़ा। शिवकुमार समर्थक नेताओं की दिल्ली यात्राओं और नेतृत्व परिवर्तन की मांगों ने इस धारणा को मजबूत किया कि मुख्यमंत्री पद का प्रश्न अभी समाप्त नहीं हुआ है। दूसरी ओर सिद्धारमैया खेमे की ओर से सरकार के पांच साल के कार्यकाल और नेतृत्व की निरंतरता पर जोर दिया जाता रहा।

2026 में सीएम की कुर्सी तो बदली, लेकिन खत्म नहीं हुए मतभेद
कर्नाटक ने लेकर नई दिल्ली तक चले कर्नाटक के नाटक के बाद अंतत: मई 2026 में सत्ता का बदलाव हुआ और डी.के. शिवकुमार ने मुख्यमंत्री पद संभाला। इसके साथ यह अध्याय जरूर बदला कि अब सिद्धारमैया मुख्यमंत्री नहीं रहे, लेकिन दोनों नेताओं के बीच वर्षों से चली आ रही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की स्मृति समाप्त नहीं हुई। मई 2026 की राजनीतिक विश्लेषणात्मक रिपोर्टों में भी इस लंबे संघर्ष को कर्नाटक कांग्रेस की राजनीति को परिभाषित करने वाला प्रमुख तत्व बताया गया था। असल, में शिवकुमार के सीएम बनने ही मतभेद कम होने के बजाए और अधिक हो गए। इन्हीं अंतरूनी मतभेदों की आग कलबुर्गी में लगी दिखाई दे रही है।

कलबुर्गी में सिद्धारमैया की मूर्ति लगाने की पहले भी हुई कोशिशें
यही वजह है कि कलबुर्गी की मूर्ति महज पत्थर या धातु की प्रतिमा बनकर नहीं रह गई। एक पूर्व मुख्यमंत्री की नौ फीट ऊंची प्रतिमा, वह भी सार्वजनिक चौराहे पर, अपने आप में राजनीतिक स्मृति का प्रतीक है। ऊपर से उसी स्थान को पहले सिद्धारमैया के नाम से जोड़ने की मांग होती रही थी। रिपोर्टों के अनुसार करीब तीन साल पहले भी इसी जगह सिद्धारमैया की प्रतिमा लगाने की कोशिश हुई थी, जिसे अधिकारियों ने हटा दिया था। इस बार भी बिना अनुमति प्रतिमा लगाए जाने के कारण प्रशासन ने कार्रवाई की।

कांग्रेस में नेहरू-इंदिरा से आगे निकली ‘मूर्ति संस्कृति’
दरअसल, यह कहना अधिक उचित ही होगा कि कांग्रेस की राजनीति में व्यक्तित्वों को स्मारकों, नामकरण, चित्रों और प्रतिमाओं के जरिए सार्वजनिक स्मृति में स्थापित करने की संस्कृति लंबे समय से मौजूद है। कांग्रेस के दौर में नेहरू, इंदिरा गांधी और अन्य राष्ट्रीय नेताओं की स्मृति से जुड़े अनेक स्मारक और प्रतिमाएं बनीं, लेकिन बाद के दशकों में कुछ अन्य दलों ने अपने सामाजिक और राजनीतिक नायकों को सार्वजनिक स्थानों पर स्थापित करने की कोशिश की। कांग्रेस शासित राज्यों में कांग्रेस नेताओं की मूर्ति लगाने की कवायद नेहरू-इंदिरा के कार्यकाल से भी आगे निकल रही है।कर्नाटक में असली सवाल मूर्ति का नहीं, अंतर्कलह का है
कलबुर्गी की घटना का असली राजनीतिक सवाल इसलिए यह नहीं है कि सिद्धारमैया की मूर्ति कितनी ऊंची थी या उसे कितने घंटे बाद हटाया गया। असली सवाल यह है कि कर्नाटक कांग्रेस में दो शीर्ष नेताओं के बीच नेतृत्व, संगठन और राजनीतिक प्रभाव का प्रश्न वास्तव में अभी तक अनसुलझा ही है? सत्ता का हस्तांतरण हो जाने से व्यक्तिगत और गुटीय राजनीतिक समीकरण अपने आप समाप्त नहीं हो जाते। जब किसी एक नेता के समर्थक उसकी राजनीतिक विरासत को सार्वजनिक प्रतीकों के जरिए स्थापित करने की कोशिश करते हैं और उसी समय दूसरे नेता सत्ता के केंद्र में होते हैं, तो वह प्रतीक स्वाभाविक रूप से राजनीतिक अर्थ ग्रहण कर लेता है।

कर्नाटक में फिर चौराहे पर आई कांग्रेस की राजनीति
सिद्धारमैया की मूर्ति कुछ घंटों में हट गई, लेकिन उससे पैदा हुआ राजनीतिक सवाल इतनी आसानी से नहीं हटेगा। कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह व्यक्तिगत प्रभाव, समर्थक खेमों और नेतृत्व की आकांक्षाओं को संगठनात्मक अनुशासन के भीतर कैसे साधती है। कलबुर्गी का चौराहा इसलिए दिलचस्प है कि वहां कुछ घंटों के लिए एक मूर्ति खड़ी हुई, लेकिन उसने कर्नाटक कांग्रेस की कई वर्षों पुरानी कहानी को फिर खड़ा कर दिया।सिद्धारमैया बनाम शिवकुमार, सत्ता बनाम संगठन, विरासत बनाम भविष्य और सबसे बढ़कर मुख्यमंत्री की कुर्सी के इर्द-गिर्द घूमती वह राजनीति, जिसका अंत केवल मूर्ति हट जाने से नहीं होता।

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार में वित्तीय कुप्रबंधन और भूमि घोटाले
एक तरफ पार्टी में मतभेदों के चलते रस्साकशी चल रही है, तो दूसरी ओर सरकार के हाल भी बेहाल हैं। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन और भूमि घोटालों के खिलाफ उठे प्रचंड जनआक्रोश के आगे आखिरकार सत्ता को अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। उपमुख्यमंत्री और बेंगलुरु विकास मंत्री डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व में बेंगलुरु के सार्वजनिक पार्कों और खेल के मैदानों की 5 प्रतिशत जमीन को व्यावसायिक गतिविधियों, लीज और बिक्री के लिए खोलने वाले विवादास्पद ‘पार्क्स अमेंडमेंट बिल 2026’ ने राज्य में एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा कर दिया। गैर-जिम्मेदाराना नीतियों से खाली हुए सरकारी खजाने को भरने और रियल एस्टेट सिंडिकेट को लाभ पहुंचाने की इस नीति को शहर की हरी-भरी सांसों पर सीधा डाका माना गया। सड़क से लेकर राजभवन तक चले चौतरफा दबाव के कारण कैबिनेट को यह जनविरोधी संशोधन बिल वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा।

65.4 एकड़ हरित क्षेत्र पर डाका: लालबाग और कब्बन पार्क पर गहराया संकट
बेंगलुरु में वर्तमान में लगभग 1,308 एकड़ क्षेत्र में फैले 1,353 सार्वजनिक पार्क हैं। इस संशोधन के लागू होते ही शहर के 65.4 एकड़ से अधिक हरे-भरे क्षेत्र पर कंक्रीट के ढांचे खड़े होने का खतरा मंडराने लगा था। सबसे बड़ा आघात 240 एकड़ वाले ऐतिहासिक लालबाग की 12 एकड़ और करीब 197 एकड़ में फैले कब्बन पार्क की 9.85 एकड़ जमीन पर था। करीब 22 एकड़ की यह धरोहर सीधे तौर पर व्यावसायिक सिंडिकेट के हवाले करने की तैयारी थी, जिसे जनता ने अपनी पहचान पर हमला माना।

‘ब्रांड बेंगलुरु’ की आड़ में ऐतिहासिक धरोहरों पर गिद्ध दृष्टि
‘ब्रांड बेंगलुरु’ के आकर्षक नारों की आड़ में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री कार्यालय के संरक्षण में शहर की बेशकीमती जमीनों के सौदे तैयार किए जा रहे थे। अरबों वर्ष पुरानी भूगर्भीय धरोहर वाली लालबाग की चट्टानों और ऐतिहासिक कब्बन पार्क की शांति को नष्ट कर वहां व्यावसायिक केंद्र बनाने की साजिश रची गई। विकास के नाम पर शहर की सदियों पुरानी प्राकृतिक और ऐतिहासिक विरासत को निजी मुनाफे की वेदी पर चढ़ाने का यह खुला प्रयास था।

टनल रोड प्रोजेक्ट: ठेकेदारों को उपकृत करने के लिए लालबाग की बलि
हजारों करोड़ रुपये के विवादास्पद टनल रोड प्रोजेक्ट के जरिए अपने चहेते निजी ठेकेदारों को भारी भरकम कमीशन बांटने की बिसात बिछाई गई थी। टनल रोड के नाम पर लालबाग की एकड़ भर बेशकीमती जमीन अधिग्रहित करने और वहां निजी व्यावसायिक निर्माण को स्वीकृति देने की तैयारी थी। बुनियादी ढांचा सुधारने के नाम पर कमीशनखोरी के इस मॉडल ने शहर के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर खतरे में डाल दिया था।

बीएमएलटीए संशोधन की आड़ में 40 हजार करोड़ रुपये का गुप्त खेल
बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन लैंड ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी (BMLTA) कानून में पिछले दरवाजे से किए गए संशोधनों ने सरकार की मंशा उजागर कर दी। धारा 19 में सेविंग्स क्लॉज जोड़कर लगभग 40 हजार करोड़ रुपये से लेकर 1 लाख करोड़ रुपये तक के मेगा प्रोजेक्ट्स को बिना किसी स्वतंत्र तकनीकी समीक्षा, संस्थागत जांच या सार्वजनिक जवाबदेही के पिछली तारीख से वैध ठहराने का गुप्त रास्ता निकाला गया था, ताकि भारी ठेकों पर कोई सवाल न उठ सके। दरअस, वर्ष 1975 से लागू ‘कर्नाटक गवर्नमेंट पार्क्स (प्रिजर्वेशन) एक्ट’ ने बीते पांच दशकों से शहर के उद्यानों को किसी भी प्रकार की बिक्री, लीज या हस्तांतरण से सुरक्षित रखा था। इस मूल कानून की धारा 5 में बदलाव कर पार्कों को गिरवी रखने और व्यावसायिक उपयोग के लिए आवंटित करने का चोर-दरवाजा खोल दिया गया। यह पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सभी स्थापित नियमों और अदालती नजीरों की सीधी अवहेलना थी।

कांग्रेस को चुनौती दूसरे दलों से ज्यादा पार्टी के भीतर से ही है

कांग्रेस आलाकमान के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब दूसरे दल नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर का आत्मघाती असंतोष बन चुका है। बिहार से लेकर पंजाब और राजस्थान से लेकर कर्नाटक तक, हर राज्य से उठती बगावत की चिंगारी यह साफ बयां करती है कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे का केंद्रीय नेतृत्व राज्यों के क्षत्रपों को साधने और अनुशासन का डंडा चलाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है। एक के बाद एक राज्यों में गुटबाजी, नेताओं के बीच बढ़ते मतभेद और संगठन के भीतर फैसलों को लेकर असंतोष तेज हो रहा है। इससे यह सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या राहुल गांधी और कांग्रेस आलाकमान अपने ही कुनबे को एकजुट रखने की क्षमता खोता जा रहा है? चुनावी मुहाने पर खड़े पंजाब और उत्तर प्रदेश जैसे बेहद महत्वपूर्ण राज्यों में कांग्रेस की यह आंतरिक खींचतान न केवल पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ रही है, बल्कि जनता के बीच भी बेहद नकारात्मक संदेश दे रही है। दरअसल, राहुल गांधी यह समझना ही नहीं चाहते कि चुनावी राजनीति केवल नैगेटिव नरेटिव और बहसों से नहीं, बल्कि एक अनुशासित, एकजुट और मजबूत सांगठनिक मशीनरी से जीती जाती है।कांग्रेस की गुटबाजी डूबा देगी आगामी चुनावों की नैया?
अगले साल कुल सात राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनाव मुख्यतः फरवरी–मार्च 2027 के आसपास होने की संभावना है, जबकि हिमाचल प्रदेश और गुजरात में चुनाव वर्ष के अंत में, लगभग नवंबर–दिसंबर में अपेक्षित हैं। इनमें से सिर्फ हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है, जो अभी से एंटी इंकम्बेंसी फेक्टर से जूझ रही है। बाकि राज्यों में भी कांग्रेस संगठन की हालत खस्ता है। दरअसल, जिस पार्टी को चुनावी मैदान में सत्ता पक्ष को चुनौती देने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंकनी चाहिए, वहां नेताओं की ऊर्जा संगठन को संभालने के बजाय आपसी खींचतान और नेतृत्व पर उठते सवालों में खर्च हो रही है। सबसे बड़ा प्रश्न राहुल गांधी और कांग्रेस आलाकमान की राजनीतिक नेतृत्व क्षमता पर है। केंद्रीय नेतृत्व न तो राज्यों के क्षत्रपों के बीच संतुलन बना पा रहा है, न असंतोष को समय रहते थाम पा रहा है। कार्यकर्ताओं को एक स्पष्ट चुनावी दिशा नहीं मिलेगी तो तो आगामी चुनावों में कांग्रेस की मुश्किलें और बढ़ना तय है।पंजाब में ‘एक अनार, सौ बीमार’: सीएम कुर्सी के लिए मची जंग
पंजाब में कांग्रेस अगले साल विधानसभा चुनाव की तैयारी करने के बजाय आपसी गुटबाजी से लहूलुहान हो रही है। यहां पर ‘एक अनार सौ बीमार’ वाली स्थिति बनी हुई है। दरअसल, हर कद्दावर नेता खुद को भावी मुख्यमंत्री मानकर चल रहा है। एक तरफ पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा का गुट है, तो दूसरी तरफ वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग अपनी जमीन मजबूत करने में लगे हैं। इन दोनों धड़ों के बीच नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा भी अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए लगातार दिल्ली दरबार के चक्कर काट रहे हैं। पार्टी के भीतर मचे इस जबरदस्त घमासान को शांत करने और सभी नेताओं के अहंकार (इगो) को साधने के लिए आलाकमान ने आखिरकार राजस्थान के पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट को पंजाब का नया प्रभारी नियुक्त किया है। पायलट तो खुद ही राजस्थान में नेताओं के अहंकार की लड़ाई में खुद को बचा नहीं पाए थे। वे कैसे पंजाब में नेताओं के बीच की गहरी खाई को पाटेंगे, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।

हिमाचल: गुटबाजी और वित्तीय संकट के बीच वेंटिलेटर पर सरकार
हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गुटबाजी के गंभीर भंवर में फंसी हुई है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और दिवंगत नेता वीरभद्र सिंह के परिवार (विशेषकर उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह और बेटे विक्रमादित्य सिंह) के बीच की तल्खी किसी से छिपी नहीं है। राज्यसभा चुनाव के दौरान पार्टी के भीतर हुआ विद्रोह और विधायकों की क्रॉस-वोटिंग इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण थी कि मुख्यमंत्री और आलाकमान का अपनी ही पार्टी के विधायकों पर नियंत्रण बेहद कमजोर हो चुका है। सरकार को बचाने के लिए आलाकमान को बार-बार शिमला में पर्यवेक्षक भेजने पड़े, लेकिन अस्थिरता का यह साया आज भी बरकरार है। राजनीतिक कमजोरी के साथ-साथ सुक्खू सरकार इस समय अभूतपूर्व वित्तीय संकट से भी जूझ रही है, जिसने सरकार की छवि को जनता के बीच बेहद कमजोर बना दिया है। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि मुख्यमंत्री, मंत्रियों और मुख्य सचिवों को अपनी सैलरी और भत्ते दो महीने के लिए स्थगित करने पड़े हैं। विकास कार्य पूरी तरह ठप हैं और कर्मचारियों के वेतन व पेंशन समय पर देना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि कांग्रेस न तो अपने नेताओं को संभाल पा रही है और ना ही राज्य की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित कर पा रही है।

उत्तराखंड : पहाड़ी राजनीति में समन्वय कांग्रेस के लिए पहाड़-सी चुनौती
उत्तराखंड में कांग्रेस के सामने अगले विधानसभा चुनाव की चुनौती केवल भाजपा से मुकाबले की नहीं, बल्कि अपने ही घर को संभालने की भी है। हिमाचल और पंजाब की तरह यहां भी पार्टी के भीतर गुटबाजी, नेताओं के बीच मतभेद और नेतृत्व को लेकर असंतोष समय-समय पर सतह पर आता रहा है। जनता सबसे गंभीर सवाल राहुल गांधी और कांग्रेस आलाकमान की भूमिका पर उठा रही है। उत्तराखंड जैसे छोटे लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण राज्य में यदि कांग्रेस नेतृत्व प्रदेश के नेताओं के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित नहीं कर पाता और असंतोष को नहीं थाम पाता तो इसका सीधा लाभ भाजपा को ही मिलेगा। भाजपा वैसे भी केंद्र से लेकर राज्य की जनकल्याणकारी योजनाओं के चलते प्रो-इंकम्बेंसी से बढ़त बनाए हुए है। सीएम धामी ने हाल ही में मदरसा बोर्ड खत्म करने का फैसला लिया है।  उत्तराखंड की पहाड़ी राजनीति में कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, उसकी अपनी अंदरूनी दरारें बन सकती हैं।बिहार कांग्रेस का दिल्ली में दंगल: अपने ही दफ्तर पर धरना
कांग्रेस के भीतर पनप रहे असंतोष की ताजा और हैरान करने वाली बानगी देश की राजधानी दिल्ली में देखने को मिली। आम तौर पर राजनीतिक दल विपक्षी पार्टियों के दफ्तरों के बाहर अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते हैं, लेकिन दिल्ली में कांग्रेस के नए मुख्यालय के बाहर बिहार कांग्रेस के करीब 40 दिग्गज नेताओं ने डेरा डाल दिया। यह धरना किसी बाहरी मुद्दे पर नहीं, बल्कि अपने ही राज्य के प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी को हटाने की मांग को लेकर था। असंतोष की जड़ें पिछले विधानसभा चुनाव के खराब प्रदर्शन से जुड़ी हैं, जहां महागठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ा और वह बेहद कम सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि पटना में उनकी जायज शिकायतों को लगातार अनसुना किया गया, जिसके कारण उन्हें दिल्ली का रुख करना पड़ा। अनुशासनहीनता के नाम पर जारी कारण बताओ नोटिसों ने इस आग में घी का काम किया है। आलाकमान का संकट यह है कि वह इस विद्रोह को दबाने के लिए कड़े कदम नहीं उठा पा रहा है, जिससे प्रांतीय नेताओं के हौसले बुलंद हैं।राजस्थान में शांत ज्वालामुखी: सियासी जंग की आहट
पंजाब के पड़ोसी राज्य राजस्थान की कहानी किसी से छिपी नहीं है। यहां अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट की ऐतिहासिक खींचतान ने पिछले चुनावों में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। हालांकि अगले विधानसभा चुनावों में अभी लंबा वक्त है, लेकिन भविष्य के नेतृत्व की जंग अभी से शुरू हो चुकी है। कांग्रेस आलाकमान ने सचिन पायलट को पंजाब जैसे हाई-प्रोफाइल राज्य का प्रभारी बनाकर यह साफ संकेत दे दिया है कि राष्ट्रीय राजनीति में उनका कद बढ़ने वाला है। लेकिन इस फैसले ने राजस्थान के भीतर एक शांत पड़े ज्वालामुखी को दोबारा भड़का दिया है। गहलोत गुट इस बदलाव को शांत बैठने वाला नहीं है। प्रदेश अध्यक्ष गोविंद डोटासरा अपनी अलग ही ढपली बजा रहे हैं। राजस्थान में नए संगठन की कमान किसके हाथ सौंपी जाती है, यह आलाकमान के लिए सबसे बड़ी सरदर्दी है। अगर राजस्थान में समय रहते शक्ति संतुलन नहीं बनाया गया, तो गुटबाजी का यह मर्ज और गहरा जाएगा।

तेलंगाना: सत्ता मिलने के बाद भी कांग्रेस अंतर्कलह से मुक्त नहीं
दक्षिण भारत के राज्य तेलंगाना में भी स्थिति पूरी तरह कांग्रेस आलाकमान के नियंत्रण में नहीं है। मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को अपनी ही कैबिनेट के भीतर से ही मिल रही चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है। हाल ही में एक बड़े विवाद के बाद मंत्री कोंडा सुरेखा को अपनी कैबिनेट कुर्सी गंवानी पड़ी। विवाद तब बढ़ा जब कोंडा सुरेखा के परिवार की तरफ से सीधे मुख्यमंत्री के अधिकारों और उनकी कार्यशैली पर तीखी टिप्पणियां की गईं, जिसे पार्टी विरोधी और नेतृत्व को खुली चुनौती माना गया। इस पूरे घटनाक्रम ने तेलंगाना कांग्रेस के भीतर ‘पुराने बनाम नए’ नेताओं के विवाद को हवा दे दी है। मुख्यमंत्री पर पिछड़ी जातियों की उपेक्षा करने के आरोप भी लगे, जिसके बाद डैमेज कंट्रोल के लिए उन्हें आनन-फानन में पिछड़ी जाति की दो महिलाओं को सरकारी पदों पर नियुक्त करना पड़ा। दक्षिण के इस अहम गढ़ में पनप रहा यह असंतोष साबित करता है कि सत्ता मिलने के बाद भी कांग्रेस अंतर्कलह से मुक्त नहीं हो पा रही है।

कर्नाटक में मलाईदार विभागों की होड़ और भ्रष्टाचार का कलंक
कर्नाटक में कांग्रेस की सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की सरकार लगातार किसी न किसी आंतरिक संकट से जूझ रही है। मंत्रिमंडल गठन से लेकर मलाईदार विभागों के बंटवारे तक मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को कई बार दिल्ली के चक्कर लगाने पड़े हैं। असंतोष का आलम यह है कि मनचाहा विभाग (बेंगलुरु विकास मंत्रालय) न मिलने पर वरिष्ठ मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने इस्तीफे की धमकी तक दे डाली थी, जिसके बाद केंद्रीय नेतृत्व को हस्तक्षेप कर उन्हें मनाना पड़ा। इसके अलावा, कैबिनेट मंत्री बी नागेंद्र पर लगे भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों और उनके इस्तीफे ने सरकार की छवि को गहरा धक्का पहुंचाया है। सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच की राजनीतिक तनातनी और समय-समय पर आने वाले विरोधाभासी बयान सरकार की स्थिरता और पार्टी की एकजुटता पर लगातार सवालिया निशान खड़े करते रहते हैं।

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