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जन सेवा के 25 साल: अंतिम व्यक्ति से शुरुआत, 25 वर्षों में कैसे बदला सबका विकास?

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भारतीय राजनीति में लंबे समय तक सामाजिक न्याय की चर्चा चुनावी गठबंधनों और लोक-लुभावन नारों तक सीमित रही। 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिवस है और वे 76 वर्ष के हो जाएंगे। इसके साथ ही 7 अक्टूबर को उनके संवैधानिक पद पर 25 साल पूरे हो जाएंगे। 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शुरू हुई इस संवैधानिक यात्रा ने शासन की प्राथमिकताओं को एक नया मोड़ दिया। पिछले ढाई दशक के इस सफर में उन्होंने राजनीति को तुष्टिकरण से बाहर निकालकर संतृप्ति (Saturation) के सिद्धांत पर स्थापित किया। इसका मूल आधार यह रहा कि सरकार की योजनाएं बिना किसी भेदभाव, बिचौलिए या लीकेज के समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक शत-प्रतिशत पहुंचे। गुजरात के पुनर्निर्माण से लेकर देश के नेतृत्व तक, नरेंद्र मोदी का यह मॉडल केवल बुनियादी अभाव दूर करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वंचितों को देश की मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था का सक्रिय भागीदार और नीति-निर्माता बनाने का सफल अभियान साबित हुआ है।

1. पीएम आवास योजना: कच्चे छप्पर से पक्के घर का सफर
गरीब और बेघर परिवारों के लिए अपना एक पक्का मकान होना केवल सिर छिपाने की छत नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और सुरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी है। ‘पीएम आवास योजना’ (ग्रामीण और शहरी) के माध्यम से देश भर में 4.25 करोड़ से अधिक पक्के मकान बनाकर वंचितों को सौंपे जा चुके हैं। इस योजना की सबसे बड़ी सामाजिक क्रांति यह रही कि 70 प्रतिशत से अधिक घरों का मालिकाना हक परिवार की महिला सदस्य के नाम या संयुक्त नाम पर पंजीकृत किया गया, जिससे महिलाओं को पहली बार वैधानिक संपत्ति अधिकार मिला। इसके साथ ही इन आवासों को स्वच्छ भारत शौचालय, सौभाग्य योजना की बिजली, उज्ज्वला का गैस कनेक्शन और जल जीवन मिशन के नल से जोड़कर एक संपूर्ण और गरिमापूर्ण जीवन का आधार बनाया गया।

2. अंत्योदय का नया दर्शन: तुष्टिकरण की राजनीति का अंत और हर हकदार तक पूरा लाभ
दशकों तक देश में सामाजिक समावेशन के नाम पर वर्ग विशेष को साधने की राजनीति चलती रही, जिससे वास्तविक जरूरतमंद हमेशा विकास की दौड़ में पीछे छूट जाते थे। नरेंद्र मोदी ने संवैधानिक पद पर रहते हुए इस परिपाटी को बदला और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘अंत्योदय’ दर्शन को धरातल पर उतारा। इसके तहत नीतियों का पैमाना यह बना कि जब तक पंक्ति के अंतिम व्यक्ति तक लाभ नहीं पहुंचता, तब तक योजना पूरी नहीं मानी जाएगी। वित्तीय समावेशन के 12 वर्षों में प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत 59 करोड़ से अधिक खाते खोले जा चुके हैं, जिनमें 56 प्रतिशत खाते महिलाओं के हैं। जन-धन, आधार और मोबाइल (JAM) की त्रिमूर्ति ने व्यवस्था से दलालों को समाप्त किया। डीबीटी के जरिए अब तक 38 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि सीधे लाभार्थियों के खातों में पारदर्शी तरीके से भेजी जा चुकी है।

3. पारंपरिक हुनर को राष्ट्रीय पहचान: ‘पीएम विश्वकर्मा योजना’ से स्वाभिमान की वापसी
लोहार,बढ़ई, कुम्हार, मोची, मूर्तिकार और दर्जी जैसे 18 पारंपरिक शिल्पों से जुड़े कारीगर भारत की सनातन अर्थव्यवस्था का आधार रहे हैं, लेकिन स्वतंत्रता के बाद के दशकों में वे संस्थागत वित्तीय तंत्र और आधुनिक विकास से अछूते रहे। 17 सितंबर 2023 को शुरू हुई ‘पीएम विश्वकर्मा योजना‘ ने तीन वर्षों के भीतर ही अभूतपूर्व गति पकड़ी है। त्रिस्तरीय सत्यापन प्रक्रिया के बाद योजना के तहत 30 लाख लाभार्थियों के पंजीकरण का लक्ष्य पूरा हो चुका है, जबकि 24.50 लाख विश्वकर्माओं को बुनियादी कौशल प्रशिक्षण दिया गया है। जमीनी उत्पादकता बढ़ाने के लिए 18.15 लाख आधुनिक टूलकिट सीधे कारीगरों के घर तक पहुंचाए गए। वहीं 6.18 लाख विश्वकर्माओं को 5 प्रतिशत की रियायती ब्याज दर पर 5,297 करोड़ रुपये का सस्ता संस्थागत ऋण देकर साहूकारों के चंगुल से मुक्त किया गया है।

4. बुनियादी गरिमा से संसद तक: देश की नीति-निर्माता बनी नारी शक्ति
महिलाओं का सशक्तीकरण कागजी चर्चाओं से निकलकर जमीन पर तब उतरा जब उनकी दैनिक समस्याओं का समाधान निकाला गया। ‘उज्ज्वला योजना‘ के तहत 10.3 करोड़ से अधिक गरीब महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन देकर चूल्हे के जहरीले धुएं से मुक्ति दी गई, जबकि ‘जल जीवन मिशन’ ने 15.3 करोड़ से अधिक ग्रामीण घरों तक नल से जल पहुंचाकर महिलाओं को मीलों पैदल पानी ढोने के रोजमर्रा के श्रम से मुक्त किया। इसके साथ ही मुद्रा योजना के 70 प्रतिशत से अधिक ऋण महिला उद्यमियों को मिले। इस यात्रा का सर्वोच्च विधायी शिखर बना ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संविधान संशोधन), जिसने लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर उन्हें देश की नीति-निर्माता की केंद्रीय भूमिका में ला खड़ा किया।

5. रेहड़ी-पटरी से औपचारिक अर्थव्यवस्था तक: ‘पीएम स्वनिधि’ से साहूकारों के चंगुल का अंत
शहरी अर्थव्यवस्था में दिन-रात पसीना बहाने वाले स्ट्रीट वेंडर्स और रेहड़ी-पटरी वाले आजादी के बाद पहली बार किसी राष्ट्रीय योजना के केंद्र में आए। कोरोना संकट के दौरान शुरू हुई ‘पीएम स्वनिधि योजना’ ने इन छोटे दुकानदारों को स्थानीय सूदखोरों और साहूकारों के दैनिक 10 से 20 प्रतिशत ब्याज के दुष्चक्र से मुक्ति दिलाई। इस योजना के तहत 75 लाख से अधिक वेंडरों को 1.12 करोड़ से अधिक चरणों में संस्थागत ऋण दिए जा चुके हैं। समय पर भुगतान और डिजिटल लेन-देन पर कैशबैक मिलने से आज देश का एक सामान्य रेहड़ी वाला भी क्यूआर कोड से भुगतान लेकर अपनी औपचारिक क्रेडिट हिस्ट्री बना रहा है।

6. संकट के समय राज्य की ढाल: ‘आयुष्मान भारत’ से बीमारी और कर्ज के भय से मुक्ति
गरीब और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए किसी गंभीर बीमारी का आना जीवनभर की जमा-पूंजी समाप्त होने और कर्ज के दलदल में धंसने का सबसे बड़ा कारण बनता था। इस संकट को खत्म करने के लिए लागू ‘आयुष्मान भारत – पीएम जन आरोग्य योजना’ के तहत देश के 60 करोड़ से अधिक आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों को प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये तक के मुफ्त और कैशलेस इलाज की गारंटी दी गई। इस सुरक्षा कवच को और विस्तार देते हुए 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के सभी वरिष्ठ नागरिकों को आय सीमा के बंधन से मुक्त कर इस योजना में शामिल किया गया। देश भर में स्थापित 1.7 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिरों ने प्राथमिक और गंभीर स्वास्थ्य सेवाओं को हर नागरिक के लिए सुलभ बनाया।

7. जनजातीय और वनवासी समाज का मुख्यधारा से जुड़ाव: उपेक्षा से स्वाभिमान तक
दशकों तक सुदूर जंगलों और पहाड़ियों में बसे जनजातीय अंचलों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने ऐतिहासिक नीतिगत पहल की। भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ घोषित कर वनवासी स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को राष्ट्रीय पटल पर स्थापित किया गया। विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) के चहुंमुखी विकास के लिए 24,000 करोड़ रुपये से अधिक की ‘पीएम जनमन योजना‘ (PM-JANMAN) लागू की गई, जिसने देश के 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की दूरदराज बस्तियों तक पक्की सड़कें, बिजली, सुरक्षित आवास और स्वच्छ पानी पहुंचाया। साथ ही आदिवासी बच्चों को आधुनिक आवासीय शिक्षा देने के लिए 400 से अधिक ‘एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल’ संचालित किए जा रहे हैं।

8. दिव्यांगजन: दया का भाव नहीं, गरिमा और सुगम्यता का अधिकार
विकलांगता को दया का विषय मानने वाली पुरानी सामाजिक सोच को बदलते हुए नरेंद्र मोदी ने ‘दिव्यांग’ शब्द देकर इस वर्ग को सामाजिक गरिमा और आत्मसम्मान प्रदान किया। 2015 में शुरू हुए ‘सुगम्य भारत अभियान’ के तहत देश भर के सरकारी भवनों, रेलवे स्टेशनों, बस टर्मिनलों, हवाई अड्डों और डिजिटल पोर्टलों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार सुगम्य बनाया गया। दिव्यांगजन अधिकार कानून 2016 के माध्यम से मान्यता प्राप्त दिव्यांगता की श्रेणियों को 7 से बढ़ाकर 21 किया गया और सरकारी नौकरियों में आरक्षण 3% से बढ़ाकर 4% किया गया। एक राष्ट्र-एक कार्ड की तर्ज पर जारी विशिष्ट दिव्यांगता पहचान पत्र (UDID Card) ने योजनाओं का लाभ पारदर्शी बना दिया।

9. छोटे और सीमांत किसान: अन्नदाता की आय और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी
देश के देश के कुल किसानों में 86 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी रखने वाले छोटे और सीमांत किसान पहले केवल नीतिगत भाषणों तक सीमित थे। नरेंद्र मोदी ने इस वर्ग को संकट से उबारने के लिए ‘पीएम किसान सम्मान निधि’ (PM-KISAN) लागू की, जिसके तहत बिना किसी बिचौलिए के सीधे बैंक खातों में हर चार महीने पर 2 हजार रुपये (सालाना 6,000 रुपये) की सुनिश्चित आर्थिक सहायता दी जा रही है। इसके तहत अब तक पात्र किसान परिवारों को सीधे उनके बैंक खातों में 4.46 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि अंतरित की जा चुकी है। इसके अतिरिक्त ‘पीएम फसल बीमा योजना’ के तहत न्यूनतम प्रीमियम पर 1.6 लाख करोड़ रुपये से अधिक के दावों का भुगतान कर किसानों को मौसम की मार से सुरक्षा दी गई।

10. अमानवीय प्रथाओं से मुक्ति: स्वच्छता कर्मियों की सुरक्षा और गरिमापूर्ण पुनर्वास
हाथ से मैला उठाने और सीवर व सेप्टिक टैंकों की खतरनाक मानवीय सफाई की अमानवीय प्रथा को समाप्त करने के लिए सरकार ने निर्णायक कदम उठाया। ‘नमस्ते योजना’ (National Action for Mechanised Sanitation Ecosystem) के माध्यम से देश के सभी शहरी स्थानीय निकायों में सीवर सफाई का शत-प्रतिशत मशीनीकरण अनिवार्य किया गया। खतरनाक सफाई के दौरान होने वाले हादसों को रोकने के लिए आधुनिक सक्शन मशीनें, जेटिंग वाहन और रोबोटिक उपकरण उपलब्ध कराए गए। सफाई कर्मियों को पीपीई किट, 5 लाख का आयुष्मान स्वास्थ्य सुरक्षा कवच और स्वयं का सफाई उद्यम शुरू करने के लिए सब्सिडी युक्त वित्तीय ऋण देकर उन्हें समाज में ‘स्वच्छता उद्यमी’ का मान दिया गया।

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11. आकांक्षी जिले और ब्लॉक कार्यक्रम: पिछड़े क्षेत्रों का जमीनी कायाकल्प
क्षेत्रीय असंतुलन समाप्त करने के लिए 2018 में देश के 112 सबसे पिछड़े जिलों की पहचान कर ‘आकांक्षी जिला कार्यक्रम’ शुरू किया गया। इन क्षेत्रों में अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालने के बजाय स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, कृषि, वित्तीय समावेशन और बुनियादी ढांचे जैसे 49 प्रमुख सामाजिक संकेतकों पर रियल-टाइम डेटा निगरानी और प्रतिस्पर्धा शुरू की गई। नीति आयोग के इस मॉडल से दशकों से पिछड़े जिलों में संस्थागत प्रसव, टीकाकरण और साक्षरता दर में राष्ट्रीय औसत से तेज सुधार दर्ज हुआ। इस सफलता को आगे बढ़ाते हुए देश के 500 सबसे पिछड़े विकासखंडों में ‘आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम’ (ABP) लागू किया गया, जिससे विकास का प्रकाश सीधे उपेक्षित गांवों तक पहुंच रहा है।

12. वरिष्ठ नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा: बुढ़ापे में सम्मान और आर्थिक संबल
असंगठित क्षेत्र में जीवनभर हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले दिहाड़ी मजदूरों, घरेलू कामगारों और छोटे कारीगरों के बुढ़ापे को आर्थिक रूप से सुरक्षित करने के लिए मजबूत ढांचा तैयार किया गया। ‘पीएम श्रम योगी मानधन योजना’ और ‘अटल पेंशन योजना’ के जरिए करोड़ों असंगठित कामगारों के लिए 60 वर्ष की आयु के बाद 1,000 से 5,000 रुपये की मासिक गारंटीड पेंशन सुनिश्चित की गई। इसके अतिरिक्त बुजुर्गों की सबसे बड़ी लाचारी यानी बीमारी के भारी खर्च को दूर करने के लिए 70 वर्ष से अधिक उम्र के सभी वरिष्ठ नागरिकों को आय के किसी भी बंधन के बिना आयुष्मान भारत के तहत प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये तक के मुफ्त इलाज की सुविधा से जोड़कर पारिवारिक संबल दिया गया।

13. वंचित युवाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा: ‘पीएम-श्री’ और भाषा की बेड़ियों से मुक्ति
शिक्षा को सामाजिक समानता का सबसे बड़ा हथियार बनाते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अंतर्गत क्रांतिकारी सुधार किए गए। दशकों पुरानी उस अंग्रेजीदां मानसिकता को तोड़ा गया जहां अंग्रेजी न जानने के कारण ग्रामीण व गरीब पृष्ठभूमि के मेधावी छात्र चिकित्सा और तकनीकी शिक्षा से वंचित रह जाते थे। अब एमबीबीएस और इंजीनियरिंग की पढ़ाई हिंदी सहित प्रमुख भारतीय भाषाओं में कराई जा रही है। इसके साथ ही देश के प्राथमिक व माध्यमिक स्तर के 14,500 से अधिक सरकारी स्कूलों को अत्याधुनिक रूप देने के लिए ‘पीएम श्री’ (PM-SHRI) स्कूल योजना लागू की गई, जहां स्मार्ट क्लासरूम, आधुनिक लैब और खेल सुविधाओं के जरिए अंतिम पंक्ति के बच्चों को विश्वस्तरीय शिक्षा मिल रही है।

14. ग्रामीण संपत्तियों का कानूनी हक: ‘स्वामित्व योजना’ से विवादों और अनिश्चितता का अंत
ग्रामीण भारत में पीढ़ियों से घरों में रहने के बावजूद ग्रामीणों के पास अपनी आबादी भूमि का कोई वैधानिक दस्तावेज नहीं होता था, जिसके चलते पारिवारिक विवाद और अदालती मुकदमे सामान्य बात थे। ‘स्वामित्व योजना’ ने आधुनिक ड्रोन तकनीक का उपयोग कर देश के लाखों गांवों के आबादी क्षेत्रों का डिजिटल सर्वेक्षण किया और ग्रामीणों को आधिकारिक ‘प्रॉपर्टी कार्ड’ सौंपे। इस पहल से गांवों में दशकों पुराने जमीनी विवाद समाप्त हुए, ग्राम पंचायतों को संपत्ति कर के जरिए वित्तीय स्वायत्तता मिली और ग्रामीणों को अपने पुश्तैनी मकान पर बैंकों से औपचारिक व्यापारिक या व्यक्तिगत ऋण लेने का कानूनी अधिकार प्राप्त हुआ।

15. सीमांत गांवों का स्वाभिमान: ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ से पहले प्रहरी बने सीमावर्ती क्षेत्र
आजादी के दशकों तक देश की सीमाओं पर बसे गांवों को रणनीतिक दृष्टि से ‘अंतिम गांव’ मानकर विकास से उपेक्षित छोड़ दिया गया था, जिससे वहां से बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पलायन हो रहा था। नरेंद्र मोदी सरकार ने इस सोच को उलटते हुए उन्हें देश का ‘पहला गांव’ घोषित किया। ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ के तहत उत्तरी सीमा पर स्थित 2,900 से अधिक सीमावर्ती गांवों के विकास का खाका खींचा गया। चौबीसों घंटे बिजली, बारहमासी पक्की सड़कें, 4G मोबाइल टावर, शुद्ध पेयजल और पर्यटन आधारित होमस्टे विकसित कर स्थानीय आबादी का पलायन रोका गया, जिससे सीमावर्ती नागरिक राष्ट्रीय सुरक्षा के पहले सजग प्रहरी बने।

16. अंतिम छोर तक डिजिटल पहुंच: ‘भारतनेट’ और ‘कॉमन सर्विस सेंटर’ की डिजिटल क्रांति
डिजिटल तकनीक को केवल महानगरों की सुख-सुविधा न रखकर ग्रामीण और सुदूर क्षेत्रों के सशक्तिकरण का माध्यम बनाया गया। ‘भारतनेट’ परियोजना के जरिए देश की 2.1 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों को हाई-स्पीड ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क से जोड़ा जा चुका है। इस डिजिटल ढांचे के ऊपर देश भर में 5.5 लाख से अधिक ‘कॉमन सर्विस सेंटर’ (CSC / जन सेवा केंद्र) संचालित हो रहे हैं। इन केंद्रों के माध्यम से गांव के एक सामान्य किसान, मजदूर और बुजुर्ग को पेंशन, आधार, बैंकिंग, छात्रवृत्ति, भूमि अभिलेख और रेल टिकट जैसी 400 से अधिक सरकारी सेवाएं बिना ब्लॉक या जिला मुख्यालय के चक्कर काटे अपने ही गांव में पारदर्शी तरीके से मिलने लगीं।

17. घुमंतू और विमुक्त जातियों को पहचान और अधिकार: ‘सीड योजना’ से नई शुरुआत
स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद भी विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदाय (DNT/NT/SNT) समाज के सबसे उपेक्षित और अदृश्य वर्ग बने हुए थे, जिनके पास न कोई स्थायी नागरिक पहचान थी और न ही कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच। मोदी सरकार ने इस ऐतिहासिक उपेक्षा को समाप्त करने के लिए ‘सीड योजना’ (Scheme for Economic Empowerment of DNTs) शुरू की। इस योजना के माध्यम से इन समुदायों के युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुफ्त कोचिंग, परिवारों को ‘आयुष्मान भारत’ के तहत स्वास्थ्य सुरक्षा, स्थायी आवास निर्माण के लिए वित्तीय अनुदान और स्वावलंबन के लिए आजीविका क्लस्टर सहायता प्रदान की गई, जिससे यह वंचित समाज सामाजिक मुख्यधारा में गौरवपूर्ण स्थान पा सका।

18. पोषण और खाद्य सुरक्षा: ‘पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना’ से भुखमरी के भय का अंत
खाद्य सुरक्षा किसी भी कल्याणकारी शासन की पहली कसौटी होती है। कोरोना संकट के समय प्रारंभ की गई ‘पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना’ के तहत देश के 81.3 करोड़ से अधिक नागरिकों को प्रति व्यक्ति 5 किलोग्राम मुफ्त अनाज उपलब्ध कराया जा रहा है। सरकार द्वारा इस योजना को 2028 तक निर्बाध जारी रखने का निर्णय दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक सुरक्षा कवच है। इसके साथ ही आंगनवाड़ी केंद्रों को आधुनिक बनाकर ‘सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0’ के माध्यम से गर्भवती महिलाओं और शिशुओं में कुपोषण, स्टंटिंग और एनीमिया के विरुद्ध वैज्ञानिक अभियान चलाया जा रहा है, जिससे अंतिम पंक्ति के परिवारों के स्वास्थ्य की बुनियाद मजबूत हुई है।

19. सस्ती और सुलभ दवाएं: ‘प्रधानमंत्री जन औषधि परियोजना’ से इलाज के खर्च में बड़ी राहत
गरीब और मध्यम वर्ग के घरेलू बजट पर बीमारियों के इलाज और महंगी दवाओं का अत्यधिक वित्तीय भार पड़ता था। इस दबाव को समाप्त करने के लिए ‘प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना’ के तहत देश भर में 14,000 से अधिक जन औषधि केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं। इन केंद्रों पर 2,000 से अधिक उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाएं और 300 सर्जिकल उत्पाद बाजार के ब्रांडेड मूल्यों से 50 से 90 प्रतिशत तक कम दामों पर उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त मात्र 1 रुपये में बायोडिग्रेडेबल ‘सुविधा’ सेनेटरी पैड उपलब्ध कराकर ग्रामीण और वंचित वर्ग की महिलाओं के स्वास्थ्य और स्वच्छता को नई सुरक्षा दी गई, जिससे आम नागरिकों के चिकित्सा खर्च में सालाना हजारों करोड़ रुपये की बचत हो रही है।

20. वंचित युवाओं का उद्यमिता में उभार: ‘स्टैंड अप इंडिया’ से रोजगार सृजक बनने का सफर
अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और महिला वर्ग को केवल नौकरी मांगने वाला नहीं, बल्कि रोजगार देने वाला (Job Creator) बनाने के लिए 2016 में ‘स्टैंड अप इंडिया’ योजना प्रारंभ की गई। इसके अंतर्गत देश के प्रत्येक वाणिज्यिक बैंक की प्रत्येक शाखा से कम से कम एक एससी/एसटी और एक महिला उद्यमी को विनिर्माण, सेवा या व्यापार क्षेत्र में ग्रीनफील्ड उद्यम लगाने हेतु 10 लाख से 1 करोड़ रुपये तक का ऋण उपलब्ध कराया गया। अब तक इस योजना के माध्यम से 50,000 करोड़ रुपये से अधिक के ऋण स्वीकृत किए जा चुके हैं, जिसने सामाजिक विषमताओं की बेड़ियों को तोड़कर वंचित समाज के युवाओं को सफल उद्यमी के रूप में स्थापित किया।

21. नए दौर के श्रम बल को पहचान: ‘ई-श्रम’ और गिग वर्कर्स की सामाजिक सुरक्षा
डिजिटल दौर में डिलीवरी बॉय, कैब ड्राइवर और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले लाखों गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स आजादी के बाद की किसी भी श्रम नीति में स्थान नहीं पा सके थे। नरेंद्र मोदी सरकार ने इस नए दौर के अनौपचारिक श्रम बल को पहली बार सामाजिक सुरक्षा संहिताओं (Social Security Code) के दायरे में लाकर कानूनी मान्यता दी। ‘ई-श्रम पोर्टल’ के माध्यम से देश के 30 करोड़ के करीब असंगठित कामगारों का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार किया गया, जिससे उन्हें 12 अंकों का यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (UAN) और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के तहत 2 लाख रुपये का दुर्घटना बीमा कवर मिला। इस पहल ने देश के सबसे बड़े श्रम बल को नीतिगत उपेक्षा से बाहर निकाला।

22. तटीय और अंतर्देशीय मछुआरों की नीली क्रांति: ‘पीएम मत्स्य संपदा योजना’
भारत के 8,000 किलोमीटर से अधिक लंबे समुद्र तटों और अंतर्देशीय जलाशयों पर जीवन बसर करने वाले लाखों पारंपरिक मछुआरे दशकों तक प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम और साहूकारों के भारी कर्ज में जीने को विवश थे। इस उपेक्षा को समाप्त करते हुए 20,050 करोड़ रुपये के ऐतिहासिक निवेश के साथ ‘पीएम मत्स्य संपदा योजना’ लागू की गई। पारंपरिक नावों का आधुनिकीकरण, गहरे समुद्र में मछली पकड़ने वाले जहाजों की व्यवस्था, आधुनिक फिशिंग हार्बर और कोल्ड-चेन नेटवर्क के निर्माण से मछुआरों की आय में भारी वृद्धि हुई। इसके साथ ही मछुआरों को पहली बार ‘किसान क्रेडिट कार्ड’ (KCC) की सुविधा से जोड़कर संस्थागत सस्ता कर्ज उपलब्ध कराया गया।

23. ग्रामीण महिलाओं का तकनीकी व आर्थिक स्वावलंबन: ‘लखपति दीदी’ और ‘नमो ड्रोन दीदी’
महिला सशक्तीकरण को केवल कल्याणकारी भत्तों से आगे ले जाकर आर्थिक उत्पादन और आधुनिक तकनीक से जोड़ा गया। देश के 10 करोड़ से अधिक ग्रामीण परिवारों की महिलाओं को 90 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों (SHGs) से जोड़ते हुए 3 करोड़ महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ (सालाना 1 लाख रुपये से अधिक की शुद्ध आय) बनाने का राष्ट्रीय अभियान चलाया गया। इसी कड़ी में शुरू हुई ‘नमो ड्रोन दीदी’ योजना ने गांवों की रूढ़िवादी सोच को पूरी तरह बदल दिया। ग्रामीण महिलाओं को आधुनिक कृषि ड्रोन उड़ाने, फसलों की निगरानी करने और नैनो उर्वरक व कीटनाशकों के वैज्ञानिक छिड़काव का पेशेवर प्रशिक्षण दिया गया। इस पहल ने गांव की साधारण महिला को आधुनिक कृषि सेवा का तकनीकी केंद्र बना दिया।

24. उपभोक्ता से उत्पादक बनती गरीब जनता: ‘पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना’
ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू बचत को गरीब और मध्यम वर्ग के द्वार तक पहुंचाने के लिए 75,000 करोड़ रुपये के परिव्यय से ‘पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना’ शुरू की गई। इसका लक्ष्य 1 करोड़ गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की छतों पर रूफटॉप सोलर सिस्टम स्थापित करना है। सरकार द्वारा बैंक खातों में सीधी वित्तीय सब्सिडी देकर परिवारों को प्रतिमाह 300 यूनिट तक बिल्कुल मुफ्त बिजली की गारंटी दी गई है। इससे आम परिवारों का बिजली का मासिक बिल शून्य होने के साथ-साथ अधिशेष बिजली सीधे पावर ग्रिड को बेचकर हर साल 15,000 से 20,000 रुपये की अतिरिक्त आमदनी हो रही है, जिसने अंतिम व्यक्ति को ऊर्जा का उपभोक्ता न रखकर सीधे स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादक बना दिया।

25. जनजातीय परिवारों की आनुवंशिक पीड़ा पर प्रहार: ‘राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन’
मध्य, पश्चिमी और पूर्वी भारत के आदिवासी क्षेत्रों में पीढ़ियों से एक आनुवंशिक रक्त विकार ‘सिकल सेल एनीमिया’ हजारों जनजातीय परिवारों को गंभीर शारीरिक दुर्बलता और अकाल मृत्यु के दुष्चक्र में धकेल रहा था। दशकों तक राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियों में उपेक्षित रही इस बीमारी पर सीधा प्रहार करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन 2047’ की शुरुआत की। इसके तहत जनजातीय बहुल 17 राज्यों के चिन्हित 348 जिलों में 7 करोड़ से अधिक नागरिकों और युवाओं की सघन स्क्रीनिंग कर उन्हें रंग-कोडित ‘सिकल सेल स्टेटस कार्ड’ सौंपे जा रहे हैं। विवाह पूर्व परामर्श, प्रारंभिक जांच और प्राथमिक स्तर पर उपचार से जनजातीय समाज की भावी पीढ़ियों के स्वास्थ्य की ठोस सुरक्षा तय हुई है।

26. आर्थिक न्याय का विस्तार: सामान्य वर्ग के निर्धनों को 10% EWS आरक्षण
दशकों तक आरक्षण और सामाजिक न्याय का विमर्श केवल पारंपरिक जातिगत सीमाओं में बंधा रहा, जिससे सामान्य वर्ग के करोड़ों निर्धन परिवार आर्थिक अभावों के बावजूद अवसरों से वंचित रह जाते थे। नरेंद्र मोदी सरकार ने 103वें संविधान संशोधन के जरिए सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों के लिए 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण लागू कर सामाजिक न्याय की अवधारणा को सर्वसमावेशी बनाया। अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के मौजूदा 50 प्रतिशत आरक्षण को बिना छुए किए गए इस निर्णय से उच्च शिक्षण संस्थानों और केंद्रीय नौकरियों में निर्धन सामान्य वर्ग के युवाओं को समान अवसर मिले। इसने यह स्थापित किया कि गरीबी किसी भी वर्ग की हो, कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी उसके साथ न्याय करने की है।

27. मुस्लिम महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा: तीन तलाक की कुप्रथा का वैधानिक अंत
तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति के दबाव में दशकों तक मुस्लिम महिलाओं के बुनियादी संवैधानिक और मानवीय अधिकारों की अनदेखी की जाती रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक नफा-नुकसान से परे जाकर मुस्लिम बहनों को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार दिलाया। ‘मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) कानून’ पारित कर एक साथ तीन बार ‘तलाक’ बोलकर वैवाहिक संबंध समाप्त करने की मध्यकालीन कुप्रथा को गैरकानूनी और संज्ञेय अपराध बनाया गया। इसके साथ ही पीड़ित महिलाओं के लिए गुजारा भत्ता और नाबालिग बच्चों के संरक्षण की वैधानिक व्यवस्था की गई। इस ऐतिहासिक सुधार ने देश की करोड़ों मुस्लिम बेटियों के मन से असुरक्षा की भावना समाप्त कर उन्हें बराबरी और आत्मसम्मान के साथ जीने का कानूनी कवच प्रदान किया।

28. प्रवासी श्रमिकों को राशन की आजादी: ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ से पोर्टेबिलिटी की क्रांति
आजीविका की तलाश में अपना गृह राज्य छोड़कर दूसरे शहरों में जाने वाले करोड़ों प्रवासी मजदूरों के सामने सबसे बड़ा संकट यह होता था कि उनका राशन कार्ड दूसरे राज्य में अमान्य हो जाता था। इस गंभीर मानवीय समस्या का समाधान ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ (ONORC) प्रणाली के माध्यम से निकाला गया। बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और इलेक्ट्रॉनिक पॉइंट ऑफ सेल (e-PoS) मशीनों के राष्ट्रीय एकीकरण से देश भर के राशन कार्ड राष्ट्रीय स्तर पर पोर्टेबल हो गए। आज बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल या ओडिशा का कोई भी श्रमिक मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु या सूरत में काम करते हुए भी अपने हिस्से का सस्ता या मुफ्त अनाज आसानी से ले सकता है। इस व्यवस्था ने पलायन करने वाले अंतिम व्यक्ति को भुखमरी के जोखिम से मुक्त कर दिया।

29. पिछड़े वर्गों के अधिकारों को संवैधानिक ढाल: ओबीसी आयोग को मिला संवैधानिक दर्जा
सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC) के कल्याण के लिए गठित ‘राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग’ (NCBC) दशकों तक केवल एक सांविधिक और सीमित शक्तियों वाली संस्था बना रहा। इसे संवैधानिक दर्जा देने की मांग तीन दशकों से लंबित थी। मोदी सरकार ने 102वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को पूर्ण संवैधानिक दर्जा प्रदान किया। इस कदम से आयोग को सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां मिलीं, जिससे वह पिछड़े वर्गों की शिकायतों की प्रभावी जांच और उनके अधिकारों का संरक्षण करने में पूरी तरह सक्षम बना। इसके साथ ही केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों और नीट (NEET) मेडिकल प्रवेश परीक्षा के ऑल इंडिया कोटे में ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देकर उच्च शिक्षा में सामाजिक प्रतिनिधित्व को मजबूत किया गया।

30. निम्न आय वर्ग को बीमा सुरक्षा: नाममात्र प्रीमियम पर ‘सुरक्षा’ और ‘जीवन ज्योति’ बीमा
असंगठित क्षेत्र के गरीबों और दिहाड़ी मजदूरों के लिए किसी भी अप्रत्याशित दुर्घटना या परिवार के मुख्य कमाऊ सदस्य की असामयिक मृत्यु का अर्थ पूरे परिवार का जीवनभर के लिए घोर दरिद्रता में चले जाना था। इस आर्थिक जोखिम को समाप्त करने के लिए सरकार ने दुनिया की सबसे किफायती सामाजिक सुरक्षा योजनाएं लागू कीं। ‘प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना’ (PMSBY) के तहत मात्र 20 रुपये के वार्षिक प्रीमियम पर 2 लाख रुपये का दुर्घटना बीमा और ‘प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना’ (PMJJBY) के तहत 436 रुपये के वार्षिक प्रीमियम पर 2 लाख रुपये का जीवन बीमा उपलब्ध कराया गया। इन दोनों योजनाओं में कुल संयुक्त नामांकन 74 करोड़ से अधिक पार हो चुका है और 21,500 करोड़ रुपये से अधिक के क्लेम सीधे पीड़ित गरीब परिवारों के बैंक खातों में बिना किसी अड़चन के पहुंचाए जा चुके हैं।

25 वर्षों की सेवा: अंत्योदय से आत्मनिर्भर भारत का पथ
संवैधानिक पद पर नरेंद्र मोदी के 25 वर्ष केवल प्रशासनिक निरंतरता के वर्ष नहीं हैं, बल्कि यह भारत के सामाजिक ताने-बाने को भीतर से मजबूत करने का एक महायज्ञ रहा है। 2001 में भूकंप के मलबे से बेघर नागरिकों को नया घर देने से शुरू हुआ यह सफर आज देश के कारीगरों, स्ट्रीट वेंडरों, माताओं-बहनों, वनवासियों, दिव्यांगों, छोटे किसानों, स्वच्छता कर्मियों, पिछड़े जिलों, बुजुर्गों, सीमावर्ती ग्रामीणों, विमुक्त जातियों, सस्ते इलाज, आधुनिक गिग कामगारों, पारंपरिक मछुआरों, ड्रोन उड़ाती ग्रामीण बहनों, ईडब्ल्यूएस वर्ग, मुस्लिम महिलाओं, प्रवासी श्रमिकों और पिछड़े वर्गों को देश की मुख्यधारा से जोड़ने तक विस्तृत हो चुका है। यह सामाजिक न्याय का ऐसा भारतीय मॉडल है जहां वंचित को वरीयता दी गई है और अधिकार को नागरिक का सम्मान बनाया गया है। सेवा के इन 25 वर्षों में तैयार हुआ यह मजबूत सामाजिक आधार ही वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के राष्ट्रीय संकल्प को सिद्ध करने का सबसे बड़ा संबल है।

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