Home PI Special जन सेवा के 25 साल: अपनी जड़ों पर लौटा भारत, जागा सांस्कृतिक...

जन सेवा के 25 साल: अपनी जड़ों पर लौटा भारत, जागा सांस्कृतिक स्वाभिमान और दुनिया में गूंजा राष्ट्र गौरव

SHARE

7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार संवैधानिक पद की शपथ लेने से लेकर आज तक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन सेवा के 25 साल पूरे हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व में बीते वर्षों में भारत ने न केवल आर्थिक और तकनीकी मोर्चों पर नई ऊंचाइयों को छुआ है, बल्कि देश अपनी सांस्कृतिक जड़ों और प्राचीन स्वाभिमान के साथ भी सीना तानकर खड़ा हुआ है। “विकास भी, विरासत भी” के विजन को जमीन पर पूरी दृढ़ता के साथ उतारते हुए मोदी सरकार ने दशकों से उपेक्षित पड़े आस्था के केंद्रों का कायाकल्प किया, विस्मृत नायकों को राष्ट्रीय पटल पर उनका खोया हुआ सम्मान दिलाया और गुलामी की हर निशानी को मिटाकर भारतीयता के गौरव को पुनर्स्थापित किया। आज का भारत अपनी पहचान पर गर्व करने वाला राष्ट्र बन चुका है। यह दौर केवल सुशासन का नहीं, बल्कि भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का एक स्वर्णिम अध्याय भी है।

विकास भी, विरासत भी: आस्था और आधुनिकता का अनूठा संगम
दशकों तक देश के प्रमुख आस्था केंद्रों को उपेक्षित छोड़ दिया गया था, जिससे श्रद्धालुओं को मूलभूत सुविधाओं के लिए भी तरसना पड़ता था। मोदी सरकार ने इस हीनभावना को समाप्त करते हुए सिद्ध किया कि आधुनिक विकास और प्राचीन विरासत साथ-साथ चल सकते हैं। अयोध्या में भव्य और दिव्य राम मंदिर का निर्माण सदियों पुराने राष्ट्रीय संकल्प की पूर्ण सिद्धि बनकर उभरा, जिसने करोड़ों रामभक्तों की आस्था को सम्मानित किया। इसी तरह काशी विश्वनाथ धाम के विस्तार ने बनारस के पुरातन स्वरूप को भव्यता और सुगमता प्रदान की, जबकि उज्जैन के श्री महाकाल लोक ने श्रद्धालुओं के लिए एक अद्वितीय आध्यात्मिक वातावरण तैयार किया। केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम का नवपुनर्निर्माण इसी अटूट राजनीतिक इच्छाशक्ति का सीधा प्रमाण है।

विदेशी धरती से पुरावशेषों की वापसी: अपनी जड़ों से जुड़ता भारत
बीते दशकों में भारत की अनमोल प्राचीन मूर्तियां और पुरातन धरोहरें सुनियोजित तस्करी के जरिए विदेशों के संग्रहालयों और निजी संग्रहों में पहुंचा दी गई थीं। लंबे समय तक इस दिशा में सरकारों ने कोई ठोस प्रयास नहीं किए, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत संपर्कों और मजबूत सांस्कृतिक कूटनीति के चलते इस परिदृश्य में क्रांतिकारी बदलाव आया। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और सिंगापुर जैसे देशों से अब तक सैकड़ों दुर्लभ पुरावशेषों की सफल वतन वापसी हो चुकी है। नटराज की कांस्य प्रतिमा हो या चोल और गुप्त काल की दुर्लभ कलाकृतियां, भारत की यह खोई हुई आध्यात्मिक संपदा अब अपनी पावन धरती पर लौटकर हमारी सांस्कृतिक जड़ों और स्वाभिमान को नई मजबूती दे रही है।

विस्मृत नायकों का सम्मान: इतिहास के पन्नों से निकलकर राष्ट्रीय पटल तक
भारत की आजादी और अस्मिता की रक्षा में सर्वस्व न्योछावर करने वाले कई वीर नायकों को अतीत में वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे, क्योंकि एक खास विचारधारा के तहत इतिहास को सीमित रखा गया। मोदी सरकार ने इस पुरानी उपेक्षा को समाप्त कर वास्तविक जननायकों को अमर बनाया। असम के महान सेनापति लचित बोरफुकन की 400वीं जयंती को पूरे देश में गौरव के साथ मनाया गया। भगवान बिरसा मुंडा के जन्मदिवस को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ का राष्ट्रीय मान देकर आदिवासी समाज के संघर्ष को स्वीकारा गया। रानी कमलापति और अल्लूरी सीताराम राजू के योगदान को नमन किया गया और कर्तव्य पथ पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भव्य प्रतिमा स्थापित कर देश ने अपने महानायक को सच्चा सम्मान दिया।

अमृत महोत्सव और मेरी माटी मेरा देश: जन-जन में राष्ट्रभक्ति का संचार
आजादी के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में शुरू हुए ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ और ‘मेरी माटी मेरा देश’ अभियान ने राष्ट्रभक्ति को हर नागरिक के दिल से जोड़कर एक व्यापक जन आंदोलन बना दिया। देश के कोने-कोने में बसे लाखों गांवों से पवित्र मिट्टी और पौधे लाकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ‘अमृत वाटिका’ का निर्माण किया गया, जो ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का जीवंत रूप बनी। ‘हर घर तिरंगा’ अभियान ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर नागरिक के दिल में राष्ट्रध्वज के प्रति अगाध निष्ठा और एकता की भावना जगाई। इस अभियान ने देशवासियों को यह अनुभव कराया कि राष्ट्र निर्माण में प्रत्येक नागरिक का योगदान और उसकी माटी का मोल अमूल्य है।

उपनिवेशवाद के प्रतीकों का अंत: गुलामी की मानसिकता से मुक्ति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लाल किले की प्राचीर से घोषित ‘पंच प्रण’ में गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का संकल्प सबसे महत्वपूर्ण है। इसी सोच के तहत सत्ता के केंद्र रहे अंग्रेजों के जमाने के ‘राजपथ’ को लोकसेवा और समर्पण के प्रतीक ‘कर्तव्य पथ’ में बदला गया। औपनिवेशिक काल की पुरानी संसद की जगह देश को अपना नया, आधुनिक और भव्य संसद भवन मिला, जो विशुद्ध भारतीय वास्तुकला से सुसज्जित है। यही नहीं, भारतीय नौसेना के ध्वज से औपनिवेशिक सेंट जॉर्ज क्रॉस को हमेशा के लिए हटाकर छत्रपति शिवाजी महाराज की शाही मुहर को स्थापित किया गया, जिसने हमारे सैनिकों को भारतीय शौर्य और नौसैनिक शक्ति की समृद्ध परंपरा से जोड़ दिया।

राष्ट्रपति भवन का भारतीयकरण: अमृत उद्यान और गणतंत्र मंडप
औपनिवेशिक सोच और प्रतीकों को पीछे छोड़ने की यह राष्ट्रव्यापी मुहिम देश के सर्वोच्च संवैधानिक भवन तक पहुंची। राष्ट्रपति भवन के प्रसिद्ध मुगल गार्डन का नाम बदलकर ‘अमृत उद्यान’ किया गया, जो भारत के प्राकृतिक और सांस्कृतिक सौंदर्य की सच्ची पहचान बनकर आम जनता के लिए खुला। इसके साथ ही राष्ट्रपति भवन के प्रमुख दरबार हॉल को ‘गणतंत्र मंडप’ और अशोक हॉल को ‘अशोक मंडप’ नाम दिया गया। इन बदलावों ने यह सुनिश्चित किया कि स्वतंत्र भारत के सर्वोच्च प्रतीक किसी विदेशी शासक या व्यवस्था के नाम पर नहीं, बल्कि देश की अपनी प्राचीन लोकतांत्रिक परंपरा और गौरवशाली पहचान के अनुरूप जाने जाएं।

संसदीय और प्रशासनिक सुधार: औपनिवेशिक परंपराओं की विदाई
अंग्रेजी हुकूमत के दौर से चली आ रही कई प्रशासनिक औपचारिकताएं स्वतंत्र भारत में बिना किसी तार्किक औचित्य के दशकों तक निभाई जाती रहीं। मोदी सरकार ने 92 साल पुराने अलग रेल बजट को आम बजट में समाहित कर देश की वित्तीय और योजनागत व्यवस्था को एकीकृत स्वरूप दिया। इसके अलावा, अंग्रेजों की सुविधा और लंदन के समय के हिसाब से शाम को बजट पेश करने की प्रथा को बदला गया। अब पहली फरवरी को सुबह 11 बजे बजट प्रस्तुत करने की व्यावहारिक शुरुआत की गई, ताकि नए वित्तीय वर्ष के शुरू होने से पहले नीतियों का सुचारू और पारदर्शी क्रियान्वयन जमीन पर सुनिश्चित हो सके।

बीटिंग रिट्रीट में भारतीय धुनें: स्वदेशी संगीत को राष्ट्रीय सम्मान
गणतंत्र दिवस समारोह के औपचारिक समापन पर होने वाले भव्य ‘बीटिंग रिट्रीट’ कार्यक्रम से ब्रिटिश काल की पारंपरिक ईसाई धुन ‘अबाइड विद मी’ की विदाई की गई। इसकी जगह कवि प्रदीप द्वारा रचित और लता मंगेशकर द्वारा अमर किए गए कालजयी देशभक्ति गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ की धुन को शामिल किया गया। तीनों सेनाओं के सैन्य बैंड्स में भारतीय शास्त्रीय रागों, पारंपरिक धुनों और देश के वाद्ययंत्रों को प्राथमिकता दी गई। इन कदमों ने सिद्ध किया कि स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय गौरव के पर्व अब किसी विदेशी औपनिवेशिक प्रभाव में नहीं, बल्कि विशुद्ध भारतीय रंग और लोकधुनों में मनाए जाएंगे।

अंतरिक्ष में सनातन की छाप: ‘शिव शक्ति’ और ‘तिरंगा’ पॉइंट
भारत के अंतरिक्ष विज्ञान की असीम सफलता को भी मोदी सरकार ने राष्ट्रीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक गरिमा के साथ जोड़ा। चंद्रयान-3 के लैंडर ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर जिस पावन स्थान पर पहली बार कदम रखा, उसका नाम ‘शिव शक्ति पॉइंट’ रखा गया। यह नाम विज्ञान के माध्यम से मानवता के कल्याण की प्राचीन भारतीय दृष्टि को व्यक्त करता है। वहीं चंद्रयान-2 के पदचिह्न वाले स्थान को ‘तिरंगा पॉइंट’ नाम देकर भारत के वैज्ञानिक परिश्रम को अमर पहचान दी गई। हर साल 23 अगस्त को ‘राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस’ घोषित कर यह सिद्ध किया गया कि तकनीकी तरक्की और सनातन सांस्कृतिक चेतना एक साथ मजबूती से आगे बढ़ सकते हैं।

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी: सरदार पटेल के विराट व्यक्तित्व को वंदन
देश की 562 से अधिक रियासतों का भारतीय संघ में एकीकरण कर अखंड भारत का निर्माण करने वाले लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल को दशकों तक उचित मान-सम्मान नहीं दिया गया था। मोदी सरकार ने गुजरात के केवड़िया में विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ बनाकर सरदार पटेल के प्रति पूरे राष्ट्र की कृतज्ञता को मूर्त रूप दिया। आज नर्मदा तट पर स्थित यह विराट स्मारक केवल पर्यटन और स्थानीय आजीविका का बड़ा केंद्र ही नहीं है, बल्कि यह हर भारतीय नागरिक के मन में ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ और राष्ट्रीय एकता की भावना को सदैव जीवित रखने वाला सबसे बड़ा तीर्थ बन चुका है।

अनुच्छेद 370 की समाप्ति और कश्मीर में सांस्कृतिक जागरण
अनुच्छेद 370 और 35ए के ऐतिहासिक खात्मे के बाद कश्मीर घाटी में अलगाववाद और आतंक के साए को मिटाकर शांति, विकास और सांस्कृतिक पुनरुद्धार का नया सवेरा हुआ। दशकों से बंद और उपेक्षित पड़े श्रीनगर के शंकराचार्य मंदिर, खीर भवानी मंदिर और अनंतनाग के मार्तंड सूर्य मंदिर में फिर से नियमित पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक उत्सवों की रौनक लौटी। सीमावर्ती कुपवाड़ा के टीटवाल में नियंत्रण रेखा के पास मां शारदा देवी के मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया। इस कदम ने कश्मीर का उसकी प्राचीन ज्ञान परंपरा, ऋषि कश्यप की धरा और सनातन संस्कृति से नाता एक बार फिर हमेशा के लिए अटूट कर दिया।

द्वीपों का भारतीयकरण: अंडमान में शौर्य और शहादत को नमन
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से ब्रिटिश हुकूमत के अफसरों के नाम हमेशा के लिए हटाकर उन्हें भारत के वीरों की स्मृति से जोड़ा गया। रॉस द्वीप का नाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप, नील द्वीप का नाम शहीद द्वीप और हैवलॉक का नाम स्वराज द्वीप रखा गया। इसके साथ ही देश की रक्षा में सर्वोच्च बलिदान देने वाले 21 परमवीर चक्र विजेताओं के नाम पर 21 बड़े निर्जन द्वीपों का नामकरण किया गया। पीरू सिंह, सोमनाथ शर्मा और विक्रम बत्रा जैसे परमवीरों के नाम पर द्वीपों की पहचान स्थापित कर भारत की सीमाओं को सदा के लिए जवानों के शौर्य और शहादत से जोड़ दिया गया।

चारधाम ऑल-वेदर रोड: देवभूमि की यात्रा आसान और सुरक्षित
उत्तराखंड के चारों पावन धामों—बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री—की यात्रा को सुरक्षित और हर मौसम के अनुकूल बनाने के लिए चारधाम ऑल-वेदर हाईवे परियोजना पर अभूतपूर्व गति से काम हुआ। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन और आधुनिक सुरंगों के निर्माण ने हिमालय के दुर्गम रास्तों पर होने वाले भूस्खलन के खतरे को कम कर तीर्थ यात्रा को बेहद सुगम बना दिया। इस परियोजना ने न केवल लाखों श्रद्धालुओं की यात्रा को सुरक्षित बनाया, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से सीमावर्ती क्षेत्रों तक भारतीय सेना की त्वरित आवाजाही को भी सुदृढ़ कर सांस्कृतिक आस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा का मजबूत संगम प्रस्तुत किया।

भारत मंडपम और यशोभूमि: वैश्विक बैठकों में भारतीय कला का वैभव
जी20 शिखर सम्मेलन के लिए तैयार किए गए ‘भारत मंडपम’ और द्वारका के ‘यशोभूमि’ जैसे अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटरों के निर्माण में भारत की प्राचीन कला, वास्तु और ज्ञान परंपरा को समाहित किया गया। भारत मंडपम के सामने स्थापित भगवान नटराज की विशाल अष्टधातु प्रतिमा, कोणार्क सूर्य मंदिर का पहिया और देश भर की लोक कलाओं के प्रदर्शन ने दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों के राष्ट्राध्यक्षों को भारत के समृद्ध सांस्कृतिक वैभव से परिचित कराया। इसने यह संदेश दिया कि नया भारत आधुनिक वैश्विक सम्मेलनों की मेजबानी अपनी सांस्कृतिक पहचान और वास्तुशिल्प के पूरे आत्मविश्वास के साथ करता है।

 

 

श्री अन्न का गौरव: वैश्विक थाली तक पहुंचा भारतीय पोषण
ज्वार, बाजरा, रागी जैसे पारंपरिक भारतीय मोटे अनाजों को मोदी सरकार ने ‘श्री अन्न’ का मान देकर एक वैश्विक जन आंदोलन का रूप दिया। भारत की मजबूत पहल और कूटनीति के चलते ही संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2023 को ‘अंतरराष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष’ घोषित किया। इस कदम ने भारत की सहस्राब्दियों पुरानी पौष्टिक खानपान संस्कृति को दुनिया भर में स्वास्थ्य, पर्यावरण और टिकाऊ जीवनशैली का नया आधार बना दिया। इसके जरिए न केवल वैश्विक मंच पर भारत के पारंपरिक भोजन का डंका बजा, बल्कि देश के लाखों छोटे और सीमांत किसानों की आय और सम्मान में भी भारी वृद्धि हुई।

भारतीय ज्ञान प्रणाली: किताबों में लौटी अपनी बौद्धिक विरासत
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के जरिए औपनिवेशिक सोच पर कड़ा प्रहार करते हुए ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली’ (आईकेएस) को मुख्यधारा के पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया गया। वैदिक गणित, प्राचीन धातु विज्ञान, आयुर्वेद, खगोल शास्त्र और भारत की पारंपरिक जल संचयन तकनीकों को आधुनिक वैज्ञानिक सोच के साथ जोड़कर स्कूलों और उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ाया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी में अपनी सभ्यता, दर्शन और पूर्वजों की बौद्धिक संपदा के प्रति हीनभावना को समाप्त करना है, ताकि देश के युवा आत्मविश्वास से भरकर वैश्विक स्तर पर नए अनुसंधानों का नेतृत्व कर सकें।

जैन और पारसी परंपराओं का सम्मान: सर्वसमावेशी सांस्कृतिक दृष्टिकोण
मोदी सरकार ने भारत की सभी प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं और संप्रदायों के संरक्षण पर संवेदनशीलता के साथ ध्यान दिया। भगवान महावीर के 2550वें निर्वाण महोत्सव का राष्ट्रीय स्तर पर भव्य आयोजन कर उनके सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह के संदेश को जन-जन तक पहुंचाया गया। इसके साथ ही जैन समाज की पवित्र आस्था के केंद्र सम्मेद शिखरजी तीर्थ की पवित्रता और मर्यादा को अक्षुण्ण रखने के लिए सरकार ने तुरंत ठोस कदम उठाए। वहीं दूसरी ओर देश की सबसे पुरानी सूक्ष्म संस्कृतियों में से एक को सहेजने के लिए ‘जियो पारसी’ योजना को नए सिरे से गति देकर पारसी समाज के अस्तित्व और विरासत को संबल दिया गया।

भारत गौरव ट्रेनें: आधुनिक रेल से सुगम सांस्कृतिक दर्शन
भारतीय रेल के विशाल नेटवर्क को देश के आध्यात्मिक स्थलों से जोड़ने के लिए अत्याधुनिक ‘भारत गौरव’ पर्यटक ट्रेनों की शुरुआत की गई। रामायण एक्सप्रेस, गुरु कृपा यात्रा और भारत-नेपाल आस्था यात्रा जैसी विशेष ट्रेनों ने देशवासियों को अयोध्या, जनकपुर, रामेश्वरम, वाराणसी और प्रमुख सिख तख्तों की सुगम और संगठित यात्रा कराई। इन ट्रेनों में पारंपरिक खानपान, सुरक्षा और सुलभ आवास की व्यवस्था कर आम परिवारों के लिए तीर्थ यात्रा को बेहद आरामदायक और गरिमापूर्ण बनाया गया, जिससे घरेलू धार्मिक पर्यटन को नई रफ्तार मिली और राज्यों की संस्कृतियां आपस में जुड़ीं।

नालंदा महाविहार का पुनरोद्धार: ज्ञान के वैश्विक केंद्र की वापसी
सदियों पहले विदेशी आक्रांताओं द्वारा जलाकर खाक कर दी गई प्राचीन नालंदा यूनिवर्सिटी के नए परिसर का लोकार्पण कर मोदी सरकार ने पूरी दुनिया को यह स्पष्ट संदेश दिया कि पुस्तकें जलाई जा सकती हैं, लेकिन ज्ञान की ज्योति कभी नहीं बुझती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन और प्रयासों से नालंदा का पुनर्जन्म हुआ, जो भारत को फिर से विश्व में शिक्षा, उच्च शोध और दर्शन का प्रमुख केंद्र बनाने की दिशा में एक युगांतकारी कदम है। यह नया परिसर दुनिया भर के छात्रों और शोधकर्ताओं को भारत की ज्ञान परंपरा से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन रहा है।

भारतीय न्याय संहिता: दंड की जगह न्याय की विशुद्ध भारतीय दृष्टि
अंग्रेजी शासन द्वारा 1860 के दशक में भारतीयों को प्रताड़ित करने और नियंत्रित करने के लिए बनाए गए दंडात्मक कानूनों (आईपीसी, सीआरपीसी और एविडेंस एक्ट) को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया। उनकी जगह भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम को लागू किया गया। यह विधायी परिवर्तन केवल धाराओं का बदलाव नहीं, बल्कि नागरिकों को सजा देने की औपनिवेशिक मानसिकता को खत्म कर पीड़ित को त्वरित न्याय, मानवीय गरिमा और सुरक्षा देने वाली विशुद्ध भारतीय न्याय दृष्टि को देश की कानूनी व्यवस्था की रीढ़ बनाना है।

 

राष्ट्रीय समर स्मारक: देश के रणबांकुरों के शौर्य का स्थायी मंदिर
आजादी के सात दशकों बाद तक देश की सीमाओं की रक्षा और विदेशी आक्रमणों का मुकाबला करते हुए प्राणों की आहुति देने वाले वीर सैनिकों के लिए कोई संयुक्त राष्ट्रीय स्मारक नहीं था। मोदी सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी के केंद्र में भव्य ‘नेशनल वॉर मेमोरियल’ का निर्माण कर अमर शहीदों के प्रति पूरे राष्ट्र का आभार प्रकट किया। इंडिया गेट पर जलने वाली अमर जवान ज्योति को इसी स्मारक की अखंड ज्योति में विलीन कर हर ज्ञात-अज्ञात बलिदानी सैनिक के नाम को स्वर्णाक्षरों में अंकित किया गया, जो आज हर देशवासी के लिए राष्ट्रभक्ति का पावन तीर्थ है।

यूनेस्को धरोहरों में भारत की छलांग: वैश्विक पटल पर संस्कृति का परचम
मोदी सरकार की सक्रिय सांस्कृतिक कूटनीति के परिणामस्वरूप भारत के प्राचीन कला और प्राकृतिक स्थलों को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में अभूतपूर्व मान्यता मिली है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन, कर्नाटक के पवित्र होयसल मंदिर समूह, हड़प्पा कालीन जल प्रबंधन के प्रतीक धोलावीरा और असम के चराईदेव मोइदम को विश्व धरोहर का दर्जा मिला। इसके साथ ही कोलकाता की दुर्गा पूजा और गुजरात के गरबा को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में शामिल कराकर भारत के सामूहिक लोकोत्सवों और लोकनृत्यों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक विशिष्ट पहचान और सम्मान दिलाया गया।

इसे भी पढ़ेंः कांग्रेस के 60 साल में 30, तो मोदी सरकार के 12 साल में 15 धरोहर स्थल यूनेस्को सूची में शामिल 

नमामि गंगे और पवित्र नदियों की सफाई: आस्था के साथ स्वच्छता
मां गंगा को केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारत की जीवनदायिनी और सांस्कृतिक चेतना मानकर ‘नमामि गंगे’ मिशन को मिशन मोड में चलाया गया। आधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स, औद्योगिक कचरे पर सख्त नियंत्रण और घाटों के सौंदर्यीकरण से गंगाजल की गुणवत्ता में क्रांतिकारी सुधार आया, जिससे वर्षों बाद कई स्थानों पर जल आचमन और स्नान के अनुकूल बना। इसके साथ ही भारतीय सभ्यता की जननी मानी जाने वाली पौराणिक और लुप्त सरस्वती नदी के प्रवाह को खोजने, उसके मार्ग को वैज्ञानिक रूप से दर्ज करने और जल पुनर्भरण की योजनाओं को नई दिशा देकर जल संस्कृति को बचाया गया।

शास्त्रीय भाषाओं का सम्मान: प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को स्वीकृति
केंद्र सरकार ने मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली को शास्त्रीय भाषा (क्लासिकल लैंग्वेज) का दर्जा देकर भारत के भाषाई, साहित्यिक और दार्शनिक वैभव का मान बढ़ाया। यह निर्णय साबित करता है कि सरकार केवल आधुनिक विकास ही नहीं, बल्कि भारत के हजारों साल पुराने ज्ञान, लोकसाहित्य, बौद्ध और जैन वाङ्मय को सुरक्षित रखने के लिए पूरी तरह समर्पित है। इस दर्जे के मिलने से इन भाषाओं में प्राचीन ग्रंथों के संरक्षण, अकादमिक शोध और विश्वविद्यालयों में नए अध्ययन केंद्रों की स्थापना को गति मिली है, जिससे भाषाई स्वाभिमान जागा है।

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस: इतिहास की सीख और राष्ट्रीय एकता
14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने की शुरुआत कर देश के विभाजन के समय अपनी जड़ों से उखड़े और जान गंवाने वाले लाखों निर्दोष देशवासियों के असीम दर्द और बलिदान को राष्ट्रीय स्मृति का हिस्सा बनाया गया। दशकों तक इस त्रासदी पर चुप्पी साधी गई थी, लेकिन इस पहल ने पीड़ितों के संघर्ष को सम्मान दिया। यह दिवस हर भारतीय नागरिक को यह स्पष्ट संदेश देता है कि नफरत और विभाजनकारी ताकतों से सतर्क रहकर सामाजिक एकता, आपसी सद्भाव और राष्ट्रीय अखंडता को बनाए रखना ही देश की सबसे बड़ी ताकत है।

प्रधानमंत्री संग्रहालय: लोकतांत्रिक निष्पक्षता का अनूठा उदाहरण
नई दिल्ली में तीन मूर्ति परिसर में अत्याधुनिक तकनीक से सुसज्जित ‘प्रधानमंत्री संग्रहालय’ बनाकर स्वतंत्र भारत के प्रत्येक पूर्व प्रधानमंत्री के योगदान को एक मंच पर निष्पक्षता से संजोया गया। राजनीतिक संकीर्णता और पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर देश के सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों की नीतियों, चुनौतियों और राष्ट्र निर्माण में उनके कार्यों को सम्मान देने वाली यह पहल अभूतपूर्व है। यह संग्रहालय देश की युवा पीढ़ी को यह सिखाता है कि लोकतंत्र किसी एक परिवार या दल की जागीर नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयासों से सींचा गया एक सशक्त जनतंत्र है।

प्रसाद और स्वदेश दर्शन: हर राज्य में तीर्थ स्थलों का कायाकल्प
‘प्रसाद’ और ‘स्वदेश दर्शन’ योजनाओं के जरिए देश के कोने-कोने में स्थित छोटे-बड़े धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों पर विश्वस्तरीय नागरिक सुविधाएं विकसित की गईं। असम के कामाख्या मंदिर, ओडिशा के जगन्नाथ पुरी, मध्य प्रदेश के अमरकंटक, गुजरात के सोमनाथ और दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिरों में दर्शनार्थियों के लिए सुगम रास्ते, आधुनिक विश्राम गृह और स्वच्छता की पुख्ता व्यवस्था की गई। इस समग्र बुनियादी विकास ने देश के भीतर सांस्कृतिक पर्यटन को बहुत बड़ा संबल दिया, जिससे आम नागरिकों के लिए तीर्थ यात्रा सुगम और आनंददायक बन सकी।

बौद्ध सर्किट और कुशीनगर एयरपोर्ट: वैश्विक शांति और मैत्री का मार्ग
भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण स्थल कुशीनगर में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का निर्माण और सारनाथ, बोधगया, राजगीर, श्रावस्ती जैसे स्थलों को बौद्ध सर्किट के तहत विश्वस्तरीय सड़कों से जोड़ने से विदेशी बौद्ध श्रद्धालुओं का भारत आना सुगम हुआ। इस पहल ने जापान, थाईलैंड, श्रीलंका, वियतनाम, कंबोडिया और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ भारत के आत्मिक, सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंधों को अभूतपूर्व प्रगाढ़ता दी। इसने दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत युद्ध की नहीं, बल्कि बुद्ध के शांति, करुणा और मैत्री के शाश्वत विचार की भूमि है।

सेंगोल की पुनर्स्थापना: नीति और धर्म से शासन का प्रतीक
संसद के नए भवन में ऐतिहासिक और पवित्र ‘सेंगोल’ को पूर्ण विधि-विधान के साथ स्थापित कर मोदी सरकार ने चोल साम्राज्य की प्राचीन ज्ञान और शासन परंपरा को पुनर्जीवित किया। लोकसभा अध्यक्ष के आसन के ठीक पास स्थापित यह सेंगोल हर जनप्रतिनिधि को याद दिलाता है कि राजनीतिक सत्ता केवल अधिकार नहीं, बल्कि जनता के प्रति धर्म, सत्य, निष्पक्षता और निस्वार्थ सेवा का पावन दायित्व है। इस कदम ने आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणाली को भारत के प्राचीन आध्यात्मिक मूल्यों और सांस्कृतिक परंपरा से सीधे जोड़ दिया।

अबू धाबी का भव्य हिंदू मंदिर: खाड़ी देश में भारतीय संस्कृति का मान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शी और मजबूत विदेश नीति का ही परिणाम है कि संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी में भव्य बीएपीएस हिंदू मंदिर का निर्माण संभव हो सका। एक प्रमुख इस्लामिक देश में भारतीय स्थापत्य कला, गुलाबी बलुआ पत्थरों की नक्काशी और सनातन आस्था के विशाल केंद्र की स्थापना यह दर्शाती है कि मोदी युग में भारतीय संस्कृति को विश्व भर में कितना ऊंचा आदर और स्वीकार्यता मिल रही है। यह मंदिर आज वैश्विक स्तर पर अंतर-धार्मिक सौहार्द और भारत के बढ़ते सांस्कृतिक कद का सबसे बड़ा प्रतीक है।

कूटनीति में स्थानीय कला: विदेशी मेहमानों को भारत की पहचान का उपहार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और वैश्विक नेताओं को औपचारिक बैठकों में भारत के स्थानीय हस्तशिल्प, हथकरघा और लोक कलाकृतियां भेंट करने की एक अनूठी और प्रेरक परंपरा शुरू की। कश्मीर का पश्मीना शॉल, गुजरात का पाटन पटोला, उत्तर प्रदेश की गुलाबी मीनाकारी, असम का गमोसा और बिहार की मंजूषा व मधुबनी पेंटिंग को वैश्विक नेताओं को भेंट कर देश के गुमनाम स्थानीय कारीगरों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई गई। इसने ‘वोकल फॉर लोकल’ को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित कर देश के सांस्कृतिक उत्पादों का मान बढ़ाया।

इसे भी पढ़ेंः पीएम मोदी की गिफ्ट डिप्लोमेसी से देश की कला को मिली विश्व में पहचान, जी-20 मेहमानों को भेंट किए अनोखे उपहार

आदिवासी गौरव संग्रहालय: स्वतंत्रता संग्राम के वीर नायकों को नमन
देश की आजादी, संस्कृति और जल-जंगल-जमीन की रक्षा में जनजातीय समाज के अतुलनीय योगदान को अमर करने के लिए देश भर के विभिन्न राज्यों में 10 अत्याधुनिक जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय स्थापित किए गए। राजस्थान के मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय महत्व का स्थल बनाकर और भगवान बिरसा मुंडा के उलगुलान को राष्ट्रीय पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा बनाकर यह सुनिश्चित किया गया कि हमारे वीर आदिवासी नायकों का त्याग इतिहास के किसी अंधेरे कोने में न छूटे, बल्कि आने वाली पीढ़ियां उनके शौर्य से प्रेरणा लें।

बाबा साहेब के पंचतीर्थ: सामाजिक समरसता और सम्मान का संकल्प
मोदी सरकार ने संविधान निर्माता और सामाजिक समरसता के अग्रदूत बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर से जुड़े पांच प्रमुख स्थानों को ‘पंचतीर्थ’ के रूप में विकसित कर राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल बनाया। महू (जन्मभूमि), लंदन (शिक्षा भूमि), नागपुर (दीक्षा भूमि), दिल्ली (महापरिनिर्वाण स्थल) और मुंबई (चैत्य भूमि) के स्थलों का अत्याधुनिक कायाकल्प कर राष्ट्र ने सामाजिक न्याय के प्रणेता के प्रति अपनी सच्ची कृतज्ञता व्यक्त की। यह प्रयास समाज के अंतिम पायदान पर खड़े वंचित वर्ग के सम्मान और राष्ट्रीय एकता की अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

योग और आयुर्वेद को विश्व में प्रतिष्ठा: भारत का स्वास्थ्य दर्शन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कूटनीतिक प्रयासों से संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ के रूप में मान्यता दी, जिसके चलते आज दुनिया के 190 से अधिक देशों में लोग योग को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बना चुके हैं। इसके साथ ही गुजरात के जामनगर में डब्ल्यूएचओ ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन की स्थापना कराकर आयुर्वेद, सिद्ध और पारंपरिक चिकित्सा को आधुनिक दुनिया में वैज्ञानिक प्रमाणिकता दिलाई गई। इसने भारत को दुनिया के वैलनेस और समग्र स्वास्थ्य पर्यटन के सबसे बड़े वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित किया है।

सिख गुरुओं के बलिदान को नमन: करतारपुर कॉरिडोर और वीर बाल दिवस
सिख श्रद्धालुओं की कई दशकों पुरानी अरदास को पूरा करते हुए मोदी सरकार ने कूटनीतिक इच्छाशक्ति से पाकिस्तान स्थित पवित्र गुरुद्वारा दरबार साहिब तक करतारपुर कॉरिडोर का निर्माण कराया, जिससे बिना वीजा के पावन दर्शन संभव हुए। इसके साथ ही श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के साहिबजादों जोरावर सिंह और फतेह सिंह के अद्वितीय शौर्य और बलिदान की स्मृति में 26 दिसंबर को ‘वीर बाल दिवस’ घोषित किया गया। इस ऐतिहासिक निर्णय ने गुरुओं के धर्म और राष्ट्र रक्षा के महान संस्कारों को देश के हर बच्चे और युवा तक पहुंचाकर अमर कर दिया।

सांस्कृतिक एकता का संगम: काशी-तमिल समागम और भाषा गौरव
उत्तर और दक्षिण भारत के सदियों पुराने ज्ञान, कला और बौद्धिक संबंधों को नया जीवन देने के लिए ‘काशी-तमिल संगमम’ और ‘सौराष्ट्र-तमिल संगमम’ जैसे अनूठे राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किए गए। इन आयोजनों ने उत्तर और दक्षिण के लोगों के बीच भावनात्मक दूरी को समाप्त कर सांस्कृतिक एकात्मता का नया सेतु बनाया। इसके साथ ही नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा और स्थानीय भाषाओं में प्राथमिक से लेकर मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसी तकनीकी पढ़ाई की व्यवस्था कर भारतीय भाषाओं के प्रति स्वाभिमान और गर्व का भाव जगाया गया।

आस्था से आजीविका: तीर्थ विकास से स्थानीय अर्थव्यवस्था को उड़ान
तीर्थ स्थलों के विकास को मोदी सरकार ने केवल धार्मिक आस्था तक सीमित न रखकर उसे स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार के सबसे बड़े माध्यम के रूप में विकसित किया। अयोध्या, काशी, उज्जैन और केदारनाथ में श्रद्धालुओं की रिकॉर्ड आमद से स्थानीय टैक्सी चालकों, नाविकों, होटल संचालकों, हस्तशिल्पियों और छोटे दुकानदारों की कमाई में कई गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस समग्र मॉडल ने यह सिद्ध कर दिखाया कि जब आस्था के केंद्रों का सम्मानपूर्वक पुनरुद्धार होता है, तो वह पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को गति देकर जन-जन को आत्मनिर्भर और समृद्ध बनाता है।

पद्म पुरस्कारों का लोकतंत्रीकरण: जमीन से जुड़े लोक साधकों का राष्ट्रीय अभिनंदन
कभी खास राजनीतिक या अभिजात्य लुटियंस हलकों तक सीमित रहने वाले पद्म पुरस्कारों की पूरी प्रक्रिया को मोदी सरकार ने पारदर्शी बनाकर सच्चे अर्थों में ‘पीपल्स पद्म’ में बदल दिया। अब दूर-दराज के गांवों, वनांचलों और बस्तियों में बिना किसी प्रचार के लोक कला, पर्यावरण संरक्षण, जैविक खेती और निस्वार्थ समाज सेवा में जुटे सच्चे कर्मयोगियों को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया जा रहा है। इन गुमनाम विभूतियों को सम्मानित करना वास्तव में भारतीय संस्कृति की जमीनी सेवा और लोक प्रतिभा का सबसे बड़ा राष्ट्रीय अभिनंदन बन चुका है।

सांस्कृतिक स्वाभिमान से सशक्त भारत का निर्माण
नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों के निरंतर जनसेवा के सफर में सांस्कृतिक पुनरुत्थान सिर्फ भाषणों या नारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह भारत के आत्मगौरव और आत्मविश्वास का सबसे मजबूत आधार बना है। अपनी प्राचीन विरासत और मूल्यों पर गर्व करते हुए आधुनिक विकास के पथ पर तेज गति से आगे बढ़ना ही आज के नए और आत्मनिर्भर भारत का मूल मंत्र है। गुलामी की हर हीनभावना से बाहर निकलकर और अपनी हजारों साल पुरानी गौरवशाली परंपराओं को सीने से लगाकर आज का भारत विश्व पटल पर एक स्वाभिमानी, सशक्त और विकसित राष्ट्र के रूप में पूरे विश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है।

Leave a Reply