पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति को लेकर समय-समय पर सामने आए घटनाक्रमों से यह साफ है कि वो खुद को संवैधानिक संस्थाओं से ऊपर मानती हैं। इसके कई उदाहरण भी हैं। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाना, अदालतों के फैसलों पर सार्वजनिक असहमति जताना, और केंद्रीय एजेंसियों जैसे ED/CBI पर सीधे राजनीतिक आरोप लगाना, ये सब केवल राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं, बल्कि उसी व्यापक नैरेटिव का हिस्सा हैं। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सभी को है, लेकिन जब हर निर्णय को पूर्वाग्रह से प्रेरित बताने की प्रवृत्ति विकसित हो जाती है, तो इससे संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाने की साजिश साफ तौर पर सामने आ जाती है। पश्चिम बंगाल में कई मौकों पर यह देखा गया है कि संस्थागत फैसलों को स्वीकार करने के बजाय उन्हें खुले मंचों से चुनौती दी गई, जिससे ना केवल टकरावपूर्ण माहौल बना, बल्कि ममता बनर्जी की कुत्सित सोच भी बार-बार उजागर हुई है।
सीएम के लिए संवाद-समन्वय की जगह टकराव और संघर्ष अहम
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के राज्यपाल और केंद्र सरकार के साथ लगातार टकराव से भी इस धारणा को मजबूती मिलती है कि सीएम ने संवाद और समन्वय की जगह टकराव और संघर्ष को प्राथमिकता दी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थाओं के बीच संतुलन और पारस्परिक सम्मान बेहद जरूरी है। मोदी सरकार पिछले डेढ़ दशक से इसी सुशासन और जनविश्वास की नींव पर आधारित है। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में सीएम खुद को संवैधानिक संस्थाओं से भी ऊपर मानती हैं। इसलिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट, कोलकाता हाई कोर्ट, राज्यपाल, राष्ट्रपति, प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई तक के खिलाफ बयान दिए हैं और उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाएं हैं। इसलिए राज्य में संतुलन बार-बार बिगड़ता है, तो उसका असर केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रहता, बल्कि प्रशासनिक कार्यक्षमता और विकास की गति पर भी स्पष्ट रूप से पड़ रहा है। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में यह सवाल इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्योंकि वह लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति भरोसे को कमजोर करने का जोखिम उठा रही है, जबकि विधानसभा चुनाव सिर पर है।
आइए, तृणमूल सरकार की मुखिया के रूप में संवैधानिक संस्थाओं पर कब-कब सवाल उठाए हैं या फिर उनसे टकराव मोल लिया है, इसके कुछ सबूत पर एक नजर डालते हैं
सबूत नंबर 10
7 अप्रैल 2026
चुनाव आयोग पर ही हमला कर उसे कठघरे में ला दिया
CM ने Election Commission of India पर “भाजपा के इशारे पर काम करने” का आरोप लगाया और कहा कि चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है। ममता बनर्जी ने एसआईआर पर चुनाव आयोग पर हमला करते हुए धार्मिक संस्थाओं और अल्पसंख्यक क्षेत्रों के मतदाताओं के नाम हटाने का आरोप लगाया। सीएम ने एसआईआर के मुद्दे पर भारतीय चुनाव आयोग पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आयोग पर आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के दौरान उसने विभिन्न धार्मिक और धर्मार्थ संगठनों के सदस्यों को भी नहीं बख्शा। उन्होंने चुनाव आयोग को “biased” बताया और केंद्रीय बलों की तैनाती पर सवाल उठाए।

सबूत नंबर 9
2 अप्रैल 2026
बंगाल में 7 न्यायिक अधिकारी 9 घंटे तक बंधक
पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर भड़के विरोध के दौरान 2 अप्रैल 2026 को सात न्यायिक अधिकारियों को लगभग 9 घंटे तक बंधक बनाए जाने की घटना सामने आई। ये अधिकारी Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची संशोधन कार्य में लगे हुए थे। इस घटना के बाद राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति और चुनावी प्रक्रिया की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे। इस तरह की घटनाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए बाधक माना जाता है। संस्थागत कार्यों में इस प्रकार का व्यवधान प्रशासनिक अस्थिरता का संकेत देता है, जिसका असर शासन व्यवस्था और व्यापक सामाजिक विश्वास पर पड़ सकता है।
सबूत नंबर 8
7 मार्च 2026
ममता सरकार ने किया राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल का उल्लंघन
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दार्जिलिंग में ममता बनर्जी पर नाराजगी जताई क्योंकि इंटरनेशनल आदिवासी कॉन्क्लेव के लिए परमिशन नहीं दी गई। यह भी आरोप है कि पश्चिम बंगाल सरकार ने प्रोटोकॉल फॉलो नहीं किया और प्रदेश सरकार के किसी भी रिप्रेजेंटेटिव ने राष्ट्रपति को रिसीव नहीं किया। राष्ट्रपति ने संथाल समुदाय के योगदान और भाषा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि साल 2003 को संथाल समुदाय के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। उस साल, संथाल भाषा को भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था। केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति के साथ ऐसे बर्ताव पर तृणमूल सरकार से स्पष्टीकरण मांगा।
सबूत नंबर 7
8–9 जनवरी 2026
I-PAC पर ED रेड और ‘ग्रीन फाइल’ विवाद
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि ED “पार्टी के दस्तावेज चुरा रही है” और यह कार्रवाई राजनीतिक है। सीएम ने कहा कि ED की कार्रवाई का मकसद TMC का चुनावी डेटा और रणनीति चुराना है। वो ना सिर्फ ED की रेड के दौरान खुद I-PAC दफ्तर पहुंचीं और “ग्रीन फाइल” सहित दस्तावेज अपने साथ ले जाती दिखीं। ED ने आरोप लगाया कि इससे जांच में बाधा आई।
सबूत नंबर 6
8–10 जनवरी 2026
ED vs राज्य सरकार – सुप्रीम कोर्ट तक मामला
प्रवर्तन निदेशालय ने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी ने जांच में हस्तक्षेप किया और सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय का रुख किया। मुख्यमंत्री के अनावश्यक दखल देने के बावजूद राज्य की पुलिस ने उल्टा प्रवर्तन निदेशालय के खिलाफ ही एफआईआर दर्ज कर दी। ED ने अदालत में कहा कि मुख्यमंत्री ने दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक सबूत हटाए, जिससे जांच प्रभावित हुई।
सबूत नंबर 5
21 नवंबर 2025
SIR अव्यवस्थित और खतरनाक, इसे तुरंत रोको
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर SIR प्रक्रिया को अव्यवस्थित, खतरनाक और बिना तैयारी के बताया, इसे तुरंत रोकने की मांग कर डाली। जबकि अन्य चुनावी राज्यों में एसआईआर विधिवत तरीके से चल रहा है। सीएम ने एसआईआर मुद्दे पर चुनाव आयोग के चीफ ज्ञानेश कुमार को कड़े शब्दों में एक लेटर लिखा, जिसमें उन्होंने इस काम को तुरंत रोकने के लिए कहा। उन्होंने इसे अव्यवस्थित, दबाव डालने वाला और खतरनाक प्रोसेस बताया। उन्होंने कहा कि वह ‘लिखने के लिए मजबूर’ थीं, क्योंकि राज्य में वोटर लिस्ट का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन ‘बहुत खतरनाक स्टेज’ पर पहुंच गया था।
सबूत नंबर 4
2022–2024
ED और CBI को “राजनीतिक हथियार” बताया
पश्चिम बंगाल सरकार के ममता बनर्जी की तृणमूल सरकार आने के बाद खूब घोटाले हो रहे हैं। केंद्रीय जांच एजेंसियां इसकी निष्पक्षता से जांच में जुटी हैं। लेकिन राज्य की मुख्यमंत्री ने Enforcement Directorate और CBI द्वारा भर्ती घोटाला, कोयला घोटाला आदि की जांच के दौरान TMC और ममता बनर्जी लगातार एजेंसियों पर “राजनीतिक बदले” का मनगढ़ंत आरोप मढ़ती रहीं। उन्होंने EDi और CBI को बार-बार “political vendetta” का टूल बताया गया।
सबूत नंबर 4
29 जून 2024
गवर्नर को करना पड़ा सीएम के खिलाफ मानहानि का केस
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो जैसे संवैधानिक मर्यादाओं का पालन न करने की कसम ही खा रखी है। उनकी सरकार में ऐसा कई बार हुआ है कि संवैधानिक नैतिकता को ताक पर रख दिया गया है। सीएम के इसी नकारात्मक आचरण के चलते ही देश के इतिहास में पहली बार किसी राज्यपाल को मुख्यमंत्री के खिलाफ ऐसा कदम उठाने को मजबूर होना पड़ा है। ममता बनर्जी की बेसिर-पैर की टिप्पणी से आहत पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने कलकत्ता हाईकोर्ट में सीएम और टीएमसी नेताओं के खिलाफ मानहानि का केस किया है। यह शायद पहला मौका है जब किसी राज्यपाल को अपने ही राज्य के मुख्यमंत्री के खिलाफ ऐसा कदम उठाने को बाध्य होना पड़ा हो। लेकिन ममता बनर्जी के लिए संवैधानिक मर्यादाओं को तार-तार करने का यह पहला मौका नहीं है।
सबूत नंबर 3
25 अप्रैल 2024
कोलकाता उच्च न्यायालत पर “बिक गया” की अप्रत्यक्ष टिप्पणी
भर्ती घोटाले की सुनवाई के दौरान CM और TMC नेताओं ने अदालत के फैसलों पर सवाल उठाए और जांच एजेंसियों की कार्रवाई को “राजनीतिक” बताया। वकीलों के एक समूह ने कलकत्ता उच्च न्यायालय से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनर्जी द्वारा उच्च न्यायालय के खिलाफ की गई टिप्पणियों पर स्वत: संज्ञान लेने का आग्रह किया। दरअसल, भर्ती घोटाले मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट सरकार को जमकर फटकार लगाई। इस पर कथित तौर पर अदालत को “बिक गया” कहने के लिए मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने का आग्रह किया। सीएम ने यह टिप्पणी नकदी के बदले स्कूल में नौकरी मामले में अपने फैसले में लगभग 24,000 शिक्षकों की नियुक्ति को रद्द करने के उच्च न्यायालय के फैसले के मद्देनजर की थी।
सबूत नंबर 2
2023
सर्वोच्च अदालत के फैसलों पर भी दी प्रतिक्रिया
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने कई मामलों में देश की सर्वोच्च अदालत के आदेशों पर असहमति जताई और कहा कि केंद्र एजेंसियों के जरिए राज्यों पर दबाव बना रहा है। तृणमूल सरकार ने इसे चुनावी समय में विपक्ष को निशाना बनाने की कार्रवाई बताया है, जबकि दूसरी ओर ईडी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। ईडी ने आरोप लगाया है कि पश्चिम बंगाल सरकार उसकी जांच और तलाशी अभियान में दखल दे रही है और काम में बाधा डाल रही है।
सबूत नंबर 1
फरवरी 2019
शारदा चिट एंड फंड घोटाले में CBI के खिलाफ धरना
सीबीआई के अधिकारियों को कोलकाता पुलिस द्वारा रोकने के बाद ममता बनर्जी धरने पर बैठ गईं और केंद्र पर एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाया। 2019 में सीबीआई और राज्य सरकार के बीच बड़ा टकराव हुआ था। उस समय सीबीआई, शारदा चिट एंड फंड घोटाले में पूछताछ के लिए राजीव कुमार के घर पहुंची थी। लेकिन कोलकाता पुलिस ने केंद्रीय एजेंसी की टीम को अंदर जाने से रोक दिया था। आरोप लगा था कि राजीव कुमार ने शारा और रोज वैली मामलों से जुड़े अहम सबूत नष्ट किए। उस टकराव के दौरान सीबीआई अधिकारियों को हिरासत में लिया गया, जबकि राज्य पुलिस की टीमें कोलकाता में सीबीआई दफ्तरों तक पहुंच गई थीं। हालात तब और गंभीर हो गए, जब ममता बनर्जी खुद राजीव कुमार के घर पहुंचीं और वहीं धरने पर बैठ गईं। उन्होंने पूरी रात वहीं बिताई और एक पुलिस चौकी को अस्थायी राज्य सचिवालय में तब्दील कर दिया गया, जहां मंत्रियों के साथ कैबिनेट बैठक भी हुई।









