समाजवादी राजनीति का केवल कहने और दिखाने के लिए दर्शन सामाजिक न्याय, पिछड़ों की आवाज़ और लोकतांत्रिक संघर्ष है, लेकिन वास्तविकता में पार्टी के नेताओं की करनी इससे ठीक उलट है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक लंबा दौर ऐसा भी आया जब समाजवादी पार्टी पर बार-बार उंगलियां उठीं कि उसने वोट बैंक की राजनीति के लिए आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर भी समझौते किए। आतंकवाद के खिलाफ देश जहां कठोर कार्रवाई की अपेक्षा करता है, वहीं सपा सरकारों और उसके नेताओं के कई फैसलों ने यह बार-बार साबित किया कि उनके लिए राष्ट्र सुरक्षा से ऊपर तुष्टिकरण की राजनीति है! यही कारण है कि पीएम से लेकर सीएम तक और अन्य बीजेपी नेता लगातार चुनावी मंचों से सपा पर आतंकियों के प्रति नरमी बरतने का आरोप लगाते रहे हैं। सपा के कई फैसलों और बयानों ने बार-बार यह धारणा बनी कि उसने आतंकवाद जैसे गंभीर विषय को भी राजनीतिक समीकरणों के चश्मे से देखा। अदालतों की फटकार, सुरक्षा एजेंसियों पर सवाल और आतंकवाद मामलों में मुकदमे वापस लेने की कोशिशें सपा की राजनीति पर अब भी सबसे बड़े सवालिया निशान हैं।
तुष्टिकरण के लिए आतंकियों के पोषक बने समाजवादी पार्टी के नेता
सबसे बड़ा प्रश्न केवल बयानबाजी का नहीं, बल्कि उन प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों का है जिनमें आतंकवाद के आरोपियों पर दर्ज मुकदमों को वापस लेने की कोशिश की गई, सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए और कई बार आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति का माहौल बनाया गया। अदालतों तक को हस्तक्षेप करना पड़ा और कई मामलों में सरकार की मंशा पर तीखी टिप्पणियां करनी पड़ीं। यही घटनाएं आज भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में “तुष्टिकरण बनाम राष्ट्र सुरक्षा” की सबसे बड़ी बहस के रूप में सामने आती हैं। 
आइए, अब सिलसिलेवार तरीके से जानते हैं कि कब-कब समाजवादी पार्टी के नेताओं ने किन आतंकियों की पैरवी कर उन्हें बचाने की कोशिश की…
सबूत नंबर -7
आतंकी के पिता के साथ अखिलेश यादव ने किया चुनाव प्रचार
19 फरवरी 2022
आतंकवाद के कई मामलों में आजमगढ़ का नाम सामने आने के बाद भी सपा नेताओं पर साफ-साफ आरोप लगे कि उन्होंने कठोर संदेश देने के बजाय अपराधियों और आतंकियों के साथ “राजनीतिक सहानुभूति” दिखाई। अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट केस में दोषी ठहराए गए कुछ आतंकियों के परिवारों के सपा से संबंधों को लेकर भी राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि सपा ने ऐसे मामलों में स्पष्ट और कठोर रुख अपनाने के बजाय हमेशा बचाव की राजनीति की। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने चुनावी रैलियों और प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया था कि फांसी की सजा पाने वाले 38 आतंकवादियों में से एक मोहम्मद सैफ का पिता शादाब अहमद, समाजवादी पार्टी का सक्रिय नेता व कार्यकर्ता है। भाजपा नेताओं ने एक तस्वीर जारी की थी, जिसमें दोषी आतंकी के पिता को सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ चुनाव प्रचार और मंच साझा कर रहे थे।
सबूत नंबर -6
अयोध्या राम मंदिर हमले के आरोपियों पर नरमी का आरोप
14 फरवरी 2022
यूपी विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री योगी ने आरोप लगाया कि जब अखिलेश यादव 2012 में मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने सबसे पहला काम अयोध्या में राम मंदिर पर हमला करने वाले आतंकियों के ख़िलाफ़ दर्ज़ मुकदमों को वापस लेने वाली फाइल पर साइन किए थे। बीजेपी ने इसे “राष्ट्र और आस्था दोनों के खिलाफ अपराध” बताया। यह आरोप इसलिए और गंभीर बना क्योंकि अयोध्या केवल एक शहर नहीं, करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। आतंकवाद के ऐसे मामलों में नरमी दिखाना सपा की राजनीति पर सबसे बड़ा दाग बन गया। काबिले जिक्र है कि अयोध्या के राम जन्मभूमि परिसर में स्थित अस्थायी राम मंदिर पर आतंकी हमला 5 जुलाई 2005 को हुआ था।
सबूत नंबर -5
अलकायदा आतंकियों की गिरफ्तारी पर यूपी पुलिस पर अविश्वास
12 जुलाई 2021
लखनऊ के काकोरी इलाके से एटीएस ने अलकायदा से जुड़े दो आतंकियों को गिरफ्तार किया। उस समय पूरे देश में सुरक्षा एजेंसियों की सराहना हो रही थी, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि उन्हें यूपी पुलिस पर भरोसा नहीं है। बीजेपी ने इसे आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई को कमजोर करने वाला बयान बताया। सवाल यह उठा कि जब देश की सुरक्षा एजेंसियाँ संभावित आतंकी साजिश को विफल कर रही थीं, तब एक पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा पुलिस पर अविश्वास जताना किस संदेश को मजबूत कर रहा था?
सबूत नंबर -4
अखिलेश सरकार द्वारा आतंकवाद मामलों को वापस लेने की कोशिश
12 दिसंबर 2013
यूपी की सत्ता में आने के बाद अखिलेश यादव सरकार ने उन मामलों की समीक्षा शुरू की, जिनमें आतंकवाद के आरोपियों पर मुकदमे चल रहे थे। सरकार ने करीब 14 आतंकवाद मामलों में 19 आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की। इनमें गोरखपुर ब्लास्ट, लखनऊ-फैजाबाद कोर्ट ब्लास्ट जैसे गंभीर मामले शामिल थे। विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह कदम न्याय व्यवस्था को कमजोर करने और कट्टरपंथी तत्वों को राजनीतिक संरक्षण देने जैसा है। बाद में अदालतों ने कई मामलों में सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए मुकदमे वापस लेने की अनुमति नहीं दी।
सबूत नंबर -3
आतंकी खालिद मुजाहिद के परिजनों को सपा सरकार में मुआवजा!
31 मई 2013
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित वाराणसी और फैजाबाद के अदालत परिसरों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोपी खालिद मुजाहिद अखिलेश सरकार के गले की फांस बन गया था। दरअसल, खालिद की मौत के बाद प्रदेश सरकार द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए दी गई मुआवजे की राशि को परिवार ने लेने से ही इनकार कर दिया था। प्रदेश सरकार को लोकसभा चुनाव-2014 में जहां एक खास वर्ग के मुस्लिमों की नाराजगी का भय सता रहा है तो वहीं विपक्षी दलों ने सरकार के इस निर्णय को मुस्लिम तुष्टीकरण की संज्ञा देकर सीधा कटघरे में खड़ा कर दिया है। विपक्ष ने कहा कि सपा सरकार आतंकवाद के आरोपियों के प्रति इतनी नरम थी कि उसने प्रशासनिक मशीनरी पर ही दबाव बनाना शुरू कर दिया। इस पूरे प्रकरण ने यह धारणा और मजबूत की कि सपा आतंकवाद के मामलों में हमेशा सुरक्षा एजेंसियों के बजाय आरोपियों के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है।
सबूत नंबर -2
बटला हाउस एनकाउंटर पर सवाल और आतंकियों के प्रति सहानुभूति
19 सितंबर 2008
दिल्ली के बटला हाउस में हुए एनकाउंटर में इंडियन मुजाहिदीन से जुड़े आतंकियों को मार गिराया गया था। उस समय पूरे देश में आतंकवादी हमलों का भय था, लेकिन समाजवादी पार्टी के कई नेताओं ने सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल खड़े किए। मुलायम सिंह यादव ने एनकाउंटर की निष्पक्ष जांच की मांग की। दरअसल, सपा आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति दिखाकर एक विशेष वोट बैंक को साधना चाहती थी। जिस समय देश आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता चाहता था, उस समय सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर अविश्वास खड़ा करना सपा की राजनीति पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन गया।

सबूत नंबर -1
वाराणसी ब्लास्ट आरोपी वलीउल्लाह को राहत देने का प्रयास
7 मार्च 2006
वाराणसी सीरियल ब्लास्ट में निर्दोष श्रद्धालुओं की मौत हुई थी। लेकिन अखिलेश सरकार ने इस मामले के आरोपी वलीउल्लाह सहित कुछ आतंकवादियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की कोशिश की। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस कदम पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि क्या सरकार आतंकवादियों को “पद्मभूषण” देना चाहती है? अदालत की यह टिप्पणी इस बात का प्रतीक बन गई कि सरकार का कदम कितना विवादास्पद माना गया। आलोचकों ने कहा कि सपा सरकार आतंकवादियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जगह उन्हें राजनीतिक संरक्षण देने में लगी थी।
आतंकवादियों के प्रति फर्जी मुकदमे का सपा का नैरेटिव
समाजवादी पार्टी ने कई बार यह तर्क दिया कि आतंकवाद के मामलों में कुछ युवकों को झूठा फंसाया गया है। लेकिन आलोचकों का कहना था कि इस तर्क के जरिए आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई को ही कटघरे में खड़ा किया गया। जब अदालतों में कई आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत हुए और सजा भी हुई, तब सपा की राजनीतिक लाइन पर और सवाल उठे। बीजेपी ने आरोप लगाया कि सपा ने “निर्दोष” का नैरेटिव बनाकर आतंकवादियों के लिए सहानुभूति पैदा करने की कोशिश की। यहां तक कि सपा सरकार को अदालतों से फटकार मिली। फिर भी उसने आतंकवाद मामलों में मुकदमे वापस लेने की नापाक कोशिशें कीं। समाजवादी पार्टी के कई बयानों ने यह धारणा और मजबूत हुई कि उसने हमेशा आतंकवाद जैसे गंभीर विषय को भी राजनीतिक समीकरण और तुष्टिकरण के चश्मे से देखा।









