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सबूत नंबर-6: सत्ता और रसूख से अखिलेश की संपत्ति दो दशक में 18 गुना बढ़ी!

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में अखिलेश यादव का नाम केवल समाजवादी पार्टी की राजनीति के एक प्रमुख चेहरे के रूप में ही नहीं, बल्कि बीते दो दशकों में उनकी घोषित संपत्ति में हुई उल्लेखनीय वृद्धि को लेकर भी लगातार सुर्खियों में रहा है। चुनाव आयोग के समक्ष विभिन्न चुनावों में दाखिल किए गए उनके शपथपत्रों पर नजर डालें तो वर्ष 2004 में लगभग 2 करोड़ रुपये से कुछ अधिक घोषित संपत्ति रखने वाले अखिलेश यादव की कुल संपत्ति अगले बीस वर्षों में बढ़कर 40 करोड़ रुपये से अधिक के स्तर तक पहुंच चुकी है। यह वृद्धि ऐसे समय में हुई जब वे सांसद, पार्टी अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जैसे प्रभावशाली पदों पर रहे। राजनीतिक विरोधियों ने समय-समय पर इस संपत्ति वृद्धि को लेकर सवाल उठाए। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में होने वाली असाधारण वृद्धि स्वाभाविक रूप से सार्वजनिक विमर्श और राजनीतिक बहस का विषय बनती है।मुख्यमंत्रित्वकाल में संपत्ति बढ़ी, अनिमितताओं से भी घिरे
इसी अवधि में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री कार्यकाल (2012-2017) के दौरान कई ऐसी परियोजनाएं और प्रशासनिक निर्णय भी विवादों में रहे, जिन पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे। गोमती रिवर फ्रंट परियोजना, अवैध खनन प्रकरण और विभिन्न सरकारी ठेकों से जुड़े विवादों ने तत्कालीन सरकार को विपक्ष के निशाने पर रखा। इनमें से कुछ मामलों की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) तथा अन्य एजेंसियों द्वारा की गई, जबकि कई आरोप राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के स्तर पर ही सीमित रहे। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जांच, आरोप और न्यायिक दोषसिद्धि तीन अलग-अलग चरण होते हैं, जिनका मूल्यांकन तथ्यों और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर किया जाता है। हलफनामों के अनुसार अखिलेश यादव की घोषित संपत्ति लगभग 20 वर्षों में 2.31 करोड़ रुपये से बढ़कर 40–42 करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंची। यह वृद्धि लगभग 17-18 गुना है।

आइए, अब देखते हैं कि राजनीतिक सफर के बढ़ने के साथ-साथ अखिलेश यादव की संपत्ति का ग्राफ कैसे तेजी से बढ़ता चला गया…

सबूत नंबर-6
2024: दो दशक के राजनीतिक सफर में 18 गुना बढ़ी अखिलेश की संपत्ति
2024 के लोकसभा चुनाव से जुड़े सार्वजनिक रिकॉर्ड में अखिलेश यादव और उनके परिवार की कुल घोषित परिसंपत्तियाँ लगभग 41 करोड़ रुपये से ज्यादा दर्ज हैं। यह दर्शाता है कि 2022 के बाद वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रही है। फिर भी, 2004 के 2.31 करोड़ रुपये से 2024 के लगभग 42 करोड़ रुपये तक का सफर भारतीय राजनीति में घोषित संपत्ति वृद्धि के उल्लेखनीय उदाहरणों में गिना जाता है।सबूत नंबर-5
2022: अखिलेश यादव की 18 साल में 17 गुना बढ़ गई संपत्ति
एक बार फिर अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव लड़ा। उन्होंने 2022 के विधानसभा चुनाव में लगभग 40.14 करोड़ रुपये की संपत्ति घोषित की। 2019 की तुलना में वृद्धि अपेक्षाकृत सीमित रही, लेकिन 2004 की तुलना में उनकी घोषित संपत्ति लगभग 17 गुना बढ़ चुकी थी। हलफनामे के अनुसार उनके पास चल और अचल दोनों प्रकार की परिसंपत्तियाँ थीं, जबकि देनदारियाँ भी घोषित की गई थीं।सबूत नंबर-4
2019: मुख्यमंत्री बनने और उसके बाद चार गुना बढ़ी संपत्ति
उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के बार अखिलेश यादव ने एक बार फिर लोकसभा की ओर रुख किया। 2019 लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने अपनी कुल संपत्ति लगभग 37.78 करोड़ रुपये घोषित की। यह आंकड़ा 2012 के मुकाबले चार गुना से अधिक था। सात वर्षों में लगभग 29 करोड़ रुपये से अधिक की वृद्धि ने राजनीतिक बहस को जन्म दिया। विपक्षी दलों ने इसे सवालों के घेरे में रखा। क्योंकि यही वो अवधि थी, जिसमें अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री के रूप में काम किया और उनपर कई अनियमितताओं के भी आरोप लगे।सबूत नंबर-3
2012: पहली बार मुख्यमंत्री बने, संपत्ति को दो गुना बढ़ाया
मुख्यमंत्री बनने के लिए 2012 में अखिलेश यादव ने लोकसभा की कन्नौज सीट से इस्तीफा दे दिया था। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए अखिलेश यादव द्वारा जो एफिडेविट दिया गया, उसमें घोषित कुल संपत्ति लगभग 8.85 करोड़ रुपये थी। यह वह चुनाव था जिसमें समाजवादी पार्टी को बहुमत मिला और अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। 2009 से 2012 के बीच उनकी घोषित संपत्ति में फिर उल्लेखनीय वृद्धि दिखाई दी। पिछली बार पांच साल में संपत्ति दोगुनी हुई, लेकिन इस बार तीन साल में ही संपत्ति करीब-करीब दोगुनी हो गई। आलोचकों ने इसी अवधि से उनकी परिसंपत्तियों की तेज वृद्धि पर प्रश्न उठाने शुरू किए। अखिलेख का तर्क था कि यह वृद्धि वैध निवेश, विरासत और आय के स्रोतों का परिणाम थी।सबूत नंबर-2
2009: पांच साल में ही अखिलेश की संपत्ति हो गई लगभग दोगुनी
पांच साल के बाद हुए लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने लगभग 4.44 करोड़ से 4.85 करोड़ रुपये के बीच की संपत्ति घोषित की। दरअसल, उन्होंने दो संसदीय सीटों से चुनाव लड़ा था, इसलिए अलग-अलग हलफनामों में मामूली अंतर के साथ संपत्ति दिखाई थी। उस समय यह भी सवाल उठा था कि कुछ ही दिनों में 41 लाख का अंतर कैसे आ गया? 2004 की तुलना में यह लगभग दोगुनी वृद्धि थी। इस अवधि में उनकी राजनीतिक हैसियत बढ़ी और वे समाजवादी पार्टी के प्रमुख राष्ट्रीय चेहरों में शामिल हो गए।सबूत नंबर-1
2004: अखिलेश ने लोकसभा चुनाव में 2.31 करोड़ संपत्ति घोषित की
चुनावी हलफनामों के अनुसार अखिलेश यादव की घोषित संपत्ति में पिछले दो दशकों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई है। एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने लगभग 2.31 करोड़ रुपये की संपत्ति घोषित की थी। उस समय वे राष्ट्रीय राजनीति में अपेक्षाकृत नए थे और उनकी घोषित परिसंपत्तियाँ मुख्यतः कृषि भूमि, अचल संपत्ति तथा वित्तीय निवेशों पर आधारित थीं। यह वह दौर था जब समाजवादी पार्टी केंद्र और उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रभावशाली थी, लेकिन अखिलेश यादव स्वयं अभी राज्य के शीर्ष नेतृत्व तक नहीं पहुंचे थे।

अब एक नजर अखिलेश यादव सरकार के दौरान उठे प्रमुख वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों पर डालते हैं….

गोमती रिवर फ्रंट परियोजना की लागत हुई ढाई गुनी
अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल की सबसे चर्चित परियोजनाओं में लखनऊ की गोमती रिवर फ्रंट परियोजना शामिल रही। परियोजना की प्रारंभिक लागत लगभग 656 करोड़ रुपये बताई गई थी, लेकिन बाद में यह बढ़कर लगभग 1,500 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। 2017 में सत्ता परिवर्तन के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने परियोजना में कथित वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाते हुए जांच की सिफारिश की।
सीबीआई जांच और वर्तमान स्थिति
उत्तर प्रदेश सरकार की सिफारिश के बाद सीबीआई ने जांच शुरू की। बाद के वर्षों में सीबीआई ने नई एफआईआर दर्ज की और बड़ी संख्या में इंजीनियरों, अधिकारियों तथा ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई की। 2021 में सीबीआई ने 189 अधिकारियों और ठेकेदारों को लेकर दूसरी एफआईआर दर्ज की तथा कई स्थानों पर छापेमारी की। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जांच कई अधिकारियों और ठेकेदारों तक पहुंची। जांच एजेंसियां परियोजना में प्रक्रियागत और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों की पड़ताल करती रहीं हैं। 

खनन पट्टों के आवंटन में पर्यावरणीय स्वीकृतियों पर सवाल
उत्तर प्रदेश में 2012-2017 के दौरान हुए कथित अवैध खनन मामलों को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ। आरोप मुख्यतः खनन पट्टों के आवंटन और पर्यावरणीय स्वीकृतियों से जुड़े थे। मामले में कई प्रशासनिक अधिकारियों और तत्कालीन जिलाधिकारियों की भूमिका की जांच हुई।
सीबीआई जांच और वर्तमान स्थिति
सीबीआई ने न्यायालय के निर्देशों के बाद जांच की। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार एजेंसी ने कई अधिकारियों से पूछताछ की और बाद में अखिलेश यादव को भी गवाह के रूप में बयान दर्ज कराने के लिए बुलाया गया था। मामले की विभिन्न शाखाओं की जांच अलग-अलग स्तरों पर चली है। कई मामलों में जांच जारी रही, जबकि कुछ हिस्सों में आरोपपत्र और न्यायिक कार्यवाही की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

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