प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पिछले कुछ वर्षों से अपने भाषणों में लगातार एक बात कहते रहे हैं कि कांग्रेस अब एमएलसी यानी ‘मुस्लिम लीगी कांग्रेस’ बनती जा रही है। कांग्रेस के युवराज और अन्य नेता इसे चुनावी जुमला कहकर खारिज करता रहे हैं, लेकिन हाल ही में पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों के आंकड़े कांग्रेस की राजनीति की ऐसी तस्वीर साफ-साफ पेश कर रहे हैं। जनता-जनार्दन द्वारा दिए गए जनादेश में अब कांग्रेस के लिए भी इसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है। इन तीन राज्यों की कुल 654 विधानसभा सीटों पर 433 उम्मीदवार उतारे थे। इनमें से कांग्रेस केवल 35 सीटें जीत पाई, यानी कांग्रेस का जीत का प्रतिशत करीब 8 फीसदी ही रहा। लेकिन इससे भी अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इन 35 विधायकों में से 21 मुस्लिम समुदाय से हैं। यानी कांग्रेस के कुल विजयी विधायकों में लगभग 60 प्रतिशत तो मुस्लिम ही हैं। और यह संयोग नहीं है, क्योंकि कांग्रेस ने इन तीन राज्यों में करीब 42 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। अर्थात जिन मुस्लिम उम्मीदवारों को कांग्रेस ने उतारा, उनमें लगभग आधे चुनाव जीत गए। यह आंकड़ा किसी व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व वाली राष्ट्रीय पार्टी का कम और एक विशेष मुस्लिम समुदाय केंद्रित राजनीति करने वाली पार्टी का अधिक प्रतीत होता है।
तीन राज्यों के चुनावी आंकड़ों ने खड़े किए बड़े सवाल
भारतीय राजनीति में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे दलों की वैचारिक दिशा और सामाजिक स्वीकार्यता का भी आईना बनते हैं। असम, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के हालिया विधानसभा चुनावों ने कांग्रेस के सामने ऐसा ही असहज दर्पण खड़ा कर दिया है, जिसमें पार्टी का चेहरा अब “सर्वधर्म समभाव” वाली राष्ट्रीय पार्टी से अधिक एक सीमित वोट बैंक पर निर्भर संगठन जैसा दिखाई देने लगा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वर्षों से कांग्रेस पर “एमएलसी” यानी “मुस्लिम लीगी कांग्रेस” बताते रहे हैं। इन तीन राज्यों के चुनावी आंकड़ों ने ही पीएम मोदी की बात को सच साबित कर दिखाया है।
असम: कांग्रेस की असमिया अस्मिता की बजाए मुस्लिम राजनीति
असम के चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा संकेत लेकर आए हैं। राज्य में कांग्रेस लंबे समय से खुद को “संतुलित” विकल्प दिखाने की कोशिश करती रही थी, लेकिन हालिया चुनावों में उसका टिकट वितरण और जीत का पैटर्न कुछ और ही कहानी कहता है। कांग्रेस ने बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार उतारे और पार्टी की जीत का बड़ा हिस्सा उन्हीं सीटों से आया जहां मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है। इससे यह धारणा और मजबूत हुई कि कांग्रेस अब व्यापक असमिया अस्मिता की राजनीति के बजाय विशेष समुदाय आधारित गणित पर निर्भर होती जा रही है। यही कारण है कि ऊपरी असम, चाय बागान क्षेत्रों और राष्ट्रवादी वोटरों में कांग्रेस का आधार तेजी से सिकुड़ता गया। भाजपा ने इसी “तुष्टिकरण बनाम विकास” की बहस को धार दी और कांग्रेस रक्षात्मक मुद्रा में आ गई। असम के परिणाम यह बताते हैं कि कांग्रेस की रणनीति उसे सीमित पॉकेट्स तक तो बचा सकती है, लेकिन पूरे राज्य की पार्टी नहीं बना सकती। यहां बीजेपी ने फिर से प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई है।
पश्चिम बंगाल: हिंदू मतदाता की दूरी और मुस्लिम निर्भरता
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की स्थिति और भी अधिक गंभीर दिखाई दी। कभी बंगाल की मुख्यधारा की राजनीति का केंद्रीय स्तंभ रही कांग्रेस अब मुस्लिम बहुल इलाकों तक सिमटती जा रही है। पार्टी जिन सीटों पर प्रभावी रही, वहां उसका सामाजिक आधार लगभग पूरी तरह अल्पसंख्यक वोटों पर निर्भर दिखाई दिया। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर कांग्रेस को हिंदू समाज में स्वीकार्यता क्यों नहीं मिल रही? क्या कारण है कि पार्टी को टिकट वितरण में भी मुस्लिम चेहरे अधिक “सुरक्षित” लगते हैं? बंगाल में कांग्रेस का यह स्वरूप उसे तृणमूल कांग्रेस की “सॉफ्ट सेक्युलर” राजनीति और वामपंथ की पुरानी लाइन के बीच फंसा देता है। विडंबना यह है कि जिस कांग्रेस ने कभी बंगाल में बंकिम, विवेकानंद और नेताजी की विरासत की बात की थी, आज वही पार्टी चुनावी अस्तित्व बचाने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण वाले सीमित समीकरणों पर निर्भर दिखाई देती है। यही कारण है कि पार्टी की सीटें घटती गईं और उसका प्रभाव भी सिमटता गया।
तमिलनाडु: द्रविड़ राजनीति में कांग्रेस की पहचान का संकट
तमिलनाडु में कांग्रेस डीएमके के सहारे चुनाव लड़ती है, इसलिए वहां उसकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान पहले ही कमजोर हो चुकी है। लेकिन इस चुनाव में भी कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों का अनुपात और उनकी जीत दर ने बहस को जन्म दिया। कांग्रेस ने यहां भी ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों पर अधिक फोकस किया जहां धार्मिक ध्रुवीकरण उसके पक्ष में काम कर सके। समस्या केवल मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने की नहीं है। किसी भी लोकतंत्र में हर समुदाय को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अब अपने पारंपरिक हिंदू, दलित, पिछड़े और मध्यमवर्गीय वोटरों का भरोसा पूरी तरह खो चुकी है? तमिलनाडु के परिणाम यही संकेत देते हैं। कांग्रेस की राजनीति अब सहयोगी दलों के एजेंडे और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है, जबकि राज्य का बड़ा वर्ग उसे केवल “डीएमके की परछाई” मानने लगा है।
कांग्रेस की सर्व समाज से “विशेष समाज” तक की यात्रा
कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत कभी उसकी समावेशी छवि थी। पार्टी हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, दलित, आदिवासी और मध्यम वर्ग सभी की राजनीतिक आकांक्षाओं का मंच मानी जाती थी। लेकिन अब उसकी राजनीति में संतुलन कम और तुष्टिकरण के प्रति झुकाव अधिक दिखाई देता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी का मुस्लिम लीगी कांग्रेस कहना केवल चुनावी नारा भर नहीं रह गया, बल्कि विपक्ष के भीतर भी चर्चा का विषय बन चुका है। इन चुनाव परिणामों ने तो इसे साबित भी किया है। इन चुनावों ने यह भी दिखाया कि कांग्रेस को टिकट देने के लिए कई बार हिंदू उम्मीदवारों से अधिक “बेहतर” मुस्लिम उम्मीदवार नजर आते हैं, जबकि दूसरी ओर मुस्लिम मतदाता भी कांग्रेस में उन्हीं चेहरों को प्राथमिकता देते दिखाई दे रहे हैं जो उनकी सामुदायिक पहचान का प्रतिनिधित्व करते हों। यह प्रवृत्ति किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए खतरनाक संकेत है, क्योंकि इससे पार्टी का सामाजिक संतुलन बिगड़ता है और वह धीरे-धीरे व्यापक जनाधार खोने लगती है।
अब जनता चाहती है विकास, सुशासन और स्थिरता
अगर कांग्रेस इसी दिशा में चलती रही, तो उसकी स्थिति भविष्य में और सीमित हो सकती है। वह कुछ विशेष क्षेत्रों और विशेष समुदायों तक सिमटकर रह जाएगी। तब “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस” का “राष्ट्रीय” स्वरूप केवल नाम तक सीमित रह जाएगा। तीनों राज्यों के चुनाव परिणामों ने कांग्रेस के सामने कठोर प्रश्न रख दिए हैं। सवाल केवल सीटों की हार का नहीं है, बल्कि राजनीतिक चरित्र के बदलने का है। और शायद यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस को तय करना होगा कि वह फिर से “सर्व समाज” की पार्टी बनना चाहती है या “विशेष समाज” की राजनीति में खुद को स्थायी रूप से सीमित कर लेना चाहती है। केवल भाजपा विरोध को राजनीति का आधार बनाकर पार्टी लंबे समय तक नहीं चल सकती। उसे यह समझना होगा कि भारत की जनता अब केवल पहचान की राजनीति नहीं, बल्कि विकास, स्थिरता, सुशासन और सांस्कृतिक आत्मविश्वास चाहती है।
एक विशेष वोट बैंक तक सीमित राजनीति खतरे की घंटी
कांग्रेस की आज की तस्वीर तेजी से बदलती नजर आ रही है। असम में कांग्रेस के 19 विधायकों में 18 मुस्लिम होना केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि पार्टी की बदलती सामाजिक संरचना का संकेत है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के दोनों विजेता मुस्लिम समुदाय से हैं। सवाल यह नहीं है कि मुस्लिम उम्मीदवार क्यों जीते। लोकतंत्र में हर नागरिक को समान अधिकार है। असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस धीरे-धीरे अपनी राजनीति को एक विशेष वोट बैंक तक सीमित करती जा रही है? विडंबना यही है कि कांग्रेस स्वयं को “समावेशी” पार्टी कहती है, लेकिन उसके टिकट वितरण और चुनावी रणनीति के आंकड़े इसके उलट कहानी कह रहे हैं। ऐसा प्रतीत होने लगा है कि कांग्रेस को टिकट देने के लिए हिंदुओं से ज्यादा “बेहतर विकल्प” मुस्लिम उम्मीदवार दिखाई दे रहे हैं, और दूसरी ओर मुस्लिम मतदाताओं को वोट देने के लिए कांग्रेस में सबसे भरोसेमंद चेहरा केवल मुस्लिम प्रत्याशी ही नजर आ रहा है। यह प्रवृत्ति किसी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं कही जा सकती। राष्ट्रीय दल तब मजबूत बनते हैं जब वे समाज के हर वर्ग में समान स्वीकार्यता रखते हैं, न कि तब जब उनका सामाजिक आधार सिमटकर पहचान आधारित राजनीति में बदलने लगे।










