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मोदी सरकार के 12 साल: अन्नदाता के सशक्तिकरण की 24 बड़ी पहलें, खेती से कमाई तक बदली तस्वीर

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने पिछले 12 वर्षों में कृषि क्षेत्र को केवल खेती तक सीमित नहीं रखा, बल्कि किसान कल्याण, आय सुरक्षा, तकनीकी आधुनिकीकरण, बाजार पहुंच और ग्रामीण विकास को जोड़कर एक व्यापक कृषि इकोसिस्टम विकसित करने का प्रयास किया। इस दौरान कई ऐसी योजनाएं और सुधार लागू किए गए, जिनका उद्देश्य खेती को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और किसान-केंद्रित बनाना रहा।

आइए एक नजर डालते हैं पिछले 12 वर्षों में किसानों के सशक्तिकरण और खेती से कमाई तक की तस्वीर बदलने वाली 24 बड़ी पहलों पर:

1. कृषि अर्थव्यवस्था को मिली नई रफ्तार
पिछले 12 वर्षों में निरंतर नीतिगत फोकस और सार्वजनिक निवेश में रिकॉर्ड बढ़ोतरी से भारत के कृषि और संबद्ध क्षेत्रों का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। देश के कुल सकल मूल्य वर्धन (GVA) में कृषि और संबद्ध क्षेत्र की हिस्सेदारी आज करीब 18 प्रतिशत पर मजबूती से टिकी हुई है। इस क्षेत्र का जीवीए जो वर्ष 2014-15 में 20.9 लाख करोड़ रुपये था, वह मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों के चलते वर्ष 2023-2024 में ढाई गुना से अधिक बढ़कर 48.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। कृषि आज देश की अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ बनकर उभरी है और ग्रामीण विकास को नई गति दे रही है।

2. रिकॉर्ड कृषि बजटीय सहायता
यह आर्थिक प्रगति और ढांचागत सुधार इसलिए संभव हो पाया क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने कृषि विभाग के बजट की सीमाओं को पूरी तरह बदल दिया। सरकार ने किसानों के कल्याण को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शीर्ष पर रखा। कृषि और किसान कल्याण विभाग के लिए बजटीय आवंटन वर्ष 2013-14 के महज 27,663 करोड़ रुपये से बढ़ाकर वर्ष 2026-27 के लिए 1,40,528.78 करोड़ रुपये कर दिया गया है। यह लगभग पांच गुना वृद्धि सरकार की अन्नदाताओं के प्रति अटूट प्रतिबद्धता को साबित करती है।

3. फसलों के उत्पादन मूल्य में ऐतिहासिक सुधार
देश की कृषि उन्नति की मुख्य रीढ़ फसलों के उत्पादन मूल्य में हुआ जबर्दस्त सुधार है। सरकार द्वारा कृषि इनपुट और आधुनिक तकनीकों पर दिए गए विशेष जोर से खेतों की उत्पादकता में भारी उछाल आया है। फसलों का जीवीए वर्ष 2014-15 के 12.92 लाख करोड़ रुपये से लगभग दोगुना होकर वर्ष 2023-24 में 26.52 लाख करोड़ रुपये के स्तर को पार कर गया है। इसने ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक समृद्धि और निवेश के एक नए युग की शुरुआत की है।

4. कुल खाद्यान्न उत्पादन में नए कीर्तिमान
मोदी सरकार की किसान-हितैषी नीतियों और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और पोषण मिशन जैसी रणनीतिक पहलों के कारण देश का कुल खाद्यान्न उत्पादन वर्ष 2013-14 के 265.05 मिलियन टन से छलांग लगाकर वर्ष 2024-25 में 357.73 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। इस ऐतिहासिक वृद्धि में चावल, गेहूं, मक्का और मोटे अनाजों के बंपर उत्पादन का सबसे बड़ा योगदान रहा है। बेहतर उन्नत बीजों, आधुनिक कृषि पद्धतियों और नई तकनीकों के जमीनी प्रसार ने देश की पूरी उत्पादन व्यवस्था को मजबूत कर दिया है।

5. चावल उत्पादन में वैश्विक नेतृत्व
वर्ष 2024-25 में देश में 150.18 मिलियन टन का रिकॉर्ड चावल उत्पादन हुआ, जो 2014-15 में 105.48 मिलियन टन की तुलना में 42.38 प्रतिशत अधिक है। इस निरंतर बढ़त ने भारत को वैश्विक चावल बाजार में एक प्रमुख शक्ति बनाया है। उन्नत किस्म के बीजों की समय पर उपलब्धता और बेहतर पोषक तत्व प्रबंधन के कारण यह संभव हुआ है। इससे न केवल घरेलू मांग पूरी हो रही है, बल्कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश भी बनकर उभरा है।

6. गेहूं उत्पादन में रिकॉर्ड आत्मनिर्भरता
चावल के साथ-साथ गेहूं की खेती में भी देश ने आत्मनिर्भरता का नया अध्याय लिखा है। वर्ष 2024-25 में 117.94 मिलियन टन का अब तक का उच्चतम गेहूं उत्पादन दर्ज किया गया, जो वर्ष 2014-15 के मुकाबले 36 प्रतिशत से अधिक की आत्मनिर्भर वृद्धि को दर्शाता है। इस रिकॉर्ड उत्पादन ने देश के सार्वजनिक अन्न भंडारों (बफर स्टॉक) को पूरी तरह सुरक्षित और आत्मनिर्भर बना दिया है। विपरीत मौसम के बावजूद किसानों की मेहनत और सरकारी सहयोग से गेहूं की उत्पादकता में लगातार सुधार हुआ है।

7. मक्का और श्रीअन्न (मोटे अनाज) का उभार
मक्के का उत्पादन वर्ष 2024-25 में 43.40 मिलियन टन तक पहुंच गया, जो वर्ष 2014-15 में 24.17 मिलियन टन से लगभग 79 प्रतिशत की अविश्वसनीय वृद्धि है। इसके साथ ही मोटे अनाजों को अब ‘श्रीअन्न’ के रूप में नई वैश्विक पहचान दी गई है। श्रीअन्न के उत्पादन और उपभोग को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने विशेष राष्ट्रीय मिशन चलाए हैं। इसने न केवल देश की पोषण सुरक्षा को मजबूत किया है, बल्कि कम पानी वाले क्षेत्रों के छोटे किसानों के लिए यह कमाई का एक बेहद मजबूत जरिया बन गया है।

8. तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता की नई उड़ान
देश को खाद्य तेलों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के ईमानदार प्रयास अब रंग लाने लगे हैं। वर्ष 2024-25 में देश में तिलहन का 42.99 मिलियन टन का रिकॉर्ड उत्पादन दर्ज किया गया, जो वर्ष 2014-15 की तुलना में 56 प्रतिशत की शानदार बढ़ोतरी है। इसी का सुखद परिणाम है कि भारत की खाद्य तेल आयात पर निर्भरता वर्ष 2015-16 के 63.2 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2023-24 में 56.25 प्रतिशत पर आ गई है। इस अवधि के दौरान तिलहन के रकबे में 18 प्रतिशत और उत्पादकता में करीब 31 प्रतिशत का सुधार देखा गया है।

9. बागवानी (Horticulture) क्षेत्र का अभूतपूर्व विस्तार
बागवानी क्षेत्र भारतीय कृषि विविधीकरण का महत्वपूर्ण आधार बनकर उभरा है, जो फसल क्षेत्र के कुल सकल मूल्य उत्पादन का लगभग 37 प्रतिशत हिस्सा साझा करता है। फल, सब्जियों और उच्च मूल्य वाली फसलों की तरफ किसानों का झुकाव तेजी से बढ़ा है। बागवानी फसलों का उत्पादन वर्ष 2013-14 के 280.70 मिलियन टन से निरंतर बढ़ते हुए वर्ष 2024-25 में 369.05 मिलियन टन के विशाल स्तर पर पहुंच गया है। यह विस्तार बेहतर कृषि कोल्ड-चेन प्रथाओं और बाजार की मांग के सही तालमेल से ही संभव हो पाया है।

10. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से मिला सुरक्षा कवच
कृषि क्षेत्र मौसम और प्राकृतिक आपदाओं पर काफी हद तक निर्भर है, ऐसे में यह योजना किसानों के लिए अभेद्य सुरक्षा कवच बनी। यह योजना ‘एक राष्ट्र, एक फसल, एक प्रीमियम’ के सिद्धांत पर काम करती है, जिसके तहत पूरे फसल चक्र के नुकसान को कवर किया जाता है। इस योजना के तहत हर साल 4 करोड़ से अधिक किसान अपनी फसलों का बीमा करवा रहे हैं। 31 दिसंबर 2025 तक के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सरकार द्वारा 1.96 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड दावों का वितरण सीधे 24.31 करोड़ से ज्यादा किसान आवेदनों में किया गया है।

11. एमएसपी लागत का 1.5 गुना तय करने का ऐतिहासिक फैसला
वर्ष 2018 में मोदी सरकार ने एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) उत्पादन लागत का कम से कम 1.5 गुना तय कर दिया। इससे किसानों को उनकी फसलों का बेहतर और सुनिश्चित मूल्य मिलना शुरू हुआ। वर्तमान में 22 अनिवार्य फसलों के लिए सालाना घोषित होने वाले एमएसपी को इस फॉर्मूले के तहत कड़ाई से लागू किया जा रहा है। पिछले 12 वर्षों में खरीफ फसलों में रागी के एमएसपी में सर्वाधिक 236 प्रतिशत और रबी फसलों में मसूर की दाल में 128 प्रतिशत की शानदार बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

12. सरकारी खरीद (Procurement) में रिकॉर्ड 76% की वृद्धि
एमएसपी में ऐतिहासिक बढ़ोतरी के साथ-साथ सरकार ने देशव्यापी सार्वजनिक खरीद प्रणालियों का भी अभूतपूर्व विस्तार किया, जिससे गेहूं, धान, दलहन, तिलहन और कपास उगाने वाले किसानों की आय में सीधे तौर पर रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई। मोदी सरकार के कार्यकाल में सरकारी खरीद 76 प्रतिशत की भारी बढ़त के साथ 1,229.2 मिलियन टन के विशाल स्तर पर पहुंच गई। इसके लिए किसानों को 26.32 लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया गया, जो इसके पिछले दशक के 7.41 लाख करोड़ रुपये की तुलना में लगभग साढ़े तीन गुना अधिक है।

13. पीएम-किसान: सीधे खातों में पहुंची आर्थिक मदद
‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ (PM-KISAN) ने छोटे और सीमांत किसानों को वित्तीय मजबूती दी है। इस योजना के तहत पात्र किसान परिवारों को हर साल 6,000 रुपये की आर्थिक सहायता सीधे बिना किसी बिचौलिए के बैंक खातों में भेजी जाती है। योजना शुरू होने से लेकर मार्च 2026 तक, 9.44 करोड़ से अधिक किसान परिवारों को 22 किस्तों के जरिए 4.28 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि भेजी जा चुकी है। इसका 25 प्रतिशत से अधिक लाभ महिला लाभार्थियों को मिला है। यह योजना दुनिया की सबसे बड़ी प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) योजनाओं में शामिल है।

14. KCC और संस्थागत ऋण का दायरा हुआ दोगुना
अन्नदाताओं को साहूकारों के शोषण से बचाने के लिए मोदी सरकार ने ‘किसान क्रेडिट कार्ड’ (KCC) योजना का सरलीकरण करते हुए दायरा बहुत व्यापक बना दिया। सितंबर 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, देश में चालू केसीसी खातों की संख्या बढ़कर अब 7.81 करोड़ हो चुकी है। इन खातों के जरिए किसानों को मिलने वाली ऋण सहायता की राशि मार्च 2014 के 4.26 लाख करोड़ रुपये से दोगुनी से अधिक बढ़कर 10.20 लाख करोड़ रुपये हो गई। वहीं कृषि के लिए ग्राउंड लेवल क्रेडिट (GLC) प्रवाह भी रिकॉर्ड चार गुना बढ़कर 28.67 लाख करोड़ रुपये हो गया है।

15. मानधन योजना से सामाजिक सुरक्षा और पेंशन का सहारा
मोदी सरकार ने न केवल किसानों के वर्तमान को संवारा है, बल्कि उनके भविष्य और बुढ़ापे को भी सुरक्षित किया है। ‘प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना’ (PM-KMY) के तहत 18 से 40 वर्ष के छोटे और सीमांत किसानों के लिए एक बेहतरीन पेंशन ढांचा तैयार किया गया है। इसके तहत, 60 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद पात्र किसानों को 3,000 रुपये की मासिक पेंशन सुनिश्चित की जाती है। फरवरी 2026 तक देश भर के करीब 24.95 लाख से अधिक प्रगतिशील किसान इस योजना से जुड़कर अपने बुढ़ापे के लिए एक गरिमापूर्ण सामाजिक सुरक्षा कवच हासिल कर चुके हैं।

16. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना: हर खेत को पानी
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) ने ‘हर खेत को पानी’ और ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ के लक्ष्य को मजबूती से आगे बढ़ाया है। पिछले 12 वर्षों में देश के सिंचित क्षेत्र कवरेज में लगातार वृद्धि हुई है और जल उपयोग की आधुनिक दक्षता को बढ़ावा मिला है। ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई (Micro-Irrigation) तकनीकों के लिए किसानों को भारी सब्सिडी दी गई है। इससे न केवल पानी की बड़ी बचत हो रही है, बल्कि कम पानी में भी फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन में भारी सुधार देखने को मिला है।

17. सॉइल हेल्थ कार्ड से वैज्ञानिक खेती की शुरुआत
मिट्टी की सेहत सुधारने और रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल को रोकने के उद्देश्य से शुरू की गई ‘मृदा स्वास्थ्य कार्ड’ (Soil Health Card) योजना आज भारतीय कृषि की दिशा बदल रही है। साल 2014-15 से लेकर मार्च 2026 तक देश भर में लगभग 26 करोड़ सॉइल हेल्थ कार्ड बांटे जा चुके हैं। इस महाभियान को गति देने के लिए देश भर में 8,313 अत्याधुनिक मृदा परीक्षण प्रयोगशालाएं दिन-रात काम कर रही हैं। इतना ही नहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में 70,000 से अधिक ‘कृषि सखियों’ को मिट्टी की सेहत से जुड़ी वैज्ञानिक सलाह देने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया है।

18. पीएम कुसुम योजना: अन्नदाता से ऊर्जादाता बनते किसान
‘प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान’ (PM-KUSUM) योजना ने भारतीय किसानों को ‘अन्नदाता’ के साथ-साथ ‘ऊर्जादाता’ के रूप में एक नई पहचान दी है। वर्ष 2019 में शुरू हुई यह योजना डीजल पंपों की जगह पर्यावरण-अनुकूल सौर ऊर्जा संचालित पंपों को बढ़ावा देती है। वर्ष 2025 के मध्य तक देश के खेतों में सौर पंपों की संख्या में 92 गुना से अधिक की रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दिसंबर 2025 तक इस योजना के माध्यम से देश भर के 21.77 लाख से अधिक किसान सीधे तौर पर लाभांवित हो चुके हैं और 10 लाख से अधिक स्टैंडअलोन सौर कृषि पंप लगाए जा चुके हैं।

19. इथेनॉल सम्मिश्रण (EBP) से बढ़ी आय
गन्ने के उप-उत्पादों से बनने वाले इथेनॉल की खरीद को 38 करोड़ लीटर से बढ़ाकर वर्ष 2024-25 में 904 करोड़ लीटर के विशाल स्तर पर पहुंचाया गया। पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने का औसत प्रतिशत जो वर्ष 2014-15 में मात्र 1.14 प्रतिशत था, वह जनवरी 2026 तक बढ़कर पूरे 20 प्रतिशत के ऐतिहासिक लक्ष्य को हासिल कर चुका है। पिछले एक दशक के दौरान देश की चीनी मिलों ने इथेनॉल बेचकर 1.29 लाख करोड़ रुपये से अधिक की शानदार आय अर्जित की है, जिसका सीधा फायदा गन्ना किसानों को मिला है।

20. सहकारिता आंदोलन और 10,000 FPOs का गठन
वर्ष 2021 में समर्पित ‘सहकारिता मंत्रालय’ की स्थापना के बाद से ग्रामीण संस्थागत ढांचे को नई ताकत मिली है। प्राथमिक कृषि ऋण समितियों- पैक्स (PACS) को मजबूत करने के लिए एक विशाल ‘राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस’ (NCD) तैयार किया गया है। कम्प्यूटरीकरण परियोजना के तहत मार्च 2026 तक 61,866 पैक्स को नेशनल सॉफ्टवेयर पर लाइव लाया जा चुका है। इसके साथ ही, छोटे किसानों को सामूहिक शक्ति देने के लिए वर्ष 2020 में शुरू की गई ‘10,000 किसान-उत्पादक संगठन (FPO) गठन योजना’ ने फरवरी 2026 तक अपना शत-प्रतिशत लक्ष्य हासिल कर 10,000 FPOs का पंजीकरण पूरा कर लिया है, जिससे छोटे किसानों की बाजार में मोलभाव करने की ताकत कई गुना बढ़ गई है।

21. कृषि अवसंरचना कोष (AIF) और ई-नाम (e-NAM) की सफलता
फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान से बचाने के लिए वर्ष 2020-21 में ‘कृषि अवसंरचना कोष’ (AIF) की शुरुआत की गई थी। मार्च 2026 तक इस कोष के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए 84,202 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की जा चुकी है, जिससे कोल्ड स्टोरेज और लॉजिस्टिक्स मजबूत हुए हैं। इसके साथ ही, डिजिटल व्यापार को बढ़ावा देने वाले ‘राष्ट्रीय कृषि बाजार’ (e-NAM) प्लेटफॉर्म ने देश की कृषि मंडियों को एक सूत्र में पिरो दिया है। मार्च 2026 तक देश की कुल 1,656 बड़ी थोक मंडियों को इस डिजिटल प्लेटफॉर्म से एकीकृत किया जा चुका है, जिस पर आज 1.80 करोड़ से अधिक किसान रजिस्टर्ड होकर बिना बिचौलियों के पारदर्शी व्यापार कर रहे हैं।

22. खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) क्षेत्र का कायाकल्प
खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र आज भारतीय कृषि को आधुनिक विनिर्माण और उद्योगों से जोड़ने वाली सबसे मजबूत कड़ी बनकर उभरा है। इस क्षेत्र का कुल सकल मूल्य वर्धन (GVA) वर्ष 2014-15 के 1.34 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 2.24 लाख करोड़ रुपये हो गया है। सरकार इस क्षेत्र को वैश्विक लीडर बनाने के लिए 10,900 करोड़ रुपये के बजट के साथ ‘उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन योजना’ (PLISFPI) चला रही है। सूक्ष्म स्तर पर ग्रामीण महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए ‘पीएम सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम योजना’ (PMFME) के तहत महिला स्वयं सहायता समूहों को 1,277.45 करोड़ रुपये की पूंजी दी गई है।

23. पशुपालन, डेयरी और नीली क्रांति से आय का विविधीकरण
मोदी सरकार ने किसानों की आय का रिकॉर्ड विस्तार करने के लिए पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन जैसे संबद्ध क्षेत्रों को बढ़ावा दिया। इसी सोच का नतीजा है कि इस अवधि के दौरान पशुधन क्षेत्र का आर्थिक मूल्य तीन गुना बढ़कर 15.06 लाख करोड़ रुपये हो गया और देश का कुल दूध उत्पादन रिकॉर्ड 247.87 मिलियन टन पहुंच गया। इसके साथ ही, ‘नीली क्रांति’ के माध्यम से देश का कुल मछली उत्पादन वर्ष 2013-14 के महज 9.58 मिलियन टन से दोगुने से भी अधिक होकर वर्ष 2024-25 में 19.78 मिलियन टन पहुंच गया है। इन संबद्ध क्षेत्रों ने किसानों को संकट के समय एक बेहद मजबूत वैकल्पिक आय सुरक्षा प्रदान की है।

24. डिजिटल कृषि मिशन, नमो ड्रोन दीदी और वैश्विक निर्यात
खेती को अत्याधुनिक बनाने के लिए ‘डिजिटल कृषि मिशन’ के तहत फरवरी 2026 तक 7.63 करोड़ से अधिक विशिष्ट ‘किसान आईडी’ बनाई जा चुकी हैं। वहीं, ‘नमो ड्रोन दीदी’ योजना के तहत महिला स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन पायलट बनाकर ग्रामीण भारत में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की नई क्रांति शुरू की गई है। इन्हीं आधुनिक सुधारों की बदौलत भारत का कुल कृषि निर्यात मूल्य वर्ष 2013-14 के 37.29 बिलियन डॉलर से लगभग 37 प्रतिशत की मजबूत छलांग लगाकर वर्ष 2024-25 में 51.1 बिलियन डॉलर के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है। हमारे निर्यात बास्केट में अब प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी बढ़कर 20.4 प्रतिशत हो गई है। सरकार ने प्राकृतिक खेती और जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों को भी बढ़ावा दिया है, जिससे टिकाऊ खेती की दिशा को मजबूती मिली है।

पिछले 12 वर्षों में कृषि क्षेत्र में हुए बदलाव केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहे। प्रत्यक्ष आय सहायता, बीमा सुरक्षा, MSP सुधार, सिंचाई विस्तार, डिजिटल तकनीक, कृषि अवसंरचना, सहकारिता, खाद्य प्रसंस्करण और निर्यात वृद्धि जैसी 24 प्रमुख पहलों ने भारतीय कृषि को अधिक आधुनिक, समावेशी और किसान-केंद्रित बनाने की दिशा में नई गति दी है। सरकार का मानना है कि इन प्रयासों ने अन्नदाता को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि भारत की विकास यात्रा का सक्रिय भागीदार बनाया है।

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