उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक लंबा दौर ऐसा भी आया था जब समाजवादी पार्टी पर बार-बार उंगलियां उठीं कि उसने वोट बैंक की राजनीति के लिए आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर भी समझौते किए। आतंकवाद के खिलाफ पूरा देश जहां कठोर कार्रवाई की अपेक्षा करता है, वहीं सपा सरकारों और उसके नेताओं के कई फैसलों ने यह बार-बार साबित किया कि उनके लिए राष्ट्र सुरक्षा से ऊपर तुष्टिकरण की राजनीति है! 2013 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार द्वारा 14 मामलों में 19 आरोपियों के खिलाफ अभियोजन वापस लेने की पहल ने राज्य की राजनीति और न्यायिक व्यवस्था में तीखी बहस छेड़ दी थी। यह सीधे-सीधे वोट बैंक की राजनीति और तुष्टिकरण का नीति का जीवंत उदाहरण बना। विवाद इसलिए और गहरा गया क्योंकि जिन मामलों का उल्लेख सामने आया, उनमें गोरखपुर विस्फोट, लखनऊ-फैजाबाद-वाराणसी अदालत विस्फोट जैसे गंभीर मामले भी शामिल थे। सवाल उठने लगे कि क्या सरकार न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही आरोपियों को राहत देने की कोशिश कर रही थी? यही कारण था कि यह मुद्दा केवल कानून का नहीं, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं और राजनीतिक संदेश का भी प्रतीक बन गया।
अदालत ने अखिलेश सरकार को दिखाया आईना
इस पूरे मामले ने नया मोड़ तब लिया जब अदालतों ने अभियोजन वापसी की प्रक्रिया पर कड़ी नजर डाली। कई मामलों में निचली अदालतों ने सरकार के आवेदन स्वीकार नहीं किए और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी स्पष्ट किया कि आतंकवाद तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में कानूनन निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। न्यायपालिका की इस सख्ती ने सरकार की मंशा पर उठ रहे सवालों को और तीखा कर दिया। आलोचकों का आरोप था कि यदि राज्य सत्ता का इस्तेमाल गंभीर आपराधिक मामलों में राजनीतिक संकेत देने के लिए किया जाने लगे, तो इससे न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा कमजोर पड़ सकता है। यही वजह है कि एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह विवाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में बार-बार चर्चा का विषय बनता है और समाजवादी पार्टी के शासनकाल के मूल्यांकन में एक महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में सामने रखा जाता है।
आइए, जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में सपा सरकार ने किन मामलों में शामिल आतंकियों के केस वापस लेने की पैरवी की थी…
सबूत नंबर -10
गोरखपुर सीरियल ब्लास्ट
गोरखपुर शहर में 22 मई 2007 को सिलसिलेवार विस्फोट हुए थे, जिनमें कई लोग घायल हुए। जांच एजेंसियों ने बाद में तारिक कासमी सहित कुछ आरोपियों को गिरफ्तार किया। 2013 में अखिलेश सरकार ने तारिक कासमी के विरुद्ध चल रहे एक मुकदमे को वापस लेने की पहल की। सरकार ने अदालत में कहा कि उपलब्ध साक्ष्य दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं हैं। लेकिन अदालत ने अभियोजन वापसी को स्वीकार नहीं किया और मामले को आगे बढ़ने दिया।
सबूत नंबर -9
लखनऊ अदालत विस्फोट मामला
23 नवंबर 2007 को लखनऊ, फैजाबाद और वाराणसी की अदालत परिसरों में बम विस्फोट हुए थे। इन विस्फोटों में कई लोग मारे गए और दर्जनों घायल हुए। जांच एजेंसियों ने इसे संगठित आतंकी साजिश बताया था। बाद में अखिलेश यादव की सरकार ने इसके आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू हुई, उनमें कुछ नाम इस प्रकरण से भी जुड़े बताए गए।

सबूत नंबर -8
फैजाबाद अदालत विस्फोट मामला
इसी दिन फैजाबाद (अब अयोध्या) अदालत परिसर में भी विस्फोट हुआ था। यह उन मामलों में शामिल था, जिन्हें लेकर सरकार की कार्रवाई विवाद का विषय बनी। विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रही है, जबकि सपा सरकार का कुतर्क था कि कुछ निर्दोष युवकों को गलत तरीके से फंसाया गया था।
सबूत नंबर -7
वाराणसी के संकट मोचन मंदिर विस्फोट मामला
7 मार्च 2006 को वाराणसी के संकट मोचन मंदिर और कैंट रेलवे स्टेशन पर हुए सीरियल बम धमाकों के मुख्य आरोपी/मास्टरमाइंड वलीउल्लाह को राहत देने का प्रयास साल 2012 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार द्वारा किया गया था। वाराणसी अदालत परिसर विस्फोट भी उसी श्रृंखला का हिस्सा था। इस मामले में भी कुछ अभियुक्तों के खिलाफ कार्रवाई वापस लेने की चर्चा हुई। हालांकि अंतिम निर्णय न्यायालयों के हाथ में रहा और अभियोजन वापसी स्वतः प्रभावी नहीं हो सकी।
सबूत नंबर -6
रामपुर पोटा/जासूसी मामले
अखिलेश सरकार ने जिन आतंकियों के केस वापस लेने की पैरवी की, उनमें से कई खतरनाक जासूस भी थे, जो देश की सेना, सुरक्षा और अन्य जानकारी आतंक के आका तक पहुंचाते थे। ये जासूस काफी मशक्कत के बाद पुलिस के हत्थे चढ़े थे और अखिलेश सरकार ने इनके केस वापस लेने की पैरवी कर डाली थी। इन्हीं में शामिल जावेद उर्फ गुड्डू, ताज मोहम्मद और मकसूद के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने के लिए सरकार ने अदालत में आवेदन दिया था।
सबूत नंबर -5
सपा ने आतंकियों के लिए घोषणा पत्र में किया था वादा
समाजवादी पार्टी ने 2012 विधानसभा चुनाव के दौरान अपने घोषणा पत्र में कहा था कि आतंकवाद के मामलों में फंसाए गए कथित रूप से निर्दोष मुस्लिम युवकों के मामलों की समीक्षा की जाएगी। सत्ता में आने के बाद सरकार ने कुछ मामलों की समीक्षा शुरू की और अभियोजन वापसी की प्रक्रिया प्रारंभ की। सरकार का तर्क था कि जांच में गंभीर खामियां थीं तथा कुछ लोगों को पर्याप्त साक्ष्य के बिना आरोपी बनाया गया था। लेकिन अदालत ने सरकार के तर्क की धज्जियां उड़ा दीं।
सबूत नंबर -4
मुकदमे के अंतिम चरण में अभियोजन वापसी उचित नहीं
बाराबंकी की विशेष अदालत ने तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद से जुड़े मामले में कहा कि मुकदमा अंतिम चरण में है और इस समय अभियोजन वापस लेना जनहित में नहीं माना जा सकता। अदालत ने सरकार का आवेदन अस्वीकार कर दिया। दिसंबर 2013 में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने कहा कि आतंकवाद और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से जुड़े मामलों में केंद्र सरकार की अनुमति के बिना अभियोजन वापस नहीं लिया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में मुकदमा वापस लेने के लिए विशेष और ठोस कारण बताने होंगे।
सबूत नंबर -3
सपा सरकार की मंशा और प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल
इस फैसले ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सरकार वोट बैंक की राजनीति कर रही है। यह बहस कई वर्षों तक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनी रही। तथ्यात्मक रूप से यह कहना सही है कि 2013 में अखिलेश यादव सरकार ने लगभग 19 आरोपियों से जुड़े 14 मामलों में अभियोजन वापसी की प्रक्रिया शुरू की थी। यह भी तथ्य है कि इनमें गोरखपुर ब्लास्ट और अदालत विस्फोटों से जुड़े कुछ मामले शामिल थे। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अदालतों ने सरकार की मंशा और प्रक्रिया पर सवाल उठाए, कई मामलों में अभियोजन वापसी की अनुमति नहीं दी और हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आतंकवाद से जुड़े मामलों में कानूनन विशेष प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।
सबूत नंबर -2
अलकायदा आतंकियों की गिरफ्तारी पर यूपी पुलिस पर अविश्वास
लखनऊ के काकोरी इलाके से एटीएस ने अलकायदा से जुड़े दो आतंकियों को गिरफ्तार किया। उस समय पूरे देश में सुरक्षा एजेंसियों की सराहना हो रही थी, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि उन्हें यूपी पुलिस पर भरोसा नहीं है। बीजेपी ने इसे आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई को कमजोर करने वाला बयान बताया। सवाल यह उठा कि जब देश की सुरक्षा एजेंसियाँ संभावित आतंकी साजिश को विफल कर रही थीं, तब एक पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा पुलिस पर अविश्वास जताना किस संदेश को मजबूत कर रहा था?
सबूत नंबर -1
आतंकी के पिता के साथ अखिलेश यादव ने किया चुनाव प्रचार
आतंकवाद के कई मामलों में आजमगढ़ का नाम सामने आने के बाद भी सपा नेताओं पर साफ-साफ आरोप लगे कि उन्होंने कठोर संदेश देने के बजाय अपराधियों और आतंकियों के साथ “राजनीतिक सहानुभूति” दिखाई। अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट केस में दोषी ठहराए गए कुछ आतंकियों के परिवारों के सपा से संबंधों को लेकर भी राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि सपा ने ऐसे मामलों में स्पष्ट और कठोर रुख अपनाने के बजाय हमेशा बचाव की राजनीति की। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने चुनावी रैलियों और प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया था कि फांसी की सजा पाने वाले 38 आतंकवादियों में से एक मोहम्मद सैफ का पिता शादाब अहमद, समाजवादी पार्टी का सक्रिय नेता व कार्यकर्ता है। भाजपा नेताओं ने एक तस्वीर जारी की थी, जिसमें दोषी आतंकी के पिता को सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ चुनाव प्रचार और मंच साझा कर रहे थे।
सपा सरकार ने इन आरोपियों से केस वापस लेने के लिए की पैरवी
क्रम आरोपी/समूह मामला/स्थान
1 तारिक कासमी गोरखपुर सीरियल ब्लास्ट
2 खालिद मुजाहिद गोरखपुर तथा कोर्ट ब्लास्ट से जुड़े मामले
3 वलीउल्लाह वाराणसी विस्फोट मामला
4-6 तीन आरोपी लखनऊ से संबंधित मामले
7-10 चार आरोपी कानपुर से संबंधित मामले
11-12 दो आरोपी बिजनौर से संबंधित मामले
13-15 तीन आरोपी रामपुर से संबंधित मामले
16 जावेद उर्फ गुड्डू जासूसी/पोटा मामला, रामपुर
17 ताज मोहम्मद जासूसी/पोटा मामला, रामपुर
18 मकसूद जासूसी/पोटा मामला, रामपुर
19 एक अन्य आरोपी विभिन्न मामलों में शामिल









