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मोदी सरकार के 12 साल: 12 बड़े फैसले जिन्होंने बदल दी VIP Culture की तस्वीर

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साल 2014 में जब नरेन्द्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने, तब उन्होंने सिर्फ सरकार नहीं, बल्कि सिस्टम बदलने की बात कही। उस दौर में VIP Culture भारतीय राजनीति की पहचान बन चुका था- लाल बत्ती वाली गाड़ियां, घंटों ट्रैफिक रोकने वाले काफिले, सिफारिशी सिस्टम और सत्ता का दिखावा। मोदी सरकार ने शुरुआत से ही यह संदेश देने की कोशिश की कि लोकतंत्र में ‘Very Important Person’ नहीं, बल्कि ‘Every Person is Important’ होना चाहिए। आज जब मोदी सरकार के सफल 12 साल पूरे हो चुके हैं, तो पीछे मुड़कर देखने पर साफ पता चलता है कि यह सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं था। पिछले 12 वर्षों में जमीनी स्तर पर ऐसे कई कड़े फैसले लिए गए, जिन्होंने दशकों पुराने वीआईपी कल्चर की जड़ों को हिलाकर रख दिया।

आइए जानते हैं कि पिछले 12 सालों में मोदी सरकार ने देश से वीआईपी कल्चर को उखाड़ फेंकने के लिए क्या-क्या बड़े और ऐतिहासिक कदम उठाए हैं-

1. गाड़ियों से ‘लाल बत्ती’ का खात्मा: रूतबे के सबसे बड़े प्रतीक पर चोट
मोदी सरकार का सबसे पहला और सबसे बड़ा प्रहार उस प्रतीक पर था, जिसे भारत में सत्ता और रूतबे की सबसे बड़ी पहचान माना जाता था—गाड़ियों के ऊपर लगी ‘लाल बत्ती’। पीएम मोदी ने मई 2017 में एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, राज्य के मंत्रियों, जजों और सभी सरकारी अधिकारियों की गाड़ियों पर लाल बत्ती लगाने पर पूरी तरह से बैन लगा दिया। सिर्फ एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड और इमरजेंसी सेवाओं को छूट दी गई।

2. बड़े काफिलों और रोड ब्लॉकेज पर सख्ती
दशकों से यह परंपरा चली आ रही थी कि नेता या बड़ा अधिकारी निकलते ही कई किलोमीटर तक ट्रैफिक रोक दिया जाता था। आम लोग घंटों जाम में फंसते थे। आम जनता ट्रैफिक में खड़ी होकर घंटों इंतजार करती थी और खुद को ठगा सा महसूस करती थी। मोदी सरकार ने राज्यों और मंत्रालयों को सलाह दी गई कि VIP मूवमेंट के नाम पर आम जनता को कम से कम परेशानी हो। दिल्ली समेत कई शहरों में पुलिस और प्रशासन को निर्देश दिए गए कि सिर्फ बेहद जरूरी स्थिति में ही ट्रैफिक पूरी तरह रोका जाए। यह फैसला सिर्फ ट्रैफिक नियम बदलने वाला नहीं था। इस एक फैसले ने सड़क पर चलने वाले आम नागरिक और खास नागरिक के बीच के बड़े अंतर को पल भर में खत्म कर दिया। सरकार का दावा रहा कि लोकतंत्र में जनता को परेशान करके VIP मूवमेंट नहीं होना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी खुद कई बार बिना बड़े तामझाम के कार्यक्रमों में पहुंचे।

3. पद्म पुरस्कारों का लोकतंत्रीकरण: ‘पीपुल्स पद्म’ की शुरुआत
एक समय था जब देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान- पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री पुरस्कारों को लेकर आम जनता में यह धारणा थी कि ये सिर्फ लुटियन दिल्ली के खास लोगों, बड़े डॉक्टरों, उद्योगपतियों या नेताओं की सिफारिश पर ही मिलते हैं। सिफारिशी चिट्ठियां चलती थीं और वीआईपी नेटवर्क वाले लोग इन पुरस्कारों को घर ले जाते थे। मोदी सरकार ने पिछले 12 सालों में इस पूरे सिस्टम को उलट कर रख दिया। सरकार ने पद्म पुरस्कारों के लिए ऑनलाइन नामांकन की व्यवस्था शुरू की, जिससे देश का कोई भी नागरिक किसी भी कोने से किसी गुमनाम नायक का नाम भेज सकता है। आज ये पुरस्कार ‘पीपुल्स पद्म’ बन चुके हैं, जहां जंगल बचाने वाले आदिवासी, मुफ्त इलाज करने वाले डॉक्टर और पारंपरिक कलाओं को जिंदा रखने वाले गरीब किसान राष्ट्रपति भवन में नंगे पैर आकर देश का सर्वोच्च सम्मान पाते हैं।

4. लुटियन दिल्ली के सरकारी बंगलों से अवैध कब्जा हटाना
दिल्ली के पॉश इलाके लुटियन जोन के आलीशान सरकारी बंगले कभी वीआईपी कल्चर का सबसे बड़ा गढ़ माने जाते थे। 2014 से पहले यह नियम सा बन था कि चुनाव हारने या पद से हटने के बाद भी पूर्व मंत्री और सांसद सालों-साल इन बंगलों पर अवैध रूप से कब्जा जमाए बैठे रहते थे। उनके रसूख के आगे प्रशासन भी बेबस नजर आता था और सरकारी पैसे की भारी बर्बादी होती थी। मोदी सरकार ने ‘सार्वजनिक परिसर अधिनियम’ में कड़ा संशोधन किया और बिना किसी भेदभाव के सख्त कार्रवाई शुरू की। पिछले 12 सालों में कई बड़े-बड़े पूर्व मुख्यमंत्रियों, कद्दावर राजनेताओं और लंबे समय से सरकारी आवासों में बने हुए पूर्व पदाधिकारियों को नोटिस देकर बंगले खाली कराए गए। सरकार ने साफ संदेश दिया कि पद गया तो सुख-सुविधाएं भी गईं, कानून सबके लिए बराबर है।

5. हवाई अड्डों पर वीआईपी विशेषाधिकारों और लाउंज एक्सेस में कटौती
एक समय देश के एयरपोर्ट्स पर वीआईपी कल्चर का नजारा बेहद आम था, जहां बड़े नेताओं और अधिकारियों को सुरक्षा जांच से छूट मिलती थी, उनकी गाड़ियां सीधे विमान तक जाती थीं और उनके लिए विशेष लाउंज रिजर्व रहते थे। आम यात्री लाइनों में खड़े रहते थे और वीआईपी बिना किसी रोक-टोक के निकल जाते थे। मोदी सरकार ने नागरिक उड्डयन मंत्रालय के जरिए इन नियमों को बेहद सख्त किया। पूर्व मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और अधिकारियों की उस लंबी लिस्ट को छोटा किया गया जिन्हें सुरक्षा जांच से छूट मिलती थी। अब नियम के मुताबिक हर खास-ओ-आम को सुरक्षा के कड़े मानकों से गुजरना पड़ता है, जिससे यह संदेश गया कि देश की सुरक्षा के आगे कोई भी वीआईपी नहीं है। मोदी सरकार के दौरान यह संदेश देने की कोशिश हुई कि नियम सबके लिए एक जैसे हों।

6. विदेशी दौरों पर फिजूलखर्ची और बड़े प्रतिनिधिमंडलों पर रोक
पहले के समय में जब भी कोई प्रधानमंत्री या केंद्रीय मंत्री विदेश दौरे पर जाता था, तो उनके साथ अधिकारियों, रिश्तेदारों और चहेतों का एक बहुत बड़ा प्रतिनिधिमंडल भी सरकारी खर्चे पर सैर-सपाटे के लिए निकल जाता था। फाइव स्टार होटलों में रुकना और भारी-भरकम भत्ते उठाना एक आम बात थी। पीएम मोदी ने खुद मिसाल पेश करते हुए इस फिजूलखर्ची पर पूरी तरह से लगाम लगाई। उन्होंने मंत्रियों और अधिकारियों के विदेशी दौरों के लिए बेहद सख्त गाइडलाइंस बनाईं। अब विदेश दौरों पर सिर्फ वही अधिकारी जाते हैं जिनका जाना बेहद जरूरी होता है, और प्रतिनिधिमंडल का आकार बेहद छोटा कर दिया गया है। खुद पीएम मोदी कई बार तकनीकी पड़ाव के दौरान होटलों के बजाय एयरपोर्ट पर ही समय बिताते हैं, जिससे सरकारी खर्चे की भारी बचत हुई है।

7. संसद कैंटीन में सब्सिडी का खात्मा: सांसदों को भी बाजार भाव पर खाना
संसद कैंटीन में दी जाने वाली भारी सब्सिडी को भी लंबे समय तक VIP विशेषाधिकार के तौर पर देखा जाता रहा। जहां देश का आम नागरिक महंगाई से जूझ रहा था, वहीं लाखों रुपये सैलरी और भत्ते पाने वाले सांसदों को संसद की कैंटीन में महज कुछ रुपयों में चिकन, मटन, बिरयानी और डोसा परोसा जाता था। जनता अक्सर सोशल मीडिया पर इस भारी सब्सिडी को लेकर अपना गुस्सा जाहिर करती थी। जनता की इस भावना को समझते हुए मोदी सरकार के प्रयास से संसद की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी ने बड़ा फैसला लिया। साल 2021 से संसद की कैंटीन में मिलने वाली हर तरह की सब्सिडी को पूरी तरह खत्म कर दिया गया। अब देश के माननीय सांसद भी उसी बाजार भाव पर खाना खाते हैं, जिस पर आम जनता खाती है। इस कदम ने जनता के बीच नेताओं की छवि को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई।

8. विवेकाधीन कोटा का अंत
भारत में वीआईपी कल्चर का एक और रूप था ‘कोटा सिस्टम’। केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों के पास गैस कनेक्शन देने, केंद्रीय विद्यालयों में बच्चों के एडमिशन कराने और रेलवे की कंफर्म टिकट देने के विशेष कोटे होते थे। इन कोटों का इस्तेमाल आम तौर पर वीआईपी लोग अपने करीबियों, रिश्तेदारों और खास लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए करते थे, जबकि गरीब और जरूरतमंद लाइन में ही खड़ा रह जाता था। मोदी सरकार ने पिछले 12 सालों में एक-एक करके इन सभी विवेकाधीन कोटों (Discretionary Quotas) को खत्म कर दिया। सबसे बड़ा फैसला केंद्रीय विद्यालयों में सांसद कोटे को खत्म करने का था, जिससे करीब 30 हजार से ज्यादा सीटें सीधे तौर पर आम और मेधावी बच्चों के लिए खुल गईं। गैस कनेक्शन का कोटा खत्म कर उसे ‘उज्ज्वला योजना’ के जरिए सीधे गरीब महिलाओं तक पहुंचाया गया। सिफारिशी राज खत्म होने से वीआईपी लोगों का रसूख अपने आप कम हो गया।

9. पीएम का खुद को ‘प्रधान सेवक’ कहना और प्रोटोकॉल को तोड़ना
किसी भी देश का कल्चर ऊपर से नीचे की तरफ बहता है। अगर देश का मुखिया खुद को राजा समझेगा, तो उसके नीचे काम करने वाले भी खुद को नवाब समझेंगे। पीएम मोदी ने 2014 में पहले दिन ही खुद को ‘प्रधानमंत्री’ की जगह ‘प्रधान सेवक’ कहा और पिछले 12 सालों में अपने आचरण से इसे साबित भी किया। कई मौकों पर देखा गया है कि पीएम मोदी ने खुद अपने काफिले का प्रोटोकॉल तोड़ा ताकि किसी एम्बुलेंस को रास्ता मिल सके। विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के भारत आने पर वे उन्हें दिल्ली के बंद कमरों से निकालकर देश के अलग-अलग राज्यों (जैसे वाराणसी, अहमदाबाद, महाबलीपुरम) में ले गए, जिससे दिल्ली-केंद्रित वीआईपी डिप्लोमेसी का अंत हुआ।

10. सरकारी दफ्तरों से ‘बाबू संस्कृति’ और चमचागिरी का खात्मा
भारत का प्रशासनिक ढांचा हमेशा से ‘साहब’ और ‘बाबू’ की संस्कृति से ग्रसित रहा है। आम आदमी जब सरकारी दफ्तर जाता था, तो उसे घंटों इंतजार करना पड़ता था और अधिकारी अपने केबिन में बैठकर चाय की चुस्कियां लेते थे। अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए नेताओं के चक्कर काटना और पैरवी लगवाना वीआईपी कल्चर का हिस्सा बन चुका था। मोदी सरकार ने सरकारी कामकाज को डिजिटल बनाकर इस बाबू संस्कृति पर गहरी चोट की। ‘GeM’ (गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस) पोर्टल लाकर सरकारी खरीद से बिचौलियों और बड़े सप्लायर्स के वीआईपी नेक्सस को तोड़ दिया गया। ट्रांसफर-पोस्टिंग को पूरी तरह से मेरिट और ऑनलाइन सिस्टम पर आधारित कर दिया गया, जिससे चापलूसी और सिफारिश के दम पर मलाईदार पोस्ट पाने वाले अफसरों के पर कतर दिए गए।

11. डिजिटल गवर्नेंस और DBT: सरकारी योजनाओं से बिचौलियों का अंत
जब तक सरकारी योजनाओं का पैसा दफ्तरों और बाबुओं के हाथ से होकर गुजरता था, तब तक आम आदमी को दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे और अधिकारियों का वीआईपी रवैया झेलना पड़ता था। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने खुद कहा था कि दिल्ली से 1 रुपया चलता है तो जमीन पर सिर्फ 15 पैसे पहुंचते हैं, बाकी के 85 पैसे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते थे। मोदी सरकार ने ‘जैम ट्रिनिटी’ (जनधन, आधार और मोबाइल) के जरिए Direct Benefit Transfer (DBT) की शुरुआत की। आज किसान सम्मान निधि हो, स्कॉलरशिप हो या गैस सब्सिडी, पैसा सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में बिना किसी बाबू या नेता की सिफारिश के पहुंचता है।

12. सोशल मीडिया ने घटाई ‘दूरी’: सीधे संवाद का नया मॉडल
मोदी सरकार के दौर में एक बड़ा बदलाव यह भी आया कि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और तमाम मंत्रालय सोशल मीडिया पर बेहद एक्टिव हो गए। पहले आम लोगों के लिए बड़े नेताओं या मंत्रियों तक पहुंचना लगभग नामुमकिन माना जाता था, लेकिन अब ट्विटर, नमो ऐप और ऑनलाइन शिकायत पोर्टलों के जरिए सीधे संवाद का मॉडल सामने आया है। रेल मंत्रालय से लेकर विदेश मंत्रालय तक, सोशल मीडिया पर सिर्फ एक टैग करने से लोगों की समस्याओं पर चलती ट्रेन या विदेशों में भी तुरंत कार्रवाई के सैकड़ों उदाहरण सामने आए। सरकार ने इसे ‘जनभागीदारी’ और ‘एक्सेसिबल गवर्नेंस’ का हिस्सा बताया, जिससे यह धारणा मजबूत हुई कि सरकार सिर्फ खास लोगों के लिए नहीं, बल्कि देश के हर एक आम नागरिक के लिए चौबीसों घंटे उपलब्ध है।

रास्ता बदला है, सोच बदलना अभी बाकी
पिछले 12 सालों का लेखा-जोखा यह साफ दिखाता है कि मोदी सरकार ने कानूनी और प्रशासनिक तौर पर वीआईपी कल्चर के ढांचे को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। अब सड़कों पर बेवजह सायरन नहीं गूंजते, संसद में मंत्रियों को भी लाइन में लगना पड़ता है और पुरस्कारों के लिए सिफारिशों की फाइलें धूल नहीं फांकतीं। वैसे वीआईपी कल्चर सिर्फ बत्तियों, बंगलों या कोटे में नहीं होता, यह इंसानी दिमाग की एक मानसिकता है। सरकार ने नियम तो बदल दिए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ छोटे नेताओं और स्थानीय स्तर के अधिकारियों के व्यवहार में ‘साहब’ बनने की चाहत अब भी कभी-कभी दिख जाती है। 12 सालों के इन कड़े प्रयासों ने एक मजबूत बुनियाद रख दी है, और अब यह देश के हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह इस ‘EPI’ (Every Person is Important) के सपने को पूरी तरह से हकीकत में बदले।

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