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सबूत नंबर -13: मुलायम से अखिलेश तक बाहुबलियों के संरक्षण से चली सपा सरकारें

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी सामाजिक न्याय और पिछड़ों की राजनीति का तो सिर्फ मुखौटा ही पहने रही थी। असल में तो उसका इतिहास बाहुबलियों, दबंग नेताओं, अपराधियों और विवादित राजनीतिक चेहरों को संरक्षण देने से जुड़ा है। पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव से लेकर सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव तक ने सपा सरकारों में माफिया और बाहुबलियों को खुलकर संरक्षण दिया है। समाजवादी पार्टी ने चुनावी जीत की राजनीति में ऐसे चेहरों को महत्व दिया जिन पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे। यही कारण है कि मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव तक का शासनकाल आते ही गुंडाराज, बाहुबली संस्कृति और राजनीतिक संरक्षण जैसे शब्द बार-बार राजनीतिक बहस का हिस्सा बनते रहे। यह प्रवृति पूर्वांचल, प्रयागराज, आजमगढ़, मऊ और रामपुर जैसे क्षेत्रों में यह बहस सबसे अधिक दिखाई देती है। इन इलाकों में कई प्रभावशाली नेताओं का उदय राजनीति और आपराधिक छवि के मिश्रण के रूप में हुआ और समाजवादी पार्टी पर उन्हें मुख्यधारा में स्थापित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी।

बाहुबलियों और विवादित चेहरों पर टिकी रही समाजवादी राजनीति
मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश यादव तक समाजवादी पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती यही रही कि वह सामाजिक न्याय की राजनीति और बाहुबली छवि के आरोपों के बीच संतुलन स्थापित नहीं कर सकी। अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी, सिबगतुल्लाह अंसारी, आजम खान और अन्य विवादित नेताओं के नाम बार-बार इस बहस में सामने आते रहे। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब भी कानून-व्यवस्था, अपराध या राजनीतिक संरक्षण का मुद्दा उठता है, तो समाजवादी पार्टी के पुराने फैसलों और टिकट वितरण की चर्चा एक बार फिर शुरू हो जाती है। समाजवादी पार्टी के आलोचक आरोप लगाते रहे कि पार्टी ने कई क्षेत्रों में बाहुबलियों की सामाजिक पकड़ और चुनावी प्रभाव को देखते हुए उन्हें राजनीतिक महत्व दिया।

 

सबूत नंबर -13
अब्दुल्ला आजम: बाहुबली की दूसरी पीढ़ी को राजनीतिक विरासत
दबंग बाहुबली आजम खान के पुत्र अब्दुल्ला आजम को समाजवादी पार्टी ने सक्रिय राजनीति में आगे बढ़ाया। 2017 विधानसभा चुनाव में उन्हें स्वार सीट से उम्मीदवार बनाया गया। अब्दुल्ला की उम्मीदवारी उन आरोपों को बल देती है कि समाजवादी पार्टी प्रभावशाली और दबंग नेताओं के परिवारों को लगातार राजनीतिक अवसर देती रही, चाहे उनका इतिहास कितना ही आपराधिक क्यों ना रहा हो? आलोचकों ने इसे आजम खान परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने का कुत्सित प्रयास बताया। बाद के वर्षों में अब्दुल्ला आजम कानूनी विवादों के कारण चर्चा में रहे, लेकिन 2017 तक वे पार्टी के उभरते युवा चेहरे के रूप में प्रस्तुत किए जाते थे।

सबूत नंबर -12
मुख्तार अंसारी: पूर्वांचल की दबंग बाहुबली समाजवादी नेता
मऊ के नेता बाहुबली मुख्तार अंसारी दशकों तक पूर्वांचल की राजनीति का बड़ा नाम रहे। उनके विरुद्ध अनेक गंभीर आपराधिक मामलों की चर्चा होती रही। वे लंबे समय तक अलग राजनीतिक मंचों पर सक्रिय रहे। समाजवादी पार्टी के साथ भी उनके संबंध समय-समय पर चर्चा में रहे। 2016 में उनकी पार्टी कौमी एकता दल का समाजवादी पार्टी में विलय हुआ था। बाद में राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं, लेकिन इसी अवधि में समाजवादी पार्टी ने उनके भाई सिबगतुल्लाह अंसारी को विधानसभा टिकट दिया था। इसे विपक्ष ने अंसारी परिवार को राजनीतिक संरक्षण देने का उदाहरण बताया।सबूत नंबर -11
अब्बास अंसारी: अखिलेश ने परिवारवाद की राजनीति को बढ़ाया
सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के करीबी बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी के पुत्र अब्बास अंसारी भी बाद के वर्षों में सपा की राजनीति में सक्रिय हुए। 2017 तक उनका राजनीतिक प्रभाव मुख्यतः अपने परिवार की विरासत के कारण देखा जाता था। विपक्ष अक्सर मुख्तार परिवार और समाजवादी पार्टी के बीच राजनीतिक समीकरणों को मुद्दा बनाता रहा।

सबूत नंबर -10
अतीक अहमद: प्रयागराज का सबसे विवादित राजनीतिक चेहरा
प्रयागराज क्षेत्र में अतीक अहमद का नाम सबसे चर्चित और विवादित नेताओं में गिना जाता रहा। उन पर हत्या, अपहरण और रंगदारी सहित अनेक गंभीर आपराधिक मामलों में आरोप लगे। इसके बावजूद वे विधायक और सांसद बने। 2004 में फूलपुर से लोकसभा पहुंचे अतीक अहमद का समाजवादी पार्टी से लंबा राजनीतिक संबंध रहा। 2013 में समाजवादी पार्टी ने उन्हें पुनः शामिल कर 2014 लोकसभा चुनाव के लिए सुल्तानपुर से उम्मीदवार घोषित किया था। उस समय उनके खिलाफ अनेक गंभीर आपराधिक मामले सार्वजनिक चर्चा में थे। उस समय यह निर्णय व्यापक रूप से मीडिया रिपोर्टों में उल्लेख हुआ कि उनके विरुद्ध दर्ज मामलों के बावजूद सपा ने उसकी जीतने की क्षमता को अधिक महत्व दिया।सबूत नंबर -9
आजम खान: सपा के मुस्लिम वोट बैंक को लुभाने वाला शातिर 
समाजवादी पार्टी के संस्थापक नेताओं में शामिल आजम खान मुलायम सिंह यादव और बाद में अखिलेश यादव दोनों सरकारों में अत्यंत प्रभावशाली मंत्री रहे। नगर विकास, संसदीय कार्य और कई अहम विभाग उनके पास रहे। उनके विरुद्ध विभिन्न समयों पर अनेक मामले दर्ज हुए, लेकिन पार्टी नेतृत्व लगातार उनके साथ खड़ा दिखाई दिया। मुलायम सिंह यादव के अंतिम कार्यकाल (2003-07) में भी आजम खान पार्टी के सबसे दबंग नेताओं में शामिल रहे। रामपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी दबंगई खूब चलती थी। वे पार्टी के दबंग और सबसे बड़े मुस्लिम चेहरों में गिने जाते रहे। आलोचकों का आरोप था कि सरकार में उनका प्रभाव कई बार मुख्यमंत्री के समान दिखाई देता था। पार्टी नेतृत्व लगातार उनके साथ खड़ा नजर आया। 2012 में अखिलेश सरकार के गठन के समय वे कैबिनेट के कद्दावर मंत्रियों में शामिल थे। अखिलेश यादव ने कई अवसरों पर सार्वजनिक रूप से उनका समर्थन भी किया।

सबूत नंबर -8
सिबगतुल्लाह अंसारी: पूर्वांचल में अंसारी परिवार की विरासत को बढ़ाया
मुलायम सिंह यादव के तीसरे कार्यकाल में मऊ, गाजीपुर और आसपास के क्षेत्रों में अंसारी परिवार की राजनीतिक ताकत लगातार बढ़ती रही। समाजवादी पार्टी ने मुख्तार अंसारी के भाई सिबगतुल्लाह अंसारी को विधानसभा टिकट दिया था। सिबगतुल्लाह अंसारी पहले से विधायक रहे थे। 2017 विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी द्वारा उन्हें पुनः टिकट दिए जाने से इस बात की पोल एक बार फिर खुली की समाजवादी पार्टी बाहुबलियों का कितना समर्थन करती है। इतना ही नहीं सपा अंसारी परिवार के राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखना चाहती है। आलोचकों का तर्क था कि यदि पार्टी मुख्तार अंसारी को सीधे आगे नहीं बढ़ा सकती थी, तो अब उसके परिजनों को राजनीतिक मंच प्रदान कर रही थी।

सबूत नंबर -7
विजय मिश्रा: भदोही की बाहुबली राजनीति का विवादित चेहरा
भदोही क्षेत्र के बाहुबली नेता विजय मिश्रा भी लंबे समय तक पूर्वांचल की राजनीति में प्रभावशाली रहे। विभिन्न चुनावों में वे अलग-अलग दलों से जुड़े रहे, लेकिन समाजवादी राजनीति के साथ उनके समीकरणों की चर्चा होती रही। उनके विरुद्ध दर्ज मामलों और राजनीतिक प्रभाव को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा। पूर्वांचल में ऐसे नेताओं की मौजूदगी को लेकर सपा की आलोचना होती रही कि पार्टी आपराधिक इतिहास को दरकिनार करके सिर्फ जीतने वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता देती है।

सबूत नंबर -6
अमरमणि त्रिपाठी: सत्ता का प्रभाव और हत्या में आजीवन कारावास
पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे चर्चित विवादों में शामिल रहे। यद्यपि उनका राजनीतिक सफर विभिन्न दलों से जुड़ा रहा। लेकिन समाजवादी शासनकाल में उनका प्रभाव बना रहने को लेकर विपक्ष सवाल उठाता रहा। कवयित्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में दोषसिद्धि के बाद उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया। 2007 में वह बसपा से सपा में शामिल हुए थे और मुलायम सिंह यादव सरकार में मंत्री बने थे। अखिलेश यादव ने परिवारवाद को बढ़ावा देते हुए उनके बेटे अमनमणि त्रिपाठी को वर्ष 2012 में टिकट दिया। उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर नौतनवा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था। कवियत्री मधुमिता शुक्ला की हत्या के मामले में अमरमणि और उनकी पत्नी को आजीवन कारावास की सजा मिली थी।सबूत नंबर -5
अमर सिंह का विवादित युग और सिने जगत के चेहरों की एंट्री
मुलायम सरकार के इस दौर में पार्टी ने कई दबंग नेताओं और क्षेत्रीय ताकतों को अपने साथ जोड़ा। चुनावी गणित के लिए पार्टी कई बार विवादित छवि वाले नेताओं के साथ समझौता करती रही। इनमें ही एक अहम नाम था- अमर सिंह। अमर सिंह कई सिने जगत के कई प्रभावशाली चेहरों को सपा में लाए। उनपर आरोप था कि जुलाई 2008 में यूपीए सरकार द्वारा लाए गए विश्वास मत के दौरान, उन्होंने विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करने के लिए तीन सांसदों को रिश्वत के रूप में 1 करोड़ रुपये की पेशकश की थी। इस मामले में उन्हें बाद में तिहाड़ जेल भी भेजा गया। 2009 कानपुर के बाबूपुरवा थाने में अमर सिंह और उनकी पत्नी के खिलाफ 500 करोड़ रुपये के काले धन को सफेद करने के लिए कई फर्जी कंपनियां बनाने का मामला दर्ज किया गया था। मुलायम सिंह के करीबी अमर सिंह को इस मामले में इलाहाबाद कोर्ट से फटकार भी लगी थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अमर सिंह की रिव्यू और रीकाल अर्जी खारिज तो ख़ारिज की ही, साथ ही मामले की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के साथ ही यूपी सरकार द्वारा नामित एजेंसी से भी कराने के निर्देश दिए थे।सबूत नंबर -4
रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया: मुलायम और सपा के सारथी
बाहुबली नेता रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया औपचारिक रूप से सपा नेता नहीं थे, लेकिन 1993 से लगातार निर्दलीय चुनाव जीतते आ रहे राजा भैया को मुलायम सिंह यादव का बहुत करीबी माना जाता था। सपा सरकारों में वे कई बार महत्वपूर्ण मंत्री रहे। वर्ष 2002 में मायावती के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके खिलाफ सख्त आतंकवाद निरोधक कानून (POTA) के तहत कार्रवाई की थी और उन्हें गिरफ्तार किया गया था। 2013 में प्रतापगढ़ के कुंडा क्षेत्र में तैनात DSP जिया-उल-हक की हत्या के मामले में राजा भैया का नाम साजिश रचने वालों में आया था। इसके बाद उन्हें राज्यमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। आपराधिक मुकदमों के अलावा, उन पर अवैध हथियारों के भंडारण और अपनी पत्नी भानवी सिंह द्वारा घरेलू हिंसा व प्रताड़ना जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं। विभिन्न दौर में सपा सरकारों के साथ उनके राजनीतिक समीकरण चर्चा में रहे। विपक्ष ने इसे समाजवादी पार्टी का बाहुबली राजनीति से समझौते का जीवंत उदाहरण बताया।

सबूत नंबर -3
मदन सिंह कसाना उर्फ मदन भैया: पश्चिमी यूपी के बाहुबली
मदन सिंह कसाना उर्फ मदन भैया ने 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के टिकट पर बागपत जिले की खेकड़ा सीट से चुनाव लड़ा था और जीत दर्ज की थी। उत्तर प्रदेश के पूर्व विधायक मदन भैया का लंबा आपराधिक इतिहास रहा है | उन पर हत्या, हत्या के प्रयास, और गैंगस्टर एक्ट जैसे कई गंभीर आरोप लगे। उनकी उत्तर प्रदेश के पश्चिमी हिस्से, विशेषकर मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर और गाजियाबाद में रसूख और बाहुबली नेता की छवि रही। उन पर 90 के दशक में लोनी (गाजियाबाद) और आसपास के क्षेत्रों में हत्या और कई हमलों के आरोप लगे थे। मदन भैया ने जेल से पहला चुनाव लड़ा। उनके खिलाफ दर्ज मामलों के कारण वह कई वर्षों तक जेल में रहे। असामाजिक गतिविधियों और संगठित अपराधों के कारण उन पर गैंगस्टर एक्ट और राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत भी कार्रवाई भी हुई। मेरठ और आसपास के क्षेत्रों में मदन भैया की पहचान एक दबंग और बाहुबली नेता के रूप में रही।सबूत नंबर -2
अरुण शंकर शुक्ला ‘अन्ना’ : मुलायम के करीबी आदतन अपराधी
उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता अरुण शंकर शुक्ला ‘अन्ना’ (अन्ना महाराज) का समाजवादी पार्टी (सपा) से पुराना और गहरा संबंध रहा है। वह मुलायम सिंह यादव के बहुत करीबी माने जाते थे। अन्ना शुक्ला 1990 और 2000 के दशक में उत्तर प्रदेश की राजनीति का चर्चित नाम रहे। उन पर कई गंभीर आरोप लगे और वे अक्सर कानून-व्यवस्था पर बहस का हिस्सा बने रहे। अरुण शंकर शुक्ला उर्फ अन्ना की हिस्ट्रीशीट लखनऊ के हसनगंज थाने में साल 1982 में ही खुल गई थी। पुलिस रिकॉर्ड में उन्हें एक आदतन अपराधी माना गया। एक समय अन्ना शुक्ला के खिलाफ करीब 50 आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें हत्या, हत्या का प्रयास, मारपीट, रंगदारी और डराने-धमकाने जैसे गंभीर आरोप शामिल रहे। 2014 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर उत्तर प्रदेश की उन्नाव लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में उन्हें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार साक्षी महाराज ने हराया था। वह दोबारा सपा-बसपा गठबंधन के तहत उन्नाव से ही सपा के आधिकारिक प्रत्याशी बनाए गए। पार्टी ने पहले पूजा पाल को टिकट दिया था, लेकिन बाद में उनका टिकट काटकर अन्ना को मैदान में उतारा गया था। इस चुनाव में भी उन्हें भाजपा के साक्षी महाराज के हाथों हार मिली थी।

 

सबूत नंबर -1
सपा में तीन दशक तक बाहुबली और अपराधिक नेताओं का बोलबाला
1989 से 2017 तक यानि करीब तीन दशकों तक उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक आरोप बार-बार दोहराया गया कि समाजवादी पार्टी ने चुनावी जीत को प्राथमिकता देते हुए आपराधिक, माफिया, बाहुबली और विवादित छवि वाले नेताओं को पर्याप्त राजनीतिक स्थान दिया। पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव से लेकर सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव तक सपा हमेशा यह कहती रही कि लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता और अदालत का होता है, लेकिन असल में सभी जानते हैं कि सपा ने कैसी छवि वाले नेताओ को राजनीतिक संरक्षण दिया। यही वजह है कि अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी, आजम खान, अंसारी परिवार और अन्य प्रभावशाली नेताओं के नाम आज भी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बहस में बार-बार लौट आते हैं। मुलायम सिंह यादव के दूसरे कार्यकाल में भी सपा ने कई क्षेत्रीय क्षत्रपों को अपने साथ जोड़ा। इसी दौर में पार्टी का विस्तार हुआ, लेकिन विपक्ष ने आरोप लगाया कि संगठन में ऐसे तत्व भी शामिल हुए जिनकी छवि विवादित और आपराधिक थी।

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