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गुंडाराज नंबर -8: अखिलेश राज की दहशत UP की जनता के जेहन में बसी

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उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव संभावित हैं। लेकिन राज्य की राजनीति में चुनाव की बात आते ही विकास, जातीय समीकरण और कल्याणकारी योजनाओं के साथ एक और मुद्दा बार-बार चर्चा में लौट आता है, वह है- कानून व्यवस्था। विशेष रूप से समाजवादी पार्टी के 2012 से 2017 के शासनकाल की यादें आज भी राजनीतिक विश्लेषकों और जनता-जनार्दन की बहस का बड़ा हिस्सा बनी हुई हैं। यही वह दौर था, जब विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा कि प्रदेश में प्रशासन से ज्यादा दबदबा सत्ता संरक्षित बाहुबलियों, दबंगों और जातीय नेटवर्क का दिखाई देता था। सड़क से लेकर थाने तक आम नागरिक खुद को असुरक्षित महसूस करता था और अपराधियों के मन से कानून का भय खत्म होता दिखाई देता था। सपा सुप्रीमो और तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के चेहरे पर कई अबलाओं का खून लगा है।

अखिलेश सरकार के दौर में पांच साल तक बेखौफ चला गुंडाराज
उत्तर प्रदेश में हालात यह थे कि हत्या से लेकर महिला अपराधों तक में राज्य के खौफनाक आंकड़े देशभर में चर्चा का विषय बन जाते थे। यही कारण है कि लगभग एक दशक बाद भी जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की वापसी की जरा-सी भी आहट होती है, तो बड़ी संख्या में मतदाता 2012-17 के उस दौर को याद करने लगते हैं। हत्या, अपहरण, लूट, दुष्कर्म, सांप्रदायिक तनाव, दंगे और आतंकी गतिविधियों को लेकर उठे सवाल आज भी सपा सरकार के राजनीतिक मूल्यांकन का हिस्सा हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े भी बताते हैं कि उस अवधि में कई गंभीर अपराधों के मामले चिंताजनक स्तर तक पहुंचे थे।

आइए, आपको अखिलेश सरकार के गुंडाराज के बारे में बताते हैं कि कैसे हर अपराध में उत्तर प्रदेश देशभर में छाया रहता था…

गुंडाराज -8
पांच साल में महिलाओं के साथ रेप में मामले के नए रिकॉर्ड बने
यदि किसी क्षेत्र में अखिलेश सरकार को सबसे अधिक आलोचना झेलनी पड़ी, तो वह महिलाओं की सुरक्षा थी। 2013 में उत्तर प्रदेश में दुष्कर्म के 3,050 मामले दर्ज हुए, जबकि 2012 में यह संख्या 1,963 थी। यानी केवल एक वर्ष में लगभग 55 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इसके बाद भी स्थिति में कोई नाटकीय सुधार नहीं आया। NCRB के अनुसार 2016 में उत्तर प्रदेश में 4,816 दुष्कर्म के मामले दर्ज हुए, जो देश में सबसे अधिक थे। बदायूं कांड सहित कई घटनाओं ने राष्ट्रीय स्तर पर उत्तर प्रदेश की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया। इस संवेदनशील मामले में सपा नेता राम गोपाल यादव के बयान ने आग में घी का काम किया। उन्होंने मामले को मीडिया द्वारा तूल देने वाला बताते हुए कहा था कि अक्सर प्रेम प्रसंगों को भी बलात्कार का रूप दे दिया जाता है, जिसको लेकर काफी विवाद हुआ था।

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अखिलेख राज में फिरौती और अपहरण उद्योग में बदला उत्तर प्रदेश
अखिलेश सरकार के दौरान अपहरण और अपहरण कर फिरौती मांगने की घटनाएं भी लगातार राजनीतिक मुद्दा बनी रहीं। NCRB के आंकड़ों के अनुसार 2013 में देशभर में अपहरण और अपहरण-संबंधी अपराधों में भारी वृद्धि दर्ज की गई थी। उत्तर प्रदेश उन राज्यों में शामिल था जहां ऐसे मामलों की संख्या लगातार चिंता का विषय बनी रही। व्यापारियों, डॉक्टरों, छात्रों और युवतियों के अपहरण की घटनाएं लगातार सुर्खियां बनती रहीं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल तक अपहरण की घटनाओं ने आम लोगों में भय का वातावरण पैदा किया।

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हत्या जैसे जघन्य मामलों में देश में शीर्ष पर रहा प्रदेश
समाजवादी पार्टी के शासनकाल के दौरान उत्तर प्रदेश लगातार हत्या के मामलों में देश के शीर्ष राज्यों में बना रहा। NCRB के अनुसार वर्ष 2013 में उत्तर प्रदेश में 5,047 हत्या के मामले दर्ज हुए, जो पूरे देश के कुल हत्या मामलों का लगभग 15 प्रतिशत से अधिक हिस्सा था। स्थिति 2016 तक भी बहुत नहीं बदली। NCRB के अनुसार 2016 में उत्तर प्रदेश में 4,889 हत्याएं दर्ज हुईं, जो देश में सर्वाधिक थीं। यह आंकड़ा केवल अपराध का रिकॉर्ड नहीं था, बल्कि उस भय के माहौल का संकेत था, जिसमें सामान्य नागरिक जी रहा था। विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा कि अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिलने के कारण पुलिस कार्रवाई प्रभावी नहीं हो पा रही थी।गुंडाराज -5
सपा के राज में महिलाओं के खिलाफ अपराधों का बढ़ता ग्राफ
केवल दुष्कर्म ही नहीं, बल्कि महिलाओं के खिलाफ कुल अपराधों के मामलों में भी उत्तर प्रदेश देश के सबसे ऊपर पहुंच गया था। महिलाओं के खिलाफ अपराधों को लेकर सरकार को लगातार आलोचना झेलनी पड़ी। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2016 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के 49,262 मामले दर्ज हुए, जो पूरे देश में सर्वाधिक थे। इसमें दहेज उत्पीड़न, छेड़छाड़, घरेलू हिंसा, अपहरण और यौन अपराधों की बड़ी संख्या शामिल थी। इससे पहले 2015 की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ 35,527 अपराध दर्ज हुए थे, जो देश में सर्वाधिक थे। बलात्कार, अपहरण, दहेज उत्पीड़न और महिलाओं के प्रति हिंसा के मामलों में प्रदेश लगातार राष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय बना रहा। विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार का पूरा ध्यान राजनीतिक समीकरणों पर था, जबकि महिलाओं की सुरक्षा पीछे छूट गई थी।

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सपा के राज में डकैती, रंगदारी और लूटपाट चरम पर
समाजवादी पार्टी शासनकाल में डकैती और लूट के मामलों को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे। व्यापारिक संगठनों और उद्योग मंडलों ने कई बार कानून व्यवस्था पर चिंता जताई। राज्य के कई हिस्सों में हाईवे लूट, व्यापारियों से रंगदारी और हथियारबंद गिरोहों की सक्रियता राजनीतिक बहस का हिस्सा बनी रही। यही कारण था कि बाद के वर्षों में भाजपा ने कानून व्यवस्था को अपना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया। यही कारण है कि 2012 से 2017 का कालखंड आज भी विपक्ष द्वारा “लूट-मार और कानून-व्यवस्था की विफलता” के दौर के रूप में याद किया जाता है। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि सरकार की प्रशासनिक विफलता और वोट बैंक आधारित राजनीति ने हालात को बिगाड़ने में अहम भूमिका निभाई थी।गुंडाराज -3
सांप्रदायिक दंगों और कानून-व्यवस्था की विफलता का दौर
अखिलेश यादव का राज बार-बार सांप्रदायिक तनाव, दंगों और हिंसक घटनाओं की वजह से सुर्खियों में रहा। सरकार बनने के कुछ ही महीनों बाद जून 2012 में मथुरा के कोसीकलां में सांप्रदायिक दंगा भड़क उठा, जिसमें तीन लोगों की जान गई और कई लोग घायल हुए। इसके बाद अक्टूबर 2012 में फैजाबाद-अयोध्या क्षेत्र में हिंसा और तनाव की घटनाएं सामने आईं। वर्ष 2013 में स्थिति और गंभीर हो गई, जब मुजफ्फरनगर और शामली में सबसे भीषण सांप्रदायिक दंगों में से एक हुआ। अगस्त-सितंबर 2013 में भड़की इस हिंसा में आधिकारिक तौर पर 60 से अधिक लोगों की मौत हुई, सैकड़ों लोग घायल हुए और लगभग 50 हजार से अधिक लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े। इसके बाद जुलाई 2014 में सहारनपुर दंगों ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया, जिसमें तीन लोगों की मौत हुई और हालात इतने बिगड़ गए कि सेना तक बुलानी पड़ी। सितंबर 2015 में दादरी के बिसाहड़ा गांव में अखलाक हत्याकांड के बाद व्यापक तनाव और राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ, जिसने प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। वहीं जून 2016 में मथुरा के जवाहर बाग में अवैध कब्जाधारियों को हटाने गई पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक संघर्ष में दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों सहित दो दर्जन से अधिक लोगों की जान चली गई। इन बड़ी घटनाओं के अलावा बरेली, मेरठ, कानपुर, प्रतापगढ़ और अन्य जिलों में भी समय-समय पर सांप्रदायिक झड़पें और हिंसा होती रहीं। केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार उस दौर में उत्तर प्रदेश देश के उन राज्यों में शामिल था, जहां सांप्रदायिक घटनाओं की संख्या सबसे अधिक थी।गुंडाराज -2
आतंकवादियों को बचाने और सिमी नेटवर्क पर उठे सवाल
समाजवादी पार्टी शासनकाल में आतंकवाद से जुड़े मामलों को लेकर भी लगातार विवाद बने रहे। विशेष रूप से प्रतिबंधित संगठन सिमी (SIMI) और उससे जुड़े नेटवर्क को लेकर सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्टें चर्चा में रहीं। सबसे बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ जब विभिन्न आतंकी मामलों में दर्ज मुकदमों को वापस लेने की कोशिशों पर सवाल उठे। बाद में अदालतों ने भी इस विषय पर कड़ी टिप्पणियां कीं। राजनीतिक विरोधियों ने आरोप लगाया कि वोट बैंक की राजनीति के कारण आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर भी नरमी दिखाई गई। इसी कारण विपक्ष ने बार-बार यह आरोप लगाया कि अखिलेश सरकार के दौरान उत्तर प्रदेश आतंकवादी गतिविधियों के लिए संवेदनशील केंद्र बन गया था।गुंडाराज -1
कानून-व्यवस्था बिगड़ने से कोर्ट से सपा सरकार को बार-बार मिली फटकार 
अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि अदालतों ने भी कई बार कड़ी टिप्पणियां कीं, जिससे सरकार की भारी किरकिरी हुई। 26 मार्च 2014 को मुजफ्फरनगर दंगों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि उत्तर प्रदेश सरकार दंगा पीड़ितों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में विफल रही है। मुजफ्फरनगर दंगों के राहत शिविरों में बच्चों की मौत का मामला भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने सितंबर 2013 में अखिलेश सरकार को निर्देश दिया कि मार्च 2012 में सरकार बनने के बाद प्रदेश में हुए सभी सांप्रदायिक दंगों का पूरा ब्यौरा अदालत में पेश किया जाए। अदालत के सामने यह आरोप रखा गया था कि सरकार की नीतियां एक विशेष समुदाय की ओर झुकी हुई दिखाई देती हैं और कई मामलों में प्रशासन दोषियों पर कार्रवाई से बचता रहा। 2014 के चर्चित बदायूं गैंगरेप और हत्या कांड में भी इलाहाबाद हाई कोर्ट को जांच की निगरानी अपने हाथ में लेनी पड़ी। 2014 में ही इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए अपराधी पृष्ठभूमि वाले 288 लोगों को दी गई सरकारी सुरक्षा वापस लेने का आदेश दिया था। दिसंबर 2013 में अदालत ने अखिलेश सरकार से तत्काल राहत सामग्री, कंबल और चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने का आदेश दिया था।

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