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माफी नंबर 3: कार्तिकेय चौहान पर आरोप और राहुल गांधी को फिर झुकना पड़ा

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देश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब किसी राष्ट्रीय दल के शीर्ष नेता के गंभीर आरोप बार-बार अदालतों की चौखट पर जाकर दम तोड़ दें और अंततः उन्हें अपने ही बयानों पर माफी मांगनी पड़े या खेद प्रकट करना पड़े, तब यह केवल एक व्यक्ति की चूक नहीं रह जाती, बल्कि उसकी राजनीतिक विश्वसनीयता, सार्वजनिक उत्तरदायित्व और नेतृत्व की गंभीरता पर भी सवालिया निशान लगते हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी का राजनीतिक सफर ऐसी अनेक माफी/खेद से भरा पड़ा है, जहां उन्होंने पहले सनसनीखेज आरोप लगाए, फिर तथ्यों के अभाव में अदालतों के सामने सफाई दी, खेद जताया या लिखित माफी तक मांगनी पड़ी। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि उनकी राजनीति में तथ्यात्मक दृढ़ता की अपेक्षा राजनीतिक अपरिपक्वता अधिक दिखाई देती है। आलोचकों का कहना है कि राहुल गांधी के बयान पुख्ता तथ्यों से अधिक भावनाओं, सुनी-सुनाई बातों और राजनीतिक नारेबाजी पर आधारित होते हैं। एक तरफ राहुल गांधी कहते हैं- मैं ‘राहुल सावरकर’ नहीं राहुल गांधी हूं, कभी माफी नहीं मांगने वाला। वहीं दूसरी तरफ वह सुप्रीम कोर्ट में अवमानना मामले में तीन बार बिना शर्त माफी मांगते हैं।बार-बार माफी राहुल गांधी की रणनीतिक और राजनीतिक विफलता
ताजा मामला केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के पुत्र कार्तिकेय चौहान से जुड़ा है। चुनावी मंच से लगाए गए आरोपों पर वर्षों बाद राहुल गांधी को अदालत के समक्ष यह स्वीकार करना पड़ा कि उनका बयान तथ्यात्मक रूप से सही नहीं था और उन्हें उस पर खेद व्यक्त करना पड़ा। इससे पहले ‘चौकीदार चोर है’ मामले में भी उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में एक नहीं, बल्कि क्रमशः स्पष्टीकरण, खेद और अंततः बिना शर्त माफी वाला हलफनामा दाखिल करना पड़ा था। सवाल यह है कि क्या एक राष्ट्रीय नेता के लिए बार-बार ऐसी स्थिति में पहुंचना केवल राजनीतिक रणनीति की विफलता है, या फिर यह नेतृत्व की उस शैली का परिणाम है जिसमें आरोप पहले लगाए जाते हैं और तथ्यों की पड़ताल बाद में की जाती है? यही प्रश्न आज राहुल गांधी की राजनीतिक कार्यशैली के केंद्र में खड़ा दिखाई देता है। दरअसल, विपक्ष का दायित्व ही सरकार से कठिन प्रश्न पूछना है, किंतु लोकतंत्र की यही स्वतंत्रता तब अपनी गरिमा खो देती है, जब आरोप तथ्यों की कसौटी पर टिक नहीं पाते और भरी अदालत में अंतिम सांसें गिनने लगते हैं।माफी नंबर 3: पनामा पेपर्स से कार्तिकेय चौहान को गलत जोड़ा
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के पुत्र कार्तिकेय चौहान से राहुल की माफी का ताजा मामला जुड़ा है। चुनावी भाषण में राहुल गांधी ने उन्हें पनामा पेपर्स से जोड़ते हुए भ्रष्टाचार का संकेत दिया था। बाद में यह दावा तथ्यात्मक रूप से सही नहीं पाया गया। मामला अदालत तक पहुंचा। वर्षों बाद जब विवाद न्यायिक प्रक्रिया में आगे बढ़ा, तब राहुल गांधी ने अदालत के समक्ष स्वीकार किया कि यह एक गलती थी और उन्होंने माफी के लिए खेद व्यक्त किया। अदालत में उनके बयान का सार यही था कि यह तथ्यात्मक भूल थी और उनका उद्देश्य कार्तिकेय चौहान के बारे में गलत आरोप लगाना नहीं था। राजनीतिक दृष्टि से यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाती है कि चुनावी मंच पर बोले गए शब्द वर्षों बाद भी न्यायिक कसौटी पर परखे जाते हैं। अदालतें राजनीतिक भाषण और तथ्यात्मक आरोप के बीच स्पष्ट अंतर करती हैं।

माफी नंबर 2: ‘चौकीदार चोर है’ और सुप्रीम कोर्ट में तीन हलफनामे
राहुल गांधी के राजनीतिक जीवन का सबसे चर्चित प्रकरण राफेल सौदे के दौरान दिया गया उनका नारा ‘चौकीदार चोर है’ रहा। चुनावी सभाओं में यह नारा कांग्रेस के अभियान का केंद्र बन गया। विवाद तब गहरा गया, जब राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से यह कह दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया है कि ‘चौकीदार चोर है।’ यहीं से मामला राजनीतिक बहस से निकलकर न्यायपालिका की गरिमा से जुड़ गया। भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने सर्वोच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर की। अदालत ने राहुल गांधी से जवाब मांगा। पहले हलफनामे में उन्होंने इसे चुनावी माहौल की गर्मा-गर्मी की टिप्पणी बताते हुए सफाई दी। अदालत संतुष्ट नहीं हुई। माफी के दूसरे हलफनामे में उन्होंने खेद व्यक्त किया, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट संकेत दिया कि केवल ‘रेग्रेट’ पर्याप्त नहीं है। अंततः तीसरे हलफनामे में राहुल गांधी को बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी। उन्होंने स्वीकार किया कि अदालत के आदेश को गलत तरीके से उद्धृत करना उनकी भूल थी। राहुल गांधी के माफीनामा को मंजूर करते हुए जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा था- “दुर्भाग्यपूर्ण है कि बिना पुष्टि के आरोपी राहुल ने पीएम के बारे में कोर्ट के हवाले से ऐसी बात कही। भविष्य में वे ध्यान रखें। इतनी जिम्मेदार राजनीतिक स्थिति वाले व्यक्ति को सावधान रहना चाहिए।”

माफी नंबर 1: 1984 दंगों पर मां सोनिया की माफी का समर्थन
1984 के सिख विरोधी दंगों का प्रश्न भी राहुल गांधी के राजनीतिक जीवन का संवेदनशील अध्याय रहा है। जब उनसे कांग्रेस की भूमिका पर माफी मांगने को कहा गया, तब उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा पहले व्यक्त किए गए खेद और माफी का पुरजोर समर्थन किया। यानि एक तरह से सिख विरोधी दंगों के लिए राहुल गांधी ने भी मन से माफी मांगी। क्योंकि यह राजनीतिक रूप से स्वीकारोक्ति थी कि उस त्रासदी पर कांग्रेस नेतृत्व पहले ही खेद जता चुका है। आलोचकों ने इसे अपर्याप्त माना, जबकि समर्थकों ने इसे संस्थागत जिम्मेदारी की निरंतरता बताया। यह प्रसंग भी इस बात का उदाहरण है कि बड़े राजनीतिक मुद्दों पर शब्दों का चयन कितना महत्वपूर्ण होता है।

विश्वसनीयता ही कुशल नेतृत्व की सबसे बड़ी कसौटी
इन बयानों और घटनाओं में एक समानता स्पष्ट दिखाई देती है। पहले तीखा आरोप, फिर विवाद, उसके बाद अदालत, और अंततः सफाई, खेद या माफी। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सरकार को चुनौती देना है, लेकिन चुनौती तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए। क्योंकि नेतृत्व केवल लोकप्रियता का नाम नहीं है। एक बड़े नेता की पहचान उसके शब्दों की विश्वसनीयता से होती है। यदि किसी नेता का हर बड़ा आरोप अंततः अदालत में जाकर कमजोर पड़ जाए, तो उसके भविष्य के आरोपों की विश्वसनीयता भी स्वतः प्रभावित होती है। यही कारण है कि राजनीति में तथ्य, संयम और जिम्मेदारी को उतना ही महत्व दिया जाता है, जितना आक्रामकता को। यदि हर कुछ वर्षों में किसी राष्ट्रीय नेता को अपने ही बयानों पर अदालत के सामने सफाई देनी पड़े, तो इससे उनकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है। राजनीति में भाषण का उद्देश्य केवल सुर्खियां बटोरना नहीं होता। वह जनमत निर्माण का माध्यम होता है। इसलिए जब कोई वरिष्ठ नेता बार-बार ऐसे आरोप लगाता है, जो बाद में प्रमाणित नहीं हो पाते, तो जनता धीरे-धीरे आरोपों की गंभीरता पर ही संदेह करने लगती है।

राहुल को पहले भी मुश्किल में डाल चुके हैं उनके बोल
‘मोदी सरनेम’ पर विवादित टिप्पणी
13 अप्रैल 2019 को कर्नाटक में चुनावी रैली में राहुल गांधी ने ‘मोदी सरनेम’ पर विवादित टिप्पणी की थी। राहुल ने कहा था, ‘नीरव मोदी, ललित मोदी, नरेंद्र मोदी का सरनेम कॉमन क्यों है? सभी चोरों का सरनेम मोदी क्यों होता है?’ इस पर बीजेपी विधायक पूर्णेश मोदी ने राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया था। सूरत सेशन कोर्ट ने राहुल गांधी को दोषी करार दिया। उन्हें दो साल की सजा सुनाई गई।

वीर सावरकर पर भी विवादास्पद बोल
भारत जोड़ो यात्रा के दौरान 17 नवंबर, 2022 को राहुल गांधी ने स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर को लेकर टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा कि सावरकर ने सजा से डरकर अंग्रेजों से माफी मांग ली थी। ऐसा करके उन्होंने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल समेत सभी को धोखा दिया। राहुल के इस बयान पर सावरकर के पौत्र रणजीत सावरकर उनके खिलाफ मामला दर्ज कराया है। लखनऊ में एक अधिवक्ता ने भी इस मामले में केस दर्ज कराया है।

आरएसएस पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप
2014 में चुनावी रैली के दौरान राहुल गांधी ने आरएसएस को महात्मा गांधी की हत्या का जिम्मेदार ठहराते हुए टिप्पणी की थी। रैली महाराष्ट्र के भिवंडी में थी। वहीं के एक स्थानीय आरएसएस कार्यकर्ता ने इस मामले में राहुल पर मामला दर्ज कराया था। यह मामला अभी लंबित है। हाल ही में लंदन में आरएसएस की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड से करने के मामले में भी राहुल पर मामला दर्ज कराया गया है। 2018 में ठाणे की अदालत ने राहुल गांधी पर आरोप तय किए थे। ये मामला अब तक अदालत में चल रहा है।

भारत जोड़ो यात्रा में KGF-2 के गाने पर केस
भारत जोड़ो यात्रा में KGF-2 का गाना इस्तेमाल करने के खिलाफ राहुल गांधी के अलावा जयराम रमेश और सुप्रिया श्रीनेत के खिलाफ ये केस दर्ज कराया गया था। ये केस एमआरटी म्यूजिक कंपनी ने दर्ज कराया था। KGF-2 के म्यूजिक का कॉपीराइट इसी के पास है। कंपनी का आरोप है कि बिना परमिशन के गानों का इस्तेमाल किया गया। कॉपीराइट के इस मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने राहुल गांधी समेत कांग्रेस नेताओं के खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी किया था।

राफेल पर मुम्बई हाईकोर्ट में मानहानि का केस
नवंबर 2018 में, महाराष्ट्र भाजपा नेता महेश श्रीश्रीमल ने ‘कमांडर-इन-चोर’ वाले बयान को लेकर राहुल पर मानहानि का मुकदमा दायर किया था। महेश श्रीश्रीमल का ये कहना है कि राफेल विवाद के दौरान दिया गया राहुल का ये बयान नरेंद्र मोदी पर सीधा निशाना था। कुछ दिनों की सुनवाई के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। महेश श्रीश्रीमल का ये कहना है कि राहुल गांधी ने बॉम्बे हाईकोर्ट से संपर्क किया था और शिकायत को रद्द करने की मांग भी की थी। इस मामले की सुनवाई भी अभी शुरू नहीं हुई है।

राहुल ने नोटबंदी को लेकर अमित शाह पर टिप्पणी
23 जून, 2018 के एक ट्वीट के आधार पर राहुल के खिलाफ यह मामला दर्ज किया गया था। राहुल ने अपने ट्वीट में ये कहा था कि अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक के निदेशक अमित शाह जी को बधाई। पुराने नोटों को नई दौड़ में बदलने में आपके बैंक को प्रथम पुरस्कार मिला 750 रुपये। पांच दिनों में करोड़! लाखों भारतीय जिनके जीवन को आपने नष्ट कर दिया, नोटबंदी आपकी इस उपलब्धि को सलाम करती है। #ShahZyadaKhaGaya”. राहुल के वकील अजीत जडेजा ने कहा है कि मामले पर अभी पूछताछ जारी है। केस की सुनवाई चल रही है।

असम मठ पर टिप्पणी पर लोक अदालत में मुकदमा
दिसंबर 2015 में राहुल के खिलाफ असम में आरएसएस के एक स्वयंसेवक ने आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर किया था। आरएसएस के इस स्वयंसेवक ने केस दर्ज कर ये कहा था कि उन्हें असम के बरपेटा सतरा में जाने से ये कह कर रोक दिया गया था कि वो आरएसएस से जुड़े हुए हैं। उसी दौरान स्वयंसेवक संघ के सदस्य ने असम की लोक अदालत में राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया था। राहुल गांधी के वकील अंशुमन बोरा के मुताबिक यह मामला अभी भी लोकल कोर्ट में चल रहा है। ये मामला सुनवाई के अंतिम चरण में है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ करवा देता है विरोधियों की हत्या
फरवरी 2019 में राहुल और सीपीआई (एम) जनरल सीताराम येचुरी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया गया था। ये मुकदमा महाराष्ट्र के आरएसएस कार्यकर्ता और वकील धृतिमान जोशी ने दायर किया था। धृतिमान जोशी ने याचिका में ये कहा था कि पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के 24 घंटे बाद राहुल ने ये बयान दिया था कि कोई आरएसएस और भाजपा की विचारधारा के खिलाफ बोलता है, तो उसे चुप कराने की कोशिश की जाती है। उस पर दवाब डाला जाता है। उसे पीटा जाता है। उसपर हमले कराए जाते हैं। यहां तक की उसे जान से भी मार दिया जाता है।

इन 7 मामलों में जमानत पर हैं कांग्रेस के युवराज 
1. ‘मोदी सरनेम’ मानहानि मामलाः 23 मार्च 2023 को ‘मोदी सरनेम’ मानहानि मामले में 2 साल की सजा मिलने के बाद राहुल गांधी को जमानत मिली। अदालत ने 15 हजार रुपये के मुचलके पर उनकी जमानत मंजूर कर ली। राहुल को फैसले के खिलाफ अपील करने के लिए 30 दिन की मोहलत दी है।
2. नेशनल हेराल्ड केसः राहुल गांधी को जिन मामलों में जमानत मिली है, उसमें सबसे प्रसिद्ध मामला नेशनल हेराल्ड का है। इस मामले में राहुल गांधी और सोनिया गांधी दोनों को ही 50 हजार के निजी मुचलके पर जमानत मिली हुई है। यह केस दिसंबर 2015 में भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने दायर किया था।
3. सभी मोदी चोर मामलाः 6 जुलाई 2019 को राहुल गांधी को पटना की एक अदालत ने मानहानि के एक मामले में जमानत दी थी। यह केस भाजपा नेता और बिहार के तात्कालीन डिप्टी सीएम ने उनकी एक टिप्पणी के बाद किया था। अपनी टिप्पणी में राहुल ने कहा था कि सभी मोदी चोर हैं।
4. सहकारी बैंक मामलाः 12 जुलाई 2019 को राहुल गांधी को मानहानि के मामले में अहमदाबाद की एक अदालत से जमानत मिली थी। यह मामला अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक ने दर्ज कराया था। दरअसल, राहुल ने आरोप लगाया था कि बैंक नोटबंदी के दौरान नोटों की अदला-बदली के एक घोटाले में शामिल था।
5. RSS गौरी लंकेश मामलाः मुंबई की एक अदालत में आरएसएस कार्यकर्ता ने राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दाखिल किया था। इस मामले में 4 जुलाई 2019 को राहुल को जमानत मिली राहुल ने गौरी लंकेश की हत्या को ‘बीजेपी-आरएसएस विचारधारा’ से जोड़ते हुए टिप्पणी की थी। उन्हें इस मामले में 15 हजार रुपये के मुचलके पर जमानत मिली थी।
6. RSS महात्मा गांधी मामलाः आरएसएस के एक और कार्यकर्ता ने महाराष्ट्र के भिवंडी में राहुल गांधी के खिलाफ केस किया था। इस मामले में राहुल को नवंबर 2016 में जमानत दी गई थी। राहुल गांधी ने कहा था कि RSS ने महात्मा गांधी की हत्या की है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें इस तरह की टिप्पणी के लिए फटकार लगाई थी। कोर्ट ने यह भी कहा था कि राहुल को मुकदमे का सामना करना पड़ेगा और अदालत में अपनी बात साबित करनी होगी
7. आरएसएस पर आरोप मामलाः आरएसएस ने राहुल गांधी के खिलाफ गुवाहाटी कोर्ट में मानहानि का केस दाखिल किया था। राहुल गांधी ने दावा किया था कि उन्हें दिसंबर 2015 में असम के बारपेट सतरा में प्रवेश करने से आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने रोका था। इस मामले में उन्हें सितंबर 2016 में 50 हजार रुपये के मुचलके पर जमानत दी गई थी।

 

 

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