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मान सरकार पर सवाल: CJP प्रदर्शन में पेट्रोल बम साजिश बेनकाब करने पर CP का तबादला, अपने ही मंत्री से भिड़े AAP विधायक

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पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार में इन दिनों दोहरे संकट से सियासी बवाल मचा है। एक तरफ जंतर-मंतर पर पेट्रोल बम हमले की साजिश का खुलासा करने वाले अमृतसर के पुलिस कमिश्नर गुरप्रीत सिंह भुल्लर को अचानक पद से हटाए जाने के बाद सियासत गरमा गई है। पंजाब पुलिस ने दावा किया था कि दो सीमा-पार आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ हुआ और उनमें से एक ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP के प्रदर्शन के दौरान हमला करने की योजना बनाई थी। पुलिस के अनुसार आरोपियों से पिस्तौल और पेट्रोल बम भी बरामद किए गए। इस खुलासे के बाद मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भुल्लर को अमृतसर CP के पद से हटा दिया गया। क्योंकि आप सरकार नहीं चाहती थी कि जंतर-मंतर पर ऐसी साजिश की पोल खुले। दूसरी तरफ राज्य में विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी के विधायक और मंत्री विधानसभा के भीतर ही आमने-सामने आ गए। AAP विधायक मनविंदर सिंह ग्यासपुरा ने अपनी ही सरकार के मंत्री तरुणप्रीत सिंह सोंड के जवाब पर सवाल उठाते हुए यहां तक कह दिया कि मंत्री अगर अपने दावे को साबित कर दें तो वह विधायक पद से इस्तीफा दे देंगे। यानी जिस सरकार को विपक्ष के सवालों का जवाब देना चाहिए, उसके सामने अब उसके अपने विधायक ही सवाल खड़े कर रहे हैं।जिस CP ने साजिश का खुलासा किया, उसी का तबादले किया
पिछले दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन पर कई तरह के सवाल उठे हैं। पीएम मोदी से लेकर उनकी स्वर्गीय मां को गालीबाजी से लेकर आंदोलन को विदेशी फंडिंग के आरोप सामने आए हैं। इसी प्रदर्शन ने अब पंजाब सरकार के सामने सबसे असहज सवाल खड़ा कर दिया है। अमृतसर के CP गुरप्रीत सिंह भुल्लर की ओर से सामने रखे गए विवरण के अनुसार एक ISI-समर्थित मॉड्यूल ने दिल्ली में जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान हिंसा फैलाने की खतरनाक साजिश रची थी। इसमें यह हैरतअंगेज खुलासा भी हुआ कि कुछ आरोपियों ने प्रदर्शन स्थल की रेकी की थी और पेट्रोल बम के जरिए हमला करने की तैयारी थी। ऐसे संवेदनशील मामले में पुलिस नेतृत्व की भूमिका स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन इसी घटनाक्रम के बीच CP गुरप्रीत भुल्लर को पद से हटा दिया गया। सरकार के पास इस अचानक प्रशासनिक बदलाव को लेकर कोई औपचारिक कारण नहीं थे, इसलिए राजनीतिक सवाल उठना स्वाभाविक है क्योंकि तबादला पेट्रोल बम साजिश के खुलासे के तुरंत बाद किया गया।

पंजाब सीमावर्ती राज्य, फिर भी राष्ट्रीय सुरक्षा पर सरकार गंभीर नहीं
पंजाब में विपक्ष ने भी इसी समय को लेकर सवाल उठाए हैं। दरअसल, पंजाब कोई सामान्य प्रशासनिक चुनौती वाला राज्य नहीं है। पाकिस्तान से लगती अंतरराष्ट्रीय सीमा, ड्रोन के जरिए हथियार और नशे की तस्करी, गैंगस्टर नेटवर्क तथा सीमा-पार आतंकी गतिविधियों की आशंका राज्य की कानून-व्यवस्था को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ देती है। ऐसे में पुलिस अधिकारियों के तबादले भी केवल विभागीय आदेश नहीं रह जाते। वे सार्वजनिक विश्वास और सुरक्षा तंत्र के मनोबल से जुड़े सवाल बन जाते हैं। यदि CP गुरप्रीत भुल्लर ने अपराधियों की साजिश का खुलासा किया है और वो खुलासा आम आदमी पार्टी की सियासत को सूट नहीं करता है तो इसमें CP गुरप्रीत भुल्लर का दोष नहीं है। आप सरकार को तबादले के बजाए अपने गिरेबां में झांकना चाहिए। यदि किसी अधिकारी की कार्रवाई में कमी है, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। लेकिन यदि कार्रवाई सही थी, तो केवल राजनीतिक विवाद के कारण ऐसा संदेश नहीं जाना चाहिए कि कठोर कार्रवाई करने वाला अधिकारी असुरक्षित है।

अमित शाह और केंद्र सरकार को बदनाम करने के साजिश थी
पंजाब को इस समय पुलिस के मनोबल और राजनीतिक हस्तक्षेप के बीच स्पष्ट रेखा की जरूरत है। पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री और BJP नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने भुल्लर के तबादले को लेकर सवाल उठाए हैं और राज्य की आम आदमी पार्टी की सरकार पर बड़ा हमला बोला है। बिट्टू ने कहा है कि इस ट्रांसफर का कनेक्शन हाल ही में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन से जुड़ा है। बिट्टू ने आरोप लगाया है कि दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्र सरकार को बदनाम करने के लिए आम आदमी पार्टी पेट्रोल बम फेंकवाने की साजिश रच रही थी जिसका अमृतसर पुलिस कमिश्नर ने खुलासा कर दिया। इसी वजह से उनका ट्रांसफर किया गया है।

सरकार को भुल्लर के तबादले की वजह स्पष्ट करनी चाहिए- बिट्टू
बीजेपी नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने कहा कि आम आदमी पार्टी की कोशिश ये थी कि दिल्ली के जंतर मंतर पर छात्रों पर पेट्रोल बम से हमला हो और उसके बाद यह नरेटिव बनाया जाए कि केंद्र सरकार के अधीन आने वाली दिल्ली पुलिस और दिल्ली की कानून-व्यवस्था के क्या हालात हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता बिट्टू ने सरकार से पूछा है कि क्या भुल्लर द्वारा जंतर-मंतर से जुड़ी कथित साजिश को लेकर किए गए खुलासों के बाद उनका तबादला किया गया है। बिट्टू ने कहा कि तबादले का समय कई सवाल खड़े करता है और सरकार को इसकी वजह स्पष्ट करनी चाहिए।

विधानसभा में सरकार के मंत्री को अपने ही विधायक ने घेरा
दूसरी ओर इसी बीच पंजाब विधानसभा का घटनाक्रम सरकार की दूसरी परेशानी का सबब बना है। दरअसल, ग्रामीण विकास एवं पंचायत मंत्री तरुणप्रीत सिंह सोंड और पायल से AAP विधायक मनविंदर सिंह ग्यासपुरा के बीच दौलतपुर गांव की पंचायत भूमि की नीलामी को लेकर तीखी बहस हुई। मंत्री ने कहा कि सरपंच को निलंबित किया गया, प्रशासक नियुक्त किया गया और नीलामी की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। विधायक ने सवाल उठाया कि सरपंच के निलंबन के बाद लगभग चार महीने तक प्रशासक क्यों नहीं नियुक्त किया गया और मंत्री के नीलामी संबंधी दावे पर भी आपत्ति जताई। ग्यासपुरा ने सदन में चुनौती देते हुए कहा कि “अगर मंत्री जी यह साबित कर दें कि इस साल एक भी नीलामी हुई है, तो मैं विधायक पद से इस्तीफा दे दूंगा।”

‘सदन झूठ दा अड्डा नहीं’ यह सरकार के लिए गंभीर चेतावनी
लोकतंत्र में सत्ता पक्ष का विधायक जब अपनी ही सरकार के मंत्री के जवाब पर सवाल उठाता है तो इसे महज राजनीतिक नोकझोंक कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। आप विधायक ने यह कहकर अपने मंत्री का विरोध जताया कि ‘सदन झूठ दा अड्डा नहीं’ है। विधानसभा वह जगह है जहां सरकार अपने फैसलों और प्रशासनिक दावों के लिए जवाबदेह होती है। यदि किसी विधायक को लगता है कि सदन में तथ्य सही नहीं रखे जा रहे, तो यह सरकार के लिए गंभीर चेतावनी है। ग्यासपुरा का सार्वजनिक रूप से अपने इस्तीफे की पेशकश करना इस विवाद को और गंभीर बनाता है। सवाल केवल एक पंचायत भूमि की नीलामी का नहीं रह जाता। सवाल यह बन जाता है कि सरकार और उसके निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच सूचना और जवाबदेही का तंत्र कितनी बुरी तरह ढह रहा है।

AAP की जवाबदेही की संस्कृति अपनाने की बजाए तबादले की तलवार
आम आदमी पार्टी की राजनीति का सबसे बड़ा दावा यही रहा है कि वह पारंपरिक राजनीतिक दलों से अलग शासन और जवाबदेही की संस्कृति लेकर आई है। लेकिन सत्ता में आने के बाद वही पार्टी यदि अपने विधायकों की सार्वजनिक असहमति से घिरने लगे, तो इसे सामान्य आवाज नहीं कहा जा सकता। ग्यासपुरा पहले भी सरकार के विभिन्न मुद्दों पर मुखर रहे हैं और 2026 में उन्हें गैंगस्टर से धमकियां मिलने के बाद सुरक्षा बढ़ाने की मांग भी करनी पड़ी थी। इसलिए उनकी सरकार से असहमति को ऐसे ही टाल देना आसान नहीं होगा। यह सत्तारूढ़ दल के भीतर से उठती हुई आवाज है।

मान सरकार प्रशासनिक और राजनीतिक, दोनों मोर्चों पर घिरी
मान सरकार की मुश्किल यह है कि दोनों घटनाएं अलग-अलग दिखने के बावजूद एक साझा सवाल पैदा करती हैं। क्या सरकार अपने प्रशासनिक फैसलों को पर्याप्त रूप से समझा और बचा पा रही है? पुलिस कमिश्नर का तबादला हो या पंचायत भूमि की नीलामी, दोनों मामलों में सरकार को केवल आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं है। उसे यह भी बताना होगा कि निर्णय क्यों लिया गया और उससे शासन की विश्वसनीयता कैसे मजबूत होगी। लोकतंत्र में तबादले प्रशासन का सामान्य हिस्सा हैं। लेकिन जब तबादला किसी बेहद संवेदनशील सुरक्षा घटनाक्रम के तुरंत बाद हो और उसी पर विपक्ष सवाल उठाए, तो सरकार की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह स्थिति को पारदर्शी ढंग से स्पष्ट करे। इसी तरह विधानसभा में मंत्री और विधायक के बीच विवाद को भी व्यक्तिगत टकराव बनाकर समाप्त करने के बजाय सरकार को तथ्य सामने रखने चाहिए।

केजरीवाल की तरह ‘बदलाव की राजनीति’ नहीं, बदले की राजनीति कर रहे मान 
AAP जब पंजाब में सत्ता में आई थी, तब उसके पास पुराने राजनीतिक ढांचे से अलग शासन देने का बड़ा दावा था। जनता ने उसे भारी बहुमत दिया और उससे अपेक्षा की कि वह प्रशासन को राजनीतिक खींचतान से ऊपर रखेगी। लेकिन सत्ता के कुछ वर्षों बाद ही उसकी पोल खुल गई। पंजाब पहले ही नशे, गैंगस्टर नेटवर्क, सीमा-पार तस्करी और सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे माहौल में राजनीतिक अस्थिरता का हर संकेत प्रशासनिक तंत्र के लिए नुकसानदेह हो सकता है। सरकार के सामने विपक्ष को जवाब देने से बड़ी चुनौती अब अपने भीतर उठ रहे सवालों का जवाब देने की है। यदि विधायक सवाल पूछता है, तो जवाब तथ्य से दिया जाना चाहिए। यदि पुलिस अधिकारी कोई बड़ा सुरक्षा ऑपरेशन करता है, तो तबादले के बजाए उसकी पीठ थपथपानी चाहिए। लेकिन ऐसा न करके आप सरकार जनता के भी सवालों के घेरे में आ गई है।मान सरकार की 18 माह से कछुआ चाल – कुलजीत सिंह रंधावा
आम आदमी पार्टी के एक अन्य विधायक कुलजीत सिंह रंधावा ने भी सरकार को घेरा। रंधावा ने डेरा बस्सी में लंबे समय से अटके तहसील परिसर के मुद्दे पर सरकार को कटघरे में खड़ा किया। अपने सवाल में रंधावा ने कहा कि इस मुद्दे को पहली बार उठाए हुए 18 महीने बीत चुके हैं, लेकिन कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। उन्होंने कहा, “लगभग 15 लाख की आबादी वाले डेरा बस्सी में अभी तक कोई उचित न्यायिक और प्रशासनिक परिसर नहीं है। डीएसपी कार्यालय, एसडीएम कार्यालय, बीडीपी कार्यालय और तहसील कार्यालय अलग-अलग स्थानों से संचालित हो रहे हैं, जिससे लोगों को कार्यालयों के बीच आना-जाना पड़ता है।” रंधावा ने सरकार को याद दिलाया कि उसने घोषणा की थी कि परिसर जल्द ही पूरा हो जाएगा, लेकिन आज तक परियोजना पूरी नहीं की है।

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