Home विपक्ष विशेष भाजपा की हार से बेदाग हुई EVM, राहुल गांधी का नैरेटिव ध्वस्त!

भाजपा की हार से बेदाग हुई EVM, राहुल गांधी का नैरेटिव ध्वस्त!

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हाल ही में देश के तीन राज्यों में हुए तीन महत्वपूर्ण विधानसभा उपचुनावों के परिणामों ने भारतीय राजनीति में एक नया और दूरगामी संदेश दिया है। भारतीय जनता पार्टी के मजबूत गढ़ माने जाने वाले बिहार की बांकीपुर सीट पर जहाँ जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार ने भाजपा के पारंपरिक किले को ध्वस्त कर दिया, वहीं मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर कांग्रेस ने जीत हासिल की। इन तीन सीटों में से भाजपा केवल गुजरात की मांजलपुर सीट ही बचाने में कामयाब रही। 31 सालों के राजनीतिक इतिहास और भाजपा के मजबूत गढ़ों में हुए इस बड़े फेरबदल ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका दिया।

हालाँकि, इन चुनावी नतीजों का सबसे बड़ा संदेश केवल हार-जीत तक सीमित नहीं है। इन परिणामों ने राहुल गांधी और पूरे ‘इंडी गठबंधन’ के उस नैरेटिव पर नए सिरे से सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें वे लगातार चुनाव आयोग और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) की निष्पक्षता पर सवाल उठाते रहे हैं। विपक्ष जिस नैरेटिव को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बेच रहा था, इस एक उपचुनाव ने उसकी बुनियाद पर ही प्रहार कर दिया है।

यदि विपक्ष के आरोपों के अनुसार चुनाव आयोग और ईवीएम पूरी तरह सत्ताधारी दल के नियंत्रण में होते, तो फिर भाजपा अपने सबसे सुरक्षित राजनीतिक गढ़ों में हार का सामना कैसे करती? यही सवाल इन उपचुनावों के बाद राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। क्या अब भी राहुल गांधी यह कह पाएंगे कि चुनाव आयोग एकतरफा काम करता है?

ईवीएम पर उठते सवालों का अंत
विपक्ष पिछले कई वर्षों से चुनावी हार के बाद ईवीएम और चुनाव आयोग पर सवाल उठाता रहा है। राहुल गांधी और उनके सहयोगी कई मंचों पर यह दावा करते रहे हैं कि भारत की चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष नहीं है और चुनाव आयोग स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर रहा। यहाँ तक कि विदेशी धरती पर जाकर भी भारत के चुनावी लोकतंत्र की छवि पर सवाल उठाए गए।

लेकिन इन उपचुनावों के परिणामों ने इस पूरे विमर्श को नई दिशा दे दी है। यदि ईवीएम में हेरफेर संभव होती या चुनाव आयोग किसी एक राजनीतिक दल के प्रभाव में काम कर रहा होता, तो क्या भाजपा बिहार की बांकीपुर जैसी प्रतिष्ठित सीट गंवाती? क्या मध्य प्रदेश जैसे राज्य में कांग्रेस भाजपा के मजबूत गढ़ में जीत दर्ज कर पाती?

राजनीतिक पंडितों का सीधा सवाल है: कोई भी सत्तारूढ़ पार्टी चुनाव आयोग को ‘हाथ में’ रखकर अपनी ही नाक के नीचे से 31 साल पुरानी सीट क्यों जाने देगी? यही कारण है कि भाजपा समर्थक इन परिणामों को विपक्ष के आरोपों के खिलाफ सबसे मजबूत राजनीतिक जवाब बता रहे हैं। उनका तर्क है कि चुनाव परिणाम यह दिखाते हैं कि मतदाता का फैसला ही अंतिम होता है, चाहे वह किसी भी दल के पक्ष में जाए।

जीत पर लोकतंत्र, हार पर ईवीएम? विपक्ष का दोहरा मापदंड 
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग लंबे समय से यह सवाल उठाता रहा है कि जब विपक्ष चुनाव जीतता है, तब वही चुनाव आयोग और वही ईवीएम लोकतंत्र की जीत का प्रतीक बन जाती है, लेकिन हार मिलने पर उन्हीं संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल क्यों उठाए जाते हैं। कर्नाटक, तेलंगाना या हिमाचल में जब नतीजे विपक्ष के पक्ष में आते हैं, तब ईवीएम ‘सुरक्षित’ हो जाती है, लेकिन मध्य प्रदेश या बिहार के आम चुनावों में हारते ही ईवीएम ‘हैक’ हो जाती है—अपनी सुविधा के हिसाब से बातें बदलने का यह खेल अब जनता अच्छे से समझ चुकी है। 

भाजपा का कहना है कि लोकतंत्र में हार और जीत दोनों को समान भाव से स्वीकार करना राजनीतिक परिपक्वता की पहचान है। यदि चुनाव आयोग पर भरोसा जीत के समय है, तो हार के समय भी वही भरोसा कायम रहना चाहिए।

बांकीपुर से दतिया तक: जनादेश ने उजागर की पारदर्शी प्रणाली
बिहार की बांकीपुर सीट, जहाँ भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन नवीन लगातार पाँच बार विधायक रहे, वहाँ सत्ता परिवर्तन और मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर कांग्रेस की जीत यह दर्शाती है कि भारत का मतदाता किसी दल का स्थायी मतदाता नहीं होता। जब जनता बदलाव चाहती है तो चुनाव परिणाम भी उसी दिशा में जाते हैं।

यह नतीजे उन राजनीतिक बयानों पर भी सवाल खड़े करते हैं, जिनमें लगातार कहा जाता रहा कि लोकतंत्र खतरे में है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वाले नेताओं के सामने अब यह प्रश्न खड़ा है कि जब विपक्ष जीतता है तब चुनाव प्रक्रिया पर सवाल क्यों नहीं उठते?

जनता ने वोटों की चोट से यह साबित कर दिया है कि भारत का लोकतंत्र किसी पार्टी का बंधक नहीं है। बैलेट पेपर की जिद्द पकड़कर बैठने वाले नेताओं को अब यह समझना होगा कि समस्या वोटिंग मशीन में नहीं, बल्कि उनकी अपनी राजनीतिक रणनीतियों में है।

ईवीएम पर सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग का रुख
चुनाव आयोग लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि भारत में इस्तेमाल होने वाली ईवीएम किसी इंटरनेट, वाई-फाई या ब्लूटूथ नेटवर्क से जुड़ी नहीं होती। इसके साथ वीवीपैट (VVPAT) प्रणाली भी जोड़ी गई है, जिससे मतदाता अपने वोट की पुष्टि कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट भी विभिन्न मामलों की सुनवाई के दौरान चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश देता रहा है, लेकिन अब तक अदालत ने ईवीएम के व्यापक दुरुपयोग या चुनावी धांधली के आरोपों को सिद्ध नहीं माना है। अदालत ने बार-बार स्पष्ट किया है कि भारत की चुनावी प्रणाली पर संदेह जताने के बजाय तथ्यों पर बात होनी चाहिए। भाजपा इन तथ्यों का हवाला देते हुए विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक नैरेटिव करार देती रही है।

विपक्ष के लिए आत्ममंथन का समय: संवैधानिक संस्थाओं पर हमला बंद हो
राहुल गांधी और इंडी गठबंधन के नेताओं को अब यह समझने की जरूरत है कि संवैधानिक संस्थाओं, चुनाव आयोग और ईवीएम पर बार-बार आरोप लगाने से लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास प्रभावित हो सकता है। बार-बार ‘EVM हैक’ का झूठा डर दिखाकर विपक्ष वास्तव में उन करोड़ों निष्ठावान मतदाताओं का अपमान करता है, जो सुबह-सुबह कतार में खड़े होकर वोट डालते हैं।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि जनता हर चुनाव में अपना फैसला बदल सकती है। यही कारण है कि कभी भाजपा जीतती है, कभी कांग्रेस और कभी कोई क्षेत्रीय दल। उपचुनावों के इन परिणामों ने एक बार फिर यह दिखाया कि अंतिम फैसला किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि मतदाता का होता है।

यदि विपक्ष वास्तव में लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत देखना चाहता है, तो उसे चुनावी जीत और हार—दोनों परिस्थितियों में समान रूप से चुनाव आयोग और संवैधानिक प्रक्रियाओं का सम्मान करना होगा। अगर राहुल गांधी और उनका गठबंधन अपनी हार की वजहों को ज़मीन पर नहीं तलाशेंगे, तो जनता हर चुनाव में उन्हें इसी तरह सच्चाई का आईना दिखाती रहेगी।

ईवीएम को लेकर चल रही बहस को मिली नई दिशा
इन उपचुनावों के परिणामों ने केवल तीन विधानसभा सीटों का राजनीतिक समीकरण नहीं बदला, बल्कि चुनाव आयोग और ईवीएम को लेकर वर्षों से चल रही बहस को भी नई दिशा दे दी है। भाजपा इसे इस बात का प्रमाण मान रही है कि भारत की चुनावी व्यवस्था मतदाता के जनादेश के अनुसार काम करती है, जबकि विपक्ष के सामने अब यह चुनौती है कि वह चुनावी हार का कारण संगठनात्मक कमियों में तलाशे या फिर पहले की तरह चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाता रहे।

संक्षेप में कहें तो, बांकीपुर और दतिया के नतीजों ने विपक्ष के ‘EVM हैक’ वाले सबसे बड़े हथियार को कुंद कर दिया है। अब देखना यह होगा कि राहुल गांधी अपनी इस घिसी-पिटी रणनीति को बदलते हैं या फिर आने वाले बड़े चुनावों में भी हार के बाद मशीन पर ही ठीकरा फोड़ते हैं।

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विदेशी नैरेटिव और विपक्ष की जुगलबंदी: एलन मस्क से ‘मिड-डे’ के दावों तक का सच
भारत और मोदी सरकार की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूमिल करने के लिए अक्सर विदेशी ताकतों द्वारा तरह-तरह के भ्रामक नैरेटिव गढ़े जाते हैं। विडंबना यह है कि बिना किसी ठोस तर्क या तथ्यों की जांच के, भारत का विपक्षी दल इन विदेशी बयानों को तुरंत राजनीतिक हथियार बनाने में आगे आ जाता है। ऐसा ही एक सुनियोजित नैरेटिव ईवीएम (EVM) की हैकिंग को लेकर तैयार किया गया था। लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के ठीक 11 दिन बाद इस झूठ को हवा दी गई। इसकी शुरुआत 15 जून को हुई, जब दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलन मस्क ने सोशल मीडिया पर लिखा— “ईवीएम को खत्म कर देना चाहिए, क्योंकि इसे इंसानों या AI द्वारा हैक किए जाने का खतरा है।” इसके ठीक एक दिन बाद, 16 जून 2024 को ‘मिड डे’ अखबार ने एक सनसनीखेज रिपोर्ट प्रकाशित कर दावा किया कि ईवीएम को हैक किया जा सकता है। इस पूरी क्रोनोलॉजी ने राजनीतिक हलकों और आम जनता के बीच भ्रम पैदा करने का काम किया, जिसे विपक्ष ने बिना सच्चाई जाने देश भर में हवा देने की कोशिश की। 

राहुल गांधी, उद्धव ठाकरे, ध्रुव राठी के खिलाफ अवमानना कार्यवाही की मांग
कांग्रेस नेता राहुल गांधी, शिवसेना-यूबीटी नेता उद्धव ठाकरे, आदित्य ठाकरे, संजय राउत और यूट्यूबर ध्रुव राठी के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की मांग को लेकर बंबई हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। इस याचिका में इन नेताओं के खिलाफ EVM को लेकर झूठ फैलाने और जनता में भ्रम पैदा करने का आरोप लगाया गया है। याचिका में कहा गया है कि उक्त लोगों ने अपने ‘छुपे एजेंडे’ के तहत ईवीएम को लेकर अलग-अलग धारणाएं बनाई और लोगों में भ्रम पैदा किया।

आरोपियों पर चले आपराधिक अवमानना का मामला
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि ध्रुव राठी और अन्य लोग लगातार फेक न्यूज फैलाकर आम जनता को भ्रमित करते हैं, ये उनकी आदत में शुमार है। ऐसा करना नीलेश नवलखा बनाम भारत संघ (2021) में बंबई हाई कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है। उक्त आदेश में मीडिया को ‘मीडिया ट्रायल’ का सहारा लेने से बचने के लिए दिशा-निर्देश दिए गए थे। याचिका के अनुसार, राहुल गांधी, ध्रुव राठी समेत सभी आरोपितों ने उस आदेश का उल्लंघन किया है, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि जिन मामलों की सुनवाई चल रही हो, उस पर कोई राय बनाकर जनता के बीच गलत बातें फैलाने पर आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आएगा। ऐसा करना कोर्ट की अवमानना अधिनियम की धारा 2(सी) के तहत दंडनीय अपराध है।

आरोपियों की ‘छिपी मंशा’ की जांच के लिए बने एसआईटी
इस मामले की सुनवाई बॉम्बे हाई कोर्ट में जस्टिस श्याम चांडक और जस्टिस मोहिते-डेरे की बेंच में हुई। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में CBI, IB और ED सहित विशेष जांच दल (SIT) के गठन की भी मांग की है, ताकि राहुल गांधी, ध्रुव राठी, उद्धव ठाकरे व अन्य लोगों की ‘छिपी मंशा’ की जांच की जा सके। याचिकाकर्ता ने कोर्ट की अवमानना अधिनियम 1971 की धारा 2(बी) और 12 के तहत राहुल गांधी, उद्धव ठाकरे, ध्रुव राठी, आदित्य ठाकरे और संजय राउत के खिलाफ कार्यवाही की मांग की। इसके अलावा याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट से पुलिस को आईपीसी की धारा 192, 193, 107, 409, 120(बी) और 34 के तहत लंबित जांच के संबंध में सार्वजनिक मशीनरी का दुरुपयोग करने और झूठे सबूत बनाने के लिए उपरोक्त लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया।

जस्टिस रेवती मोहिते-डेरे से इस मामले से अलग होने की अपील
इस दौरान याचिकाकर्ता ने जस्टिस रेवती मोहिते-डेरे से इस मामले की सुनवाई से अलग होने की भी अपील की, क्योंकि जस्टिस डेरे की बहन शरद पवार की एनसीपी से जुड़ी हुई हैं। हालाँकि, पीठ ने इस मामले की सुनवाई करने से इनकार किया। साथ ही कहा कि इसे गलत तरीके से उसके समक्ष रखा गया। याचिकाकर्ताओं से कहा गया कि वे चीफ जस्टिस से संपर्क करें और अपनी याचिका को उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का अनुरोध करें।

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मिडडे ने ईवीएम को लेकर झूठी खबर छापी
मिडडे अखबार ने 16 जून 2024 को एक खबर छापी थी, जिसमें ईवीएम मशीन को ओटीपी के जरिए अनलॉक करने का दावा किया गया था। विपक्षी नेताओं ने उसका इस्तेमाल देश के लोकतंत्र पर सवाल खड़ा करने के लिए किया। 16 जून को मिड डे समाचार पत्र में प्रकाशित 5 कॉलम की रिपोर्ट में दावा किया गया था पुलिस ने अपनी जांच में पाया है कि एनडीए के प्रत्याशी रवींद्र वायकर के रिश्तेदार ने मतदान के वक्त फोन इस्तेमाल कर रहे थे जो कि ईवीएम से कनेक्ट था। इस रिपोर्ट में पुलिस के हवाले से कहा गया था कि प्रत्याशी का रिश्तेदार ओटीपी के जरिए ईवीएम अनलॉक कर रहा था। पुलिस उसका फोन फॉरेंसिक जांच को भेज चुकी है। हालांकि बाद में मिड-डे ने अपनी खबर का खंडन छापा था और कहा था कि ये खबर गलत थी। ऐसा होना मुमकिन नहीं है।

ध्यान भटकाने के लिए निकाला गया ईवीएम का जिन्न!
लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान राहुल गांधी ने गरीब महिलाओं के खाते में हर महीने 8500 और सालाना एक लाख रुपए भेजने की गारंटी दी थी। 4 जून को रिजल्ट आने के बाद 5 जून से देश के कई इलाकों में मुस्लिम महिलाएं कांग्रेस का गारंटी कार्ड लेकर पहुंच गईं और एक लाख रुपए की मांग करने लगीं। देश के कई शहरों में महिलाओं की लगातार जुटती भीड़ से कांग्रेस की काफी बदनामी होने लगी। यह गारंटी कांग्रेस के गले की फांस बन गई। कांग्रेस को इस गारंटी से पार पाने का रास्ता नहीं सूझ रहा था तो लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के 11 दिन बाद ईवीएम का जिन्न बाहर निकाला गया। मोदी विरोधी ग्लोबल पावर्स और डीप स्टेट ने इसके लिए एलन मस्क का इस्तेमाल किया। मस्क ने अमेरिका के संदर्भ में कहा कि EVM को हैक किए जाने का खतरा है इसलिए इसे खत्म कर देना चाहिए। इसके बाद राहुल गांधी को जैसे संजीवनी मिल गई। राहुल गांधी ने मस्क की पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए कहा- भारत में EVM ब्लैक बॉक्स की तरह है। डीप स्टेट ने इसके बाद मिड डे में प्लांटेड खबर छपवा दी कि OTP से EVM को अनलॉक किया जा सकता है। जबकि यह भ्रामक बातें हैं। चुनाव आयोग ने कहा कि ईवीएम में किसी फोन या OTP की जरूरत नहीं है।

भारत की चुनावी प्रक्रिया की दुनिया ने की तारीफ
लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों ने भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) पर सवाल उठाने वालों को चुप तो कराया ही पूरी दुनिया ने भी चुनाव नतीजों के बाद भारत की चुनावी प्रक्रिया की तारीफ की। मगर एलन मस्क ने एक अलग ही राग छेड़ दिया। ये EVM का भूत खड़ा किया गया ताकि देश का ध्यान कांग्रेस द्वारा 8500 रुपये वाले चुनावी फ्रॉड से हट सके। वहीं अब तक मुद्दाविहीन विपक्ष और खटाखट गारंटी से परेशान कांग्रेस ने ईवीएम मुद्दे को हाथोंहाथ लिया। राहुल गांधी से लेकर अखिलेश यादव तक ने एलन मस्क के पोस्ट को री-ट्वीट कर ईवीएम पर चिंता जताने लगे। अगर राहुल और अखिलेश को ईवीएम पर भरोसा नहीं है तो उन्हें अपने सभी सांसदों से इस्तीफा दिलवा देना चाहिए और फिर इस पर बात करनी चाहिए। विधवा विलाप करने से कोई फायदा नहीं है क्योंकि देशवासियों को इनकी करतूतें पता चल चुकी है।

लोकसभा चुनाव परिणाम आने के 11 दिन बाद क्यों उठा ईवीएम मुद्दा
लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के 11 दिन बाद एक बार फिर ईवीएम पर सवाल उठे हैं। आखिर 11 दिन बाद इस मुद्दे की उठने की वजह क्या हो सकती है? इसकी टाइमिंग को लेकर यह साफ है कि राहुल गांधी की चुनावी गारंटी से ध्यान भटकाने के लिए इस मुद्दे को उछाला गया। जैसे ही यह मुद्दा उछला राहुल गांधी ने इसे लपक लिया। उन्होंने इसे ब्लैक बॉक्स बताया और कहा कि भारत जैसे देश में किसी को भी इसकी जांच करने की अनुमति नहीं है। राहुल ने इसके अलावा एक न्यूजपेपर की कटिंग भी शेयर की जिसमें लिखा था कि मुंबई उत्तरपश्चिम लोकसभा सीट जीतने वाले शिवसेना सांसद(शिंदे गुट) रवींद्र वायकर के रिश्तेदार के पास ऐसा फोन है जिससे ईवीएम को आसानी से खोला जा सकता है।

यदि EVM हैक होती तो BJP 272 से नीचे क्यों रहती?
यहां सवाल यह उठता है कि यदि EVM हैक होती तो BJP 272 से नीचे क्यों रहती? यदि EVM हैक होती तो मोदी जी काउंटिंग में पीछे क्यों चलते? यदि EVM हैक होती तो मोदी जी मात्र डेढ़ लाख वोटों से क्यों जीतते? यदि EVM हैक होती तो BJP के 18 मंत्री चुनाव क्यों हारते? यदि EVM हैक होती तो BJP अयोध्या क्यों हारती? यदि EVM हैक होती तो मोदी जी गठबंधन का रिस्क क्यों लेते?

ईवीएम में किसी फोन या OTP की जरूरत नहींः चुनाव आयोग
ओटीपी के जरिए ईवीएम अनलॉक का दावा करने वाली मिड डे अखबार की रिपोर्ट को चुनाव आयोग ने नकार दिया। चुनाव आयोग ने कहा, ‘ एक न्यूजपेपर (मिड डे) में खबर आई कि ईवीएम को एक फोन से अनलॉक किया जाता है। यह बिलकुल गलत है। ईवीएम में किसी फोन या OTP की जरूरत नहीं है। यह पूरी तरह वायरलेस प्रोसिजर है और स्वतंत्र है। चुनाव आयोग ने साफ कहा कि ईवीएम हैक नहीं हो सकती। यह खबर गलत है। जिस अखबार में यह खबर आई है, उसे हमने गलत खबर फैलाने के लिए धारा 499 और 505 के तहत नोटिस भेजा है।

मिड डे की न्यूज़ रिपोर्ट अपने आप में भ्रामक
मिड डे की न्यूज़ रिपोर्ट अपने आप में भ्रामक है। ओटीपी जनरेशन सर्विस वोटर के लिए मतदान में शामिल होने की एक प्रक्रिया का हिस्सा है। सर्विस वोटर (सेना, सुरक्षा बल और भारत सरकार में कार्यरत) एन्क्रिप्टेड ईटीपीबी फ़ाइल डाउनलोड करता है और फिर वोट डालने के लिए इस फ़ाइल को खोलने के लिए ओटीपी उत्पन्न होता है। ईटीपीबीएस ईवीएम से बहुत अलग है।

EVM को खत्म कर देना चाहिएः एलन मस्क
दुनिया के सबसे अमीर बिजनेसमैन एलन मस्क ने 15 जून को लिखा- EVM को खत्म कर देना चाहिए। इसे इंसानों या AI द्वारा हैक किए जाने का खतरा है। हालांकि ये खतरा कम है, फिर भी बहुत ज्यादा है। अमेरिका में इससे वोटिंग नहीं करवानी चाहिए। दरअसल, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी के भतीजे और अगले अमेरिकी चुनावों के लिए स्वतंत्र उम्मीदवार रॉबर्ट एफ कैनेडी जूनियर के एक पोस्ट के जवाब में एलन मस्क ने यह ट्वीट किया था। रॉबर्ट एफ कैनेडी जूनियर ने अपने पोस्ट में प्यूर्टो रिको में हुए मतदान में अनियमितताएं बताई थीं। मस्क ने इसी पर एक्स पर पोस्ट कर लिखा, “हमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को खत्म कर देना चाहिए। इंसानों या एआई द्वारा हैक किए जाने का जोखिम, हालांकि छोटा है, फिर भी यह बहुत अधिक है।”

भारतीय EVM सुरक्षित हैंः राजीव चंद्रशेखर
एलन मस्क के ट्वीट पर भाजपा नेता और पूर्व IT मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने कहा- मस्क के मुताबिक, कोई भी सुरक्षित डिजिटल हार्डवेयर नहीं बना सकता, ये गलत है। उनका बयान अमेरिका और अन्य स्थानों पर लागू हो सकता है – जहां वे इंटरनेट से जुड़ी वोटिंग मशीन बनाने के लिए नियमित कंप्यूट प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं। भारतीय EVM सुरक्षित हैं और किसी भी नेटवर्क या मीडिया से अलग हैं। कोई कनेक्टिविटी नहीं, कोई ब्लूटूथ, वाईफाई, इंटरनेट नहीं। यानी कोई रास्ता नहीं है। फैक्ट्री प्रोग्राम्ड कंट्रोलर जिन्हें दोबारा प्रोग्राम नहीं किया जा सकता। EVM को ठीक उसी तरह डिजाइन किया जा सकता है, जैसा कि भारत ने किया है। भारत में इसे हैक करना संभव नहीं है। इलॉन, हमें ट्यूटोरियल (सिखाने वाला संस्थान) चलाकर खुशी होगी।

भारत में EVM ब्लैक बॉक्स की तरहः राहुल गांधी
भारत की हर सफलता में नकारात्मकता ढूंढ़ने में माहिर राहुल गांधी ने मस्क की पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए कहा- भारत में EVM ब्लैक बॉक्स की तरह है। किसी को भी इसकी जांच की अनुमति नहीं है। हमारी चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर गंभीर चिंताएं जताई जा रही हैं। जब संस्थाओं में जवाबदेही की कमी होती है, तो लोकतंत्र एक दिखावा बन जाता है और धोखाधड़ी की संभावना बढ़ जाती है। राहुल गांधी ने इस ट्वीट के साथ ईवीएम को लेकर मिड डे में छपी खबर को भी पोस्ट किया है।

ईवीएम में छेड़छाड़ की जा सकती हैः सैम पित्रोदा
इसके बाद राहुल गांधी और उनके राजनीतिक गुरु सैम पित्रोदा ने कहा कि देश में बैलट पेपर से ही चुनाव कराया जाना चाहिए क्योंकि ईवीएम की व्यवस्था ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि मैंने ईवीएम की व्यवस्था का पूरा अध्ययन किया है और मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि यह व्यवस्था ठीक नहीं है और इसमें छेड़छाड़ की जा सकती है। उन्होंने कहा कि ईवीएम से छेड़छाड़ की आशंका को देखते हुए बैलट पेपर से ही चुनाव कराना उचित होगा और इसी के जरिए चुनाव में हार-जीत का फैसला किया जाना चाहिए।

आगामी सभी चुनाव बैलेट पेपर से होः अखिलेश यादव
ईवीएम को बदनाम करने की रेस में सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी कूद पड़े। अखिलेश यादव ने एक बार फिर से ईवीएम पर शक जताया। उन्होंने एलन मस्क के एक बयान के बाद यह बात कही। सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए अखिलेश ने लिखा कि “टेक्नॉलजी समस्याओं को दूर करने के लिए होती है, अगर वही मुश्किलों की वजह बन जाए, तो उसका इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए। आज जब विश्व के कई चुनावों में EVM को लेकर गड़बड़ी की आशंका ज़ाहिर की जा रही है और दुनिया के जाने-माने टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट्स EVM में हेराफेरी के ख़तरे की ओर खुलेआम लिख रहे हैं, तो फिर EVM के इस्तेमाल की ज़िद के पीछे की वजह क्या है, ये बात भाजपाई साफ़ करें। आगामी सभी चुनाव बैलेट पेपर (मतपत्र) से कराने की अपनी मांग को हम फिर दोहराते हैं।” अखिलेश यादव जब ईवीएम पर शक है तो ऐसे में उन्हें अपने सभी सांसदों से इस्तीफा दिलवा देना चाहिए फिर इस पर बात करें तो लोगों को भरोसा होगा कि वे साफ नीयत से बोल रहे हैं।

चुनाव आयोग को EVM पर कोई सख़्त फ़ैसला लेना चाहिएः संजय सिंह
आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग को EVM पर कोई सख़्त फ़ैसला लेना चाहिए। अमेरिका जैसा देश EVM बंद करने की बात करता है। हम भी इसे लेकर सवाल उठाते हैं लेकिन हमारा मज़ाक उड़ाया जाता है। इससे देश का लोकतंत्र कमजोर हो रहा है। मुंबई में EVM से NDA के उम्मीदवार के रिश्तेदार का फ़ोन जुड़ा हुआ पाया जाता है। देश में 80 सीटें हैं, जो संदेह के घेरे में हैं। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दाखिल हुई है। अगर अब ठीक ढंग से Counting की जाएगी तो NDA की मौजूदा सरकार गिर जाएगी।

मिड डे ने स्पष्टीकरण छाप कर अपना पल्ला झाड़ा
ईवीएम पर तमाम तरह की शंकाओं, आशंकाओं को जन्म देने के बाद मिड डे ने स्पष्टीकरण छाप कर अपना पल्ला झाड़ लिया। मिड डे ने ईवीएम पर पांच कॉलम में खबर छापी थी जबकि सात पंक्ति में छोटा सा स्पष्टीकरण छाप कर इससे अपने को अलग कर लिया। इस बीच इंडी अलायंस और कांग्रेस को देश की जनता से किए गए झूठे वादे से ध्यान भटकाने का मौका मिल गया। कल तक जो चर्चा कांग्रेस की फ्रॉड गारंटी पर हो रही थी आज वह ईवीएम पर आकर ठहर गई है।

फोन से ईवीएम को अनलॉक किया जा सकताः ध्रुव राठी
उधर एलन मस्क ने बयान दिया, इधर मिड डे ने झूठी खबर छाप दी और लेफ्ट लिबरल इकोसिस्टम इसको ले उड़ा। इसी इकोसिस्टम से जुड़े यूट्यूबर ध्रुव राठी ने भी बहती गंगा में हाथ धो लिया। उन्होंने ट्विटर पर लिखा- ”यह मुंबई उत्तर पश्चिम लोकसभा सीट है। इंडी अलायंस यह सीट महज 48 वोटों से हार गई। एनडीए उम्मीदवार के रिश्तेदार के पास एक फोन था जो ईवीएम को अनलॉक कर सकता था। चुनाव आयोग को इस निर्वाचन क्षेत्र में पुनः चुनाव का आदेश देना चाहिए!” इनकी विश्वनीयता इसी बात से समझी जा सकती है कि ध्रुव राठी ने जिस खबर के हवाले यह ट्वीट किया उस मिड डे अखबार ने स्पष्टीकरण भी छाप दिया।

चुनाव आयोग ने दिया था EVM हैक करने का चैलेंज
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में EVM हैक करने का चैलेंज दिया था। 4 दिनों तक यह मेगा हैकेथोंन रखा गया था इसमें विदेशी हैकर्स को भी शामिल किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के दो जज भी प्रतिदिन 10 घंटे बैठे रहते थे। कोई भी हैकर EVM हैक नहीं कर पाया। एक हैकर ने स्वीकार किया कि वह 6 घंटे तक लगा रहा लेकिन EVM हैक नहीं कर सका।

ईवीएम से बोगस वोटिंग पर लगी लगाम
सैद्धांतिक रूप से या व्यवहारिक रूप से ईवीएम चुनाव का सबसे बेहतर उपाय है। पहले बैलेट पेपर से जब चुनाव होता था तो बोगस वोटिंग खूब होती थी और उसके कारण ही वोट प्रतिशत बढ़ता था। लेकिन ईवीएम में जितना वोटिंग होती है उतना ही दिखता भी है। विश्व स्तर पर इसे सराहा गया है।

बैलेट पेपर की काउंटिंग में भी होती थी धांधली
बैलेट पेपर की काउंटिंग लंबी और समय-खाऊ प्रक्रिया थी। जब तक काउंटिंग पूरी नहीं हो जाती, काउंटिंग चलती रहती थी। दिन-रात 3-4 दिन तक काउंटिंग का चलना आम बात होती थी। काउंटिंग के वक्त बाड़े में वोट गिनने वाले सरकारी कर्मचारी और बाड़े से बाहर प्रत्याशी और उनके एजेंट रहते थे। बक्सा लाया जाता था। सील चेक कराई जाती थी और सील तोड़कर बक्सा खोला जाता था। एक-एक बैलेट पेपर खोलकर चिह्न देखा जाता था और हर प्रत्याशी के वोट वाले बैलेट अलग-अलग किए जाते थे। कई बार इस पर भी बवाल होता था कि वोट गिनने वाले किसी बैलेट पेपर को इंक लगने के आधार पर इनवैलिड मानकर किनारे कर दिया जाता था। ऐसे में प्रत्याशी झगड़ता रहता था कि ये वोट उसका है। बैलेट पेपर अलग-अलग करने के बाद हर प्रत्याशी के 50-50 बैलेट पेपर की गड्डियां बनती थी। और फिर वो गड्डियां गिन ली जाती थी। बैलेट पेपर की गड्डियां बनाने के दौरान भी हराने-जिताने का खेल होता था। जब 50-50 वोटों की गड्डियां बनाई जाती थी तब उस वक्त हराने-जिताने के हिसाब से गड्डियों को 60 का या 40 का कर दिया जाता था। संदेह होने पर रीकाउंटिंग करवाया जाता था लेकिन असली पेच यहीं है। रीकाउंटिंग में गड्डियां नहीं खोली जातीं थी, केवल गड्डियों को दोबारा गिन लिया जाता था।

ईवीएम पर साइबर क्राइम की तरकीब काम नहीं करेगी
EVM से छेड़छाड़ पर साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल कहते हैं, ‘वोटिंग के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ये मशीन इंटरनेट से जुड़ी नहीं होती, लिहाजा इसमें किसी साइबर क्राइम की कोई तरकीब काम नहीं करेगी।

कोर्ट में भी गया ईवीएम का मामला
ईवीएम का मामला कोर्ट में भी गया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही 2011 में वीवी पैट की शुरुआत हुई। पहले ईवीएम से वोटिंग के बाद यह पता नहीं चलता था कि वोट सही में किसको मिला, लेकिन वीवीपैट से वोटर यह देख सकते हैं कि जिसे भी वोट किया है पर्ची में वह है या नहीं। 2019 के चुनाव में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि एक निर्वाचन क्षेत्र में पांच ईवीएम के वोटों का वीवीपैट पर्चियों से मिलान किया जाए।

उम्मीदवार 7 दिनों के अंदर जांच की मांग कर सकते हैं
अप्रैल 2024 में भी ईवीएम मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर ) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के जरिए डाले गए वोट का वीवीपैट के साथ पूर्ण सत्यापन करने के लिए मांग की गई थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपंकर दत्ता ने सुनवाई के बाद जो फैसला दिया उसमें कहा ”चुनाव ईवीएम से ही होंगे वैलेट पेपर से चुनाव नहीं होंगे। नतीजे में जो उम्मीदवार दूसरे या तीसरे नंबर पर है। अगर उसे लगता है कि गड़बड़ी हुई है तो वह रिजल्ट घोषित होने के 7 दिनों के अंदर जांच की मांग कर सकता है। जांच इंजीनियरों की एक टीम करेगी। इसका खर्च उम्मीदवार को उठाना होगा। गड़बड़ी होने पर पैसा वापस कर दिया जाएगा।”

सर्वोच्च अदालत का EVM के पक्ष में फैसला
सर्वोच्च अदालत ने EVM के पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि वोटिंग के दौरान ईवीएम को सील किया जाएगा और इसे 45 दिनों तक सुरक्षित रखा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के जजों ने चुनाव आयोग को भी कुछ निर्देश दिए जिसमें यह भी कहा कि आयोग को यह भी देखना चाहिए कि क्या चुनाव निशान के अलावे हर पार्टी के लिए अलग से कोई बारकोड भी हो सकता है या नहीं। कुल मिलाकर देखें तो सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम के पक्ष में ही अब तक फैसला दिया है। ऐसे ईवीएम से पूरे देश में चुनाव हो रहा है और कई राज्यों में 75 प्रतिशत से भी अधिक वोटिंग हो रही है।

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