भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में हथकरघा केवल कपड़ा बनाने की तकनीक नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही कला, परंपरा और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है। हर वर्ष 7 अगस्त को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय हथकरघा दिवस देश के लाखों बुनकरों के हुनर, समर्पण और योगदान को सम्मान देने का अवसर बनता है। वर्ष 2026 का यह अवसर ऐसे समय में आया है, जब भारतीय हथकरघा उद्योग परंपरागत पहचान को संजोते हुए आधुनिक डिजाइन, डिजिटल प्लेटफॉर्म और वैश्विक बाजारों में नई पहचान बना रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और स्थानीय उत्पादों को वैश्विक बाजारों से जोड़ने की नीति ने हथकरघा क्षेत्र को नई गति दी है। सरकारी योजनाओं, तकनीकी नवाचार, डिजिटल मार्केटिंग, वित्तीय सहायता और निर्यात प्रोत्साहन के चलते आज भारत का हथकरघा उद्योग केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण, रोजगार सृजन और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने का सशक्त माध्यम बनकर उभरा है।
स्वदेशी आंदोलन से जुड़ा है राष्ट्रीय हथकरघा दिवस
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस हर वर्ष 7 अगस्त को मनाया जाता है। यह दिन 1905 के स्वदेशी आंदोलन की याद में मनाया जाता है, जब विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी उत्पादों को अपनाने का अभियान शुरू हुआ था। इस आंदोलन ने भारतीय हथकरघा उद्योग को नई ऊर्जा दी और स्थानीय उत्पादन को राष्ट्रीय गौरव से जोड़ दिया। इसी ऐतिहासिक विरासत को सम्मान देने के लिए मोदी सरकार ने वर्ष 2015 में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस की शुरुआत की। तब से यह दिन न केवल बुनकरों के योगदान को सम्मानित करता है, बल्कि देशवासियों को भारतीय हस्तनिर्मित वस्त्रों को अपनाने के लिए भी प्रेरित करता है।
NATIONAL HANDLOOM DAY | 7th AUGUST 🇮🇳🧵
Commemorating India’s rich handloom heritage and honouring the invaluable contribution of the weaving community to the country’s cultural and economic development.#NationalHandloomDay #Weavers #HandloomDay
– Video by AI @TexMinIndia pic.twitter.com/QoJy9Zdr4U
— Ministry of Information and Broadcasting (@MIB_India) August 7, 2026
हजारों वर्षों पुरानी है भारत की बुनाई परंपरा
भारत की बुनाई कला का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर ऋग्वेद, रामायण, महाभारत और कौटिल्य के ग्रंथों तक भारतीय सूती और रेशमी वस्त्रों की उत्कृष्टता का उल्लेख मिलता है। सदियों से विभिन्न क्षेत्रों के बुनकरों ने अपनी विशिष्ट तकनीकों और स्थानीय परंपराओं के माध्यम से ऐसी बुनाई विकसित की, जिसने बनारसी, कांचीपुरम, चंदेरी, इकत, पोचमपल्ली, पटोला, जामदानी और कई अन्य प्रसिद्ध वस्त्रों को वैश्विक पहचान दिलाई। आज भी भारत का हथकरघा उद्योग परंपरा और आधुनिकता का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है।
35.22 लाख लोगों की आजीविका का आधार
चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना (2019-20) के अनुसार देश में लगभग 35.22 लाख हथकरघा बुनकर और संबद्ध श्रमिक कार्यरत हैं। इनमें लगभग 31.45 लाख हथकरघा परिवार शामिल हैं, जबकि 8.48 लाख लोग बुनाई से पहले और बाद की प्रक्रियाओं—जैसे वार्पिंग, डाइंग, वाइंडिंग और कैलेंडरिंग—से जुड़े हुए हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि हथकरघा उद्योग केवल वस्त्र निर्माण तक सीमित नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की आर्थिक रीढ़ भी है।
धागों में विरासत… हाथों में हुनर… और हर बुनाई में आत्मनिर्भर भारत की पहचान। 🇮🇳#राष्ट्रीय_हथकरघा_दिवस पर जानिए उस समृद्ध विरासत की कहानी, जिसने स्वदेशी की भावना को जन-जन तक पहुँचाया और आज भी लाखों बुनकर परिवारों की आजीविका को नई उड़ान दे रही है।
आइए, स्थानीय उत्पाद अपनाकर… pic.twitter.com/IMjJcNIAD6
— MyGov Hindi (@MyGovHindi) August 7, 2026
महिलाओं के हाथों में है हथकरघा उद्योग की ताकत
भारतीय हथकरघा क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसमें महिलाओं की भागीदारी है। देशभर में इस क्षेत्र में कार्यरत 25.46 लाख महिलाएं हैं, जो कुल कार्यबल का 72 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हैं। ग्रामीण भारत में महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने में हथकरघा उद्योग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। घर से ही उत्पादन की सुविधा मिलने के कारण लाखों महिलाएं परिवार की आय बढ़ाने में योगदान दे रही हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत कड़ी
जनगणना के अनुसार देश में 28.20 लाख करघे मौजूद हैं। इनमें से 25.30 लाख करघे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं, जबकि केवल 2.90 लाख करघे शहरी क्षेत्रों में हैं। यानी भारत के लगभग 90 प्रतिशत हथकरघे गांवों में संचालित होते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि यह उद्योग ग्रामीण रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए कितना महत्वपूर्ण है।
On #NationalHandloomDay, we celebrate the hands that weave India’s story, giving life to the timeless traditions of Bharat’s culture through textiles.
Let’s strengthen our local artisans and wear our handlooms with pride. #VocalForLocal pic.twitter.com/Ikd1pzHewg
— Sarbananda Sonowal (@sarbanandsonwal) August 7, 2026
सामाजिक समावेशन का उदाहरण
हथकरघा उद्योग सामाजिक समावेशन का भी मजबूत उदाहरण है। इस क्षेत्र में लगभग 4.84 लाख अनुसूचित जाति के श्रमिक, 6.28 लाख अनुसूचित जनजाति के श्रमिक, 12.67 लाख अन्य पिछड़ा वर्ग के श्रमिक कार्यरत हैं। इससे यह क्षेत्र समाज के विभिन्न वर्गों को रोजगार उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
ई-पहचान से बुनकरों को मिली नई पहचान
सरकार ने हथकरघा श्रमिकों को योजनाओं का लाभ सीधे पहुंचाने के लिए जनवरी 2025 में ई-पहचान पोर्टल शुरू किया। इस पोर्टल के माध्यम से नए बुनकर अपना पंजीकरण करा सकते हैं, जबकि पहले से पंजीकृत श्रमिक अपने विवरण अपडेट कर पहचान पत्र डाउनलोड कर सकते हैं। जुलाई 2026 तक लगभग 84 हजार अतिरिक्त श्रमिकों को ई-पहचान कार्ड की मंजूरी मिल चुकी थी।

राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम से मिल रही नई ताकत
हथकरघा क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए केंद्र सरकार राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम (National Handloom Development Programme-NHDP) के माध्यम से व्यापक सहायता उपलब्ध करा रही है। यह कार्यक्रम वर्ष 2021-22 से लागू है और बुनकरों के कल्याण, आधुनिक तकनीक, डिजाइन विकास, बाजार विस्तार और वित्तीय सहायता जैसे अनेक पहलुओं को एक साथ जोड़ता है। सरकार इस योजना को सरकारी हथकरघा संगठनों, राष्ट्रीय एवं राज्य हथकरघा निगमों, बुनकर सहकारी समितियों, उत्पादक कंपनियों और बैंकों के माध्यम से लागू कर रही है। इसी के तहत वर्ष 2020-21 से 2026-27 के बीच 200 हथकरघा उत्पादक कंपनियों का गठन किया गया, जिससे बुनकरों को पेशेवर तरीके से कारोबार करने का अवसर मिला।
छोटे क्लस्टरों को मिल रही करोड़ों की सहायता
एनएचडीपी के अंतर्गत स्मॉल क्लस्टर डेवलपमेंट प्रोग्राम (SCDP) के जरिए छोटे हथकरघा समूहों को उनकी जरूरत के अनुसार 2 करोड़ रुपये तक की वित्तीय सहायता दी जाती है। इस सहायता का उपयोग आधुनिक करघे, बेहतर कार्यशालाएं, प्रकाश व्यवस्था, डिजाइन विकास, उत्पाद सुधार और विपणन सुविधाओं के लिए किया जाता है। वर्ष 2021-22 से जून 2026 तक इस योजना के तहत 357 क्लस्टरों को मंजूरी दी जा चुकी है। वहीं 2025-26 के दौरान वर्कशेड, करघों, सहायक उपकरणों और इलेक्ट्रॉनिक जैक्वार्ड जैसी परियोजनाओं के लिए 94 करोड़ रुपये जारी किए गए।

वर्कशेड से बढ़ी आय और उत्पादकता
सरकार द्वारा बनाए जा रहे आधुनिक वर्कशेड का सीधा लाभ बुनकरों को मिला है। अध्ययन के अनुसार— दैनिक उत्पादन में 53 प्रतिशत वृद्धि हुई, कार्य घंटे 60 प्रतिशत बढ़े, मासिक कार्य दिवसों में 28 प्रतिशत की वृद्धि हुई। औसत दैनिक आय 328 रुपये से बढ़कर 465 रुपये हो गई, यानी लगभग 42 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इससे स्पष्ट है कि बेहतर कार्यस्थल का सीधा असर उत्पादन और आय दोनों पर पड़ा है।
इलेक्ट्रॉनिक जैक्वार्ड से बदली बुनाई की तस्वीर
सरकार आधुनिक तकनीक को भी हथकरघा क्षेत्र से जोड़ रही है। इलेक्ट्रॉनिक जैक्वार्ड तकनीक के माध्यम से जटिल डिजाइन पहले की तुलना में अधिक तेजी और सटीकता से तैयार किए जा रहे हैं। इस तकनीक से जुड़े लाभार्थियों में दैनिक उत्पादन में 55 प्रतिशत वृद्धि हुई। 96 प्रतिशत बुनकरों ने उत्पादकता बढ़ने की जानकारी दी। दैनिक मजदूरी 360 रुपये से बढ़कर 560 रुपये हो गई। औसत मासिक आय 9,600 रुपये से बढ़कर लगभग 15,000 रुपये तक पहुंच गई। यह बदलाव दर्शाता है कि तकनीक अपनाने से पारंपरिक उद्योग भी प्रतिस्पर्धी बन सकता है।

बाजार तक पहुंच बनाने पर सरकार का जोर
बेहतरीन उत्पाद तैयार होने के बाद उन्हें बाजार तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है। इसी उद्देश्य से हथकरघा विपणन सहायता (Handloom Marketing Assistance-HMA) योजना संचालित की जा रही है। इस योजना के अंतर्गत बुनकरों और संस्थाओं को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों, मेलों, शिल्प उत्सवों और विपणन कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिलता है। 2021-22 से जून 2026 तक 960 से अधिक विपणन कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर की प्रदर्शनियां, शिल्प मेले और व्यापारिक आयोजन शामिल हैं।
उत्कृष्ट बुनकरों का राष्ट्रीय सम्मान
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर उत्कृष्ट कार्य करने वाले बुनकरों को सम्मानित भी किया जाता है। 2025 में दिए गए 2024 के पुरस्कारों में कुल 24 बुनकरों को सम्मानित किया गया। इनमें 5 संत कबीर हथकरघा पुरस्कार, 19 राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार प्रदान किए गए। पुरस्कार प्राप्त करने वालों में 6 महिलाएं और एक दिव्यांग बुनकर भी शामिल रहे।
संत कबीर हथकरघा पुरस्कार- यह पुरस्कार उन बुनकरों को दिया जाता है जिन्होंने उत्कृष्ट शिल्प कौशल, परंपराओं के संरक्षण और समाज के लिए उल्लेखनीय योगदान दिया है। इसमें 3.5 लाख रुपये, स्वर्ण सिक्का, ताम्रपत्र, शॉल और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाता है।
राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार- यह पुरस्कार नवाचार, उत्कृष्ट शिल्प और समर्पण के लिए दिया जाता है। सम्मानित बुनकरों को 2 लाख रुपये, ताम्रपत्र, शॉल और प्रमाण पत्र प्रदान किए जाते हैं।

आसान ऋण से मिल रहा कारोबार बढ़ाने का अवसर
हथकरघा बुनकर मुद्रा योजना के तहत बुनकरों को 6 प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जाता है। इसके अलावा सरकार 7 प्रतिशत तक ब्याज सब्सिडी, मार्जिन मनी सहायता और क्रेडिट गारंटी शुल्क का भी भुगतान करती है। 2021-22 से जून 2026 तक 40 हजार से अधिक ऋण स्वीकृत किए गए, जिनकी कुल ऋण राशि 280 करोड़ रुपये से अधिक रही। वर्ष 2026-27 तक 967 नए ऋण स्वीकृत किए जा चुके हैं, जिनकी राशि 7.45 करोड़ रुपये है।
सामाजिक सुरक्षा भी बनी बड़ी ताकत
सरकार हथकरघा बुनकरों को सामाजिक सुरक्षा से भी जोड़ रही है। इसके तहत उन्हें प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (PMJJBY) तथा प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (PMSBY) का लाभ दिया जा रहा है। PMJJBY के तहत प्राकृतिक मृत्यु पर 2 लाख रुपये का बीमा मिलता है, जबकि PMSBY दुर्घटना में मृत्यु या पूर्ण दिव्यांगता पर 2 लाख रुपये तथा आंशिक दिव्यांगता पर 1 लाख रुपये का लाभ देती है। वर्ष 2021-22 में जहां 1.12 लाख बुनकर इन योजनाओं से जुड़े थे, वहीं 2026-27 तक यह संख्या बढ़कर 2.02 लाख से अधिक हो गई, जो लगभग 81 प्रतिशत की वृद्धि है। इसी अवधि में सहायता राशि भी 204.83 लाख रुपये से बढ़कर 335 लाख रुपये हो गई।

बच्चों की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति
सरकार बुनकर परिवारों के बच्चों को भी उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित कर रही है। प्रत्येक पात्र बुनकर के दो बच्चों को वस्त्र क्षेत्र में डिप्लोमा, स्नातक या स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए प्रति वर्ष 2 लाख रुपये तक की छात्रवृत्ति दी जाती है। जून 2026 तक 531 आवेदनों को मंजूरी मिल चुकी थी।
मेगा क्लस्टर योजना से बड़े स्तर पर विकास
सरकार ने हथकरघा उद्योग को संगठित और प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए मेगा क्लस्टर विकास कार्यक्रम भी शुरू किया है। इस योजना के तहत ऐसे बड़े क्लस्टर विकसित किए जाते हैं, जहां कम से कम 10 हजार हथकरघा संचालित होते हों। प्रत्येक मेगा क्लस्टर को पांच वर्षों में 30 करोड़ रुपये तक की केंद्रीय सहायता प्रदान की जाती है। इस सहायता का उपयोग साझा अवसंरचना, डिजाइन केंद्र, प्रशिक्षण, विपणन और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता है। अब तक आठ मेगा क्लस्टर पूरी तरह विकसित होकर संचालित हो चुके हैं, जबकि चार अन्य क्लस्टरों पर कार्य जारी है। इस योजना के तहत अब तक 370.72 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं, जिससे 1.62 लाख से अधिक बुनकरों को प्रत्यक्ष लाभ मिला है।

विशेष अवसंरचना परियोजनाओं पर भी फोकस
सरकार आवश्यकता आधारित विशेष अवसंरचना परियोजनाओं के माध्यम से हथकरघा गांवों और उत्पादन केंद्रों को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ रही है। इस योजना के तहत उत्पाद विकास, गुणवत्ता सुधार, मूल्य संवर्धन और विपणन के लिए 12 करोड़ रुपये तक की सहायता दी जाती है। वर्तमान में छह हथकरघा गांव पूरी तरह संचालित हैं, जबकि तीन नई परियोजनाओं का निर्माण जारी है।
कच्चे माल की उपलब्धता हुई आसान
हथकरघा उद्योग की सबसे बड़ी जरूरत गुणवत्तापूर्ण धागे की समय पर उपलब्धता है। इसी उद्देश्य से रॉ मैटेरियल सप्लाई स्कीम (RMSS) लागू की गई है। इसके तहत सभी प्रकार के धागों की ढुलाई लागत की प्रतिपूर्ति की जाती है तथा निर्धारित सीमा तक चयनित धागों पर 15 प्रतिशत मूल्य सब्सिडी भी दी जाती है। सरकार ने वर्ष 2026-27 में भी इस योजना के लिए 200 करोड़ रुपये का बजट रखा है। वहीं राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम के लिए 205 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

जीएसटी राहत से मिली बड़ी राहत
सरकार ने हथकरघा और पारंपरिक हस्तशिल्प उत्पादों को सस्ता और प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए जीएसटी में भी राहत दी है। जीएसटी सुधारों के तहत 36 हस्तशिल्प वस्तुओं पर जीएसटी 12 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया। सूती हथकरघा गलीचे और हाथ से बुने कालीन भी 5 प्रतिशत जीएसटी के दायरे में लाए गए। घरेलू और औद्योगिक सिलाई मशीनों पर भी जीएसटी 12 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया। इन फैसलों से उत्पादन लागत कम होने और छोटे उत्पादकों को राहत मिलने की उम्मीद है।
बजट 2026-27 में हथकरघा क्षेत्र को मिला नया विजन
केंद्रीय बजट 2026-27 में वस्त्र उद्योग और हथकरघा क्षेत्र के लिए कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं। सरकार ने राष्ट्रीय फाइबर योजना के माध्यम से प्राकृतिक, मानव निर्मित और आधुनिक फाइबर में आत्मनिर्भरता बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। इसके अलावा वस्त्र विस्तार एवं रोजगार योजना के तहत पारंपरिक क्लस्टरों का आधुनिकीकरण, मशीनरी उन्नयन, परीक्षण प्रयोगशालाओं और प्रमाणन केंद्रों की स्थापना की जाएगी। सरकार राष्ट्रीय हथकरघा एवं हस्तशिल्प कार्यक्रम के माध्यम से मौजूदा योजनाओं को एकीकृत कर अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में भी काम कर रही है। वहीं महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल के तहत खादी, हथकरघा, हस्तशिल्प, ग्राम उद्योग, ग्रामीण युवाओं और एक जिला-एक उत्पाद (ODOP) को वैश्विक बाजारों से जोड़ने की योजना है।

डिजाइन और नवाचार को मिल रहा बढ़ावा
अब हथकरघा केवल परंपरागत कपड़ों तक सीमित नहीं है। वर्ष 2026 में आयोजित “Weave the Future 4.0 – Upcycling Edition” प्रदर्शनी में 100 से अधिक डिजाइनर, कारीगर और नवप्रवर्तकों ने टिकाऊ फैशन, अपसाइक्लिंग और जिम्मेदार उत्पादन के नए मॉडल प्रस्तुत किए। इसी तरह वस्त्र मंत्रालय ने Handloom Hackathon 2026 शुरू किया है, जिसमें छात्र, स्टार्टअप, डिजाइनर, शोधकर्ता और बुनकर मिलकर डिजाइन, डिजिटल तकनीक, ब्रांडिंग, उत्पादकता और बाजार विस्तार के नए समाधान विकसित करेंगे। यह पहल स्पष्ट करती है कि सरकार हथकरघा को नई पीढ़ी और नई तकनीकों से जोड़ने पर विशेष जोर दे रही है।
दुनिया में बढ़ रही भारतीय हथकरघा की मांग
भारतीय हथकरघा उत्पाद अपनी गुणवत्ता, हस्तनिर्मित पहचान और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादन के कारण दुनिया भर में लोकप्रिय हो रहे हैं। वर्ष 2025-26 में भारत का हथकरघा निर्यात लगभग 1,330.96 करोड़ रुपये रहा। भारतीय हथकरघा उत्पादों के प्रमुख निर्यात बाजारों में संयुक्त अरब अमीरात, संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, स्पेन शामिल रहे।

डिजिटल प्लेटफॉर्म से बढ़ा बाजार
सरकार बुनकरों को डिजिटल माध्यमों से सीधे खरीदारों तक पहुंचाने पर भी जोर दे रही है। करीब 1.50 लाख बुनकर और हथकरघा संस्थाएं GeM पोर्टल से जुड़ चुकी हैं, जहां वे सरकारी संस्थानों को सीधे अपने उत्पाद बेच सकती हैं। वहीं IndiaHandmade प्लेटफॉर्म के माध्यम से सत्यापित बुनकर सीधे ग्राहकों तक अपने उत्पाद पहुंचा रहे हैं। वर्ष 2023-24 से जून 2026 तक इस मंच से 4,186 बुनकर और कारीगर जुड़ चुके हैं।
Handloom Mark से बढ़ रहा भरोसा
उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ाने के लिए सरकार Handloom Mark योजना चला रही है। यह प्रमाणित करता है कि संबंधित उत्पाद वास्तव में हाथ से बुना गया है। 30 जून 2026 तक 29,402 हैंडलूम मार्क पंजीकरण, 815 अधिकृत बिक्री केंद्र सक्रिय थे।

India Handloom Brand बना गुणवत्ता की पहचान
7 अगस्त 2015 को शुरू किया गया India Handloom Brand उच्च गुणवत्ता वाले प्रमाणित हथकरघा उत्पादों को बढ़ावा देता है। इस प्रमाणन के तहत केवल उच्च गुणवत्ता, पारंपरिक डिजाइन, प्राकृतिक रेशों, त्वचा के अनुकूल रंगों और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन वाले उत्पादों को शामिल किया जाता है। जून 2026 तक 184 श्रेणियों में 2,305 पंजीकरण जारी किए जा चुके थे।
GI टैग से सुरक्षित हो रही क्षेत्रीय पहचान
भारत की कई प्रसिद्ध बुनाई परंपराओं को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) का संरक्षण प्राप्त है। जीआई टैग किसी विशेष क्षेत्र में बनने वाले ऐसे उत्पादों की पहचान करता है जिनकी गुणवत्ता और प्रतिष्ठा उसी क्षेत्र से जुड़ी होती है। अगस्त 2026 तक 106 हथकरघा उत्पाद, 6 उत्पाद लोगो, 227 हस्तशिल्प उत्पाद जीआई पंजीकरण के अंतर्गत शामिल किए जा चुके हैं। इसके साथ ही सरकार नकली उत्पादों पर रोक लगाने और असली बुनकरों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी कार्रवाई भी सुनिश्चित कर रही है।

हथकरघा अधिनियम से मिल रहा कानूनी संरक्षण
हथकरघा (उत्पाद आरक्षण) अधिनियम, 1985 के तहत 11 विशेष वस्त्र केवल हथकरघे पर बनाए जाने के लिए आरक्षित हैं। सरकारी एजेंसियां समय-समय पर निरीक्षण कर यह सुनिश्चित करती हैं कि इन उत्पादों का निर्माण पावरलूम या मिलों में न हो। इससे पारंपरिक बुनकरों की आजीविका और सांस्कृतिक विरासत दोनों सुरक्षित रहती हैं।
नए युग में कदम रखता भारतीय हथकरघा
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 2026 केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की उस जीवंत परंपरा का सम्मान है जिसने सदियों से देश की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखा है। आज भारतीय हथकरघा परंपरा और आधुनिकता के बीच एक मजबूत सेतु बन चुका है। डिजिटल तकनीक, नई डिजाइन, सरकारी योजनाएं, वित्तीय सहायता, वैश्विक बाजार और गुणवत्ता प्रमाणन ने इस क्षेत्र को नई दिशा दी है। 35.22 लाख से अधिक बुनकरों और उनसे जुड़े लाखों परिवारों की मेहनत आज भारत की अर्थव्यवस्था, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण विकास और “वोकल फॉर लोकल” अभियान को मजबूती दे रही है। ऐसे समय में जब पूरी दुनिया टिकाऊ, पर्यावरण-अनुकूल और हस्तनिर्मित उत्पादों की ओर बढ़ रही है, भारतीय हथकरघा उद्योग अपनी परंपराओं को संजोते हुए वैश्विक मंच पर नई पहचान बनाने की ओर तेजी से अग्रसर है। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 2026 इसी विश्वास का प्रतीक है कि भारत के बुनकरों के हाथों में केवल धागे नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत, आत्मनिर्भरता और भविष्य की नई संभावनाएं भी बुनी जा रही हैं।










