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दिल्ली को बंधक बनाने की राजनीति खत्म: जंतर-मंतर पर बंद होगा हुड़दंग!

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राजधानी दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों के नाम पर सड़कों को जाम करने, आम जनता के लिए परेशानी का सबब बनने और कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती खड़ी करने वाली राजनीति पर अब अंतिम प्रहार की तैयारी हो चुकी है। देश की सुरक्षा, आम नागरिकों के अधिकारों और सुगम यातायात को प्राथमिकता देने वाली मोदी सरकार के सख्त रुख पर अब दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी अपनी मुहर लगा दी है। जंतर-मंतर पर आए दिन होने वाले हुड़दंग और प्रदर्शनों पर सवाल उठाते हुए हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से स्पष्ट पूछा है कि आखिर शहर के बीचों-बीच स्थित इस जगह को हमेशा के लिए प्रदर्शन स्थल के रूप में बंद क्यों नहीं कर दिया जाता? अदालत ने साफ कहा कि किसी भी राजनीतिक या सांगठनिक स्वार्थ के लिए पूरे शहर को अनावश्यक रूप से बंधक बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

न्यायालय का यह कड़ा रुख उन तत्वों के लिए बहुत बड़ा झटका है जो शांतिपूर्ण आंदोलन का चोला ओढ़कर राजधानी की रफ्तार रोकने और सुरक्षा तंत्र पर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं। दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय पहले से ही 15 अगस्त के राष्ट्रीय समारोह को देखते हुए बेहद सतर्क हैं और कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता दे रहे हैं। केंद्र सरकार का स्पष्ट मानना है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर आम जनता के मौलिक अधिकारों, मरीजों को ले जा रही एम्बुलेंस और दफ्तर जाने वाले नागरिकों के रास्ते में बाधा डालने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों जगह जंतर-मंतर को खाली कराने और किसी वैकल्पिक दूरस्थ स्थान पर भेजने की मांग पर तेजी से सुनवाई हो रही है, जिससे साफ संकेत मिलता है कि अब दिल्ली को बंधक बनाने वाली नूरा-कुश्ती का अंत बहुत जल्द होने वाला है।

1. ‘पूरे शहर को बंधक नहीं बनाया जा सकता’: हाई कोर्ट दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस अमित महाजन ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस के रुख का समर्थन करते हुए बेहद सख्त टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि विरोध-प्रदर्शनों के नाम पर दिल्ली की आम जनता को रोज-रोज असुविधा झेलने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने साफ किया कि शहर के बीचों-बीच ऐसे किसी भी आयोजन की अनुमति नहीं होनी चाहिए, जिससे दैनिक जनजीवन प्रभावित हो। मोदी सरकार की सोच भी यही रही है कि लोकतंत्र में विरोध का स्थान ऐसा हो जिससे आम नागरिकों के काम-काज, दफ्तर जाने वाले कर्मचारियों और स्कूल जाने वाले बच्चों को किसी तरह की मुसीबत का सामना न करना पड़े।

2. स्वतंत्रता दिवस के मद्देनजर अभेद्य सुरक्षा: गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस पूरी तरह मुस्तैद
15 अगस्त के पावन राष्ट्रीय पर्व से ठीक पहले राजधानी में किसी भी तरह की सुरक्षा चूक को रोकने के लिए गृह मंत्रालय के निर्देश पर दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर और आसपास के संवेदनशील इलाकों में धारा 144 लागू कर दी है। सुरक्षा एजेंसियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि किसी भी अराजक तत्व को राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ करने की इजाजत न दी जाए। ASG चेतन शर्मा ने अदालत को बताया कि स्वतंत्रता दिवस जैसे संवेदनशील मौकों पर सुरक्षा बल किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं कर सकते और इसी कारण सार्वजनिक सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए कड़े प्रशासनिक कदम उठाए जा रहे हैं।

3. ’75 प्रदर्शनकारियों से 75 हजार की भीड़’: अनियंत्रित हुड़दंग को रोकने के लिए कड़े कदम
अदालत में ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी की ओर से 75 लोगों के प्रदर्शन की अनुमति मांगी गई थी, जिस पर अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने सरकार की व्यावहारिक चिंता को सामने रखा। उन्होंने कहा कि अक्सर देखा गया है कि कागजों पर 50-75 लोगों की अनुमति ली जाती है, लेकिन देखते ही देखते वहां हजारों की अनियंत्रित भीड़ जुटा ली जाती है। इस रणनीति का इस्तेमाल सुरक्षा बलों को छकाने और कानून-व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए किया जाता है। केंद्र सरकार ऐसे सुनियोजित षड्यंत्रों को भांपते हुए सख्त फैसले ले रही है ताकि भीड़ की आड़ में अराजकता न फैलाई जा सके।

 4. जंतर-मंतर को स्थायी रूप से बंद करने पर गंभीरता से विचार: आम दिल्लीवासियों को मिलेगी बड़ी राहत
लंबे समय से जंतर-मंतर पर लगने वाले धरने-प्रदर्शनों के कारण कनॉट प्लेस और लुटियंस दिल्ली के आसपास रहने वाले लोगों का जीना दूभर हो गया है। हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि जंतर-मंतर को हमेशा के लिए प्रदर्शन स्थल के तौर पर बंद कर दिया जाए। केंद्र सरकार भी इस विचार पर गंभीरता से आगे बढ़ रही है ताकि इस ऐतिहासिक और घने व्यावसायिक क्षेत्र को रोजाना के ट्रैफिक जाम और शोर-शराबे से मुक्त कराया जा सके। अगर यह फैसला लागू होता है, तो यह दिल्ली के लाखों वाहन चालकों और स्थानीय निवासियों के लिए ऐतिहासिक राहत होगी।

5. एम्बुलेंस और आपातकालीन सेवाओं के रास्ते में रोड़ा बने प्रदर्शनकारियों पर नकेल
जंतर-मंतर और लुटियंस दिल्ली का इलाका देश के सबसे बड़े अस्पतालों जैसे एआईआईएमएस (AIIMS), राम मनोहर लोहिया (RML) और सफदरजंग के बेहद करीब है। प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए जाने वाले जाम के कारण कई बार जीवनरक्षक एम्बुलेंस घंटों फंसी रहती हैं, जिससे मरीजों की जान पर बन आती है। जस्टिस अमित महाजन ने भी इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि किसी का भी प्रदर्शन करने का अधिकार किसी की जान बचाने के अधिकार से बड़ा नहीं हो सकता। सरकार का यह प्रयास है कि दिल्ली का कोई भी अस्पताल मार्ग किसी भी राजनीतिक ड्रामे की वजह से बाधित न हो।

6. सुप्रीम कोर्ट में भी घिरी जंतर-मंतर की राजनीति: जनहित याचिका पर केंद्र को नोटिस
जंतर-मंतर पर होने वाले उपद्रव का मामला अब सिर्फ हाई कोर्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में भी इस पर कड़ी सुनवाई चल रही है। भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने सतीश चंद कौशिक द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए माना है कि जंतर-मंतर अब प्रदर्शनों के लिए बिल्कुल अनुपयुक्त जगह बन चुका है। सर्वोच्च अदालत ने भी माना कि वहां होने वाली गतिविधियों से स्थानीय लोगों और चिकित्सा सेवाओं को भारी नुकसान पहुंचता है। अदालत द्वारा केंद्र सरकार को जारी नोटिस इस बात की पुष्टि करता है कि अब देश की सर्वोच्च संस्थाएं भी जंतर-मंतर को खाली कराने के पक्ष में हैं।

7. संसद भवन पर धावा बोलने की साजिश नाकाम: सुरक्षा बल बने ढाल
जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों का असली मकसद कई बार लोकतांत्रिक मांगें उठाना नहीं, बल्कि कुछ ही दूरी पर स्थित देश की संसद की सुरक्षा में सेंध लगाना होता है। हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान उपद्रवियों ने संसद भवन की ओर मार्च करने की कोशिश की और सुरक्षा घेरों को तोड़ने का दुस्साहस किया। हालांकि, सतर्क दिल्ली पुलिस ने मौके पर ही बैरिकेड्स लगाकर उन्हें रोक दिया। केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर यानी संसद की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी तत्व को बख्शा नहीं जाएगा और कड़े से कड़े कानूनी कदम उठाए जाएंगे।

8. पुलिसकर्मियों और बुजुर्ग अधिकारियों के साथ बदसलूकी करने वालों पर शिकंजा
संसद की ओर बढ़ने से रोके जाने पर प्रदर्शनकारियों ने जिस तरह हिंसा का सहारा लिया, उसने उनके तथाकथित ‘शांतिपूर्ण’ आंदोलन के दावों की पोल खोल दी। उग्र भीड़ ने न केवल सुरक्षा बैरिकेड्स को भारी नुकसान पहुंचाया, बल्कि ड्यूटी पर तैनात वरिष्ठ और बुजुर्ग पुलिस अधिकारियों के साथ धक्का-मुक्की और बदसलूकी भी की। पुलिस और प्रशासन ने अब ऐसे हिंसक और अराजक तत्वों की पहचान करना शुरू कर दिया है। सरकार का कड़ा संदेश है कि वर्दी पर हाथ डालने वाले और कानून हाथ में लेने वाले अपराधियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा, भले ही वे किसी भी झंडे या बैनर का सहारा लें।

9. मौलिक अधिकारों का संतुलन जरूरी: आम जनता के अधिकार भी महत्वपूर्ण
सुनवाई के दौरान यह अहम बात सामने आई कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिलने वाली अभिव्यक्ति की आजादी असीमित नहीं है। ASG चेतन शर्मा ने अदालत के समक्ष पुरजोर तरीके से यह बात रखी कि विरोध करने वाले मुट्ठी भर लोगों के अधिकारों को देश के करोड़ों सामान्य नागरिकों के जीने और सुरक्षित आवाजाही के अधिकार से ऊपर नहीं रखा जा सकता। संविधान हर नागरिक को बराबरी का अधिकार देता है, इसलिए कुछ लोगों की सहूलियत के लिए बाकी पूरी दिल्ली के नागरिकों के अधिकारों की बलि नहीं दी जा सकती। न्यायपालिका ने भी इस तर्क को स्वीकार करते हुए संतुलन बनाने की बात कही है।

10. वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल की मांग: शहर के आउटर इलाके में बने नया सेंटर
सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट में चल रही बहसों के बीच यह विचार भी तेजी से उभरा है कि अगर विरोध-प्रदर्शन करने ही हैं, तो उनके लिए शहर से बाहर या किसी ऐसे आउटर इलाके में वैकल्पिक स्थल तय किया जाए जहाँ आम जनजीवन प्रभावित न हो। बुराड़ी या शहर के बाहरी सीमाओं पर ऐसे स्थान चिन्हित करने की बात हो रही है। इससे एक तरफ जहां प्रदर्शनकारियों को अपनी बात कहने का मंच मिलेगा, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली के मुख्य शहर को रोज-रोज के ट्रैफिक जाम, वीआईपी मूवमेंट के झंझट और सुरक्षा खतरों से स्थाई मुक्ति मिल जाएगी।

11. व्यापारियों और दुकानदारों के नुकसान पर रोक: कनॉट प्लेस का व्यापार होगा सुरक्षित
जंतर-मंतर पर होने वाले लगातार प्रदर्शनों के कारण आसपास के व्यापारिक क्षेत्रों, विशेषकर कनॉट प्लेस और जनपथ के व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। धारा 144 और बैरिकेडिंग की वजह से ग्राहक इन बाजारों तक पहुंच ही नहीं पाते थे। सरकार द्वारा जंतर-मंतर को बंद करने या स्थानांतरित करने की दिशा में उठाए जा रहे कदमों का दिल्ली के व्यापारी वर्ग ने दिल से स्वागत किया है। इससे न केवल बाजारों की चहल-पहल लौटेगी, बल्कि राजधानी की अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी और स्थानीय व्यापारियों का रोज़गार सुरक्षित रहेगा।

12. वीआईपी सुरक्षा और प्रशासनिक तंत्र का सुचारू संचालन
लुटियंस दिल्ली प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र है, जहाँ राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास, केंद्रीय मंत्रालय और विदेशी दूतावास स्थित हैं। जंतर-मंतर पर होने वाले उग्र प्रदर्शनों के कारण अक्सर सुरक्षा एजेंसियों को अतिरिक्त बल तैनात करना पड़ता है, जिससे सरकार का कीमती समय और संसाधन बर्बाद होते हैं। जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल से हटाने से प्रशासनिक कामकाज बिना किसी बाधा के पूरा हो सकेगा और देश-विदेश से आने वाले गणमान्य व्यक्तियों की सुरक्षा व्यवस्था को भी बिना किसी अनावश्यक तनाव के सुचारू रूप से संचालित किया जा सकेगा।

13. शाहीन बाग फैसले का पुनरावलोकन: अधिकार अपनी जगह, पर सड़क कब्जाना गलत
हाई कोर्ट की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से शाहीन बाग फैसले का हवाला देकर विरोध प्रदर्शन को संवैधानिक अधिकार बताया गया, जिस पर जस्टिस अमित महाजन ने तुरंत स्पष्ट किया कि अधिकार अपनी जगह हैं, लेकिन पूरे शहर को बंधक नहीं बनाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट पहले भी यह साफ कर चुका है कि अनिश्चितकाल के लिए सार्वजनिक रास्तों को घेरना कानूनन गलत है। सरकार का यह स्पष्ट रुख है कि किसी भी नागरिक या समूह के अधिकार का दायरा वहीं खत्म होता है जहां से दूसरे नागरिक के शांति से जीने का अधिकार शुरू होता है।

14. जनविरोधी राजनीति का अंत
पिछले कुछ वर्षों में देखा गया है कि किस तरह कुछ निहित स्वार्थी समूह और राजनीतिक दल अपनी जमीन तलाशने के लिए दिल्ली को अखाड़ा बना देते हैं। कभी किसान आंदोलन तो कभी नागरिकता कानून के नाम पर शहर की रफ्तार को रोकने की कोशिशें की गईं। अदालत की इन टिप्पणियों और मोदी सरकार के सख्त रवैये से यह संदेश साफ हो गया है कि अब जनहित और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा जाएगा। अराजकता फैलाने वाली राजनीति का दौर अब समाप्त हो चुका है और दिल्ली अब शांति, सुरक्षा तथा तेज विकास के नए युग में कदम रख रही है।

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