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‘कृष्णलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’….अब मथुरा में सनातन का शंखनाद, 6 दिसंबर को कारसेवा की घोषणा

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी तापमान बढ़ने से पहले ही मथुरा से निकली एक घोषणा ने आने वाले महीनों की सियासत की नई दिशा का संकेत दे दिया है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति के लिए साधु-संतों ने 6 दिसंबर को मथुरा में व्यापक कारसेवा का ऐलान किया है। यह अपने-आप में सामान्य तारीख नहीं है। यही वह दिन है जब 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराया गया था और राम मंदिर आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दिशा हमेशा के लिए बदल दी थी। अब उसी तारीख को मथुरा में कारसेवा का आह्वान बताता है कि कृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा केवल अदालत की फाइलों तक सीमित रहने वाला नहीं है। संत-महंत और कृष्ण भक्त इसे जनआंदोलन का रूप देने की तैयारी में हैं। इसी से निकला संदेश धार्मिक आस्था, न्यायिक प्रक्रिया, कानून-व्यवस्था और 2027 के विधानसभा चुनाव की राजनीति एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देगा। श्रीकृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा उत्तर प्रदेश के अगले चुनाव का बड़ा राजनीतिक ध्रुव बन सकता है।

अयोध्या में रामलला के बाद अब मथुरा के कृष्णलला की बारी
अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन ने उत्तर प्रदेश की राजनीति पर जो प्रभाव डाला, वह किसी से छिपा नहीं है। पांच सौ साल के संघर्ष के बाद रामलला का मंदिर बना। राम जन्मभूमि का मुद्दा दशकों तक राजनीतिक चिंतन के केंद्र में रहा और अंततः मंदिर निर्माण का रास्ता खुला। पीएम मोदी ने अयोध्या में मंदिर का शिलान्यास करने के बाद प्राण प्रतिष्ठा भी कराई। अब मथुरा में संतों का आंदोलन उसी भावनात्मक परंपरा को कृष्ण जन्मभूमि से जोड़ने की कोशिश करता दिखाई दे रहा है। चित्रगुप्त पीठाधीश्वर स्वामी सच्चिदानंद महाराज की ओर से पहले 9 अगस्त को कारसेवा का ऐलान किया गया था, जिसके बाद संतों की बैठक में 6 दिसंबर की तारीख तय करने का निर्णय लिया गया। मंच से कृष्ण लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे, जैसे नारे लगाए गए। इसका स्पष्ट संदेश है कि आंदोलन को केवल स्थानीय धार्मिक कार्यक्रम न रखकर देशव्यापी संत और भक्त भागीदारी से जोड़ने की कोशिश प्रचंड रहेंगी।

इसलिए है 6 दिसंबर को कारसेवा सबसे महत्वपूर्ण तारीख
श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति के लिए राधाकुंड क्षेत्र के गांव जुल्हेंदी स्थित चित्रगुप्त पीठ में साधु-संतों ने शंखनाद कर कारसेवा के लिए 6 दिसंबर की तारीख की घोषणा की। कारसेवा के लिए 6 दिसंबर का चयन राजनीतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। संतों ने स्वयं इसे अयोध्या की कारसेवा की स्मृति से जोड़कर देखा है। यानी मथुरा आंदोलन के लिए तारीख केवल कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि राम मंदिर आंदोलन की ऐतिहासिक स्मृति का प्रतीक है। यही कारण है कि 6 दिसंबर आते-आते मथुरा का मुद्दा राष्ट्रीय मीडिया, राजनीतिक दलों और सोशल मीडिया के विमर्श में तेजी से उभर सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आंदोलन कितना व्यापक होगा और कहां-कहां से कृष्ण भक्त इसमें शामिल होने आएंगे। लोकतांत्रिक व्यवस्था में धार्मिक मांग रखना और उसके लिए शांतिपूर्ण जनसमर्थन जुटाना कृष्ण भक्तों का अधिकार है। दूसरी ओर, श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद न्यायिक प्रक्रिया में भी है और इससे जुड़े मामले सर्वोच्च न्यायालय में भी सूचीबद्ध हैं। कोर्ट अपना काम करेगा और कृष्णभक्त कारसेवा कर अपना आंदोलन करेंगे।

संतों की चार मांगें और न्यायपालिका पर बढ़ता दबाव
संतों की ओर से राष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश के नाम ज्ञापन भेजने की बात भी कही गई है। इसमें श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद का शीघ्र निपटारा, 1991 के Places of Worship Act को समाप्त करने, जन्मभूमि पर पूजा-अर्चना से संबंधित मांगों तथा पुरातात्विक सर्वेक्षण से जुड़ी रोक हटाने जैसी मांगें शामिल हैं। संतों का आंदोलन जितना आक्रामक राजनीतिक दबाव बनाएगा, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी आंदोलन के नेतृत्व और प्रशासन दोनों की होगी कि न्यायिक प्रक्रिया और सार्वजनिक शांति प्रभावित न हो। यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक तरफ अदालत की प्रक्रिया और संवाद चल रहा है, दूसरी तरफ आंदोलन की घोषणा हो चुकी है। इसका अर्थ यह है कि आने वाले महीनों में मथुरा के मुद्दे पर कानूनी और राजनीतिक, दोनों मोर्चों पर समानांतर विकास देखने को मिल सकता है।

सुलह वार्ता फेल, अब 18 अगस्त को फिर से होगी बैठक
इस बीच श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद में उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर दोनों पक्षों के बीच स्थानीय स्तर पर वार्ता भी हुई। लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल सका। अब इस मामले में 18 अगस्त को फिर से वार्ता की जाएगी। अधिवक्ताओं के अनुसार दोनों पक्षों ने अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (चतुर्थ) की अदालत में अपनी-अपनी दलीलें रखीं। हालांकि किसी सहमति पर नहीं पहुंचा जा सका। उन्होंने बताया कि अगर इस बार भी कोई सकारात्मक समाधान नहीं निकलता है तो मामले में उच्चतम न्यायालय से ही निर्णय की उम्मीद होगी। मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मस्थान और मंदिर परिसर स्थित शाही ईदगाह को लेकर पिछले कई साल से विवाद बना हुआ है। करीब डेढ़ दर्जन याचियों ने खुद को भगवान श्रीकृष्ण का अनन्य भक्त बताते हुए दावा किया कि शाही ईदगाह श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट के स्वामित्व वाली 13.37 एकड़ भूमि पर स्थित है। इसे हिंदू पक्ष को सौंपे जाने की मांग की गई है।

सुप्रीम कोर्ट का पूरा आदर, लेकिन अब और इंतजार नहीं कर सकते
निरंजनी अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी कृष्णा नंद ने कहा कि 6 दिसंबर की तारीख कारसेवा के लिए तय की गई है। अब हम मंदिर निर्माण के लिए इंतजार नहीं करेंगे। सुप्रीम कोर्ट का हमें पूरा सम्मान है और उसके फैसले का आदर करते हैं लेकिन अब इंतजार बहुत नहीं कर सकते। हिन्दुओं को जागृत करने के लिए हम यह सब कर रहे हैं। कोर्ट का ध्यान आकर्षित करने के लिए हम ये आयोजन कर रहें हैं। इसी दौरान महिला संत निरंजनी अखाड़ा की साध्वी इन्द्राणी नंद गिरी ने भी अपनी बातें रखी। उन्होंने कहा कि संतों ने 6 दिसंबर तारीख बहुत सोच समझ कर रखी है। इस तारीख में कई रहस्य हैं, जो आने वाले समय में सब को साफ होंगे। हम अब 500 साल का ध्यान नहीं कर सकते। हमें जल्द से जल्द श्री कृष्ण जन्मभूमि पर मंदिर चाहिए।

प्रशासन के दवाब में कार्यक्रम नहीं रुकेगाः सच्चिदानंद महाराज
इससे पहले चित्रगुप्त पीठाधीश्वर स्वामी सच्चिदानंद महाराज ने यह भी कहा कि हमारे संतों और साधुओं को प्रशासन ने रोकने का प्रयास किया है। उन्होंने बताया कि बड़ी संख्या में साधु और संत इस कार्यक्रम में शामिल हो रहे हैं। पुलिस के अधिकारी हमारे साथ गलत व्यवहार कर रहे हैं और उसकी शिकायत हमने एसएसपी से की है। प्रशासन के दबाव में कार्यक्रम रुकेगा नहीं, लेकिन जो किया जा रहा है वह बहुत गलत है। शीला कार्यक्रम के लिए जो पत्थर मंगवाए गए थे, उसको भी रात को अचानक गायब कर दिया। सीसीटीवी कैमरे से हम इसकी जांच करेंगे कि आखिर यह सब कैसे गायब कर दिया गया। इस दौरान भरतपुर के बंसी पहाड़पुर से मंगाए गए पत्थरों का शिला पूजन नहीं हो सका। चित्रगुप्त पीठाधीश्वर का दावा है कि प्रशासन द्वारा पत्थरों को इधर-उधर कर दिया गया। शंखनाद में पशुपति अखाड़ा नेपाल के श्रीकृष्णानंद महाराज, मोहिनी शरण, राधा प्रसाद, अतुल कृष्णदास, स्वामी अवधेशानंद गिरि, संतोषानंद महाराज, आचार्य बद्रीश, दशरथ दास, अभिषेक दास, सुरेशानंद महाराज, चंद्रदेव महाराज, राहुल कृष्ण गोपाल, बसंतलाल देवेंद्रानंद, शिंदे गुट शिवसेना के प्रदेश उपाध्यक्ष दीपक सक्सेना, बबलू लवानिया और मनोज सक्सेना आदि मौजूद रहे।अगले साल यूपी चुनाव और मथुरा की राजनीति में बीजेपी को बढ़त
उत्तर प्रदेश की विधानसभा का कार्यकाल 22 मई 2027 को समाप्त होना है और निर्वाचन आयोग ने चुनाव समय पर कराने की बात स्पष्ट की है। यानी अगले कुछ महीनों में चुनावी राजनीति तेजी से आकार लेने वाली है। ऐसे समय में मथुरा का मुद्दा स्वाभाविक रूप से राजनीतिक दलों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा। भाजपा इस मुद्दे से वैचारिक रूप से जुड़ी है, क्योंकि राम मंदिर आंदोलन उसकी राजनीति के लंबे इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। मथुरा का मुद्दा भाजपा के पारंपरिक हिंदुत्व समर्थक आधार को भावनात्मक रूप से और अधिक सक्रिय कर सकता है। राम मंदिर के बाद कृष्ण जन्मभूमि का प्रश्न उसी सांस्कृतिक विरासत की अगली कड़ी है, जिसे भाजपा अपनाती रही है। भाजपा के लिए मथुरा का मुद्दा एक अतिरिक्त राजनीतिक ऊर्जा पैदा कर सकता है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों के सामने अलग तरह की ही चुनौती होगी। यदि वे आंदोलन का खुलकर विरोध करते हैं तो उनके हिंदू आस्था विरोधी रूप की पोल खुल जाएगी। यदि वे आंदोलन का समर्थन करते हैं तो उनका अपना सामाजिक और राजनीतिक आधार प्रतिकूल हो जाएगा।

आइए, अब जानते हैं कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि और ईदगाह विवाद को खत्म करने के लिए जमीन से लेकर कोर्ट तक क्या-क्या प्रयास किए गए हैं…

श्रीकृष्ण जन्मभूमि-ईदगाह के विवाद को खत्म करने के लिए जुटाए साक्ष्य
वृंदावन के साथ ही श्री कृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह के विवाद को खत्म करने के लिए सनातनी हिंदू, वास्तुविद, वकील और रिसर्चर उन तमाम साक्ष्यों की खोज कर रहे हैं, जिनसे साबित हो कि मंदिर को तोड़कर यहां पर मस्जिद बनाई गई थी, जिसे अब शाही ईदगाह कहा जाता है। कोर्ट के केस के लिए एडवोकेट महेंद्र प्रताप सिंह ने कई सबूत जुटाए हैं। अल-उतबी की लिखी किताब-ए-यामिनी के साथ-साथ मथुरा गजेटियर, फ्रैंकोइस बर्नियर की लिखी ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर, वीएस भटनागर की लिखी एम्परर औरंगजेब एंड डिस्ट्रक्शन ऑफ टेंपल और अलेक्जेंडर कनिंघम की लिखी आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया किताब में भी श्रीकृष्ण जन्मभूमि का जिक्र है। इन्हें कोर्ट में बतौर सबूत पेश किया गया है।

मुगलकाल से मथुरा गजेटियर तक श्रीकृष्ण जन्मभूमि का जिक्र
साक्ष्य गवाह बने हैं कि मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सैकड़ों साल से बना हुआ है। आज से 5512 साल पहले श्रीकृष्ण भगवान मथुरा में प्रकट हुए थे। 1017 में महमूद गजनवी भारत आया और मथुरा पर बार-बार हमला किया। 9वें हमले में उसकी सेना ने शहर में लूटपाट कर मंदिर तोड़ दिया। गजनवी के साथ उसका मंत्री अल-उतबी भी था। कृष्ण मंदिर को देखकर गजनवी के मंत्री ने कहा था कि ऐसी खूबसूरत इमारत न मैंने देखी, न मेरे सुल्तान ने देखी थी। ऐसा लगता है कि इसकी तामीर फरिश्तों ने की हो। दोबारा इतनी सुंदर मंदिर बनाने में 200 साल लगेंगे। इसके मंदिर को तोड़ दिया गया। महेंद्र प्रताप के मुताबिक, ‘रिसर्च के दौरान हमने कई प्राचीनतम किताबों की स्टडी की, जिनमें मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि का रिकार्ड मिलता है। औरंगजेब ने दिया भगवान कृष्ण के मंदिरों को तोड़ने का फरमान
साकी मुस्ताद खान की किताब ‘मआसिर-ए-आलमगीरी’ में इस तथ्य का जिक्र आया है। इस किताब में औरंगजेब के 1658 से 1707 तक के शासन का इतिहास है। इसमें लिखा है- औरंगजेब ने मथुरा के केशवदेव मंदिर को ढहाने और यहां की मूर्तियों को आगरा में शाही जहांआरा बेगम साहिब मस्जिद की सीढ़ियों में लगाने का आदेश जारी किया। सिर्फ एक किताब नहीं है, ऐसी कई किताबें हैं, जिसमें औरंगजेब के श्रीकृष्ण मंदिर को ढहाने के आदेश का जिक्र है। मंदिर तोड़ने के बाद एक हिस्से में मंदिर के ढांचे पर मस्जिद बनवाई गई। इसे अब शाही ईदगाह बताया जा रहा है, लेकिन वही श्रीकृष्ण भगवान का जन्मस्थान और गर्भगृह है।’ कटरा केशव देव से मिलीं मूर्तियां और शाही ईदगाह में कमल की आकृति
सनातनी हिंदुओं का दावा है कि शाही ईदगाह में हिंदू धर्म से जुड़े कई निशान आज भी मौजूद हैं। वहां खंभों पर कमल के निशान हैं। नागराज आदिशेष की आकृति बनी है। महेंद्र सिंह के मुताबिक इसीलिए हमने सुप्रीम कोर्ट में शाही ईदगाह के एएसआई सर्वे की याचिका लगाई है। वैज्ञानिक तरीके से जांच होगी, तो पता चल जाएगा कि उस जगह मंदिर का गर्भगृह है या फिर शाही ईदगाह। इसके अलावा मथुरा के म्यूजियम में कई मूर्तियां हैं, जो श्री कृष्ण जन्मभूमि की समय-समय पर खुदाई के दौरान निकली हैं। आर्कियोलॉजी के जानकारों ने बताया भी है कि ये मूर्तियां किस वक्त की हैं। इससे साबित होता है कि यही जमीन श्रीकृष्ण जन्मस्थान है।’

आजादी से पहले 1921 में आगरा डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने जमीन मंदिर की बताई
आजादी से पहले का डिस्ट्रिक्ट कोर्ट आगरा का भी एक अकाट्य आदेश है। कोर्ट का ये आदेश 1921 का है। इसमें लिखा है कि दीवार के अंदर की विवादित जमीन मंदिर की जगह है। अंग्रेजों ने 1815 में केशव देव मंदिर नीलाम किया, तो बनारस के पटनीमल ने ये जगह ले ली थी। तभी से मुस्लिम पक्ष की तरफ से बार-बार मुकदमे किए गए। 1920 में अंजुमन इस्लामिया की ओर से मुकदमा किया गया। इस पर कोर्ट ने फैसला सुनाया कि विवादित जमीन मंदिर की है। मुस्लिम पक्ष की याचिका खारिज कर दी गई। बार-बार कोशिशों के बावजूद हर बार मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया गया। यहां तक कि इसकी खसरा खतौनी में भी ईदगाह का जिक्र नहीं है। अब तक हाउस टैक्स भी श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट ही जमा कर रहा है। ये सभी पुख्ता सबूत हैं।

133 साल में 10 मुकदमे, सभी श्रीकृष्ण जन्मभूमि के पक्ष में आए
हिंदू पक्ष के मुताबिक, 1803 में अंग्रेजों ने मराठों को हराकर मथुरा पर कब्जा कर लिया था। 1815 में अंग्रेजों ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि की जमीन की नीलामी की थी। नीलामी ने बनारस के राजा पटनीमल ने जमीन खरीद ली। 1832 से लेकर 1965 तक इस जमीन के लिए 9 मुकदमे हो चुके हैं।
पहला मुकदमा, साल: 1832
1832 में शाही ईदगाह के पक्ष में पहला मुकदमा कलेक्टर कोर्ट में दायर किया गया। इसमें कहा गया कि जमीन का सौदा रद्द किया जाए। मस्जिद का रेनोवेशन कराया जाए। लेकिन कलेक्टर ने जमीन बेचने को सही ठहराया था।
दूसरा मुकदमा, साल: 1897
1897 में अहमद शाह नाम के शख्स ने मथुरा थाने में कटरा केशवदेव के चौकीदार गोपीनाथ पर मस्जिद की जमीन पर सड़क बनाने और रोकने पर मारपीट का मुकदमा दर्ज कराया। फरवरी 1897 में मुकदमा खारिज हो गया, कोर्ट ने कहा कि शाही ईदगाह की जमीन भी राजा पटनीमल की संपत्ति है।
तीसरा मुकदमा, साल: 1920
1920 में अंजुमन इस्लामिया ने याचिका लगाई कि मस्जिद के आसपास प्रह्लाद नाम का शख्स मंदिर बनवा रहा है और ये जमीन मुस्लिमों की है। कोर्ट ने मुकदमा खारिज कर कहा कि जमीन मंदिर की है।
चौथा मुकदमा, साल: 1928
1928 में पटनीमल के वारिस राय कृष्णदास ने मोहम्मद अब्दुल्ला खां पर मुकदमा किया कि वे मस्जिद के आसपास पड़े सामान का इस्तेमाल कर रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि राय कृष्ण दास इस जमीन के मालिक हैं। मुस्लिम आसपास पड़े सामान का इस्तेमाल नहीं करेंगे।

पांचवां मुकदमा, साल: 1946
मुस्लिम पक्ष की ओर से मदन मोहन मालवीय और अन्य पर केस दर्ज कर कहा गया कि इन्हें गलत तरीके से जमीन दी गई। कोर्ट ने मदन मोहन मालवीय के पक्ष में फैसला सुनाया।

छठा मुकदमा, साल: 1955
1955 में श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट ने म्यूनिसिपल बोर्ड को गोपाल मालवीय का नाम कागजों में दर्ज करने का प्रार्थना पत्र दिया। मुस्लिम पक्ष ने इस पर आपत्ति दर्ज कराई और याचिका दायर की। एक बार फिर फैसला ट्रस्ट के पक्ष में आया।
सातवां मुकदमा, साल: 1960
1960 में श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ ने शौकत अली और अन्य पर मुकदमा दायर कर कहा कि ये सभी हमारी जमीन से नहीं हट रहे हैं। कोर्ट ने सेवा संघ के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि जो न हटे, उसकी चल अचल संपत्ति कोर्ट को सौंपी जाए।
आठवां मुकदमा, साल: 1961
1961 में शौकत अली और अन्य की तरफ से एडिशनल सिविल जज की कोर्ट में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ पर मुकदमा दायर किया गया। इसमें पिछले मुकदमे रोकने की मांग की गई।
नौंवा मुकदमा, साल: 1965
श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ ने दूसरे पक्ष पर मुकदमा दायर किया। इसमें कहा गया कि जो मुस्लिम पक्ष, मंदिर की जमीन पर किराएदार हैं और टैक्स भी जमा नहीं कर रहे हैं। फैसला श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ के पक्ष में आया।
दसवां मुकदमा, साल:1973
भगवान श्रीकृष्‍ण विराजमान कटरा केशव देव मथुरा की तरफ से याचिका दायर कर 20 जुलाई 1973 के फैसले को रद्द करने और 13.37 एकड़ कटरा केशव देव की जमीन को श्रीकृष्‍ण विराजमान के नाम घोषित किए जाने की मांग की गई थी। कहा गया है कि जमीन को लेकर दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते के आधार पर 1973 में दिया गया फैसला वादी पर लागू नहीं होगा क्‍योंकि वह पक्षकार नहीं था। इस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शाही ईदगाह ट्रस्‍ट और यूपी सुन्‍नी सेंट्रल वक्‍फ बोर्ड की याचिका को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने मथुरा के जिला जज को पूरे मामले की नई सिरे से सुनवाई का आदेश दिए हैं।

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