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अखिलेश के शासन का रिकॉर्ड कहता है कि वो दोबारा मुख्यमंत्री बनने के लायक नहीं!

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उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 का चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहा है, अखिलेश यादव की राजनीति और यूपी जैसे बड़े प्रदेश के मुखिया बनने के उनके सपने पर सवाल उठ रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है उनके पुराने शासन के रिकॉर्ड। 2012 से 2017 के बीच उनके कार्यकाल में अपराध, दंगों, कानून-व्यवस्था और प्रशासन से जुड़े कई गंभीर मामले चर्चा में रहे। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक उस दौर में यूपी में हर साल रिकॉर्ड संख्या में  आईपीसी और दंगों के मामले दर्ज हुए थे।

मैनाठेर कांड, मुजफ्फरनगर दंगे, जवाहरबाग हिंसा और अपराध से जुड़े मामलों में भी मुख्यमंत्री के तौर पर उनके काम करने के तरीके पर सवाल उठते रहे हैं। 2027 के चुनावों को लेकर ये मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है।  कि क्या अखिलेश यादव अपने पुराने शासन के रिकॉर्ड के आधार पर दोबारा उत्तर प्रदेश के मुखिया बनने के दावेदार हैं। 

कानून-व्यवस्था और पिछले शासन के रिकॉर्ड को लेकर भाजपा के राज्यसभा सांसद एवं पूर्व डीजीपी बृजलाल ने समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने संतकबीरनगर और रायबरेली की हालिया घटनाओं के साथ 2011 के मुरादाबाद मैनाठेर कांड का हवाला देते हुए सपा शासनकाल की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए। बृजलाल ने कहा है कि 2027 में चुनावी मुद्दों में कानून-व्यवस्था अहम रहेगी।

संतकबीरनगर और रायबरेली की घटनाएं

बृजलाल ने हालिया घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि संतकबीरनगर में गणेश चतुर्थी के दौरान श्रद्धालुओं के जुलूस को लेकर विवाद हुआ।

उनका कहना है कि स्थानीय सपा सांसद पप्पू निषाद ने अपनी गाड़ी रोककर लोगों को धमकाया और धर्म-कर्म पर सवाल खड़े किए, लेकिन स्थानीय रामभक्त निषाद समाज ने इसका जमकर विरोध किया।

रायबरेली  में सपा नेता की पुलिस से भिड़ंत 

बृजलाल ने रायबरेली की घटना का भी उल्लेख किया, जहां सपा जिलाध्यक्ष और पुलिस अधिकारियों के बीच विवाद हुआ था। इस दौरान पुलिस अधिकारियों से अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया और हाथापाई के हालात बन गए। यदि पुलिस ने संयम नहीं बरता होता तो स्थिति और बिगड़ सकती थी।

पहले पुलिस पर हमला करना और उसके बाद पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाकर खुद को पीड़ित बताना सपा की पुरानी रणनीति रही है।

मुरादाबाद के मैनाठेर कांड से भी उठे सवाल 

6 जुलाई 2011 को मुरादाबाद के मैनाठेर क्षेत्र में जमकर हिंसा हुई थी।  विधानसभा चुनाव से पहले अफवाह फैलने के बाद थाने और पुलिस चौकी पर हमला हुआ था और सरकारी वाहनों को आग लगा दी गई थी। तत्कालीन डीआईजी अशोक कुमार सिंह जब पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे तो उन पर भी हमला किया गया। मैनाठेर मामले में अदालत ने 16 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। 

अखिलेश सरकार पर आरोप लगे कि 2012 में सत्ता में आने के बाद डीआईजी पर हमले से जुड़े मुकदमे को वापस लेने की कोशिश की थी और कुछ अन्य मामलों में भी कार्रवाई प्रभावित की गई। घटना के दौरान डीआईजी को छोड़कर भागने वाले बर्खास्त पुलिसकर्मियों को बाद में बहाल कर मनचाही तैनाती दी गई। 

सपा शासन में कानून-व्यवस्था का बुरा हाल 

अपराधियों को लेकर अखिलेश सरकार पर लगे आरोपों की एक वजह है, मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद जैसे बाहुबलियों के साथ नरमी। उस दौर में व्यापारियों से रंगदारी वसूली, जमीनों पर अवैध कब्जे और कानून-व्यवस्था से जुड़े मामले कई संगीन मामले सामने आए थे।  

अखिलेश यादव की नाकामियों की लंबी लिस्ट

अखिलेश यादव के शासनकाल में सामने आई प्रमुख घटनाओं और विवादों पर नजर डालें तो कई ऐसे मामले मिलते हैं, जिन पर सरकार की कार्यशैली, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक क्षमता को लेकर सवाल उठते हैं। 

अखिलेश राज  में यूपी में दंगा राज: मुजफ्फरनगर दंगे पर गंभीर सवाल

मुजफ्फरनगर के 2013 के दंगे उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था के इतिहास की सबसे गंभीर घटनाओं में गिने जाते हैं। हिंसा में 60 से अधिक लोगों की जान गई और बड़ी संख्या में परिवारों को अपना घर छोड़कर राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी। इस पूरी घटना ने उस समय की अखिलेश यादव सरकार की प्रशासनिक क्षमता और दंगों से निपटने के तरीके पर गंभीर सवाल खड़े किए।

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उस दौर की तस्वीरें और रिपोर्टें आज भी यह सवाल उठाती हैं कि जब हजारों विस्थापित परिवार राहत शिविरों में मुश्किल हालात में रह रहे थे, तब सरकार की प्राथमिकता क्या थी? तत्कालीन सरकार पर राहत शिविरों को हटाने और टेंटों को गिराने को लेकर भी सवाल उठे थे। आलोचकों ने आरोप लगाया कि सरकार को दंगों के बाद पैदा हुई राजनीतिक और प्रशासनिक छवि की ज्यादा चिंता थी। 

लेकिन मुजफ्फरनगर की घटना को अखिलेश सरकार के पूरे कानून-व्यवस्था रिकॉर्ड से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

NCRB के आंकड़ों में उत्तर प्रदेश में अलग-अलग वर्षों में दंगों के बड़ी संख्या में मामले दर्ज हुए। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2012 में 227, 2013 में 247, 2014 में 242 और 2015 में 219 दंगे दर्ज किए गए।

यही वह दौर था जब उत्तर प्रदेश में शासन, पुलिस प्रशासन और हिंसा पर नियंत्रण को लेकर लगातार बहस होती रही। सवाल सिर्फ यह नहीं था कि दंगा क्यों हुआ, बल्कि यह भी था कि सरकार हिंसा को समय रहते रोकने, पीड़ितों को सुरक्षित रखने और विस्थापित परिवारों को सम्मानजनक राहत देने में कितनी प्रभावी रही।

जवाहर बाग कांड: अखिलेश सरकार पर बड़ा सवाल

मथुरा के जवाहर बाग में करीब 280 एकड़ सरकारी जमीन पर वर्षों तक अवैध कब्जा रहा। 2 जून 2016 को कब्जा हटाने पहुंची पुलिस टीम पर हिंसक हमला हुआ, जिसमें एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी और एसएचओ संतोष कुमार यादव समेत 24 लोगों की मौत हुई। मौके से हथियार और विस्फोटक भी बरामद हुए।

सबसे बड़ा सवाल यह था कि इतने बड़े सरकारी भूखंड पर वर्षों तक कब्जा आखिर चलता कैसे रहा? अखिलेश सरकार ने पहले से खतरे की जानकारी और चेतावनियां मिलने के बावजूद समय रहते निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं की?

घटना के बाद समाजवादी पार्टी पर आरोपियों को राजनीतिक संरक्षण देने के आरोप भी लगे। खुद तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी घटना में प्रशासनिक चूक की बात स्वीकार की थी।

सवाल यही है- अखिलेश सरकार को सब पता था तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और अगर पता नहीं था, तो इतनी बड़ी प्रशासनिक विफलता की जिम्मेदारी किसकी थी?

2016 का बुलंदशहर हाईवे कांड से शर्मसार हुआ यूपी 

अलीगढ़-गाजियाबाद हाईवे पर मां-बेटी के साथ सामूहिक दुष्कर्म और लूटपाट की इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। यह मामला कितना संगीन था, इसका पता इसी से चलता है कि मामले के पांच दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई । 

29 जुलाई 2016 की रात परिवार कार से शाहजहांपुर जा रहा था। दोस्तपुर फ्लाईओवर के पास बदमाशों ने परिवार को बंधक बनाया और मां-बेटी के साथ दरिंदगी की। यह घटना अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल में हुई थी। घटना कितनी बड़ी थी, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि  तत्कालीन सरकार ने एसएसपी समेत 17 पुलिसकर्मियों को निलंबित किया था। 

बुलंदशहर की वह घटना सिर्फ एक आपराधिक वारदात नहीं थी। उसने उस दौर की कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े किए थे। 

पत्रकार को जिंदा जलाया, मरते हुए मंत्री का नाम लिया 

शाहजहांपुर के पत्रकार जगेंद्र सिंह की मौत ने 2015 में उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार और पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। 1 जून 2015 को घर में आग लगाए जाने के बाद गंभीर रूप से झुलसे जगेंद्र सिंह की 8 जून को इलाज के दौरान मौत हो गई। उनके परिवार ने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों और कुछ लोगों ने उन पर हमला कर आग लगाई।

जगेंद्र सिंह ने सोशल मीडिया और अपने लेखों के जरिए तत्कालीन मंत्री राममूर्ति वर्मा से जुड़े कथित जमीन कब्जे और अन्य मामलों को उठाया था। उनकी मौत के बाद परिवार की शिकायत पर मंत्री समेत छह लोगों के खिलाफ हत्या, धमकी और साजिश जैसी धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया।

माइनिंग माफिया के आगे अखिलेश का सरेंडर 

दो हफ्ते में पलटा फैसला: पहले बर्खास्त, फिर अखिलेश सरकार में वापस आए गायत्री प्रजापति।

उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल में मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति को लेकर सितंबर 2016 में घटनाक्रम तेजी से बदला। अवैध खनन को लेकर गंभीर आरोपों और इलाहाबाद हाईकोर्ट के CBI जांच के आदेश के बाद 12 सितंबर 2016 को उन्हें मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया गया।

लेकिन बर्खास्तगी के महज दो सप्ताह बाद ही 26 सितंबर को प्रजापति की दोबारा कैबिनेट में वापसी हो गई। उन्होंने राजभवन में मंत्री पद की शपथ ली।

अखिलेश सरकार में UPPSC पर करप्ट प्रैक्टिस के आरोप 

अखिलेश यादव सरकार के कार्यकाल में UPPSC अध्यक्ष बनाए गए अनिल कुमार यादव की नियुक्ति को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2015 में रद्द कर दिया था। अदालत ने चयन प्रक्रिया में जरूरी जांच और उम्मीदवार की उपयुक्तता पर पर्याप्त विचार नहीं किए जाने को गंभीर माना।

मामले में सामने आया कि अध्यक्ष पद के लिए 83 बायोडाटा आए थे। याचिकाकर्ताओं ने यादव की पृष्ठभूमि की जांच पर सवाल उठाए। उनके चरित्र सत्यापन को लेकर भी आपत्ति हुई। रिपोर्ट के मुताबिक यह एक ही दिन में, रविवार को पूरा किया गया था।

याचिका में यह आरोप भी लगाया गया कि यादव का बायोडाटा समाजवादी पार्टी कार्यालय से फैक्स के जरिए सरकार तक भेजा गया था। हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 316 के तहत नियुक्ति प्रक्रिया की समीक्षा करते हुए उनकी नियुक्ति निरस्त कर दी।

UPPSC जैसे संवैधानिक भर्ती संस्थान के अध्यक्ष की नियुक्ति रद्द होना अखिलेश सरकार के कामकाज के तरीके पर एक बड़ा सवाल था। 

नोएडा के चीफ इंजीनियर यादव सिंह का भयंकर भ्रष्टाचार

नोएडा के तत्कालीन चीफ इंजीनियर यादव सिंह पर आय से अधिक संपत्ति और बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। नवंबर 2014 में आयकर छापों के दौरान करोड़ों रुपये की नकदी, सोना और हीरे बरामद होने की बात सामने आई। इसके बाद यूपी सरकार ने 8 दिसंबर 2014 को उन्हें निलंबित कर दिया।

16 जुलाई 2015 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सीबीआई जांच का आदेश दिया। अखिलेश यादव सरकार इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची, लेकिन 7 अगस्त 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी और सीबीआई जांच को उचित ठहराया।

यादव सिंह प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यही था कि जब मामला इतना गंभीर था, तो राज्य सरकार सीबीआई जैसी केंद्रीय एजेंसी से जांच कराने के पक्ष में क्यों नहीं थी? हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद आखिरकार जांच सीबीआई को ही करनी पड़ी।

यूपी के बुंदेलखंड में पानी को तरसे लोग

2015 में बुंदेलखंड सूखे और पानी की कमी से बुरी तरह प्रभावित था। यूपी सरकार के अपने दस्तावेज के अनुसार, फरवरी-मार्च 2015 में प्रदेश के 73 जिले, खासकर बुंदेलखंड, ओलावृष्टि से प्रभावित हुए और इसके बाद सूखे की स्थिति बनी।

साल के अंत तक बुंदेलखंड में हालात और बिगड़ गए। खराब मानसून के कारण लोगों और पशुओं के सामने पीने के पानी और भोजन का संकट खड़ा होने की रिपोर्टें सामने आईं।

यानी 2015 में बुंदेलखंड पानी और सूखे के गंभीर संकट से जूझ रहा था, जबकि राज्य सरकार के सामने राहत और दीर्घकालिक जल प्रबंधन की कोई तैयारी नहीं थी। 

यूपी में साढ़े चार मुख्यमंत्रियों की सरकार

2012 से 2015 के बीच मुलायम सिंह यादव का सार्वजनिक रूप से अखिलेश को फटकारना चर्चा में रहा। चाचा शिवपाल के पास भी मजबूत सत्ता-केंद्र था, रामगोपाल यादव की भी पार्टी में बड़ी भूमिका थी और आजम खान का अपना प्रभाव था। ऐसे में सवाल उठता है कि मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश की अपनी निर्णायक भूमिका कहां थी? क्या जनता को पांच साल का शासन एक प्रयोग के तौर पर दिया गया था?

2012 में सत्ता मिलते ही कई जगह हिंसा, तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाओं की खबरें सामने आईं। अगर अखिलेश उस चुनावी जीत का श्रेय अपनी रणनीति और नेतृत्व को देते हैं, तो फिर शासन की विफलताओं की जिम्मेदारी से दूरी क्यों?

सवाल बड़ी घटनाओं और कानून-व्यवस्था के रिकॉर्ड का भी है। सरकार का असली आकलन इस बात से भी होता है कि आम नागरिक कितना सुरक्षित महसूस करता है और प्रशासन संकट के समय कितना प्रभावी साबित होता है।

अखिलेश के झांसे में नहीं आने वाले यूपी के लोग

अखिलेश यादव के 2012-2017 के कार्यकाल का रिकॉर्ड कानून-व्यवस्था, दंगों, प्रशासनिक फैसलों, भ्रष्टाचार के आरोपों और कई बड़े विवादों से जुड़े सवालों से भरा रहा। मुजफ्फरनगर दंगे से लेकर जवाहरबाग, बुलंदशहर, यादव सिंह प्रकरण, गायत्री प्रजापति की वापसी और UPPSC नियुक्ति जैसे मामलों ने सरकार की कार्यशैली और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े किए।

2027 में फिर यूपी की जनता से जनादेश मांगने को लेकर लोग अखिलेश यादव से सवाल कर रहे हैं। क्योंकि उनकी नजर वादों के साथ समाजवादी पार्टी के पिछले कुशासन पर भी है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि अखिलेश यादव क्या नया करने का वादा करते हैं, बल्कि यह भी है कि उनके पिछले कार्यकाल से क्या सबक मिलता है। 

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