एक्ट्रेस स्वरा भास्कर एक बार फिर से विवादित बयान को लेकर चर्चा में हैं। हाल ही में स्वरा भास्कर पति फहाद अहमद के साथ एक पॉडकास्ट में कहा कि 2019 के अयोध्या मामले में राम जन्मभूमि को लेकर फैसला आया था तो ‘मैं बहुत ज्यादा अपसेट थी। जब ये वर्डिक्ट आया क्योंकि मुझे लगा कि ये अनफेयर हुआ है।’ तब मैंने आमिर खान, शाहरुख खान, सलमान खान से लेकर फहाद तक अपने मुस्लिम दोस्तों को मेसेज भेजकर कहा कि मुझे बहुत दुख हुआ है और मुझे बहुत शर्म आ रही है और मैं इस फैसले पर शर्मिंदा हूं और सहमत नहीं हूं।’ अपने घटिया बयान से वह लोगों के आक्रोश का शिकार हो रही हैं। इससे पहले भी स्वरा भास्कर जौहर की बलात्कार के तुलना कर चुकी हैं। तब भी लोगों ने उन्हें काफी भला-बुरा कहा था। अब स्वरा की इन बातों को लेकर लोगों में एक बार फिर उनके खिलाफ गुस्सा नजर आ रहा है। लोगों ने कहा है- आपको सुर्खियों में रहने के लिए कुछ भी कहना है, तब भी आपको फिल्म नहीं मिलने वाली। वहीं एक यूजर ने कहा- आपको लेकर हमें शर्मिंदगी महसूस होती है।
🚨 स्वरा भास्कर ने खुलासा किया – राम जन्मभूमि फैसले से इतनी परेशान थीं कि फोनबुक में मौजूद हर मुस्लिम सेलिब्रिटी को मैसेज किया।
आमिर खान, शाहरुख खान, सलमान खान… सबको।
“एक हिंदू होने के नाते माफ करना, मुझे शर्म आ रही है। मैं इस फैसले से सहमत नहीं हूँ।”सुप्रीम कोर्ट का… pic.twitter.com/Mz1DM3pMFM
— Ms.Bhumi (@ibmindia20) September 18, 2026
आमिर, शाहरुख, सलमान और फहाद अहमद को संदेश भेजे
अभिनेत्री स्वरा भास्कर का 2019 के अयोध्या फैसले को लेकर दिया गया हालिया बयान एक बार फिर बहस के केंद्र में है। द मिडनाइट ऑवर के पॉडकास्ट में उन्होंने याद किया कि 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने पर वह बेहद परेशान थीं। उन्हें यह फैसला “अनफेयर” लगा और उन्होंने अपने मुस्लिम मित्रों में शामिल आमिर खान, शाहरुख खान, सलमान खान और फहाद अहमद को संदेश भेजकर कहा कि एक हिंदू होने के नाते उन्हें “बहुत शर्म” आ रही है। वह इस फैसले से सहमत नहीं हैं। यहां सवाल उस असहमति से आगे जाकर उस शब्दावली का है, जिसमें देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले पर एक हिंदू के रूप में “शर्म” महसूस करने की बात कही गई।
स्वरा की सोच लेफ्ट लिबरल गैंग वाली खतरनाक सोच है
अयोध्या का फैसला किसी राजनीतिक दल की सभा में लिया गया निर्णय नहीं था। यह दशकों पुराने संपत्ति और धार्मिक दावे से जुड़े विवाद पर भारत की सर्वोच्च अदालत की पांच सदस्यीय संविधान पीठ का सर्वसम्मत निर्णय था। अदालत ने विवादित 2.77 एकड़ भूमि पर राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ किया और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को मस्जिद के लिए पांच एकड़ वैकल्पिक भूमि देने का निर्देश दिया। ऐसे में किसी नागरिक का यह कहना कि उसे फैसला पसंद नहीं आया, लोकतांत्रिक असहमति है। लेकिन उसी फैसले के कारण अपने हिंदू होने पर शर्म महसूस करने की अभिव्यक्ति, बहुत बड़ा सांस्कृतिक और सामाजिक सवाल खड़ा करती है। स्वरा की सोच लेफ्ट लिबरल गैंग वाली खतरनाक सोच है। यही वह बिंदु है जहां स्वरा भास्कर के बयान को केवल “एक अभिनेत्री की निजी राय” कहकर आगे बढ़ जाना पर्याप्त नहीं है।
देवी देवताओं का अपमान करने वाली स्वरा भास्कर हिंदू कैसे…???
बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने सुप्रीम कोर्ट के 2019 के राम जन्मभूमि-अयोध्या फैसले पर निराशा जताई है और कहा है कि उन्हें एक हिंदू होने के नाते इस फैसले पर शर्मिंदगी महसूस हुई थी।
वीडियो दैनिक भास्कर साभार pic.twitter.com/FL7pjKuQEL
— Dilip Kumar Singh (@DilipKu24388061) September 18, 2026
राम जन्मभूमि कोई अचानक पैदा हुआ विवाद नहीं था
अयोध्या विवाद भारत के सबसे लंबे चले न्यायिक विवादों में से एक था। 2019 का फैसला किसी एक दिन की राजनीतिक घोषणा नहीं था, बल्कि अदालत के सामने रखे गए दावों, दस्तावेजों और साक्ष्यों की लंबी न्यायिक प्रक्रिया का परिणाम था। सर्वोच्च न्यायालय ने विवादित भूमि पर राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि देने के साथ मुस्लिम पक्ष के लिए वैकल्पिक भूमि का भी निर्देश दिया। ऐसे में फैसले से असहमति रखने वाला व्यक्ति अपने तर्क सामने रख सकता है, लेकिन उसे केवल बहुसंख्यक समुदाय की हार-जीत के चश्मे से देखना उस जटिल न्यायिक प्रक्रिया को बहुत छोटा कर देता है। असहमति का अर्थ यह नहीं कि किसी समुदाय के मित्रों के सामने अपने ही धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान के लिए क्षमा मांगी जाए। स्वरा का कथन इसलिए चर्चा में है क्योंकि उन्होंने केवल यह नहीं कहा कि उन्हें फैसला गलत लगा; उन्होंने इसे अपने हिंदू होने से जोड़ते हुए “सॉरी” और “शेम्ड” होने की बात कही।
Jaipur, Rajasthan: Reacting to actress Swara Bhaskar’s statement, BJP State President Madan Rathore says, “Just look at how absurd this is, that these people have the audacity to demand an apology for the construction of Ram’s temple in Hindustan, as if a wrong has been done.… pic.twitter.com/LJOgGGCBVw
— IANS (@ians_india) September 18, 2026
‘मैं हिंदू हूं, इसलिए शर्मिंदा हूं’ पर इसलिए खड़े हुए सवाल
स्वरा के बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा “मैं हिंदू हूं” और “मुझे शर्म आ रही है” के बीच बनाया गया संबंध है। किसी अदालत के फैसले से असहमति को अपनी धार्मिक पहचान से जोड़कर शर्म की भाषा में व्यक्त करना स्वाभाविक रूप से यह सवाल पैदा करता है। आखिर शर्म किस बात की थी? अदालत के निष्कर्ष से, उस ऐतिहासिक विवाद से, या राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के पक्ष में आए फैसले से? यदि आपत्ति न्यायिक तर्क पर थी तो उस तर्क की आलोचना की जा सकती थी। लेकिन जब असहमति को अपनी धार्मिक पहचान के प्रति अपराधबोध जैसी भाषा में व्यक्त की जाए तो बहस न्याय से हटकर पहचान और आत्मग्लानि की ओर चली जाती है।
ये सुअर भैंस को हिंदू होकर राम मंदिर के फैसले पर शर्मिंदगी, दुख और अफसोस… और फिर मुस्लिम दोस्तों को मैसेज करके अपनी “पीड़ा” सुनाना! 🤬
ये कैसी घटिया दोमुंही मानसिकता है?
अपने ही समाज की आस्था पर थूकना और फिर उसी समाज के खिलाफ खड़े लोगों के सामने सहानुभूति बटोरना।
बाहर वालों…
— Santosh Jha (@jhasoft) September 18, 2026
राम मंदिर पर शर्म नहीं, इतिहास को समझने की जरूरत
अयोध्या का फैसला भारतीय इतिहास के सबसे संवेदनशील विवादों में से एक के न्यायिक समाधान का हिस्सा था। उस फैसले के बाद मंदिर निर्माण हुआ और आज राम मंदिर भारतीय सार्वजनिक जीवन की वास्तविकता है। किसी को इससे प्रसन्नता हो सकती है, किसी को असहमति हो सकती है, लेकिन किसी भी पक्ष को दूसरे की धार्मिक पहचान को अपराधबोध में बदलने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। यही बात स्वरा भास्कर के बयान पर भी लागू होती है। अयोध्या पर असहमति हो सकती है, फैसले की कानूनी व्याख्या पर बहस हो सकती है और इतिहास के अलग-अलग पाठ भी हो सकते हैं। लेकिन “मुझे फैसला गलत लगा” और “एक हिंदू होने के नाते मुझे शर्म आई” के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है। राम मंदिर पर शर्म नहीं, स्वरा को इतिहास को समझने की जरूरत है।
स्वरा के खिलाफ एक्स पर तीखी प्रतिक्रियाओं की बाढ़
स्वरा भास्कर के बयान के सामने आने के बाद एक्स पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई यूजर्स ने इस बात पर सवाल उठाया कि जिस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से सुनाया, उसके बाद एक हिंदू के तौर पर “शर्मिंदा” महसूस करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी। एक यूजर ने तंज कसते हुए लिखा—“उन्हें राम जन्मभूमि के फैसले पर दुख हुआ, हमें स्वरा के लिए दुख है। उन्होंने एक कोर्ट का आदेश देखा, हमने राम को देखा।” एक अन्य टिप्पणी में सवाल किया गया कि क्या स्वरा के मुस्लिम मित्रों ने उनसे ऐसी सहानुभूति मांगी थी और क्या उन्होंने कभी किसी मस्जिद के निर्माण पर किसी गैर-मुस्लिम को इसी तरह शर्मिंदा होते देखा है। कुछ यूजर्स ने यह भी लिखा कि हिंदुओं को राम मंदिर पर शर्म नहीं, बल्कि गर्व है। हालांकि सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने स्वरा के विचार रखने के अधिकार का समर्थन भी किया। यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि एक्स पर लिखी गई ये टिप्पणियां व्यक्तिगत प्रतिक्रियाएं हैं, पूरे समाज की राय का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं।
जौहर पर सवाल से पहले इतिहास जानना जरूरी
इससे पहले स्वरा भास्कर ने बलात्कार से तुलना करते हुए जौहर पर सवाल उठाए थे। दरअसल, जौहर पर सवाल उठाने से पहले इतिहास जानना में बेहद जरूरी है। मध्यकालीन भारत में जिन प्रमुख जौहरों का उल्लेख मिलता है, उनमें रणथंभौर, ग्वालियर, चित्तौड़, जालौर, जैसलमेर, बुंदेलखंड, गागरोन, चंदेरी और काम्पिली (कर्नाटक) जैसे सभी प्रसंग मुस्लिम सल्तनतों या मुस्लिम शासकों के सैन्य आक्रमणों और किलों की घेराबंदी से जुड़े हैं। इन घटनाओं में जौहर करने वाली महिलाएं मुख्यतः हिंदू और राजपूत समाज से थीं। रणथंभौर में अलाउद्दीन खिलजी के सामने हम्मीरदेव की सेना का साका और जौहर, चंदेरी के खिलाफ बाबर का युद्ध, चित्तौड़ में अलाउद्दीन खिलजी और बाद में अकबर के आक्रमण जैसे की भयावह अध्याय इसके जीवंत उदाहरण हैं। इतिहास में नारीशक्ति की वीरता, साहस, संयम, त्याग, धैर्य और युद्ध कौशल की अनगिनत मिसाल हैं। इसलिए जौहर और बलात्कार को एक ही सामाजिक तराजू में तौलना न तो इतिहास के साथ न्याय है, न ही नारीशक्ति के साथ इंसाफ है। स्वरा अपने बयान पर चौतरफा घिरीं तो माफी भी मांग ली थी।
आक्रांताओं की अमानवीय क्रूरता के आगे स्वाभिमान का सर्वोच्च संकल्प
मध्यकालीन दौर में कोई आधुनिक न्याय प्रणाली, पुलिस, अदालत या मानवाधिकार आयोग नहीं था जो आक्रांताओं के हमलों के समय महिलाओं और बच्चों की रक्षा कर सके। उस बर्बर कालखंड में बंदी बनाई जाने वाली स्त्रियों को बाजार में बेचे जाने और जीवन भर अमानवीय क्रूरता का सामना करने का संकट रहता था। ऐसी भयावह परिस्थितियों में दासता और हरम की क्रूरता स्वीकार करने के बजाय देह त्याग का निर्णय लेना कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि अपने आत्मसम्मान और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का चरम संकल्प था। आधुनिक युग के वातानुकूलित कमरों में बैठकर सदियों पुरानी युद्धकालीन विवशताओं और बलिदानों को ‘कायरता’ करार देना केवल ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ना-मरोड़ना है।
स्वरा भास्कर ऐसा प्रतीत करा रही हैं जैसे जौहर करने वाली महिलाएँ वो बलात्कार पीड़िताएँ थीं, जो अपने घर को लौटकर कोने में विचार कर रही थीं कि चलो मर जाया जाए।
पुलिस ने अपराधियों को पकड़ लिया, इधर पीड़िताओं की काउंसिलिंग हो गई, फिर अदालत ने बलात्कारियों को सज़ा दे दी और सरकार ने…
— Anupam K. Singh (@AnupamNawada) September 2, 2026
2026 के भारत की 1303 के चित्तौड़ से बेतुकी तुलना: विपक्ष की समझ पर करारा वार
ऐतिहासिक बलिदानों को विकृत करने की इस वामपंथी कोशिश पर भाजपा नेता शहजाद पूनावाला ने सीधा प्रहार करते हुए इसे विपक्ष की समझ का दिवालियापन करार दिया। आज के एक लोकतांत्रिक और संवैधानिक राष्ट्र की तुलना 1303 के घिरे हुए चित्तौड़ से करना केवल राहुल गांधी और उनके समर्थक इकोसिस्टम की सतही समझ का परिचायक है। आज महिलाओं के पास संविधान, पुलिस और अदालतों की व्यवस्था है, जबकि उस मध्ययुगीन दौर में अलाउद्दीन खिलजी जैसे दरिंदे ने एक ही दिन में 30,000 हिंदुओं को सूखी घास की तरह काट डाला था। ऐसी भयावह स्थिति में 800 से अधिक राजपूत वीरांगनाओं के सामने बंदी बनाए जाने, दासी बनने और आजीवन अमानवीय अत्याचार सहने के खतरे के अलावा कोई विकल्प नहीं था। आधुनिक दौर के विशेषाधिकारों में बैठकर उस ऐतिहासिक पीड़ा और विवशता को आज के संदर्भ में तौलना न केवल अज्ञानता की पराकाष्ठा है, बल्कि वीरांगनाओं के अदम्य साहस का जानबूझकर किया गया घोर अपमान है।
SWARA BHASKAR AB BAS KAR
ISLAMIST SWARA’S JAUHAR ARGUMENT BUSTED
You cannot erase Khilji’s conquest, captivity and brutality—and then put the Hindu women of Chittor on trial.
I demolish Swara’s context-free false equivalence: stop judging the victims while sanitising the… pic.twitter.com/uwsKi0LLun
— Shehzad Jai Hind (@Shehzad_Ind) September 1, 2026
चौतरफा घिरने पर अनुवाद का बहाना: बैकफुट पर आते ही सफाई का नया पैंतरा
अभिनय की दुनिया से लंबे समय तक दूर रहने के बाद अचानक ऐतिहासिक मुद्दों पर विवादास्पद बयान देकर चर्चा बटोरने की कोशिश जब उल्टी पड़ गई, तो बचाव में लीपापोती का दौर भी शुरू हो गया। 31 अगस्त को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान 2018 की फिल्म ‘पद्मावत’ के जौहर दृश्य पर की गई अमर्यादित टिप्पणी पर जब राष्ट्रव्यापी आक्रोश भड़का, तो अभिनेत्री ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर खुद को निर्दोष बताने का प्रयास किया। अभिनेत्री का दावा है कि उनके बयान का गलत अनुवाद किया गया और उन्होंने वीरांगनाओं को सीधे तौर पर ‘कायर’ नहीं कहा था, बल्कि फिल्म देखते समय अपने व्यक्तिगत विचारों को साझा किया था। किंतु जागरूक समाज इसे अपनी चूक छिपाने और बैकफुट पर आने के बाद गढ़ी गई एक सोची-समझी दलील मान रहा है।
अभिव्यक्ति की आड़ में सनातनी इतिहास को लांछित करने का एजेंडा
अपने स्पष्टीकरण में अभिनेत्री यह कहती नजर आईं कि फिल्म का दृश्य देखते समय उन्हें ऐसा आभास हुआ कि यदि कोई अपराध पीड़िता आत्महत्या नहीं करती तो क्या वह कायर कहलाएगी। किंतु सवाल यह उठता है कि वर्तमान समय में अपराध पीड़िताओं के जीवन के अधिकार और पुनर्वास के संवेदनशील विषय को सदियों पुराने युद्धकालीन जौहर से जोड़कर भ्रम पैदा करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी? जब फिल्म रिलीज हुए कई वर्ष बीत चुके हैं और हिंदू समाज शताब्दियों पहले ऐसी प्रथाओं से आगे निकल चुका है, तब जबरन इस विमर्श को खींचना यह सिद्ध करता है कि मकसद अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास की महान वीरांगनाओं के त्याग को कमतर आंकना और सस्ती लोकप्रियता के लिए विवाद को जिंदा रखना था।
स्वरा भास्कर की बात पर लड़ाई ये नहीं है कि सर्वाइवर जिए या न जिए।
लड़ाई ये है कि 700 साल पहले की मजबूरी को आज के कमरे से “कायरता” कह दिया गया।
दोनों बातें एक नहीं हैं।
फर्क समझो।
आज रेप के बाद जीना हक है — ये बात सही है।
जौहर युद्ध हारने के बाद गुलामी और हरम से बचने का आखिरी… pic.twitter.com/Dyd3dMs51D— 𝙰𝚗𝚊𝚗𝚍 𝚜𝚑𝚊𝚛𝚖𝚊🇮🇳 (@anandsh04294243) September 2, 2026
चुनावी मंच से मजहबी कार्ड: वोट बैंक के लिए सीधे जनभावनाओं को भड़काया
सोशल मीडिया पर आलोचक स्वरा भास्कर के राजनीतिक रुख और बयानों की निष्पक्षता पर लगातार गंभीर सवाल उठा रहे हैं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान अपने पति के समर्थन में आयोजित एक जनसभा में उन्होंने सीधे तौर पर मजहबी कार्ड खेलते हुए भीड़ को उकसाने वाले मुद्दों को चुनावी केंद्र में ला खड़ा किया था। मंच से भाषण देते हुए उन्होंने कहा था कि पैगंबर के सम्मान के लिए किसी विशेष जाति में पैदा होना जरूरी नहीं है, और ‘नबी की शान में गुस्ताखी’ जैसे संवेदनशील विषयों को उठाकर पूछा था कि ऐसे मामलों पर लोगों का ईमान कहां चला जाता है। एक तरफ जहां सनातन धर्म की ऐतिहासिक परंपराओं, त्याग और वीरांगनाओं के शौर्य पर प्रगतिशीलता का चोला ओढ़कर कटाक्ष किए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ चुनावी रैलियों में वोट बैंक को साधने और लोगों को भड़काने के लिए खुलेआम धार्मिक कट्टरता से जुड़े संवेदनशील नैरेटिव का सहारा लिया जाता है। यह रुख तथाकथित लिबरल खेमे के दोहरे चरित्र को पूरी तरह उजागर करता है।
हरम की घिनौनी दासता ठुकराकर चुना गरिमायुक्त आत्मबलिदान
जीवन जीने और गरिमायुक्त जीवन जीने के बीच एक गहरा अंतर होता है। मध्यकालीन युद्धों के दौरान जब पराजय तय दिखती थी, तब स्त्रियों के सामने केवल दो ही रास्ते बचते थे—या तो वे आक्रांताओं के हरम में जाकर दास बनकर घुट-घुट कर जिएं, या फिर अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान दे दें। आज के समय में किसी अपराध पीड़िता को न्याय, गरिमा और पुनर्वास का पूर्ण अधिकार है, किंतु सात सौ वर्ष पूर्व युद्ध हारने के बाद दासता से बचने के उस अंतिम ऐतिहासिक निर्णय को वर्तमान अपराधों से जोड़ना पूरी तरह अनुचित है। जब तक उस दौर की अमानवीय हिंसा और आक्रांताओं के अत्याचारों पर बात नहीं होगी, तब तक केवल बलिदान देने वाली नारियों के निर्णय पर सवाल उठाना एकतरफा और पूर्वाग्रह से ग्रसित सोच को दर्शाता है।
जौहर पर स्वरा भास्कर के बयान को लेकर बहस तेज
नई दिल्ली: स्वरा भास्कर के जौहर पर दिए एक पुराने बयान को लेकर सोशल मीडिया पर फिर बहस छिड़ गई है।
इस पर राजवीर सर ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “स्वरा जैसी महिलाओं की बुद्धि पर तरस आता है, जो कहती हैं कि यदि मैं पद्मिनी की जगह होती तो… pic.twitter.com/4xpotl7bf8
— Ajeet Bharti YouTube (@NijiSachiv) September 1, 2026
वीरांगनाओं के आत्मनिर्णय पर सवाल उठाकर तार-तार हुआ ‘माय चॉइस’ का ढोंग
तथाकथित आधुनिक फेमिनिज्म का सबसे बड़ा नारा रहा है कि स्त्री के शरीर और उसके निर्णयों पर केवल उसी का संप्रभु अधिकार है। किंतु जब चित्तौड़ की वीरांगनाओं द्वारा आक्रांताओं की क्रूर दासता स्वीकार न करते हुए अपनी मर्जी से देह त्याग करने का प्रसंग आता है, तो यही लिबरल वर्ग उस निर्णय को ‘कायरता’ कहकर नकारने लगता है। यदि किसी महिला का अपनी गरिमा के लिए स्वयं निर्णय लेना उसकी सर्वोच्च एजेंसी है, तो फिर इन वीरांगनाओं के आत्मनिर्णय का उपहास क्यों उड़ाया जा रहा है? यह दोहरापन साबित करता है कि आधुनिक फेमिनिज्म का यह वर्ग केवल सनातन विरोध और सिलेक्टिव नैरेटिव गढ़ने के लिए अपने ही तय किए गए सिद्धांतों की धज्जियां उड़ाने से नहीं हिचकता।
केसरिया बाना और अग्नि समाधि: योद्धा संस्कृति के संयुक्त महासंकल्प पर चोट
इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाले अक्सर जौहर को एक एकाकी घटना के रूप में दिखाने की भूल करते हैं, जबकि वास्तविकता में जौहर और साका एक ही सिक्के के दो पहलू थे। जब किले के बाहर विशाल आक्रांता सेना से अंतिम सांस तक लड़ने के लिए योद्धा केसरिया बाना पहनकर ‘साका’ करने रणभूमि में उतरते थे, तब महिलाएं पीछे से अग्नि समाधि लेकर ‘जौहर’ करती थीं। यह एक सुविचारित सामरिक संकल्प था ताकि रणभूमि में लड़ रहे योद्धाओं का ध्यान पीछे छूटे परिजनों की सुरक्षा से न भटके और वे बिना किसी समझौते के अंतिम दम तक शत्रु का संहार कर सकें। इस महान संयुक्त बलिदान को कायरता कहना भारतीय योद्धा संस्कृति और मातृशक्ति के पराक्रम का खुला अपमान है।
नारी जद जौहर करे, नर देवड़ सिर होड़…
मरणो अठे मसखरी, यो मेवाड़ी चित्तौड़…हे महिषी स्वरा भास्कर… तुम इन लोकोक्तियों का अर्थ कभी नही समझ सकती..
न तो तुमको जौहर के इतिहास की पर्याप्त जानकारी है और न ही साका की परंपरा की…. दुर्भाग्य यह है कि इन विषयों को समझने की इच्छा भी… pic.twitter.com/2JhZ39aTZ6
— Oc updates (@ocjain4) September 2, 2026
60 रानियों ने अपने हाथों काटे शीश: डीग का वो जौहर जो इतिहास में अमर हुआ
भारत का इतिहास केवल चित्तौड़ तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वाभिमान की रक्षा के लिए दिया गया देश का अंतिम जौहर भरतपुर के जाट साम्राज्य की अमिट वीरता का साक्षी है। 30 अप्रैल 1776 को डीग के महल में घटी यह ऐतिहासिक घटना मातृशक्ति के सर्वोच्च पराक्रम को दर्शाती है। दिल्ली के वजीर नजफ खां की सेना द्वारा सात महीने तक डीग किले की घेराबंदी के बाद जब विपरीत परिस्थितियां बनीं, तब जाट साम्राज्य की 60 रानियों और दासियों ने मुग़ल आक्रांताओं के समक्ष घुटने टेकने या उनकी दासता स्वीकार करने के बजाय अपने हाथों से अपने शीश काटकर स्वाभिमान की वेदी पर न्योछावर कर दिए। महाराजा सूरजमल की वीर परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इन वीरांगनाओं ने यह सिद्ध किया कि भारतीय नारी के लिए आत्मसम्मान और सांस्कृतिक मर्यादा से बढ़कर कुछ भी नहीं था। ऐसे अद्वितीय और रोंगटे खड़े कर देने वाले बलिदान को आज के आधुनिक चश्मे से कायरता कहना समूचे राष्ट्र के गौरवशाली इतिहास और मातृशक्ति के पराक्रम पर सीधा प्रहार है।
क्या भगत सिंह की शहादत भी कायरता थी? प्राण से ऊपर स्वाभिमान का राष्ट्रधर्म
यदि प्राण बचाना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य होता, तो सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को गले न लगाया होता। क्या सीमाओं पर मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले भारतीय सेना के वीर जवान अपने जीवन को सबसे ऊपर रखते हैं? जिस प्रकार देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान राष्ट्रभक्ति का शिखर माना जाता है, ठीक उसी प्रकार बर्बर विदेशी आक्रांताओं के सामने घुटने न टेकते हुए अपने धर्म, कुल और अस्मिता की रक्षा के लिए देह को समर्पित कर देना अदम्य वीरता का प्रमाण है। इसे केवल शारीरिक स्तर पर तौलने वाली सोच कभी शहादत और बलिदान के मर्म को नहीं समझ सकती।
सहिष्णुता और क्या होती है?
करीब दसेक साल हो गए होंगे। हमारे देश में एक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की गई थी कि देश में सहिष्णुता नहीं रही है। असहिष्णुता एकदम से बढ़ गई है। इसके खिलाफ कोई सैकड़ो लोगों ने चिट्ठियां लिखीं और बुद्धिजीवी कहे जाने वाले अनगिनत लोगों ने अपने अवार्ड भी वापस… pic.twitter.com/sDx2a0cG2V— Arvind Chotia (@arvindchotia) September 2, 2026
खिलजी के खूनी पंजों पर पर्दा डालकर पीड़ितों को ही कठघरे में खड़ा करने की साजिश
इस पूरे विवाद में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि विमर्श की सुई आक्रांताओं की बर्बरता से हटाकर पीड़ितों के निर्णय पर केंद्रित कर दी गई है। अलाउद्दीन खिलजी जैसे मध्यकालीन हमलावरों की युद्ध संस्कृति, लूट और महिलाओं को युद्ध सामग्री की तरह इस्तेमाल करने के क्रूर इतिहास पर एक शब्द नहीं बोला जाता। इसके विपरीत, अपनी अस्मिता बचाने के लिए प्राण न्योछावर करने वाली वीरांगनाओं के चरित्र और साहस पर उंगलियां उठाई जा रही हैं। यह आक्रांताओं के इतिहास को सफेद करने और उल्टे पीड़ितों को ही दोषी ठहराने की पुरानी वामपंथी रणनीति का हिस्सा है, जिसे आज का प्रबुद्ध समाज पूरी तरह समझ चुका है।
बड़ा सवाल है??
स्वरा भास्कर अगर खिलजी के समय होती और 100-200 दरींदे जब स्वरा की तरफ दौडते तो वो खुदको जौहर करती या ऑफर करती??
इतिहास की वो घटना जो कांग्रेस ने कभी पढ़ाया ही नहीं खिलजी को बदनाम करने के लिए
जब स्वरा भास्कर को देखकर अलाउद्दीन ख़िलजी ने जौहर कर लिया🤣 pic.twitter.com/bFG0eWBmfS— Indian🇮🇳 (@singh31919) September 2, 2026
राजपूत और हिंदू अस्मिता पर हमला कर जातिगत खाई चौड़ी करने का चुनावी दांव
संसद से लेकर सड़क तक सनातन और भारतीय गौरव के प्रतीकों को निशाना बनाना विपक्ष के सोचे-समझे चुनावी खेल का हिस्सा है। मेवाड़ और राजस्थान के शौर्य को विवादित बनाकर बहुसंख्यक समाज के भीतर जातिगत आधार पर दरार डालने का प्रयास किया जा रहा है। आगामी विधानसभा चुनावों में विकास के मुद्दों पर भाजपा से सीधे मुकाबला करने में असमर्थ विपक्ष इस प्रकार के ऐतिहासिक और भावनात्मक मामलों को हवा देकर समाज को जातियों में उलझाने की फिराक में है। हालांकि, देश की जनता यह देख रही है कि कैसे एक तरफ तुष्टीकरण की राजनीति की जा रही है और दूसरी तरफ राष्ट्र की एकता को खंडित करने का प्रयास हो रहा है।
जौहर को समझने के लिए इतिहास पढ़ना पड़ता है, AC हॉल में बैठकर उस पर सस्ती पंचलाइन नहीं बनाई जा सकती।
रानी पद्मावती सहित हजारों वीरांगनाओं के साहस को ‘कायरता’ बताना इतिहास की पीड़ा, स्त्री के साहस और उस दौर की वास्तविकता तीनों का अपमान है। उनके निर्णय को आज के राजनीतिक चश्मे से जज… pic.twitter.com/BuAbye64ib
— Rohan Gupta (@rohanrgupta) September 2, 2026
मोदी के ‘पंच प्रण’ ने तोड़ी औपनिवेशिक मानसिकता, दरबारी विमर्श हुआ बेअसर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को औपनिवेशिक व विदेशी दासता की मानसिकता से मुक्ति पाने और अपनी गौरवशाली विरासत पर गर्व करने का ‘पंच प्रण’ दिया है। केंद्र सरकार जहां इतिहास के उन विस्मृत नायकों और वीरांगनाओं को मुख्यधारा में लाकर उनका सम्मान कर रही है जिन्होंने मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया, वहीं दूसरी ओर एक विशेष वर्ग आज भी उसी पुरानी दरबारी मानसिकता में जकड़ा हुआ है। यह वर्ग भारतीय इतिहास के त्याग और बलिदान को तुच्छ साबित करने के लिए विदेशी चश्मे का इस्तेमाल कर रहा है, जिसे ‘पंच प्रण’ के पथ पर अग्रसर नया भारत सिरे से खारिज कर रहा है।
स्वरा भास्कर को Jauhar “कायरता” लगता है…
शायद इतिहास को समझने के लिए सिर्फ़ Twitter Timeline नहीं, थोड़ा इतिहास पढ़ना भी पड़ता है। 🙂
चित्तौड़ की वीरांगनाओं के लिए #जौहर कोई “Cowardice” नहीं, बल्कि युद्ध, captivity और अपमान के भय के बीच अपनी dignity और agency की रक्षा का एक… pic.twitter.com/onguGOsYRv
— अखण्ड भारत संकल्प (@Akhand_Bharat_S) September 1, 2026
सनातन पर आक्रामक और कुरीतियों पर खामोश: लिबरल बिरादरी का दोगलापन
हिंदू समाज ने सदियों पहले सामाजिक बुराइयों का त्याग कर व्यापक सुधारों को आत्मसात किया, लेकिन आज भी एक विशेष विचारधारा केवल सनातन परंपराओं और ऐतिहासिक घटनाओं को ही कठघरे में खड़ा करने का काम करती है। दूसरी ओर, अन्य समुदायों में आज भी जारी कुप्रथाओं पर तथाकथित प्रगतिशील पूरी तरह मौन साध लेते हैं। यह दोहरा मापदंड स्पष्ट करता है कि उद्देश्य नारी सम्मान नहीं, बल्कि बहुसंख्यक समाज की आस्था और गौरवशाली इतिहास को लांछित करना है। भारतीय समाज की सहिष्णुता और लोकतांत्रिक मूल्यों का ही यह परिणाम है कि संवेदनशील और पूज्य प्रतीकों पर अनर्गल बयानबाजी करने वाले लोग बिना किसी जवाबदेही के समाज में सक्रिय बने रहते हैं।
Do Hindus still practice“ Jauhar “ or “ Sati pratha “ ?
It has been 200 years Sati
Pratha was stopped and even longer since Jauhar naturally faded awayBut HALALA which a legalised form of R@Pe is still practiced in Islam and yet Swara Bhaskar questions “ Jauhar “ and doesn’t… pic.twitter.com/gbHaTg6F6Z
— Sheetal Chopra 🇮🇳 (@SheetalPronamo) September 1, 2026
वीरांगनाओं के अपमान पर कांग्रेस की चुप्पी: वोट बैंक के आगे इतिहास की बलि
चित्तौड़ की वीरांगनाओं का जौहर कोई कमजोरी नहीं, बल्कि युद्ध और क्रूर कैद के भय के बीच अपनी गरिमा और संप्रभुता की रक्षा का एक असाधारण निर्णय था। ऐसे बलिदानों को राजनीतिक एजेंडे के तहत विकृत करने के प्रयासों पर विपक्षी दलों का रुख भी सवालों के घेरे में है। नारी सम्मान की बड़ी-बड़ी बातें करने वाली पार्टियां, विशेषकर कांग्रेस, अपने समर्थक विचारकों और कलाकारों द्वारा ऐतिहासिक वीरांगनाओं का उपहास उड़ाए जाने पर पूरी तरह चुप्पी साधे बैठी हैं। इस मौन से साफ जाहिर होता है कि तुष्टीकरण और चुनावी लाभ के लिए इतिहास की बलि चढ़ाने में किसी को कोई संकोच नहीं है।
खोखली वामपंथी बयानबाजी के बरक्स मोदी सरकार का ठोस नारी सशक्तीकरण
तथाकथित उदारवादियों का नारी सशक्तीकरण केवल सोशल मीडिया पर विवादित बयान देने और सांस्कृतिक प्रतीकों को नीचा दिखाने तक सीमित रह गया है। इसके विपरीत, वर्तमान केंद्र सरकार ने जमीनी स्तर पर नारी शक्ति को राष्ट्र निर्माण की धुरी बनाया है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के जरिए संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को ऐतिहासिक आरक्षण देना हो, तीन तलाक जैसी कुप्रथा से मुक्ति दिलाना हो या सशस्त्र बलों में स्थायी कमीशन देकर बेटियों को फ्रंटलाइन कमांड सौंपना हो—यह वास्तविक सशक्तीकरण का प्रमाण है। वामपंथी फेमिनिज्म जहां महिलाओं को अपनी ही संस्कृति से विमुख करने का षड्यंत्र रचता है, वहीं भारतीय परंपरा नारी को शक्ति और स्वाभिमान का साक्षात स्वरूप मानती है।
पद्मिनी के आत्मबल से राष्ट्रपति की एडीसी तक: अदम्य साहस की वही अविचल धारा
भारतीय संस्कृति में नारी के अदम्य साहस की धारा युगों-युगों से प्रवाहित होती रही है। जिस सभ्यता ने पद्मिनी और कर्णावती जैसी वीरांगनाओं के आत्मबल को संजोया है, उसी भारत की बेटियां आज सेना, प्रशासन और राष्ट्र के सर्वोच्च पदों पर आसीन होकर नेतृत्व कर रही हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की पहली महिला एडीसी के रूप में मेजर नव्या शेखावत की नियुक्ति इस बात का जीवंत प्रमाण है कि समय के साथ वीरता का स्वरूप बदला है, लेकिन भारतीय नारी का आत्मसम्मान और संकल्प आज भी अडिग है। जिन्होंने अतीत में विदेशी आक्रांताओं के समक्ष घुटने नहीं टेके, उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने वाली आज की बेटियां उन ताकतों को करारा जवाब दे रही हैं जो भारतीय संस्कृति को हीन दिखाने का प्रयास करती हैं।
मेज़र नव्या शेखावत #ADC #president #शेखावत pic.twitter.com/BYckzUQLf9
— कुलदीप सिंह बड़ियाल (@KuldeepBadiyal) July 11, 2026
अब सनातनी समाज रक्षात्मक नहीं: तथ्यों से वामपंथी एजेंडे की धज्जियां उड़ाती युवा पीढ़ी
एक समय था जब सनातन प्रतीकों और ऐतिहासिक नायकों का उपहास उड़ाए जाने पर समाज रक्षात्मक मुद्रा में आ जाता था या चुप रह जाता था। किंतु सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के इस नए युग में भारतीय समाज बौद्धिक हीनभावना से पूरी तरह बाहर आ चुका है। आज की युवा पीढ़ी ऐतिहासिक साक्ष्यों और तथ्यों के साथ खुलकर अपनी बात रख रही है और बॉलीवुड या वामपंथी विमर्शकारों की बौद्धिक ठेकेदारी को सीधे चुनौती दे रही है। समाज का यह मुखर स्वरूप दर्शाता है कि अब झूठे विमर्शों के दम पर देश के आत्मगौरव को दबाया नहीं जा सकता।
स्वरा के माँ-बाप वामपंथी है
स्वरा के सास ससुर और पति मुस्लिम हैवामपंथी और मुस्लिम जब मिलते है या जुड़ते है तो वे सभ्य समाज एवं सांस्कृतिक मूल्यों के लिए उतना ही हानिकारक है जितना की “विष”
आतंकवादी भी कम्युनिस्ट+इस्लामिस्ट के सहयोग से ही पैदा होता है
स्वरा जैसी महिलाओं को ही… https://t.co/ca08p2SFmF— Kajal HINDUsthani (@kajal_jaihind) September 1, 2026
फ्लॉप करियर को चमकाने के लिए सनातन विरोध का आजमाया हुआ नुस्खा
सिनेमा और कला जगत के एक विशेष धड़े का यह पुराना ढर्रा रहा है कि मुख्यधारा के विमर्श से ओझल होते ही सनातन धर्म और भारतीय गौरव पर विवादास्पद टिप्पणियां करके फिर से सुर्खियों में आने की कोशिश की जाए। जब वास्तविक सामाजिक सुधारों या अन्य मजहबों की कुरीतियों के विरुद्ध खड़े होने की बात आती है, तब यह तथाकथित प्रगतिशील जमात पूरी तरह खामोश हो जाती है। यह कोई वास्तविक स्त्री विमर्श नहीं, बल्कि एक सुनियोजित एजेंडा है जिसके तहत सस्ती लोकप्रियता पाने और अपने वैचारिक आकाओं को संतुष्ट करने के लिए गौरवशाली इतिहास को लांछित किया जाता है। किंतु विकास और राष्ट्रगौरव के पथ पर बढ़ते भारत में अब ऐसे हथकंडे पूरी तरह बेअसर साबित हो रहे हैं।
स्वरा भास्कर जब वह नयी नयी जब काम की तलाश
में Bollywood की बंगाल फाइल्स जैसे कोई सेट
पर लेकिन देखा बालीवुड में तो Bhai Jaan की
चलती है तो अपना स्टैंड बदल लिया ।
और आज कल राजस्थान के Jauhar पर बकचोदी कर रही है https://t.co/CLx6r2I8As pic.twitter.com/2gTWOWqTVR
— श्रवण बिश्नोई (किसान/ Hindus) (@SKBishnoi29Rule) September 2, 2026
विकास और राष्ट्रगौरव के आगे नतमस्तक हुआ तुष्टीकरण का हर विभाजनकारी षड्यंत्र
चित्तौड़ के दुर्ग से लेकर डीग के महलों तक भारत की माटी वीरांगनाओं के अद्वितीय शौर्य, आत्मसम्मान और अमर बलिदान की गाथाओं से सिंचित है। सदियों पूर्व आक्रांताओं के बर्बर अत्याचारों के विरुद्ध अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए उठाए गए उन पवित्र कदमों को आज का प्रबुद्ध और स्वाभिमान से भरा युवा राष्ट्र का अमूल्य गौरव मानता है। लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम और चुनावी लाभ के लिए सनातन प्रतीकों को लांछित करने वाली ताकतों को यह समझना होगा कि आधुनिक भारत औपनिवेशिक हीनभावना की जंजीरों को तोड़ चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘पंच प्रण’ और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पथ पर अग्रसर यह देश अब न तो अपने पूर्वजों के त्याग का उपहास बर्दाश्त करेगा और न ही तुष्टीकरण के झूठे नैरेटिव से अपनी एकता को खंडित होने देगा। यह विवाद स्पष्ट कर चुका है कि विकास, विरासत और राष्ट्रगौरव के महाविमर्श के आगे समाज को बांटने वाली हर वैचारिक साजिश का ध्वस्त होना तय है।









