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कनिमोझी की सीक्रेट मीटिंग से हड़कंप, तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट, कांग्रेस को झटका देने की तैयारी

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तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी और डीएमके सांसद कनिमोझी के हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और क्षेत्र-वार बैठकों ने इस चर्चा को हवा दी है कि क्या क्षेत्रीय दल कांग्रेस के बिना एक नए समीकरण की पटकथा लिख रहे हैं। इसके संकेत हाल ही में हुईं कुछ बैठकों से मिल रहे हैं। DMK यानी द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम सांसद कनिमोझी ने पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात की है। खबरें हैं कि बगैर कांग्रेस के और भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ एक क्षेत्रीय दलों का गठबंधन तैयार करने की योजना बनाई जा रही है। तृणमूल कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों की योजना है कि जिस राज्य में जो क्षेत्रीय दल मजबूत है, उसे वहां की राजनीतिक कमान सौंपी जानी चाहिए।

कनिमोझी और ममता बनर्जी की मुलाकात
तमिलनाडु में टीवीके की करिश्माई जीत के बाद कांग्रेस की धोखेबाजी से आहत डीएमके तीसरा मोर्चा (थर्ड फ्रंट) की संभावना पर काम कर रही है।  गुरुवार यानी 17 सितंबर को डीएमके के लोकसभा सदस्य कनिमोझी करुणानिधि ने पश्चिम बंगाल की पूर्व सीएम ममता बनर्जी से कोलकाता में मुलाकात की। हालांकि, कालीघाट स्थित पूर्व सीएम के आवास पर हुई बैठक में किन मुद्दों पर बात की गई, इसे लेकर स्थिति साफ नहीं हो पाई है। लेकिन राजनीतिक हलकों में इस मुलाकात को थर्ड फ्रंट को अस्तित्व में लाने की कवायद से जोड़ कर देखा जा रहा है। गौरतलब है कि कनिमोझी करुणानिधि डीएमके संसदीय दल की नेता हैं।

तीसरा मोर्चा बनाने के लिए मुलाकातों का दौर जारी
यह सारी कवायद 2029 के आम चुनावों से पहले बीजेपी और कांग्रेस के खिलाफ एक मजबूत क्षेत्रीय मोर्चा बनाने के लिए की जा रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, डीएमके के एक नेता ने कहा, ‘हम बगैर कांग्रेस के एक तीसरे मोर्चे की संभावनाएं तलाश रहे हैं।’ इधर, अखबार से बातचीत में एक टीएमसी सांसद ने कहा, ‘ममता बनर्जी के DMK प्रमुख एमके स्टालिन के साथ बहुत अच्छे संबंध हैं। वह गैर NDA पार्टियों के साथ भी अच्छे रिश्ते बनाए रखती हैं और INDIA ब्लॉक के उन सदस्यों के करीब हैं जो कांग्रेस समर्थक नहीं हैं। आज की बातचीत सिर्फ उनके और कनिमोझी के बीच हुई। इसके अलावा कुछ भी कहना सिर्फ अटकलें लगाना होगा।’

उद्धव ठाकरे से ‘मातोश्री’ में मिली कनिमोझी
इससे पहले डीएमके नेता कनिमोझी ने शिवसेना यूबीटी चीफ उद्धव ठाकरे से से ‘मातोश्री’ आवास पर मुलाकात की। ठाकरे ने खुद डीएमके सांसद का स्वागत किया और उन्हें सम्मान के तौर पर सुनहरी शॉल भेंट की। करीब एक घंटे तक चली इस बैठक में शिवसेना (यूबीटी) के सांसद अनिल देसाई और मिलिंद नार्वेकर भी मौजूद थे। खबरों के मुताबिक, बीजेपी के प्रति कांग्रेस के मौजूदा रुख और इंडिया ब्लॉक की भविष्य की रणनीति पर चर्चा की। इस चर्चा में विपक्षी गठबंधन में क्षेत्रीय और छोटी पार्टियों के महत्व और उभरती राजनीतिक चुनौतियों से निपटने में उनकी भूमिका पर भी बात हुई।

कनिमोझी की शरद पवार और सुप्रिया सुले से बातचीत
उद्धव ठाकरे के साथ बैठक के बाद कनिमोझी दिल्ली गईं, जहां उन्होंने नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एसपी) के नेता शरद पवार और उनकी बेटी व लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले के साथ अलग-अलग बातचीत की। इन मुलाकातों से यह अटकलें शुरू हो गई हैं कि डीएमके उन क्षेत्रीय पार्टियों को एक साथ लाने की संभावना तलाश रही है, जिनके कांग्रेस पार्टी के साथ मतभेद हैं।

केजरीवाल और अखिलेश यादव से मुलाकात की संभावना
कहा जा रहा है कि कनिमोझी जल्द ही आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल से मिल सकती हैं। केजरीवाल के ममता बनर्जी और एम स्टालिन से रिश्ते अच्छे हैं। यह स्थिति कांग्रेस को बेचैन कर सकती है। कनिमोझी पंजाब के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता भगवंत मान तथा समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव से मिलकर अपना संपर्क अभियान जारी रखेंगी इन प्रस्तावित बैठकों को एक समन्वित क्षेत्रीय राजनीतिक मंच के लिए समर्थन का आकलन करने की डीएमके की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

डीएमके तमिलनाडु में पड़ रही अकेली
डीएमके की तरफ थर्ड फ्रंट बनाने की कोशिशों की चर्चा ऐसे वक्त पर सामने आई है जब तमिलनाडु में विजय अपनी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। कुछ समय पहले उन्होंने सेक्युलर सोशल जस्टिस विक्ट्री अलायंस बनाया है। इसका हिंदी में मतलब ‘धर्मनिरपेक्ष सामाजिक न्याय विजय गठबंधन’ है। डीएमके की मुश्किल यह है कि वह बीजेपी के साथ नहीं जा सकती है, दूसरी तरफ कांग्रेस ने पोस्ट पोल अलायंस के तहत विजय से हाथ मिला लिया है।

DMK की कांग्रेस से नाराजगी, INDIA गठबंधन से भी दूरी
तमिलनाडु की राजनीति में लंबे समय तक कांग्रेस और डीएमके एक साथ रहे। विधानसभा और लोकसभा चुनाव साथ लड़े, लेकिन 2026 चुनाव के बाद स्थिति बदल गई। कांग्रेस राज्य के सबसे बड़े दल तमिलागा वेत्री कझगम से जा मिली और पुराने साथी डीएमके के छोड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि डीएमके ने कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा और INDIA गठबंधन से भी दूरी बना ली।

डीएमके के पास हैं 32 सांसद
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) पार्टी के पास संसद के दोनों सदनों में कुल 32 सांसद (लोकसभा में 22 और राज्यसभा में 10) हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि अगर थर्ड फ्रंट की बात आगे बढ़ती है तो इसमें बीआरएस और जगन मोहन की अगुवाई वाली वाईएसआरसीपी जैसे दल भी एंट्री ले सकते हैं। अभी राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए और इंडिया ब्लॉक हैं। ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है।

कांग्रेस ने मदद से किया इनकार तो नाराज हुई ममता बनर्जी
ममता बनर्जी की नाराजगी की एक वजह सीट शेयरिंग हो सकती है। खबरें थीं कि पश्चिम बंगाल की दो सीटों पर होने वाले आगामी उपचुनाव को लेकर ममता ने कांग्रेस से मदद मांगी थी, जिसे कांग्रेस ने ठुकरा दिया। हालांकि, टीएमसी नेता इससे इनकार कर रहे हैं। जबकि, कांग्रेस खुलकर इसे स्वीकार कर रही है। खबरें थीं कि पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कांग्रेस से रेजिनगर सीट पर समर्थन मांगा था और नंदीग्राम सीट छोड़ने की पेशकश की थी।

पहले भी हो चुकी हैं तीसरे मोर्चे की कोशिशें
कांग्रेस और भाजपा से अलग क्षेत्रीय दलों को एक मंच पर लाने की कोशिशें पहले भी होती रही हैं। 2013 में ममता बनर्जी ने ऐसा राजनीतिक मंच बनाने की पहल की थी। इसके बाद 2018 में तेलंगाना के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने विभिन्न राज्यों के नेताओं से संपर्क किया था। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले अरविंद केजरीवाल की ओर से भी विपक्षी दलों के बीच व्यापक राजनीतिक समन्वय की कोशिशें हुई थीं।

तीसरे मोर्चे के सक्रिय होने से कांग्रेस को लगेंगे बड़े झटके
भारतीय राजनीति में तीसरा मोर्चा (Third Front) हमेशा से कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए बड़ी चुनौती रहा है, लेकिन इसका सबसे सीधा और घातक असर कांग्रेस पर पड़ता है। राजनीतिक विश्लेषकों और ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, तीसरे मोर्चे के सक्रिय होने से कांग्रेस को बड़े झटके लगते हैं…

झटका नंबर 1- गैर-भाजपा वोटों का बिखराव  
देश में जो मतदाता भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ हैं, उनका वोट मुख्य रूप से कांग्रेस को जाता है। जब तीसरा मोर्चा मैदान में उतरता है, तो यह गैर-भाजपा (Anti-BJP) वोट बैंक दो हिस्सों में बंट जाता है। इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलता है और कांग्रेस की सीटें कम हो जाती हैं। डीएमके (DMK) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के कांग्रेस से अलग होकर नया मोर्चा बनाने से विपक्षी एकता बिखर जाएगी।

झटका नंबर 2- कांग्रेस की ‘बड़े भाई’ की भूमिका खत्म
कांग्रेस केंद्र में सरकार बनाने के लिए क्षेत्रीय दलों (जैसे TMC, SP, AAP, DMK) के साथ गठबंधन (जैसे INDIA ब्लॉक) पर निर्भर रहती है। तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट होते ही क्षेत्रीय दल कांग्रेस को ‘बड़े भाई’ की भूमिका से हटाकर खुद नेतृत्व करने की कोशिश करने लगते हैं, जिससे विपक्षी एकता कमजोर होती है।

झटका नंबर 3- कांग्रेस के पारंपरिक जनाधार पर कब्जा
तीसरे मोर्चे में शामिल अधिकांश दल (जैसे वामपंथी, समाजवादी और दलित/पिछड़ा वर्ग की राजनीति करने वाली पार्टियां) उसी सेक्युलर और गरीब-कल्याण वाले एजेंडे पर चुनाव लड़ते हैं जो कांग्रेस का मुख्य आधार रहा है। इससे कांग्रेस का पारंपरिक वोटर उनसे छिटक जाता है।

झटका नंबर 4- पीएम पद पर कांग्रेस की दावेदारी कमजोर 
जब भी कोई तीसरा मोर्चा आकार लेता है, तो उसमें प्रधानमंत्री पद के कई दावेदार (जैसे ममता बनर्जी, या अरविंद केजरीवाल) सामने आ जाते हैं। ऐसे में विपक्ष की तरफ से कांग्रेस नेतृत्व (जैसे राहुल गांधी) की सर्वसम्मत स्वीकार्यता खत्म हो जाती है।

झटका नंबर 5- कांग्रेस की सौदेबाजी पर लगाम
कांग्रेस देश के कई राज्यों में सरकार और सबसे पुरानी पार्टी होने के आधार पर विपक्षी गठबंधन की धुरी बनने का प्रयास करती है, लेकिन क्षेत्रीय दलों के अलग होने से राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की सौदेबाजी की क्षमता और प्रभाव कम हो जाएगा। सीट-बंटवारे के समझौतों में कांग्रेस की स्थिति कमजोर हो जाती है, जिससे राष्ट्रीय राजनीति में उसकी सौदेबाजी की क्षमता घट जाती है।

झटका नंबर 6- कांग्रेस को अलग-थलग बनने का खतरा
क्षेत्रीय दल अपने राज्यों में मजबूत हैं। यदि वे कांग्रेस को साथ लिए बिना आगे बढ़ते हैं, तो कांग्रेस कई राज्यों में पूरी तरह हाशिए पर आ जाएगी। राज्यों में क्षेत्रीय दलों की मजबूत पकड़ होती है। गठबंधन में न होने पर कांग्रेस को उन राज्यों में अपने दम पर संघर्ष करना पड़ता है, जहां उसका संगठन पहले से कमजोर है।

झटका नंबर 7- कांग्रेस की राष्ट्रीय विकल्प की छवि धूमिल
कांग्रेस खुद को भाजपा के एकमात्र राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पेश करती है। तीसरे मोर्चे के उभरने से यह दावा कमजोर होता है कि केवल कांग्रेस ही राष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला कर सकती है।

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