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रक्षाबंधन पर अखिलेश का चुनावी पाखंड: राखी की आड़ में तुष्टीकरण का खेल

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उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही समाजवादी पार्टी में सियासी बेचैनी साफ नजर आने लगी है। सनातन संस्कृति और भाई-बहन के पवित्र स्नेह का प्रतीक रक्षाबंधन भी सपा की चुनावी जोड़-तोड़ और वोटबैंक राजनीति का शिकार बन गया। लखनऊ स्थित सपा कार्यालय में पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव द्वारा आयोजित रक्षाबंधन कार्यक्रम केवल एक सुनियोजित राजनीतिक पीआर स्टंट बनकर रह गया। भाई-बहन के आत्मीय रिश्ते की जगह केवल वोटों के गुणा-गणित और कैमरों के सामने लिफाफे बांटने की होड़ दिखाई दी। सनातन धर्म के पावन पर्व को केवल चुनावी प्रचार का माध्यम बनाकर समाजवादी पार्टी ने यह साबित कर दिया है कि उसके लिए जनभावनाएं और पवित्र परंपराएं सत्ता पाने का महज एक साधन हैं।

पवित्र पर्व पर सिर्फ वोटबैंक की नजर
सपा कार्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम में रक्षाबंधन के मूल भाव और आत्मीयता का पूरी तरह अभाव दिखा। सोशल मीडिया पर सामने आए दृश्यों से यह साफ झलकता है कि सपा प्रमुख के लिए पर्व की मर्यादा या राखी का भाव कोई मायने नहीं रखता, बल्कि उनका पूरा ध्यान सिर्फ लिफाफे बांटने और मुस्लिम वोटबैंक को साधने पर टिका था। जिस पावन पर्व को सनातन समाज निस्वार्थ प्रेम और सुरक्षा के संकल्प के रूप में मनाता है, उसे केवल सियासी लाभ के लिए एक औपचारिक तमाशा बना दिया गया। जब नेता अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए पवित्र रिवाजों का सौदा करने लगें, तो समाज में उनके दोहरे चरित्र की पोल अपने आप खुल जाती है। वोटबैंक के लालच में डूबी सपा ने बहनों के स्नेह को भी एक चुनावी टूल बनाकर रख दिया।

मिशन 2027 की बेचैनी: सनातन विरोध से हिंदू समाज में बढ़ते आक्रोश को दबाने की छटपटाहट
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के नजदीक आते ही समाजवादी पार्टी को अपनी खिसकती जमीन का एहसास होने लगा है। वर्षों तक हिंदू विरोधी राजनीति करने और सनातन आस्था पर प्रहार करने के बाद सपा नेतृत्व को अब समझ आ रहा है कि बहुसंख्यक हिंदू समाज उनके दोहरे रवैये को पहचान चुका है। यही कारण है कि आगामी चुनाव में करारी हार के डर से अखिलेश यादव अब रक्षाबंधन और हिंदू त्योहारों पर अचानक सक्रिय होकर चुनावी हिंदू बनने का स्वांग रच रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि तुष्टीकरण की राजनीति में डूबी सपा का यह रक्षाबंधन इवेंट केवल डैमेज कंट्रोल की एक नाकाम कोशिश है, जिसे उत्तर प्रदेश का जागरूक मतदाता भली-भांति समझ रहा है।

प्रभु श्रीराम के नाम पर दोहरा चरित्र: सोशल मीडिया पर झूठी भक्ति का पाखंड
समाजवादी पार्टी और उसके प्रमुख अखिलेश यादव का प्रभु श्रीराम के प्रति दोहरा चरित्र तब और खुलकर सामने आ गया जब सोशल मीडिया पर उनकी भारी फजीहत हुई। एक तरफ पार्टी के वरिष्ठ नेता द्वारा पवित्र श्रीरामचरितमानस को बैन करने की मांग की जा रही थी और अखिलेश यादव ने उस नेता को दंडित करने के बजाय संगठन में राष्ट्रीय महासचिव का बड़ा पद थमा दिया, वहीं दूसरी तरफ डैमेज कंट्रोल के लिए उन्होंने एक्सप्रेसवे पर ले जाई जा रही श्रीराम की मूर्ति का वीडियो शेयर करते हुए ‘प्रभु राम का रथ, सपा का पथ’ लिख दिया। जनता ने सपा प्रमुख के इस पाखंड को तुरंत पकड़ लिया और सोशल मीडिया पर उन्हें जमकर घेरा। लोगों ने दो टूक कहा कि जिस पार्टी के नेता चौपाइयों और धर्मग्रंथों का सरेआम अपमान कर रहे हों, उसके मुखिया का प्रभु राम के नाम पर राजनीतिक क्रेडिट लेना केवल एक घटिया चुनावी स्वांग है। 

सपा का सनातन द्रोह: श्रीरामचरितमानस की प्रतियां जलाने वालों को खुला राजनीतिक संरक्षण
समाजवादी पार्टी के संरक्षण में सनातन धर्म के सबसे पूज्य ग्रंथ श्रीरामचरितमानस का जो खुला अपमान हुआ, उसे उत्तर प्रदेश की जनता कभी नहीं भूल सकती। सपा नेताओं के जहरीले बयानों के बाद लखनऊ की सड़कों पर खुलेआम श्रीरामचरितमानस की प्रतियां जलाई गईं, जिससे करोड़ों रामभक्तों की भावनाएं तार-तार हुईं। इस बेहद शर्मनाक और घृणित कृत्य के बाद भी अखिलेश यादव ने दोषियों पर सख्त कार्रवाई करने के बजाय उन पर चुप्पी साधकर अपनी मौन सहमति दी। धार्मिक सौहार्द बिगाड़ने और हिंदू धर्मग्रंथों का सरेआम अपमान करने वाले उपद्रवियों को पार्टी का परोक्ष समर्थन हासिल रहा। यह घटना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि एक विशेष वोटबैंक को खुश करने के लिए सपा सनातन धर्म के अपमान की किसी भी सीमा को पार कर सकती है।

हिंदू आस्था पर प्रहार: पवित्र ग्रंथ को प्रतिबंधित करने की मांग और नफरत का खेल
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं द्वारा पूज्य श्रीरामचरितमानस पर लगातार अमर्यादित और नफरत भरे हमले किए गए। संत तुलसीदास जी द्वारा रचित इस अमर ग्रंथ को समाज विरोधी बताते हुए इस पर प्रतिबंध लगाने की मांग तक की गई, जिससे हिंदू समाज में भारी आक्रोश फैल गया। हैरान करने वाली बात यह रही कि अखिलेश यादव ने सनातन धर्म के खिलाफ जहर उगलने वाले नेताओं को दंडित करने के बजाय उन्हें पदोन्नति देकर सम्मानित किया। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने हिंदू विरोधी बयानों को अपनी मुख्य चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाया और समाज में जातिगत वैमनस्य फैलाने का प्रयास किया। जब पार्टी की पूरी विचारधारा ही हिंदू धर्मग्रंथों के तिरस्कार पर टिकी हो, तो रक्षाबंधन पर इनका यह नया रूप केवल एक भद्दा चुनावी ढोंग ही साबित होता है।

रक्त-रंजित इतिहास: रामभक्तों के दमन से लेकर प्राण प्रतिष्ठा के बहिष्कार तक सपा की हिंदू विरोधी मानसिकता
समाजवादी पार्टी का हिंदू विरोधी चेहरा कोई नया नहीं है, बल्कि यह अपने खूनी इतिहास के साथ सनातन द्रोह की राजनीति करता आया है। वर्ष 1990 में जब अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन चल रहा था, तब तत्कालीन सपा सरकार ने निहत्थे कारसेवकों पर बर्बरता से गोलियां चलवाई थीं। निर्दोष साधु-संतों और रामभक्तों के खून से सरयू का पावन जल लाल हो गया था, जिसे सपा नेता बेशर्मी से अपनी उपलब्धि बताते रहे। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन का निरंतर विरोध करने और भव्य राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह का बहिष्कार करने वाली पार्टी आज किस मुंह से सनातन धर्म की हितैषी बनने का नाटक कर रही है? रामभक्तों के सीने पर चलाई गई गोलियों का दर्द और सपा का यह हिंदू द्रोह हर सनातनी के मन में आज भी ताजा है।

रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का बहिष्कार: जब 500 वर्षों के संकल्प पर सपा ने फेरा मुंह
जब 22 जनवरी को अयोध्या धाम में 500 वर्षों के लंबे इंतजार और संघर्ष के बाद प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक उत्सव मनाया जा रहा था, तब सपा का सनातन विरोधी चेहरा पूरी दुनिया ने देखा। देश-विदेश के संतों और श्रद्धालुओं के साथ पूरा राष्ट्र जब राममय था, तब अखिलेश यादव ने प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण ठुकरा दिया और ऐतिहासिक कार्यक्रम से दूरी बना ली। अपने कट्टर वोटबैंक को साधे रखने के डर से सपा प्रमुख ने रामलला के दर्शन करने तक से परहेज किया। जो पार्टी प्रभु श्रीराम के अस्तित्व और भव्य मंदिर के उत्सव से मुंह मोड़ लेती है, उसका किसी भी हिंदू त्योहार को मनाना केवल एक सियासी ढोंग और पाखंड के सिवा कुछ नहीं हो सकता।

ज्ञानवापी शिवलिंग और मंदिरों का उपहास: कहीं भी पत्थर और लाल झंडा रखने वाला अमर्यादित बयान
काशी में ज्ञानवापी परिसर के सर्वे के दौरान जब पवित्र शिवलिंग के साक्ष्य सामने आए, तब अखिलेश यादव ने सनातन आस्था का सीधा उपहास उड़ाते हुए विवादित बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि कहीं भी पत्थर रख दो और लाल झंडा लगा दो तो मंदिर बन जाता है। भगवान शिव के विग्रह और हिंदू मंदिरों के निर्माण की पवित्र परंपरा को पत्थर और झंडे से जोड़कर सपा प्रमुख ने करोड़ों शिवभक्तों की आस्था पर गहरा आघात किया था। महादेव के पवित्र स्वरूप को फव्वारा बताकर हिंदुओं का मजाक उड़ाने वालों के सुर में सुर मिलाना सपा की सोची-समझी हिंदू विरोधी मानसिकता का हिस्सा रहा है।

साधु-संतों और मठ परंपरा पर हमला: मठाधीशों की माफिया से तुलना कर संत समाज का अपमान
सनातन धर्म में पूज्य साधु-संतों और प्राचीन मठ परंपरा का अपमान करने में भी समाजवादी पार्टी कभी पीछे नहीं रही। अखिलेश यादव ने राजनीतिक दुर्भावना में आकर मठाधीशों की तुलना माफिया से कर दी थी। भारत के मठों और अखाड़ों ने सदैव समाज को संस्कार, शिक्षा और सांस्कृतिक सुरक्षा देने का काम किया है, लेकिन सपा प्रमुख ने गोरक्षपीठ समेत पूरे संत समाज को कठघरे में खड़ा कर दिया। इस अमर्यादित बयान के बाद पूरे देश के अखाड़ों और महामंडलेश्वरों में भारी रोष देखा गया था। साधु-संतों को अपराधी बताकर अपमानित करने वाली पार्टी आज राखी बंधवाकर खुद को सनातन का हितैषी साबित करने की नाकाम कोशिश कर रही है।

अयोध्या के दीपोत्सव से चिढ़: मिट्टी के दीयों पर सवाल और हिंदू पर्वों का उपहास
सनातन संस्कृति के सबसे बड़े उत्सव दीपोत्सव को लेकर भी समाजवादी पार्टी की नकारात्मक सोच कई बार उजागर हो चुकी है। जब योगी सरकार ने अयोध्या में लाखों मिट्टी के दीये जलाकर पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति का परचम लहराया, तो सपा प्रमुख ने दीपोत्सव पर सवाल उठाते हुए फिजूलखर्ची करार दिया। दीपोत्सव से न केवल प्रभु राम की पावन नगरी जगमगाती है, बल्कि स्थानीय कुम्हारों और गरीब कारीगरों को रोजगार भी मिलता है। लेकिन सनातन परंपराओं से चिढ़ रखने वाले सपा नेतृत्व ने दीयों को पैसों की बर्बादी बताकर हिंदू आस्था और मेहनतकश कारीगरों दोनों का अपमान किया।

शिवभक्तों की आस्था पर पहरा: कांवड़ यात्रा की सुरक्षा का विरोध और तुष्टीकरण का खुला खेल
समाजवादी पार्टी का हिंदू विरोधी रवैया प्रतिवर्ष श्रावण मास में निकलने वाली पवित्र कांवड़ यात्रा के दौरान भी खुलकर सामने आता रहा है। सपा शासनकाल में शिवभक्तों के धार्मिक आयोजनों और डीजे पर पाबंदियां लगाकर सनातन परंपराओं को कुचलने का प्रयास किया जाता था। वहीं वर्तमान में जब योगी सरकार ने कांवड़ यात्रियों की सुविधा, सुरक्षा और पवित्रता के लिए ढाबों पर नेमप्लेट लगाने का पारदर्शी आदेश दिया, तो अखिलेश यादव ने कांवड़ मार्ग आदेश का विरोध शुरू कर दिया। शिवभक्तों की धार्मिक भावनाओं और आहार शुचिता की रक्षा करने के बजाय सपा हमेशा की तरह तुष्टीकरण के पक्ष में खड़ी नजर आई। करोड़ों शिवभक्तों की आस्था का तिरस्कार करने वाली पार्टी का रक्षाबंधन पर दिखावटी प्रेम केवल जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है।

संसद में भारतीय संस्कृति का अपमान: सेंगोल हटाने की मांग और सनातन प्रतीकों से नफरत
समाजवादी पार्टी की भारतीय संस्कृति और ऐतिहासिक प्रतीकों के प्रति दुर्भावना देश की संसद तक पहुंच चुकी है। जब नई संसद में भारतीय न्याय और संप्रभुता के ऐतिहासिक प्रतीक सेंगोल को स्थापित किया गया, तो सपा सांसद ने सेंगोल को हटाने की मांग कर दी और अखिलेश यादव ने इस बयान का समर्थन किया। चोल साम्राज्य की न्यायप्रियता और भारतीय सनातन परंपरा का प्रतीक सेंगोल सपा को राजा का डंडा नजर आने लगा। संसद जैसे लोकतंत्र के मंदिर में भी भारतीय प्रतीकों का विरोध करना यह दिखाता है कि सपा को भारत के समृद्ध इतिहास और परंपराओं से कितनी नफरत है।

तुष्टीकरण का बजट मॉडल: सनातन तीर्थों की उपेक्षा और एकतरफा मेहरबानी
समाजवादी पार्टी की सरकारों का बजट मॉडल हमेशा से सनातन संस्कृति की उपेक्षा और एकतरफा तुष्टीकरण पर आधारित रहा है। सपा के शासन में जनता की गाढ़ी कमाई के अरबों रुपये केवल कब्रिस्तानों की बाउंड्री निर्माण के बजट पर बहाए गए, जबकि अयोध्या, काशी, मथुरा और चित्रकूट जैसे ऐतिहासिक सनातन तीर्थों को बदहाल छोड़ दिया गया था। हिंदू आस्था के केंद्रों पर बुनियादी सुविधाओं तक का अभाव था और तीर्थयात्रियों को उपेक्षित रखा गया। आज जब योगी सरकार में इन सभी धामों का पुनरुद्धार कर विश्व स्तरीय पर्यटन स्थल बनाया जा रहा है, तो सपा नेताओं को यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण रास नहीं आ रहा है। तुष्टीकरण के इस बजट मॉडल ने सपा की प्राथमिकता को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है।

काशी-मथुरा के भव्य पुनरुद्धार से बेचैनी: वोटबैंक खोने के डर से सनातन गौरव का विरोध
सनातन धर्म के गौरव का प्रतीक माने जाने वाले काशी और मथुरा के पुनरुद्धार से भी समाजवादी पार्टी को हमेशा परेशानी रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में जब भव्य काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर का लोकार्पण हुआ, तब अखिलेश यादव ने आखिरी समय काशी में बिताने का विवादित तंज कसा था। इसी तरह ज्ञानवापी और मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि के मामलों पर भी सपा नेतृत्व लगातार सनातन पक्ष की भावनाओं की अनदेखी करता रहा है। अपने वोटबैंक के खिसकने के भय से सपा नेता कभी भी हिंदू समाज के स्वाभिमान और सांस्कृतिक विरासत के साथ खड़े नहीं हो पाए।

विकास और जेपीएनआईसी पर अखिलेश की हताशा
प्रेस वार्ता में अखिलेश यादव ने योगी सरकार द्वारा जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय केंद्र (जेपीएनआईसी) के संचालन को लेकर लिए गए फैसले पर भी बेबुनियाद बयानबाजी की। अपनी सरकार के समय जनता की गाढ़ी कमाई को फिजूलखर्ची और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ाने वाले अखिलेश यादव आज योगी सरकार की पारदर्शी नीतियों पर सवाल उठा रहे हैं। सपा शासनकाल में जेपीएनआईसी का निर्माण वित्तीय अनियमितताओं और अधूरे काम का प्रतीक बनकर रह गया था। जनता के पैसे का सही इस्तेमाल करने और इस केंद्र को बेहतर तरीके से संचालित करने के लिए जब योगी सरकार ने ठोस कदम उठाए, तो सपा प्रमुख बौखलाहट में उतर आए। अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए वे अब सरकार पर बेतुके आरोप मढ़ने में लगे हैं।

भ्रष्टाचार पर चोट से घबराई सपा
लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नाम पर केवल राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी यह भूल जाती है कि जेपी का पूरा जीवन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को समर्पित था। जेपी ने तानाशाही और सरकारी लूट के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन खड़ा किया था, जबकि सपा ने उनके नाम पर सिर्फ अरबों रुपये के सरकारी बजट को बर्बाद किया। योगी सरकार में जब भ्रष्टाचार के हर रास्ते बंद किए जा रहे हैं और सरकारी संपत्तियों का जनहित में पारदर्शी उपयोग सुनिश्चित हो रहा है, तब अखिलेश यादव अनर्गल आरोप लगाकर अपनी विफलताएं छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। रक्षाबंधन जैसे पावन अवसर पर भी विकास कार्यों का विरोध करना और तुष्टीकरण का खेल खेलना सपा की जनविरोधी और निराशावादी मानसिकता को ही उजागर करता है।

जनता सब जानती है: सपा का चुनावी पाखंड और सनातन का जागरण
समाजवादी पार्टी का यह पूरा घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि उसके पास न तो प्रदेश के विकास के लिए कोई सकारात्मक विजन है और न ही भारतीय संस्कृति के प्रति कोई वास्तविक निष्ठा। श्रीरामचरितमानस के अपमान से लेकर कारसेवकों पर गोलियां चलवाने और संतों को अपमानित करने तक, सपा का पूरा इतिहास सनातन विरोध की नींव पर खड़ा रहा है। अब चुनाव आते ही लिफाफे बांटकर रक्षाबंधन का स्वांग रचना केवल एक चुनावी छलावा है। उत्तर प्रदेश की प्रबुद्ध जनता तुष्टीकरण की इस संकीर्ण राजनीति को अच्छी तरह पहचान चुकी है और आने वाले चुनावों में ऐसे पाखंडी राजनीतिक हथकंडों का जवाब अपने मत से देने के लिए पूरी तरह तैयार है।

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