इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की मांग वाली 11वीं की एक नाबालिग मुस्लिम छात्रा की याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में साफ-साफ कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में नाकाम रही कि हिजाब पहनना मुस्लिम आस्था का जरूरी हिस्सा है। अदालत ने कहा कि अगर किसी एक को इस तरह से यूनिफॉर्म से अलग पहने की इजाजत दी जाती है, तो यूनिफॉर्म पहनने का मूल मकसद ही नाकाम हो सकता है। दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह ऐतिहासिक निर्णय केवल एक कानूनी व्यवस्था नहीं, बल्कि उन राजनेताओं की नीयत पर करारी चोट है, जो दशकों से वोट बैंक की तिजोरी भरने के लिए हिजाब का इस्तेमाल कर रहे हैं। जब देश की माननीय अदालतें बार-बार यह स्पष्ट कर रही हैं कि शैक्षणिक संस्थानों में समानता, अनुशासन और यूनिफॉर्म कोड किसी भी प्रकार की धार्मिक कट्टरता या व्यक्तिगत हठ से ऊपर होने चाहिए, तब कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों द्वारा अदालतों के फैसलों को चुनौती देने और उनकी आलोचना करने से उनका दोहरा चरित्र सामने आ जाता है। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल के लिए राष्ट्र की एकता और समरसता से कहीं अधिक मूल्यवान एक वर्ग-विशेष का थोक वोट बैंक है, जिसके तुष्टिकरण के लिए वह संविधान की दुहाई देकर संवैधानिक संस्थाओं के फैसलों की ही गरिमा को तार-तार करने से भी नहीं हिचक रहा है।
बहुसंख्यक भावनाएं और देश की न्यायिक मर्यादा दांव पर
समानता आधारित भारत के निर्माण में बड़ी बाधा वह संकीर्ण राजनीतिक सोच है, जो मजहबी पहचान को शिक्षा और राष्ट्रीय अनुशासन पर तरजीह देती है। कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया द्वारा हिजाब प्रतिबंध को वापस लेने के आत्मघाती कदम से लेकर अब इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर वरिष्ठ कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद की विचलित करने वाली टिप्पणियों तक, कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति का एक लंबा इतिहास रहा है। जब देश की बेटियां अंतरिक्ष, खेल और रक्षा के क्षेत्र में रूढ़ियों को तोड़कर आगे बढ़ रही हैं, तब प्रगतिशीलता का ढोंग रचने वाली कांग्रेस उन्हें वापस मध्यकालीन पहनावे और मजहबी दीवारों के भीतर कैद रखने की वकालत कर रही है। इससे पता चलता है कि कैसे कांग्रेस ने ‘अल्पसंख्यक अधिकारों’ की आड़ में हमेशा बहुसंख्यक समाज की भावनाओं और देश की न्यायिक मर्यादाओं को दांव पर लगाया है।
स्कूल के तय ड्रेस कोड के साथ हिजाब पहनना जरूरी नहीं – कोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में दिए फैसले में एक बार फिर भारत के कानूनी और सामाजिक इतिहास में एक मील का पत्थर स्थापित किया है। प्रयागराज के एक विद्यालय की मुस्लिम छात्रा की याचिका को सिरे से खारिज करते हुए न्यायालय ने दोटूक शब्दों में कहा कि स्कूल के तय ड्रेस कोड के साथ हिजाब पहनना किसी भी प्रकार से इस्लाम की ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ का हिस्सा नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि शैक्षणिक संस्थान का प्राथमिक उद्देश्य छात्रों के बीच बिना किसी धार्मिक भेदभाव के समानता और अनुशासन की भावना पैदा करना है। जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की बेंच ने अपने फैसले में बॉम्बे हाई कोर्ट और कर्नाटक हाई कोर्ट के पिछले फैसलों का भी हवाला दिया और कहा कि विवाद प्राथमिक तौर पर एक संस्था के अनुशासन से जुड़ा है, न कि किसी तरह से धार्मिक आजादी में दखल है।
कोर्ट के फैसले से सेक्युलर राजनीति के मठाधीशों को मिर्ची लगी
इलाहाबाद हाईकोर्ट का जैसे ही यह फैसला आया, तथाकथित सेक्युलर राजनीति के मठाधीशों में छटपटाहट साफ देखी जा सकती है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं का भड़कना तो उनकी चिर-परिचित राजनीति का हिस्सा ही है, लेकिन खुद को राष्ट्रीय और आधुनिक बताने वाली कांग्रेस पार्टी का इस पर बिफरना उसकी असली मंशा को उजागर करता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस स्पष्ट फैसले पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने जो टिप्पणी की, उसने कांग्रेस की वैचारिक दिवालियापन को एक बार फिर देश के सामने ला खड़ा किया है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हिजाब पर दिए फैसले के अहम बिंदू
• इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की मांग वाली 11वीं की एक नाबालिग मुस्लिम छात्रा की याचिका खारिज कर दी।
• हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में नाकाम रही कि हिजाब पहनना मुस्लिम आस्था का जरूरी हिस्सा है।
• जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की बेंच ने अपने फैसले में बॉम्बे हाई कोर्ट और कर्नाटक हाई कोर्ट के पिछले फैसलों का भी हवाला दिया और कहा कि विवाद प्राथमिक तौर पर एक संस्था के अनुशासन से जुड़ा है, न कि किसी तरह से धार्मिक आजादी में दखल है।
• अदालत ने कहा कि अगर किसी एक को इस तरह से यूनिफॉर्म से अलग पहने की इजाजत दी जाती है, तो यूनिफॉर्म पहनने का मूल मकसद ही नाकाम हो सकता है।
हिजाब पहनने की मांग वाली याचिकाकर्ता के तर्क हुए खारिज
• यह मामला प्रयागराज के टैगोर पब्लिक स्कूल से जुड़ा है। इसमें मुस्लिम छात्रा ने कोर्ट में दलील दी थी कि हिजाब पहनना इस्लाम का एक जरूरी हिस्सा है, जो कि उसका मौलिक अधिकार है।
• उसने यह भी दलील दी कि वह इसी स्कूल में क्लास 6 से ही बिना किसी आपत्ति के हिजाब पहनती आ रही है।
• लेकिन, हाई कोर्ट ने कहा कि अगर पहले नहीं रोका गया तो इससे यह जरूरी नहीं हो जाता कि उसे स्कूल की यूनिफॉर्म पॉलिसी को तोड़ने का अधिकार मिल गया है।
खुर्शीद का बयान न्यायिक मर्यादाओं को बौना दिखाने का प्रयास
कांग्रेस नेता खुर्शीद ने यह कहकर फैसले पर विरोध जताया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मामले में संकेत दे चुका है। खुर्शीद ने फैसले के महत्व को कमतर आंकने की कोशिश करते हुए कहा कि इसका कोई दूरगामी या बड़ा असर नहीं पड़ेगा। एक ऐसे नेता से, जो खुद देश का कानून मंत्री रहा हो और देश की सर्वोच्च अदालत का वरिष्ठ अधिवक्ता हो, इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी की उम्मीद नहीं की जा सकती। खुर्शीद का यह बयान सीधे तौर पर देश की उच्च न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र को चुनौती देने और मुस्लिम समाज के भीतर यह संदेश देने का प्रयास है कि कांग्रेस उनकी मजहबी जिद के साथ खड़ी है, चाहे अदालतें कुछ भी कहें। यह कानूनी समझ नहीं, बल्कि शुद्ध रूप से मुस्लिम वोट बैंक को रिझाने का एक हताश राजनीतिक पैंतरा है।
कर्नाटक से यूपी तक: कांग्रेस की तुष्टिकरण की क्रोनोलॉजी
यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस ने हिजाब के मुद्दे पर इस तरह का संकीर्ण रुख अपनाया है। अगर हम कर्नाटक से लेकर उत्तर प्रदेश तक की कड़ियों को जोड़ें, तो कांग्रेस की तुष्टिकरण की एक स्पष्ट क्रोनोलॉजी (क्रम) दिखाई देती है। साल 2022 में जब कर्नाटक के उडुपी से यह विवाद शुरू हुआ था, तब कांग्रेस ने इसे अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने का सबसे बड़ा अवसर माना। डी.के. शिवकुमार और सिद्धारमैया जैसे नेताओं ने तत्कालीन भाजपा सरकार द्वारा लगाए गए हिजाब प्रतिबंध को ‘मानवाधिकारों का हनन’ और ‘मुस्लिम विरोधी’ करार दिया। कांग्रेस ने तब भी स्कूल यूनिफॉर्म की मर्यादा का समर्थन करने के बजाय, सड़क पर उतरकर हिजाब समर्थकों का साथ दिया था। यह पूरी तरह से एक सोची-समझी रणनीति थी, जिसका उद्देश्य कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में मुस्लिम मतों का एकतरफा ध्रुवीकरण अपने पक्ष में करना था।
कर्नाटक में स्कूल-कालेज बने थे धार्मिक ध्रुवीकरण के अखाड़े
मई 2023 में जब कांग्रेस कर्नाटक की सत्ता में आई, तो उसने सबसे पहला काम समाज को बांटने और अपने वोट बैंक को संतुष्ट करने का किया। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने लगातार ऐसे बयान दिए जिससे समाज में वैचारिक खाई और गहरी हो। अंततः, मई 2026 में कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने वह आत्मघाती कदम उठा ही लिया, जिसका डर हर देशभक्त नागरिक को था। कांग्रेस सरकार ने शैक्षणिक संस्थानों में पिछले भाजपा शासन द्वारा लगाए गए पूर्ण हिजाब प्रतिबंध को आधिकारिक तौर पर वापस ले लिया। सरकार ने एक नया आदेश जारी कर स्कूलों में ड्रेस कोड के साथ हिजाब जैसे धार्मिक प्रतीकों को पहनने की छूट दे दी। यह फैसला देश के शिक्षा तंत्र पर एक गहरा आघात था। कांग्रेस ने सत्ता के लालच में आकर स्कूलों को ज्ञान का केंद्र बनाए रखने के बजाय, उन्हें धार्मिक ध्रुवीकरण के अखाड़े में तब्दील कर दिया।
वोट बैंक की राजनीति बनाम आधी आबादी का अधिकार
कांग्रेस हमेशा खुद को महिलाओं के अधिकारों और सशक्तिकरण की सबसे बड़ी पैरोकार बताती है। प्रियंका गांधी ने यूपी में ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ जैसे खोखले नारे दिए। लेकिन उनकी पार्टी कांग्रेस का दोहरा चरित्र हिजाब के मुद्दे पर पूरी तरह बेनकाब हो जाता है। जब ईरान और दुनिया के अन्य हिस्सों में मुस्लिम महिलाएं हिजाब और बुर्के जैसी दमनकारी रूढ़ियों के खिलाफ अपनी जान की बाजी लगा रही हैं, तब देश में कांग्रेस मुस्लिम बेटियों को प्रगतिशीलता से दूर धकेलने में लगी है। कांग्रेस का यह रुख मुस्लिम महिलाओं के सशक्तिकरण के खिलाफ है। वह नहीं चाहती कि मुस्लिम समाज की लड़कियां आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष माहौल में पढ़कर तार्किक सोच अपनाएं। कांग्रेस उन्हें केवल एक ‘थोक वोट बैंक’ के रूप में देखती है, जिसे मजहबी पहचान के दायरे में बांधकर रखना ही उसकी राजनीति को चमकाने का एकमात्र साधन है।
न्यायपालिका की लक्ष्मण रेखा और कांग्रेस की हठधर्मिता
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25) देता है, लेकिन यह अधिकार असीमित या निरपेक्ष नहीं है। संविधान स्पष्ट करता है कि लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन ही यह अधिकार दिया जा सकता है। कर्नाटक हाईकोर्ट से लेकर अब इलाहाबाद हाईकोर्ट तक, देश की न्यायपालिका ने बार-बार यह रेखांकित किया है कि जब कोई छात्र किसी स्कूल या कॉलेज में प्रवेश लेता है, तो वह स्वेच्छा से उस संस्थान के नियमों और अनुशासन को स्वीकार करता है। स्कूल की यूनिफॉर्म छात्र की धार्मिक पहचान को मिटाकर उसे केवल एक ‘विद्यार्थी’ बनाती है। परंतु कांग्रेस इस संवैधानिक और सामाजिक संतुलन को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। उसकी हठधर्मिता यह है कि स्कूल के नियम बदल जाएं, देश का अनुशासन टूट जाए, लेकिन उसका अल्पसंख्यक वोट बैंक खिसकना नहीं चाहिए।

तुष्टिकरण की इस राजनीति का राष्ट्रव्यापी खतरा
कांग्रेस द्वारा की जा रही हिजाब की यह राजनीति केवल किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका राष्ट्रव्यापी खतरा है। जब एक राज्य की सरकार (जैसे कर्नाटक) तुष्टिकरण के दबाव में आकर घुटने टेक देती है, तो इससे देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसी ही असंवैधानिक मांगों को बल मिलता है। मुस्लिम तुष्टिकरण के हिमायतियों को ताकत मिलती है। यदि ऐसी बेकार की मांगें मानी गईं तो कल को किसी अन्य समुदाय के छात्र अपनी धार्मिक पोशाक पहनकर कक्षाओं में बैठने की जिद करेंगे, जिससे हमारे स्कूलों का धर्मनिरपेक्ष और अनुशासित ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगा। कांग्रेस और सलमान खुर्शीद जैसे नेता अपने तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए देश के भविष्य के साथ एक ऐसा खिलवाड़ कर रहे हैं, जिसकी भारी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी।
इलाहाबाद हाई कोर्ट को फैसला रोकना चाहिए था – ओवैसी
कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद का मुस्लिम वोट बैंक प्रेम और सिद्धारमैया का हिजाब प्रेम वास्तव में कांग्रेस के पतन की गाथा को ही और आगे बढ़ा रहा है। लेकिन कम हैदराबाद के सांसद और एआईएमआईएम चीफ असदु्द्दीन ओवैसी भी नहीं हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने उनको भड़का दिया है। उन्होंने कहा है कि कोर्ट होता कौन है यह तय करने वाला कि मुसलमान क्या पहने और क्या न पहने। ओवैसी के मुताबिक हाईकोर्ट को यह भी नहीं कहना चाहिए कि ‘हिजाब मुस्लिम आस्था का जरूरी हिस्सा नहीं’ है।‘ उन्होंने बिना नाम लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ भी भड़काऊ टिप्पणी की है। हैदराबाद स्थित अपने पार्टी हेडक्वार्टर दारुस्सलाम में आयोजित एक जलसे में एआईएमआईएम चीफ ने हिजाब पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के हालिया फैसले पर कहा, ‘मैं हाई कोर्ट के इस जजमेंट के खिलाफ हूं, इससे सहमत नहीं हूं। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच में शबरीमाला पर सुनवाई चल रही है। इलाहाबाद हाई कोर्ट को अपना फैसला रोकना चाहिए था।’









